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Friday, 21 June 2019

सच्ची भक्ति

सच्ची भक्ति

एक बहुत बड़े देश का राजा था उस के देश में एक गरीब सा आदमी रहता था। वो राजा को जब भी किसी बड़े आदमी से हाथ मिलाते देखता तो मन ये विचार लाता कि काश मैं भी राजा से हाथ मिला सकता।
धीरे धीरे उस की ये तम्मना बढ़ती गई। फिर एक दिन उसने ठान लिया कि चाहे कुछ हो जाये मैं राजा से हाथ मिला कर रहूगा।
एक दिन वह आदमी किसी संत के पास गया और अपनी इच्छा बताई। तब संत जी ने कहा कि इस के लिए तुझे सब्र और मेहनत करनी पड़ेगी, क्रोध, लालच का त्याग करना पड़ेगा समय भी लगेगा।
उसने कहा मैं इसके लिए तैयार हूँ। तब संत जी ने बताया कि राजा एक महल तैयार करवा रहा है तुम वहा जाकर बिना किसी लालच के सेवाभाव के इमानदारी से काम करो।
वो आदमी महल में काम करने लगा जब भी शाम को राजा का मंत्री मजदूरी देता तो वो ये कह देता कि अपना ही काम है अपने काम की मजदूरी कैसी और वह दिन रात लगा रहता खाली नहीं बेठता था
वक्त बीतता गया महल तैयार हो गया। उसने महल के चारो और सुंदर सुंदर फूल तथा पेड़ लगा कर महल को इतना खुबसुरत बना दिया कि जो भी देखता, देखता ही रह जाता।
एक दिन राजा महल देखने के लिए आया तो महल देखकर बहुत खुश हुआ। तब मंत्री से बोला कि इतनी सजावट किसने की है। तब मंत्री बोला जी हजूर ये कोई आप का ही रिश्तेदार है।
राजा हेरानी से बोला हमारा रिश्तेदार..!!
मंत्री जी हजूर आपका ही रिश्तेदार है, उसने ना तो 12 साल से मजदूरी ली है और दूसरे मजदूरो से अधिक काम किया है दिन रात लगा रहता है।
जब भी मजदूरी देने की बात होती है तब यही कहता है कि अपना ही काम है अपने काम की मजदूरी कैसी।
राजा सोच में पड़ गया कि ऐसा कोन सा रिश्तेदार है। फिर राजा ने कहा उसे बुलाओ।
उसे बुलाया गया तब राजा ने उसका खड़े होकर स्वागत किया और हाथ मिलाया। फिर राजा ने उससे उसका परिचय लिया।
परिचय के बाद राजा को हेरानी हुई कि ये रिश्तेदार भी नहीं है और मजदूरी भी नहीं ली और सेवाभाव से काम भी किया,
राजा बहुत खुश हुआ और कहा मांगो क्या मांगते हो।
तब उसने कहा जी कुछ नहीं, जो चाहता था आपसे मिल गया तब उसने सारी बात बताई।
तब राजा ने कहा कि अब तेरा मुझ से हाथ मिल गया है अब तू बेपरवाह है सब सुख तेरे अधीन है अब तू भी बादशाह है। जो कुछ मेरा है वह तेरा है।
मतलब ये है कि हमे उस मालिक बादशाह की भक्ति जी जान से दिल लगा कर पूरी इमानदारी से सिर्फ उस को प्राप्त करने के लिए करनी चाहिए जब उससे अपना हाथ मिल गया तो कोई कमी नहीं ।
अगर एक दुनिया का राजा खुश हो कर इतना कुछ दे सकता है। तो खुद मालिक परमात्मा से हाथ मिलाने पर क्या कमी होगी।
सो अर्ज है कि अपने परमात्मा को खुश करो चाहे जैसे भी करो। यही सच्ची भक्ति है। उससे हाथ मिलाकर उस जैसे हो जाओ वह बादशाह है तुम्हे भी बादशाह बना देगा।

तेरे ना होने से ज़िन्दगी की  तस्वीर बदल जायेगी
तू साथ है तो बिगड़ी तक़दीर बदल जायेगी
अपना बना कर कभी दूर मत जाना
तेरी  जुदाई से  " सांवरे " ज़िन्दगी बिखर जायेगी
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छबील क्यूं लगाई जाती है

 छबील क्यूं लगाई जाती है

श्री गुरु अर्जुनदेव जी को जिस दिन गर्म तवी पर बिठाया गया,उसी शाम को गुरु जी को वापिस जेल मे डाल दिया गया, और बहुत सख्त पहरा लगा दिया गया कि कोई भी गुरुजी से मिल ना सके, उस समय चँदू लाहोर का नवाब था।
जिसके हुकुम से ये सब हूआ था, उसी रात को चँदू की पत्नी, चँदू का पुत्र कर्मचंद और पुत्रवधू गुरु अर्जुनदेव जी से मिलने जेल मे गए तो सिपाहियों ने उन्हें आगे नहीं जाने दिया, तो चँदू की पत्नी और पुत्रवधू ने अपने सारे जेवरात उतार कर सिपाहियों को दे दिये और उस जगह पहुंच गए जहाँ गुरु जी कैद थे।
जब चँदू के परिवार ने गुरुजी की हालत देखी तो सभी रोने लगे कि इतने बड़े महापुरुष के साथ ऐसा सलूक ?
तब चँदू की पत्नी ने कहा गुरुजी मैं आपके लिए ठंडा मिठा शरबत लेकर आई हूँ कृपया करके शरबत पी लिजिए, ये कहते हुए शरबत का गिलास गुरुजी के आगे रख दिया, तो गुरुजी ने मना कर दिया और कहा हम परण कर चुके हैं कि हम चँदू के घर का पानी भी नहीं पियेंगे।ये सुन कर चँदू की पत्नी की आँखें भर आईऔर बोली कि मैंने तो सुना है कि गुरुजी के घर से कोई खाली हाथ नहीं गया पर ?
तब गुरु जी ने वचन किया कि माता इस मुख से तो मैं तेरा शरबत नहीं पियूँगा, पर हां एक समय ऐसा जरुर आएगा जब ये जो शरबत आप लेकर आयीं हैं, आपके नाम का ये शरबत हजारों लोग पिलाएंगे और लाखों लोग पिएंगे।आपकी सेवा सफल होगी।
आज ये छबील लगाई और पिलाई जाती है ये गुरु अर्जुन देव जी का वचन है, ये है छबील का इतिहास जो देश के हर गांव और शहर में ठंडे मिठे पानी की छबीलें लगाई जाती है।
तब चँदू की पुत्रवधू ने गुरु जी से विनती की,कि महाराज कल आपको शहीद कर दिया जयेगा, मेरी आपसे एक ही विनती है कि कल जब आप ये शरीर रुपी चोला छोड़ो तो मैं भी अपना शरीर छोड़ दूँ,मैं लोगों के ताने नहीं सुन सकती कि वो देखो चँदू की पुत्रवधू जा रही जिसके ससुर ने श्री गुरू अर्जुन देव जी को शहीद किया था।अगले दिन जब गुरु जी को शहीद किया गया तो चँदू की पुत्रवधू भी शरीर त्याग गई।
ये होता है अपने गुरु से सच्चा प्यार और गुरु के प्रति श्रध्दा।
बातों से कभी ईश्वर नहीं मिलता, यहां तो 90-90साल के बुर्जुग भी मरने को तैयार नहीं, पर धन है चँदू की पुत्रवधू

