🌹 जय जय श्री राधे 🌹
ज्ञान को ही मनुष्य की वास्तिवक शिक्त माना गया है वास्तिवक वस्तु वह है जो सदैव रहने वाली हो संसार में हर वस्तु काल पाकर नष्ट हो जाती है धन नष्ट हो जाता है, तन जजर्र हो जाता है, साथी और सहयोगी छूट जाते है केवल ज्ञान ही एक ऐसा अक्षय तत्व है, जो कहीं भी मनुष्य का साथ नहीं छोड़ता।
Thursday, 6 June 2019
मुखंहि बजावत बेनु धनि यह बृन्दावन की रेनु
मुखंहि बजावत बेनु धनि यह बृन्दावन की रेनु,
ब्रजभूमि धन्य है जहां नंदपुत्र श्रीकृष्ण गाय चराते हैं तथा अधरों से बांसुरी बजाते हैं। ऐसी भूमि पर श्यामसुंदर का स्मरण करने से मन को परम शांति मिलती हैं। सूरदास मन को संबोधित करते हुए कहते हैं कि अरे मन ! तू क्यूं इधर-उधर भटकता रहता हैं। ब्रज में ही रह जहां व्यावहारिकता से परे रहकर सुख की प्राप्ति होती है। ब्रज में रहते हुए ब्रजवासियों के झूंठे बर्तनों से जो कुछ प्राप्त हो उसी को ग्रहण करने से ब्रह्ममत्व की प्राप्ति होती हैं। सूरदास कहते हैं की ब्रजभूमि की समानता कामधेनु भी नहीं कर सकती। ब्रजवासी श्याम सुंदर रुप के खजाने है। उनके एक रुप की झलक पाने के लिए गोपियाँ नंद बाबा के यहाँ किसी ना किसी बहाने से आती रहती है और अपने नैनों को कृष्ण के अद्भुत रुप दर्शन से तृप्ति करती हैं। उनके मनोहारी रुप की छठा का पान करने के लिए देवताओं को भी ब्रजभमि में आना पड़ा। कभी भोले बाबा मां यशोदा के द्वार पर साधु भेष में आते हैं तो कभी परम ब्रह्मा भी लीला को देखने आते हैं। जब से माता यशोदा का ये लाला ब्रज में आया है ब्रजवासी प्रतिदिन उत्सव की तरह मनाते हैं। सिर पर मोर मुकुट और पीताम्बर पहने कृष्ण रुप के खजाने लगते हैं। उनका रुप इतना सुंदर है कि हजारों, करोड़ों कामदेव पराजित हो जाएं और जब बंशी बजाते हैं तो सम्पूर्ण ब्रज अपनी सुध-बुध खो बैठता है। पशु-पक्षी सब बांसुरी की धुन सुन मंत्रमुग्ध हो जाते हैं। सब को इस बंशी ने अपने बस में कर रखा है।
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