कष्टों से मुक्ति एवं धन प्राप्ति के उपाय

कष्टों से मुक्ति एवं धन प्राप्ति के उपाय


  1. गाय को प्रतिदिन तेल लगाकर रोटियां अवश्य खिलाएं प्रत्येक बुधवार को गाय को हरा चारा खिलाएं इससे आपके धन आने के रास्ते में जो बाधाएं हैं वह दूर हो जाएंगे
  2. प्रतिदिन अपने माता-पिता का आशीर्वाद लें एवं घर के बड़े बुजुर्गों की सेवा करें उन को प्रसन्न रखें और उनका आशीर्वाद लें
  3. सूर्योदय एवं सूर्यास्त के समय 48 मिनट के अंदर एक माला गायत्री मंत्र का जाप करें एवं दीपक जलाएं सभी कष्टों से छुटकारा मिलेगा
  4. अपने जन्मदिन पर रुद्राभिषेक करवाएं ,अपने जन्म नक्षत्र का उपाय करके घर से बाहर निकलने से आपको सभी कामों में सफलता मिलेगी
  5. एक तांबे का सिक्का लंबी यात्रा के दौरान बहते हुए जल में प्रवाहित करें ,कहीं घर से बाहर जाना हो काम के सिलसिले में तो घर के बड़े बुजुर्गों को प्रणाम करके चरण स्पर्श करके घर से बाहर निकलें उनका आशीर्वाद लेकर
  6. किसी विशेष काम से घर से निकलना हो तो हींग हाथ में लेकर अपने ऊपर से उतारकर उत्तर दिशा में फेंक दें फिर घर से बाहर जाएं आपका कार्य सिद्ध हो जाएगा
  7. यात्रा के समय एक लाल धागा अपने पास अवश्य रखें लौटने के बाद में उसको तुलसी के पेड़ में
  8. यात्रा में जाते समय नाभि में शहद लगाकर जाएं कार्य सिद्ध होगा
  9. विशेष कार्य के लिए जाने पर सफेद धागे पर तुलसी के रस को लगा कर ले जाएं
  10. कठिन कार्य सिद्धि के लिए जाते समय एक सुपारी में कलावा लपेट कर उसकी पूजा करके साथ में लेकर जाएं कार्य सिद्ध होगा
  11. गुड़ और सफेद इलायची वाली चाय पीकर जाने से आकर्षण बढ़ता है
  12. निर्जन एवं सुनसान स्थानों पर बैठकर शांति मन से अपने पूर्वजों को याद कर प्रार्थना करें एवम पंचतत्वों वायु जल अग्नि आकाश पृथ्वी से प्रार्थना करें अपनी समस्या के समाधान के लिए मन ही मन निवेदन करें ऐसा करते हुए 5 अगरबत्तियां चलाएं जब तक कार्य सिद्ध ना हो जाए तब तक यह प्रयोग करते रहे
  13. महामृत्युंजय मंत्र का जाप करें महामृत्युंजय मंत्र का जाप करने से सूर्यादि नवग्रह सभी देवी देवता प्रसन्न होते हैं जाप करने से बहुत सी परेशानियां स्वता ही समाप्त हो जाती हैं
  14. धन प्राप्ति के लिए जल में शहद मिलाकर अभिषेक करें एवं महामृत्युंजय का नियमित जाप करें
  15. शनिदेव को प्रसन्न करने के लिए काले घोड़े की नाल का छल्ला बनवाएं एवं सिद्ध करके मध्यमा अंगुली में धारण करने से शनिदेव के कोप शांत होते है
  16. काले रंग के 11 कंबल दान करने से सभी परेशानियां खत्म हो जाती है इन उपायों से सभी परेशानियां 1 वर्ष में समाप्त होना शुरू हो जाती है
  17. धन वृद्धि के लिए लाल कपड़े में मोती शंख बांधकर तिजोरी में रखें इससे घर में बरकत होगी धन की वृद्धि होगी
  18. कुछ नोटों पर चंदन का इत्र लगाकर तिजोरी में रखें बरकत के रूप में घर में धन की कमी कभी नहीं रहेगी
  19. रात में एक गिलास दूध चढ़ाने रखें सुबह उठकर उसे बबूल के वृक्ष में डाल दें आर्थिक स्थिति में सुधार होने लग जाएगा क्या कार्य कम से कम चार 41 दिन अवश्य करें
  20. एकाक्षी नारियल पूजा करके सिद्ध कराकर लाल वस्त्र में लपेटकर लक्ष्मी स्वरूप मानकर व्यापार स्थल के तिजोरी में रख दें धन आने में रुकावट दूर होगी
  21. सात मोर पंख लेकर उसमें गुलाब का इत्र लगाकर रेशमी वस्त्र में बांधकर तिजोरी का धन रखने के स्थान पर रख दें बरक्कत होना प्रारंभ हो जाएगी
  22. घर में जो झाड़ू लगाते हैं उस में काला धागा बांधकर झाड़ू लगाने के बाद छुपा के रख दे मां लक्ष्मी की कृपा आनी प्रारंभ हो जाएगी घर में धन की कमी नहीं रहेगी
  23. सुबह ब्रह्म मुहूर्त में तीन झाड़ू चुपचाप किसी भी मंदिर में रख कर चले जाएं पीछे मुड़कर ना देखें व्यापार में घाटा बना धीरे-धीरे बंद हो जाएगा
  24. व्यापार स्थल में शुद्ध स्फटिक यास पारद का श्री यंत्र स्थापित करें प्रतिदिन धूप दीप नैवेद्य से पूजा करें
  25. व्यापार स्थल पर किसी ब्राह्मण द्वारा गोपाल सहस्रनाम स्तोत्र का पाठ नित्य करवाने से व्यापार में बरक्कत होती है धन-धान्य की स्थिति मजबूत होती है व्यापार वृद्धि की ओर बढ़ता है व्यापार में लाभ होता है
  26. शनिवार या मंगलवार को पीपल के 12 पत्ते तोड़ना सभी में सीताराम लिखें 11 पत्ते की माला बनाएं और एक पत्ते में सफेद बर्फी का भोग हनुमान जी को लगाएं एवं माला हनुमान जी को पहनाकर 7 बार हनुमान चालीसा का पाठ करें सभी मनोकामनाएं पूर्ण होना प्रारंभ हो जाएंगी धन की कमी दूर होना प्रारंभ हो जाएगी
  27. लक्ष्मी प्राप्ति के लिए बिल्ली के नाल शुभ मुहूर्त में शुद्ध करवा कर अपने पास रखें धन-धान्य की कमी नहीं रहेगी

महाशिवरात्री

महाशिवरात्रि के शुभ अवसर पर पढ़े माता पार्वती ओर भोलेनाथ के विवाह की कथा...

महाशिवरात्री...
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तुलसीदास जी कहते हैं शिव-पार्वती के विवाह की इस कथा को जो स्त्री-पुरुष कहेंगे और गाएँगे, वे कल्याण के कार्यों और विवाहादि मंगलों में सदा सुख पाएँगे।

यह उमा संभु बिबाहु जे नर नारि कहहिं जे गावहीं। कल्यान काज बिबाह मंगल सर्बदा सुखु पावहीं॥

सब देवता अपने भाँति-भाँति के वाहन और विमान सजाने लगे, कल्याणप्रद मंगल शकुन होने लगे और अप्सराएँ गाने लगीं॥ सभी अपना अपना श्रृंगार कर रहे हैं लेकिन भगवान शिव का श्रृंगार अब तक किसी ने नही किया है।

सिवहि संभु गन करहिं सिंगारा। जटा मुकुट अहि मौरु सँवारा॥  कुंडल कंकन पहिरे ब्याला। तन बिभूति पट केहरि छाला॥

शिवजी के गण शिवजी का श्रृंगार करने लगे।
जटाओं का मुकुट बनाकर उस पर साँपों का मौर सजाया गया। शिवजी ने साँपों के ही कुंडल और कंकण पहने, शरीर पर विभूति रमायी और वस्त्र की जगह बाघम्बर लपेट लिया॥
शिवजी के सुंदर मस्तक पर चन्द्रमा, सिर पर गंगाजी, तीन नेत्र, साँपों का जनेऊ, गले में विष और छाती पर नरमुण्डों की माला थी।

भोले नाथ का उबटन किया गया है। लेकिन हल्दी से नहीं, जले हुए मुर्दों की राख से। क्योंकि भोले नाथ को मुर्दों से भी प्यार है। एक बार भोले बाबा निकल रहे थे किसी की शव यात्रा जा रही थी। लोग कहते हुए जा रहे थे राम नाम सत्य है।

भोले नाथ ने सुना की ये सब राम का नाम लेते हुए जा रहे हैं। ये सभी मेरी पार्टी के लोग हैं। क्योंकि मुझे राम नाम से प्यार है। लेकिन जैसे ही लोगों ने उस मुर्दे को जलाया तो लोगों ने राम नाम सत्य कहना बंद कर दिया। और सभी वहां से चले गए।

भोले नाथ ने कहा अरे! इन सबने राम नाम सत्य कहना बंद कर दिया इनसे अच्छा तो ये मुर्दा है जिसने राम नाम सुनकर यहाँ राम नाम की समाधी लगा दी। मुझे तो इनकी चिता से और इनकी भस्म से ही प्रेम है। इसलिए मैं इनकी भस्म को अपने शरीर पर धारण करूँगा।

एक हाथ में त्रिशूल और दूसरे में डमरू सुशोभित है। शिवजी बैल पर चढ़कर चले। बाजे बज रहे हैं। शिवजी को देखकर देवांगनाएँ मुस्कुरा रही हैं (और कहती हैं कि) इस वर के योग्य दुलहिन संसार में नहीं मिलेगी॥

 विष्णु और ब्रह्मा आदि देवताओं के समूह अपने-अपने वाहनों (सवारियों) पर चढ़कर बारात में चले। तब विष्णु भगवान ने सब दिक्पालों को बुलाकर हँसकर ऐसा कहा- सब लोग अपने-अपने दल समेत अलग-अलग होकर चलो॥ हे भाई! हम लोगों की यह बारात वर के योग्य नहीं है। क्या पराए नगर में जाकर हँसी कराओगे? विष्णु भगवान की बात सुनकर देवता मुस्कुराए और वे अपनी-अपनी सेना सहित अलग हो गए॥

महादेवजी (यह देखकर) मन-ही-मन मुस्कुराते हैं कि विष्णु भगवान के व्यंग्य-वचन (दिल्लगी) नहीं छूटते! अपने प्यारे (विष्णु भगवान) के इन अति प्रिय वचनों को सुनकर शिवजी ने भी भृंगी को भेजकर अपने सब गणों को बुलवा लिया॥ शिवजी की आज्ञा सुनते ही सब चले आए और उन्होंने स्वामी के चरण कमलों में सिर नवाया। तरह-तरह की सवारियों और तरह-तरह के वेष वाले अपने समाज को देखकर शिवजी हँसे॥

शिवजी की बारात कैसी है जरा देखिये- कोई बिना मुख का है, किसी के बहुत से मुख हैं, कोई बिना हाथ-पैर का है तो किसी के कई हाथ-पैर हैं। किसी के बहुत आँखें हैं तो किसी के एक भी आँख नहीं है। कोई बहुत मोटा-ताजा है, तो कोई बहुत ही दुबला-पतला है॥

 कोई बहुत दुबला, कोई बहुत मोटा, कोई पवित्र और कोई अपवित्र वेष धारण किए हुए है। भयंकर गहने पहने हाथ में कपाल लिए हैं और सब के सब शरीर में ताजा खून लपेटे हुए हैं। गधे, कुत्ते, सूअर और सियार के से उनके मुख हैं। गणों के अनगिनत वेषों को कौन गिने?

 बहुत प्रकार के प्रेत, पिशाच और योगिनियों की जमाते हैं। उनका वर्णन करते नहीं बनता।
भूत-प्रेत नाचते और गाते हैं, वे सब बड़े मौजी हैं। देखने में बहुत ही बेढंगे जान पड़ते हैं और बड़े ही विचित्र ढंग से बोलते हैं॥ जैसा दूल्हा है, अब वैसी ही बारात बन गई है।

आप सोचे रहे होंगे की भोले नाथ इन बहुत प्रेत को लेकर क्यों जा रह हैं इसके पीछे भी एक कथा है।

जिस समय भगवान राम का विवाह हो रहा था उस समय सभी विवाह में पधारे थे। सभी देवता, सभी गन्धर्व इत्यादि। भोले नाथ भी विवाह में दर्शन करने के लिए जा रहे थे। तभी भोले बाबा ने देखा की कुछ लोग मार्ग में बैठकर रो रहे हैं। शिव कृपा के धाम हैं और करुणा करने वाले हैं। भोले नाथ ने उनसे पूछा की तुम क्यों रो रहे हो? आज तो मेरे राम का विवाह हो रहा है। आप रो रहे हो। रामजी के विवाह में नहीं चल रहे?

वो बोले- हमे कौन लेकर जायेगा? हम अमंगल हैं, हम अपशगुन हैं। दुनिया के घर में कोई भी शुभ कार्य हो तो हमे कोई नहीं बुलाता है।
भोले नाथा का ह्रदय करुणा से भर गया- तुरंत बोल पड़े की कोई बात नहीं राम विवाह में मत जाना तुम, पर मेरे विवाह में तुम्हे पूरी छूट होगी। तुम सारे अमंगल-अपशगुन आ जाना। इसलिए आज सभी मौज मस्ती से शिव विवाह में झूमते हुए जा रहे हैं।

बारात को नगर के निकट आई सुनकर नगर में चहल-पहल मच गई, जिससे उसकी शोभा बढ़ गई। अगवानी करने वाले लोग बनाव-श्रृंगार करके तथा नाना प्रकार की सवारियों को सजाकर आदर सहित बारात को लेने चले॥ देवताओं के समाज को देखकर सब मन में प्रसन्न हुए और विष्णु भगवान को देखकर तो बहुत ही सुखी हुए, किन्तु जब शिवजी के दल को देखने लगे तब तो उनके सब वाहन (सवारियों के हाथी, घोड़े, रथ के बैल आदि) डरकर भाग चले॥

क्या कहें, कोई बात कही नहीं जाती। यह बारात है या यमराज की सेना? दूल्हा पागल है और बैल पर सवार है। साँप, कपाल और राख ही उसके गहने हैं॥ दूल्हे के शरीर पर राख लगी है, साँप और कपाल के गहने हैं, वह नंगा, जटाधारी और भयंकर है। उसके साथ भयानक मुखवाले भूत, प्रेत, पिशाच, योगिनियाँ और राक्षस हैं, जो बारात को देखकर जीता बचेगा, सचमुच उसके बड़े ही पुण्य हैं और वही पार्वती का विवाह देखेगा। लड़कों ने घर-घर यही बात कही।

शिव का चंद्रशेखर रूप,,,,पार्वती की माता मैना के भीतर अहंकार था। आज भोले नाथ इस अहंकार को नष्ट करना चाहते हैं। इसलिए उन्होंने भगवान विष्णु और ब्रह्माजी से कहा- आप दोनों मेरी आज्ञा से अलग-अलग गिरिराज के द्वार पर पहुँचिये। शिवजी की आज्ञा मानकर भगवान विष्णु सबसे पहले हिमवान के द्वार पर पधारे हैं।

मैना (पार्वतीजी की माता) ने शुभ आरती सजाई और उनके साथ की स्त्रियाँ उत्तम मंगलगीत गाने लगीं॥ सुंदर हाथों में सोने का थाल शोभित है, इस प्रकार मैना हर्ष के साथ शिवजी का परछन करने चलीं। जब मैना ने विष्णु के अलोकिक रूप को देखा तो प्रसन्न होकर नारद जी से पूछा है- नारद! क्या ये ही मेरी शिवा के शिव हैं?

नारदजी बोले- नहीं, ये तो भगवान हैं श्री हरि हैं। पार्वती के पति तो और भी अलोकिक हैं। उनकी शोभा का वर्णन नहीं हो सकता है। इस प्रकार एक एक देवता आ रहे हैं, मैना उनका परिचय पूछती हैं और नारद जी उनको शिव का सेवक बताते हैं।

फिर उसी समय भगवान शिव अपने शिवगणों के साथ पधारे हैं। सभी विचित्र वेश-भूषा धारण किये हुए हैं। कुछ के मुख ही नहीं है और कुछ के मुख ही मुख हैं। उनके बीच में भगवान शिव अपने नाग के साथ पधारे हैं।

अब भोले बाबा से द्वार पर शगुन माँगा गया है। भोले बाबा बोले की भैया, शगुन क्या होता है?
किसी ने कहा की आप अपनी कोई प्रिय वास्तु को दान में दीजिये। भोले बाबा ने अपने गले से सर्प उतारा और उस स्त्री के हाथ में रख दिया जो शगुन मांग रही थी। वहीँ मूर्छित हो गई। इसके बाद जब महादेवजी को भयानक वेष में देखा तब तो स्त्रियों के मन में बड़ा भारी भय उत्पन्न हो गया॥ बहुत ही डर के मारे भागकर वे घर में घुस गईं और शिवजी जहाँ जनवासा था, वहाँ चले गए। कुछ डर के मारे कन्या पक्ष(मैना जी) वाले मूर्छित हो गए हैं।

जब मैना जी को होश आया है तो रोते हुए कहा-चाहे कुछ भी हो जाये मैं इस भेष में अपनी बेटी का विवाह शिव से नहीं कर सकती हूँ। उन्होंने पार्वती से कहा-  मैं तुम्हें लेकर पहाड़ से गिर पड़ूँगी, आग में जल जाऊँगी या समुद्र में कूद पड़ूँगी। चाहे घर उजड़ जाए और संसार भर में अपकीर्ति फैल जाए, पर जीते जी मैं इस बावले वर से तुम्हारा विवाह न करूँगी।

नारद जी को भी बहुत सुनाया है। मैंने नारद का क्या बिगाड़ा था, जिन्होंने मेरा बसता हुआ घर उजाड़ दिया और जिन्होंने पार्वती को ऐसा उपदेश दिया कि जिससे उसने बावले वर के लिए तप किया॥ सचमुच उनके न किसी का मोह है, न माया, न उनके धन है, न घर है और न स्त्री ही है, वे सबसे उदासीन हैं। इसी से वे दूसरे का घर उजाड़ने वाले हैं। उन्हें न किसी की लाज है, न डर है। भला, बाँझ स्त्री प्रसव की पीड़ा को क्या जाने॥

ये सब सुनकर पार्वती अपनी माँ से बोली- हे माता! कलंक मत लो, रोना छोड़ो, यह अवसर विषाद करने का नहीं है। मेरे भाग्य में जो दुःख-सुख लिखा है, उसे मैं जहाँ जाऊँगी, वहीं पाऊँगी! पार्वतीजी के ऐसे विनय भरे कोमल वचन सुनकर सारी स्त्रियाँ सोच करने लगीं और भाँति-भाँति से विधाता को दोष देकर आँखों से आँसू बहाने लगीं।

फिर ऐसा कहकर पार्वती शिव के पास गई हैं। और उन्होंने निवेदन किया है हे भोले नाथ! मुझे सभी रूप और सभी वेश में स्वीकार हो। लेकिन प्रत्येक माता पिता की इच्छा होती है की उनका दामाद सुंदर हो। तभी वहां विष्णु जी आ जाते हैं। और कहते है- पार्वती जी! आप चिंता मत कीजिये।

 आज जो भोले बाबा का रूप बनेगा उसे देखकर सभी दांग रह जायेंगे। आप ये ज़िम्मेदारी मुझ पर छोड़िये। अब भगवान विष्णु ने भगवान शिव का सुंदर श्रृंगार किया है। और सुंदर वस्त्र पहनाये हैं। करोड़ों कामदेव को लज्जित करने वाला रूप बनाया है भोले बाबा का। भोले बाबा के इस रूप को आज भगवान विष्णु ने चंद्रशेखर नाम दिया है। बोलिए चंद्रशेखर शिव जी की जय!!

इस समाचार को सुनते ही हिमाचल उसी समय नारदजी और सप्त ऋषियों को साथ लेकर अपने घर गए॥ तब नारदजी ने पूर्वजन्म की कथा सुनाकर सबको समझाया (और कहा) कि हे मैना! तुम मेरी सच्ची बात सुनो, तुम्हारी यह लड़की साक्षात जगज्जनी भवानी है॥ पहले ये दक्ष के घर जाकर जन्मी थीं, तब इनका सती नाम था, बहुत सुंदर शरीर पाया था। वहाँ भी सती शंकरजी से ही ब्याही गई थीं।

एक बार मोहवश इन्होने शंकर जी का कहना नहीं माना। और भगवान राम की परीक्षा ली। भगवान शिव ने इनका त्याग कर दिया और इन्होने अपनी देह का त्याग कर दिया। फिर इन्होने आपके घर पार्वती के रूप में जन्म लिया है।

 ऐसा जानकर संदेह छोड़ दो, पार्वतीजी तो सदा ही शिवजी की प्रिया (अर्द्धांगिनी) हैं। और आप ये भी चिंता ना करो की भोले बाबा का रूप ऐसा हैऐसा जानकर संदेह छोड़ दो, पार्वतीजी तो सदा ही शिवजी की प्रिया (अर्द्धांगिनी) हैं। आप देखना भोले बाबा के नए रूप को। जिसे भगवान हरि ने स्वयं अपने हाथो से सजाया है। तब नारद के वचन सुनकर सबका विषाद मिट गया और क्षणभर में यह समाचार सारे नगर में घर-घर फैल गया॥

तब मैना और हिमवान आनंद में मग्न हो गए। और जैसे ही भगवान शिव के दिव्य चंद्रशेखर रूप का दर्शन किया है। मैंने मैया तो देखते ही रह गई। उन्होंने अपने दामाद की शोभा देखि और आरती उतारकर घर में चली गई।

शिव पार्वती विवाह,,,,,नगर में मंगल गीत गाए जाने लगे और सबने भाँति-भाँति के सुवर्ण के कलश सजाए। जिस घर में स्वयं माता भवानी रहती हों, वहाँ की ज्योनार (भोजन सामग्री) का वर्णन कैसे किया जा सकता है?

 हिमाचल ने आदरपूर्वक सब बारातियों, विष्णु, ब्रह्मा और सब जाति के देवताओं को बुलवाया॥ भोजन (करने वालों) की बहुत सी पंगतें बैठीं। चतुर रसोइए परोसने लगे। स्त्रियों की मंडलियाँ देवताओं को भोजन करते जानकर कोमल वाणी से गालियाँ देने लगीं॥ और व्यंग्य भरे वचन सुनाने लगीं।

 देवगण विनोद सुनकर बहुत सुख अनुभव करते हैं, इसलिए भोजन करने में बड़ी देर लगा रहे हैं। भोजन कर चुकने पर) सबके हाथ-मुँह धुलवाकर पान दिए गए। फिर सब लोग, जो जहाँ ठहरे थे, वहाँ चले गए।

फिर मुनियों ने लौटकर हिमवान्‌ को लगन (लग्न पत्रिका) सुनाई और विवाह का समय देखकर देवताओं को बुला भेजा॥
वेदिका पर एक अत्यन्त सुंदर दिव्य सिंहासन था। ब्राह्मणों को सिर नवाकर और हृदय में अपने स्वामी श्री रघुनाथजी का स्मरण करके शिवजी उस सिंहासन पर बैठ गए।

फिर मुनीश्वरों ने पार्वतीजी को बुलाया। सखियाँ श्रृंगार करके उन्हें ले आईं। पार्वतीजी को जगदम्बा और शिवजी की पत्नी समझकर देवताओं ने मन ही मन प्रणाम किया। भवानीजी सुंदरता की सीमा हैं। करोड़ों मुखों से भी उनकी शोभा नहीं कही जा सकती॥

सुंदरता और शोभा की खान माता भवानी मंडप के बीच में, जहाँ शिवजी थे, वहाँ गईं। वे संकोच के मारे पति (शिवजी) के चरणकमलों को देख नहीं सकतीं, परन्तु उनका मन रूपी भौंरा तो वहीं (रसपान कर रहा) था।

मुनियों की आज्ञा से शिवजी और पार्वतीजी ने गणेशजी का पूजन किया। मन में देवताओं को अनादि समझकर कोई इस बात को सुनकर शंका न करे (कि गणेशजी तो शिव-पार्वती की संतान हैं, अभी विवाह से पूर्व ही वे कहाँ से आ गए?)

पर्वतराज हिमाचल ने हाथ में कुश लेकर तथा कन्या का हाथ पकड़कर उन्हें भवानी (शिवपत्नी) जानकर शिवजी को समर्पण किया॥ जब महेश्वर (शिवजी) ने पार्वती का पाणिग्रहण किया, तब (इन्द्रादि) सब देवता हृदय में बड़े ही हर्षित हुए। श्रेष्ठ मुनिगण वेदमंत्रों का उच्चारण करने लगे और देवगण शिवजी का जय-जयकार करने लगे॥ अनेकों प्रकार के बाजे बजने लगे। आकाश से नाना प्रकार के फूलों की वर्षा हुई। शिव-पार्वती का विवाह हो गया। सारे ब्राह्माण्ड में आनंद भर गया॥

बहुत प्रकार का दहेज देकर, फिर हाथ जोड़कर हिमाचल ने कहा- हे शंकर! आप पूर्णकाम हैं, मैं आपको क्या दे सकता हूँ? (इतना कहकर) वे शिवजी के चरणकमल पकड़कर रह गए। तब कृपा के सागर शिवजी ने अपने ससुर का सभी प्रकार से समाधान किया।

फिर प्रेम से परिपूर्ण हृदय मैनाजी ने शिवजी के चरण कमल पकड़े (और कहा- नाथ उमा मम प्रान सम गृहकिंकरी करेहु। छमेहु सकल अपराध अब होइ प्रसन्न बरु देहु॥

हे नाथ! यह उमा मुझे मेरे प्राणों के समान (प्यारी) है। आप इसे अपने घर की टहलनी बनाइएगा और इसके सब अपराधों को क्षमा करते रहिएगा। अब प्रसन्न होकर मुझे यही वर दीजिए॥

शिवजी ने बहुत तरह से अपनी सास को समझाया। फिर माता ने पार्वती को बुला लिया और गोद में बिठाकर यह सुंदर सीख दी- -हे पार्वती! तू सदाशिवजी के चरणों की पूजा करना, नारियों का यही धर्म है। उनके लिए पति ही देवता है और कोई देवता नहीं है। इस प्रकार की बातें कहते-कहते उनकी आँखों में आँसू भर आए और उन्होंने कन्या को छाती से चिपटा लिया॥

पार्वतीजी माता से फिर मिलकर चलीं, सब किसी ने उन्हें योग्य आशीर्वाद दिए। हिमवान्‌ अत्यन्त प्रेम से शिवजी को पहुँचाने के लिए साथ चले। वृषकेतु (शिवजी) ने बहुत तरह से उन्हें संतोष कराकर विदा किया॥

पर्वतराज हिमाचल तुरंत घर आए और उन्होंने सब पर्वतों और सरोवरों को बुलाया। हिमवान ने आदर, दान, विनय और बहुत सम्मानपूर्वक सबकी विदाई की॥

जब शिवजी कैलास पर्वत पर पहुँचे, तब सब देवता अपने-अपने लोकों को चले गए। (तुलसीदासजी कहते हैं कि) पार्वतीजी और शिवजी जगत के माता-पिता हैं, इसलिए मैं उनके श्रृंगार का वर्णन नहीं करता॥

शिव-पार्वती विविध प्रकार के भोग-विलास करते हुए अपने गणों सहित कैलास पर रहने लगे। वे नित्य नए विहार करते थे। इस प्रकार बहुत समय बीत गया॥ तब छ: मुखवाले पुत्र (स्वामिकार्तिक) का जन्म हुआ, जिन्होंने (बड़े होने पर) युद्ध में तारकासुर को मारा। वेद, शास्त्र और पुराणों में स्वामिकार्तिक के जन्म की कथा प्रसिद्ध है और सारा जगत उसे जानता है॥

तुलसीदास जी कहते हैं शिव-पार्वती के विवाह की इस कथा को जो स्त्री-पुरुष कहेंगे और गाएँगे, वे कल्याण के कार्यों और विवाहादि मंगलों में सदा सुख पाएँगे।

 यह उमा संभु बिबाहु जे नर नारि कहहिं जे गावहीं। कल्यान काज बिबाह मंगल सर्बदा सुखु पावहीं॥
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 हर हर महादेव

मकर संक्रांति क्या है?

विशेष मकर सक्रांति

मकर संक्रांति क्या है?


सूर्य के एक राशि से दूसरी राशि में जाने को ही संक्रांति कहते हैं. एक संक्रांति से दूसरी संक्रांति के बीच का समय ही सौर मास है. वैसे तो सूर्य संक्रांति 12 हैं, लेकिन इनमें से चार संक्रांति महत्वपूर्ण हैं जिनमें मेष, कर्क, तुला, मकर संक्रांति हैं. मकर संक्रांति के शुभ मुहूर्त में स्नानए दान और पुण्य के शुभ समय का विशेष महत्व है.

मकर संक्रांति के पावन पर्व पर गुड़ और तिल लगाकर नर्मदा में स्नान करना लाभदायी होता है. इसके बाद दान संक्रांति में गुड़, तेल, कंबल, फल, छाता आदि दान करने से लाभ मिलता है और पुण्यफल की प्राप्ति होती है. 14 जनवरी ऐसा दिन है, जब धरती पर अच्छे दिन की शुरुआत होती है. ऐसा इसलिए कि सूर्य दक्षिण के बजाय अब उत्तर को गमन करने लग जाता है. जब तक सूर्य पूर्व से दक्षिण की ओर गमन करता है तब तक उसकी किरणों का असर खराब माना गया है, लेकिन जब वह पूर्व से उत्तर की ओर गमन करते लगता है तब उसकी किरणें सेहत और शांति को बढ़ाती हैं.                                ☀✨मकर संक्रांति के 10 रोचक तथ्य ✨☀

उन त्योहार, पर्व या उत्सवों को मनाने का महत्व अधिक है जिनकी उत्पत्ति स्थानीय परम्परा, व्यक्ति विशेष या संस्कृति से न होकर जिनका उल्लेख वैदिक धर्मग्रंथ, धर्मसूत्र और आचार संहिता में मिलता है। ऐसे कुछ पर्व हैं और इनके मनाने के अपने नियम भी हैं। इन पर्वों में सूर्य-चंद्र की संक्रांतियों और कुम्भ का अधिक महत्व है। सूर्य संक्रांति में मकर सक्रांति का महत्व ही अधिक माना गया है। माघ माह में कृष्ण पंचमी को मकर सक्रांति देश के लगभग सभी राज्यों में अलग-अलग सांस्कृतिक रूपों में मनाई जाती है। आओ जानते हैं कि मकर संक्रांति के दिन कौन कौन से खास कार्य होते हैं.

1. क्यों कहते हैं मकर संक्रांति?
मकर संक्रांति में 'मकर' शब्द मकर राशि को इंगित करता है जबकि 'संक्रांति' का अर्थ संक्रमण अर्थात प्रवेश करना है। मकर संक्रांति के दिन सूर्य धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश करता है। एक राशि को छोड़कर दूसरे में प्रवेश करने की इस विस्थापन क्रिया को संक्रांति कहते हैं। चूंकि सूर्य मकर राशि में प्रवेश करता है इसलिए इस समय को 'मकर संक्रांति' कहा जाता है। हिन्दू महीने के अनुसार पौष शुक्ल पक्ष में मकर संक्रांति पर्व मनाया जाता है।

2. इस दिन से सूर्य होता है उत्तरायन
चन्द्र के आधार पर माह के 2 भाग हैं- कृष्ण और शुक्ल पक्ष। इसी तरह सूर्य के आधार पर वर्ष के 2 भाग हैं- उत्तरायन और दक्षिणायन। इस दिन से सूर्य उत्तरायन हो जाता है। उत्तरायन अर्थात उस समय से धरती का उत्तरी गोलार्द्ध सूर्य की ओर मुड़ जाता है, तो उत्तर ही से सूर्य निकलने लगता है। इसे सोम्यायन भी कहते हैं। 6 माह सूर्य उत्तरायन रहता है और 6 माह दक्षिणायन। अत: यह पर्व 'उत्तरायन' के नाम से भी जाना जाता है। मकर संक्रांति से लेकर कर्क संक्रांति के बीच के 6 मास के समयांतराल को उत्तरायन कहते हैं।

3. इस पर्व का भौगोलिक विवरण
पृथ्वी साढ़े 23 डिग्री अक्ष पर झुकी हुई सूर्य की परिक्रमा करती है तब वर्ष में 4 स्थितियां ऐसी होती हैं, जब सूर्य की सीधी किरणें 21 मार्च और 23 सितंबर को विषुवत रेखा, 21 जून को कर्क रेखा और 22 दिसंबर को मकर रेखा पर पड़ती है। वास्तव में चन्द्रमा के पथ को 27 नक्षत्रों में बांटा गया है जबकि सूर्य के पथ को 12 राशियों में बांटा गया है। भारतीय ज्योतिष में इन 4 स्थितियों को 12 संक्रांतियों में बांटा गया है जिसमें से 4 संक्रांतियां महत्वपूर्ण होती हैं- मेष, तुला, कर्क और मकर संक्रांति।

4. फसलें लहलहाने लगती हैं
इस दिन से वसंत ऋतु की भी शुरुआत होती है और यह पर्व संपूर्ण अखंड भारत में फसलों के आगमन की खुशी के रूप में मनाया जाता है। खरीफ की फसलें कट चुकी होती हैं और खेतों में रबी की फसलें लहलहा रही होती हैं। खेत में सरसों के फूल मनमोहक लगते हैं।

5. पर्व का सांस्कृतिक महत्व
मकर संक्रांति के इस पर्व को भारत के अलग-अलग राज्यों में वहां के स्थानीय तरीकों से मनाया जाता है। दक्षिण भारत में इस त्योहार को पोंगल के रूप में मनाया जाता है। उत्तर भारत में इसे लोहड़ी, खिचड़ी पर्व, पतंगोत्सव आदि कहा जाता है। मध्यभारत में इसे संक्रांति कहा जाता है। मकर संक्रांति को उत्तरायन, माघी, खिचड़ी आदि नाम से भी जाना जाता है।

6. तिल-गुड़ के लड्डू और पकवान
सर्दी के मौसम में वातावरण का तापमान बहुत कम होने के कारण शरीर में रोग और बीमारियां जल्दी लगती हैं इसलिए इस दिन गुड़ और तिल से बने मिष्ठान्न या पकवान बनाए, खाए और बांटे जाते हैं। इनमें गर्मी पैदा करने वाले तत्वों के साथ ही शरीर के लिए लाभदायक पोषक पदार्थ भी होते हैं। उत्तर भारत में इस दिन खिचड़ी का भोग लगाया जाता है। गुड़-तिल, रेवड़ी, गजक का प्रसाद बांटा जाता है।

7. स्नान, दान, पुण्य और पूजा
माना जाता है कि इस दिन सूर्य अपने पुत्र शनिदेव से नाराजगी त्यागकर उनके घर गए थे इसलिए इस दिन पवित्र नदी में स्नान, दान, पूजा आदि करने से पुण्य हजार गुना हो जाता है। इस दिन गंगासागर में मेला भी लगता है। इसी दिन मलमास भी समाप्त होने तथा शुभ माह प्रारंभ होने के कारण लोग दान-पुण्य से अच्छी शुरुआत करते हैं। इस दिन को सुख और समृद्धि का माना जाता है।

8. पतंग महोत्सव का पर्व
यह पर्व 'पतंग महोत्सव' के नाम से भी जाना जाता है। पतंग उड़ाने के पीछे मुख्य कारण है कुछ घंटे सूर्य के प्रकाश में बिताना। यह समय सर्दी का होता है और इस मौसम में सुबह का सूर्य प्रकाश शरीर के लिए स्वास्थवर्द्धक और त्वचा व हड्डियों के लिए अत्यंत लाभदायक होता है। अत: उत्सव के साथ ही सेहत का भी लाभ मिलता है।

9. अच्छे दिन की शुरुआत
भगवान श्रीकृष्ण ने भी उत्तरायन का महत्व बताते हुए गीता में कहा है कि उत्तरायन के 6 मास के शुभ काल में जब सूर्यदेव उत्तरायन होते हैं और पृथ्वी प्रकाशमय रहती है, तो इस प्रकाश में शरीर का परित्याग करने से व्यक्ति का पुनर्जन्म नहीं होता, ऐसे लोग ब्रह्म को प्राप्त होते हैं। यही कारण था कि भीष्म पितामह ने शरीर तब तक नहीं त्यागा था, जब तक कि सूर्य उत्तरायन नहीं हो गया।

10. ऐतिहासिक तथ्‍य
हिन्दू धर्मशास्त्रों के अनुसार मकर संक्रांति से देवताओं का दिन आरंभ होता है, जो आषाढ़ मास तक रहता है। महाभारत काल में भीष्म पितामह ने अपनी देह त्यागने के लिए मकर संक्रांति का ही चयन किया था। मकर संक्रांति के दिन ही गंगाजी भगीरथ के पीछे-पीछे चलकर कपिल मुनि के आश्रम से होती हुई सागर में जाकर मिली थीं। महाराज भगीरथ ने अपने पूर्वजों के लिए इस दिन तर्पण किया था इसलिए मकर संक्रांति पर गंगासागर में मेला लगता है ...

गणेश हरैं सब विघ्न आपके

गणेश हरैं सब विघ्न आपके.
लक्ष्मी बैठैं दोनों हाथ ।
खुशियाँ आपके सदाँ कदम चूमैं. तरक्की हो दिन रात।
कान्हा आपको दें कामयाबी .
राधारानी दें आपको प्यार।
नव वर्ष यह सब दे आपको.
यही दुआ है मेरी आज।
आपको आपके परिवार को नव वर्ष 2019 की हार्दिक शुभकामनायें

हिन्दू नव वर्ष के वैज्ञानिक तथ्य

हिन्दू नव वर्ष के वैज्ञानिक तथ्य

१ चैत्र माह मतलब हिन्दू नव वर्ष के शुरू होते ही रातें छोटी और दिन बड़े होने लगते है..

२ पेड़ों पर नवीन पत्तियों और कोपलों का आगमन होता है..पतझड़ ख़तम होता है और बसंत की शुरुवात होती है..
३ प्रकृति में हर जगह हरियाली छाई होती है प्रकृति का नवश्रृंगार होता है..
४ धर्म को मानने वाले लोग पूजा पाठ करते है मंदिर जातें है नदी स्नान करतें है..
५ भास्कराचार्य ने इसी दिन को आधार रखते हुए गड़ना कर पंचांग की रचना की.
५ हमारे हिन्दुस्थान में सभी वित्तीय संस्थानों का नव वर्ष अप्रैल से प्रारम्भ होता है .
आप ही सोचे क्या जनवरी के माह में ये नवीनता होती है नहीं तो फिर नव वर्ष कैसा..शायद किसी और देश में जनवरी में बसंत आता हो तो वो जनवरी में नव वर्ष हम क्यूँ मनाये???
हिन्दू नव वर्ष कब मनाया जाता है : हिन्दू पंचांग के अनुसार चैत्र माह के शुक्ल प्रतिपदा के प्रथम दिन हिन्दू नव वर्ष मनाया जाता है..ऐसी मान्यता है की सतयुग का प्रथम दिन भी इसी दिन शुरू हुआ था..एक अन्य मान्यता के अनुसार ब्रम्हा ने इसी दिन सृष्टि का सृजन शुरू किया था..भारत के कई हिस्सों में गुडी पड़वा या युगादी पर्व मनाया जाता है.इस दिन घरों को हरे पत्तों से सजाया जाता है और हरियाली चारो और दृष्टीगोचर होती है.

पाताल भुवनेश्‍वर की गुफ़ा

भारत के प्राचीनतम ग्रन्थ स्कन्द पुराण में वर्णित पाताल भुवनेश्‍वर की गुफ़ा के सामने पत्थरों से बना एक-एक शिल्प तमाम रहस्यों को खुद में समेटे हुए है। किंवदन्ती है कि यहाँ पर पाण्डवों ने तपस्या की और कलियुग में आदि शंकराचार्य ने इसे पुनः खोजा। राज्य उत्तराखण्ड ज़िला पिथौरागढ़ मार्ग स्थिति उत्तराखंड के कुमाऊं मंडल के प्रसिद्ध नगर अल्मोड़ा से शेराघाट होते हुए 160 किलोमीटर की दूरी तय कर पहाड़ी वादियों के बीच बसे सीमान्त कस्बे गंगोलीहाट में स्थित है।
पाताल भुवनेश्वर गुफ़ा 'पाताल भुवनेश्वर का गुफ़ा मंदिर' उत्तराखंड के कुमाऊं मंडल के प्रसिद्ध नगर अल्मोड़ा से शेराघाट होते हुए 160 किलोमीटर की दूरी तय कर पहाड़ी वादियों के बीच बसे सीमान्त कस्बे गंगोलीहाट में स्थित है। पाताल भुवनेश्वर गुफ़ा किसी आश्चर्य से कम नहीं है। इसके रास्ते में दिखाई देती हैं धवल हिमालय पर्वत की नयनाभिराम नंदा देवी, पंचचूली, पिंडारी, ऊंटाधूरा आदि चोटियां। दिल्ली से चल कर पहले दिन 350 किमी की दूरी तय कर अल्मोड़ा पहुंच सकते हैं।

पौराणिक महत्व: स्कन्दपुराण में वर्णन है कि स्वयं महादेव शिव पाताल भुवनेश्वर में विराजमान रहते हैं और अन्य देवी देवता उनकी स्तुति करने यहाँ आते हैं। यह भी वर्णन है कि त्रेता युग में अयोध्या के सूर्यवंशी राजा ऋतुपर्ण जब एक जंगली हिरण का पीछा करते हुए इस गुफ़ा में प्रविष्ट हुए तो उन्होंने इस गुफ़ा के भीतर महादेव शिव सहित 33 करोड देवताओं के साक्षात दर्शन किये। द्वापर युग में पाण्डवों ने यहां चौपड़ खेला और कलयुग में जगदगुरु शंकराचार्य का 822 ई के आसपास इस गुफ़ा से साक्षात्कार हुआ तो उन्होंने यहां तांबे का एक शिवलिंग स्थापित किया। इसके बाद चन्द राजाओं ने इस गुफ़ा के विषय में जाना। और आज देश विदेश से सैलानी यहां आते हैं। और गुफ़ा के स्थपत्य को देख दांतो तले उंगली दबाने को मजबूर हो जाते हैं। मनुस्मृति में कहा गया है कि भगवान शंकर कैलाश में सिर्फ तपस्या करते थे। उनके समय बिताने के लिए विष्णुजी ने उनके लिये यह स्थान चुना। मान्यताएं चाहे कुछ भी हो पर एकबारगी गुफ़ा में बनी आकृतियों को देख लेने के बाद उनसे जुड़ी मान्यताओं पर भरोसा किये बिना नहीं रहा जाता। पाण्डवों के एक वर्ष के प्रवास के दौरान का दृश्य, उनके द्वारा जुए में हारना, सतयुग से कलयुग आने का चित्रण व कई प्राचीन शिल्प कला के दृष्य देखने को मिलते हैं। कुमाऊँ एक धार्मिक स्थल के साथ ही रोमांचक पर्यटक स्थल के रूप में जाना जाता है। भारत का प्राचीन स्कन्द पुराण ग्रन्थ और टटोलिये मानस खण्ड के 103वें अध्याय के 273 से 288 तक के श्लोकों में गुफ़ा का वर्णन पढ़ कर उपरोक्त प्रतिकात्मक मूर्तियां मानो साक्षात जागृत हो जाएंगी और आप अपने 33 करोड़ देवी-देवताओं के दर्शन कर रहे होंगे। शृण्यवन्तु मनयः सर्वे पापहरं नणाभ्‌ स्मराणत्‌ स्पर्च्चनादेव, पूजनात्‌ किं ब्रवीम्यहम्‌ सरयू रामयोर्मध्ये पातालभुवनेश्‍वरः [3] (अर्थात् व्यास जी ने कहा मैं ऐसे स्थान का वर्णन करता हूं जिसका पूजन करने के सम्बन्ध में तो कहना ही क्या, जिसका स्मरण और स्पर्च्च मात्र करने से ही सब पाप नष्ट हो जाते हैं वह सरयू, रामगंगा के मध्य पाताल भुवनेश्‍वर है)। भूमिगत गुफाओं में निर्मित आकृति 103वें अध्याय के श्लोक 21 से 27 के अनुसार ये भूतल का सबसे पावन क्षेत्र है। पाताल भुवनेश्‍वर वहाँ जागरूक है और उनका पूजन करने से अश्वमेध यज्ञ से हज़ार गुणा फल प्राप्त होता है अतः उससे बढ़कर कोई दूसरा स्थान नहीं है। चार धाम करने का यश यहीं प्राप्त हो जाता है। श्‍लोक 30-34 के अनुसार पाताल भुवनेश्‍वर के समीप जाने वाला व्यक्ति एक सौ कुलों का उद्धार कर शिव सायुज्य प्राप्त करता है। आश्चर्य ही है कि ज़मीन के इतने अन्दर होने के बावजूद यहां घुटन नहीं होती शान्ति मिलती है। देवदार के घने जंगलों के बीच बसी रहस्य और रोमांच से सराबोर पाताल भुवनेश्वर की गुफ़ा की सैलानियों के बीच आज एक अलग पहचान है। कुछ श्रृद्धा से, कुछ रोमान्च के अनुभव के लिये, और कुछ शीतलता और शान्ति की तलाश में यहां आते हैं। गुफ़ा के पास हरे भरे वातावरण में सुन्दर होटल भी पर्यटकों के लिये बने हैं। ख़ास बात यह है कि गंगोलीहाट में अकेली यही नहीं बल्कि दस से अधिक गुफ़ाएं हैं जहाँ इतिहास की कई परतें, मान्यताओं के कई मूक दस्तावेज खुद-ब-खुद खुल जाते हैं। आंखिर यूं ही गंगोलीहाट को गुफ़ाओं की नगरी नहीं कहा जाता। 

किस देवता का रंग कौन-सा जानिए रहस्य

किस देवता का रंग कौन-सा जानिए रहस्य...

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धरती पर पहले शुद्ध रूप से चार वर्णों के लोग रहते थे। प्राचीनकाल में श्वेत, रक्त, पीत और कृष्ण रंग के मनुष्यों की ही संख्या अधिक रही है और आज भी है। इन्हें ही गौर, लाल, पीला (गेहुआ) और काला कहा गया। लेकिन क्या कभी किसी ने नीले या श्याम वर्ण के लोगों को देखा है?
माना जाता है कि प्राचीनकाल में नील वर्ण की भी एक जाति रहती थी। आज भी बहुत से लोगों की आंखे नीली क्यों और किस तरह हो जाती है? क्या सचमुच ही प्राचीनकाल में नीले रंग के भी लोग रहते थे।

अनंत का प्रतीक नीला रंग👉  हिन्दू धर्म अनुसार नीला रंग आत्मा का मूल रंग माना जाता है। कहते हैं कि जब कोई जल ज्यादा गहराई लिए हुए हो तो वह नीला दिखाई देने लगता है। नीलवर्ण विशाल, व्यापकता और अनन्तता का  द्योतक है। अगाध आकाश का रंग नीला है, वैसे ही अनन्त महासागर का रंग भी नीला है।

कुछ विद्वान तर्क देते हैं कि राम के नीले वर्ण और कृष्ण के काले रंग के पीछे एक दार्शनिक रहस्य है। भगवानों का यह रंग उनके व्यक्तित्व को दर्शाता है। दरअसल इसके पीछे भाव है कि भगवान का व्यक्तित्व अनंत है। उसकी कोई सीमा नहीं है, वे अनंत है।

ब्राह्मा👉  ब्रह्मा और सरस्वती का रंग श्वेत बताया गया है।

विष्णु👉 भगवान विष्णु का रंग नीला और माता लक्ष्मी का रंग स्वर्ण के समान है।

शिव👉  शिव का रंग श्याम और माता पार्वती का रंग गौरा बताया जाता है।

श्रीराम👉 कुछ ग्रंथों अनुसार भगवान श्रीराम भी नीलवर्ण के थे। इसीलिए उन्हें नीलाम्बुज, मेघवर्ण, नीलमणि, गगनसदृश आदि उपमाएं दी जाती हैं। क्या वाकई भगवान राम नीले रंग के थे, किसी इंसान का नीला रंग कैसे हो सकता है?

श्रीकृष्ण👉  भगवान श्रीकृष्ण को भी नील वर्ण का माना जाता है। उनके नीले रंग को श्याम वर्ण कहते थे। श्याम रंग अर्थात कुछ-कुछ काला और कुछ-कुछ नीला। दरअसल उनकी त्वचा का रंग मेघ श्यामल था। अर्थात काला, नीला और सफेद मिश्रित रंग। श्याम वर्ण के होने के कारण कुछ कवियों ने उनको काला रंग का मान लिया।  
माता दुर्गा👉  दुर्गामासुर का वध करने के कारण आद्य शक्ति को दुर्गा कहा गया। काजल के समान देह, नील कमल के समान विशाल नेत्रों से युक्त दस भुजाओं वाली देवी ने स्वयं प्रकट होकर देवताओं की रक्षा की थी।

1.शैलपुत्री : राजा दक्ष की पुत्री सती को ही शैलपुत्री कहा गया। इनका वर्ण गौर है।

2.ब्रह्मचारिणी : माता सती ने हिमालय राज के यहां जन्म लिया और शिव को पाने के लिए कठिन तप किया इसीलिए ब्रह्मचारिणी कहलाई। कठोर तप के कारण इनका रंग काला पड़ गया था लेकिन बाद में गौरा हो गया।

3.चंद्रघंटा : माता की तीसरी शक्ति का शारीरिक वर्ण स्वर्ण के समान हैं।

4.कुष्मांडा : इस देवी का वास सूर्यमंडल के भीतर लोक में है। सूर्यलोक में रहने की शक्ति क्षमता केवल इन्हीं में है। इसीलिए इनके शरीर की कांति और प्रभा सूर्य की भांति ही दैदीप्यमान है।

5.स्कंदमाता : ब्रह्मचारिणी और स्कंदमाता एक ही है। स्कन्द', शिव तथा पार्वती के पुत्र कुमार कार्तिकेय का एक और नाम हैं। इनका वर्ण एकदम शुभ्र है।

6.कात्यायनी : कत नमक एक विख्यात महर्षि थे, उनके पुत्र कात्य हुए तथा तथा इन्हीं कात्य के गोत्र में प्रसिद्ध ऋषि कात्यायन उत्पन्न हुए। कात्यायन, ऋषि ने देवी माता को पुत्री रूप में पाने हेतु बहुत वर्षों तक कठिन तपस्या की तथा ऋषि की इच्छानुसार ही मां दुर्गा ने इनके यहाँ पुत्री के रूप में जन्म लिया, तथा कात्यायनी नाम से प्रसिद्ध हुई।

7.कालरात्रि : नाम से अभिव्यक्त होता है कि मां दुर्गा की यह सातवीं शक्ति कालरात्रि के नाम से जानी जाती है अर्थात जिनके शरीर का रंग घने अंधकार की तरह एकदम काला है। नाम से ही जाहिर है कि इनका रूप भयानक है।

8.महागौरी : महागौरी ही पार्वती है यही स्कंदमाता है और यही ब्रह्मचारिणी है। यही अपने पूर्व जन्म में सती थीं। नाम से प्रकट है कि इनका रूप पूर्णतः गौर वर्ण है। इनकी उपमा शंख, चंद्र और कुंद के फूल से दी गई है। ब्रह्मचारिणी के रूप में तपस्या करने के बाद शिव की कृपा से यह गौर वर्ण की हो गई थीं।

9.सिद्धिदात्री : भगवान शिव ने भी इस देवी की कृपा से ये तमाम सिद्धियां प्राप्त की थीं। इस देवी की कृपा से ही शिवजी का आधा शरीर देवी का हुआ था। इसी कारण शिव अर्द्धनारीश्वर नाम से प्रसिद्ध हुए। देवी का स्वरूप कांति युक्त तथा मनोहर हैं।

दस महाविद्या देवी का वर्ण : 

1.माता कालीका : मां काली का रंग कहीं-कहीं काला और कहीं पर नीले का वर्णन मिलता है। कुछ विद्वान इन्हें श्यामरंग की मानते हैं।

2.तारा : भगवती तारा के तीन स्वरूप हैं:- 1.नील सरस्वती 2.एक जटा 3.उग्र तारा। 'आद्या शक्ति महाकाली ने हयग्रीव नमक दैत्य के वध हेतु घोर नीला वर्ण धारण किया तथा वे उग्र तारा के नाम से जानी जाने लगी।

3.त्रिपुर सुंदरी : देवी का शारीरिक वर्ण हजारों उदयमान सूर्य के कांति की भांति है।

4.भुवनेश्वरी : दस महाविद्याकों में से एक माता भुवनेश्वरी का वर्ण लाल बताया गया है। कुछ जगह पर इन्हें स्वर्ण आभा के सामान कांति वाली और देवी उगते सूर्य या सिंदूरी वर्ण से शोभिता हैं।

5.देवी छिन्नमस्तका : देवी का शारीरक वर्ण पिला या लाल-पीले मिश्रित रंग का हैं।

6.देवी महा त्रिपुरभैरवी : देवी भैरवी कि शारीरिक कांति हजारों उगते हुए सूर्य के समान है। कभी-कभी देवी का शारीरिक वर्ण गहरे काले रंग के समान प्रतीत होती है, जैसे काली या काल रात्रि देवियों का हैं।

7.धूमावती : देवी धूमावती का वास्तविक रूप धुएं जैसा है अर्थात मटमेला।

8.बगलामुखी : दस महाविद्याओं में से एक बगलामुखी देवी का रंग पीला है।

9.देवी मातंगी : देवी मातंगी का वर्ण गहरे नीले रंग (नील कमल के समान) या श्याम वर्ण का है।

10.कमला : देवी कमला का स्वरूप अत्यंत ही मनोहर तथा मनमोहक हैं तथा स्वर्णिम आभा लिया हुए हैं। अर्थात इनका रंग पीला है।

उज्जैन के प्राचीन 108 हनुमान मन्दिरो में से एक है अति प्राचीन दक्षिण मुखी हनुमान नाका मंदिर

उज्जैन के प्राचीन 108 हनुमान मन्दिरो में से एक है अति प्राचीन दक्षिण मुखी हनुमान नाका मंदिर


अति प्राचीन हनुमान नाका मंदिर उज्जैन शहर के हरिफाटक ब्रिज के समीप स्थित है

वैष्णव अखाड़े से सम्बंध रखने वाले श्री 1008 रामचरण दास जी बैरागी जी ने आज से लगभग 130 वर्ष पूर्व
उज्जैन शहर की सीमा के करीब एक टीले पर खुदाई करवाई थी ..

जहाँ  बजरंगबली की मूर्ति साक्षात मिली थी ...

कहते है मूर्ति का मुख दक्षिण दिशा की तरफ था इस वजह से मूर्ति की उसी इस्थान पर दक्षिण दिशा की तरफ़ ही प्राण प्रतिष्ठा कर दी गयी थी,

इलाके में एक ही मन्दिर होने की वजह से इस्थान का नाम भी  हनुमान नाका एवम पास में मौजूद पुलिया का नाम गदपुलिया पड़ गया मंदिर में श्री राम दरबार भी है,।
हनुमान जी के साथ मे बाल हनुमान श्री भैरव एवम श्री गणेश जी की प्रतिमा भी है ..

त्योहारों पर मंदिर में विविध तरह के आयोजन किये जाते है. जब भी आप उज्जैन पधारे यहां अवश्य पधारे 🙏

जब किसी की शवयात्रा दिखे तो क्या करना चाहिए?

जब किसी की शवयात्रा दिखे तो क्या करना चाहिए?                


जीवन का अंतिम अटल सत्य है मृत्यु। भागवत गीता में श्रीकृष्ण ने बताया है कि जीवन के इस अटल सत्य को कोई टाल नहीं सकता है। जिस व्यक्ति का जन्म हुआ है वह अवश्य ही एक दिन मृत्यु को प्राप्त होगा। अमर केवल आत्मा होती है जो शरीर बदलती है। जिस प्रकार हम कपड़े बदलते हैं ठीक उसी प्रकार आत्मा अलग-अलग शरीर धारण करती है और निश्चित समय के लिए। इसके बाद पूर्व निर्धारित समय पर आत्मा शरीर छोड़ देती है। किसी भी व्यक्ति की मृत्यु के बाद हिंदू धर्म के अनुसार मृत शरीर का दहन किया जाता है।
किसी भी इंसान की मृत्यु के बाद शवयात्रा निकाली जाती है और इस संबंध में भी शास्त्रों में कई नियम बताए गए हैं। जिन्हें अपनाने से धर्म लाभ तो प्राप्त होता है साथ ही इससे मृत आत्मा को शांति भी मिलती है। यदि हम कहीं जा रहे हैं और रास्ते में शवयात्रा दिखाई दे तो उस समय थोड़ी देर ठहर जाना चाहिए।
ऐसा माना जाता है कि यदि शवयात्रा निकलती दिखाई देती है तो कुछ देर ठहरकर परमात्मा से मृत आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना अवश्य करनी चाहिए। मृतक को प्रणाम करके आगे बढऩा चाहिए।
ज्योतिष शास्त्र में शवयात्रा के संबंध में बताया गया है कि यदि आप किसी जरूरी कार्य के लिए जा रहे हैं और रास्ते में कोई शवयात्रा दिख जाए तो इसका मतलब है कि आपको इच्छित कार्य में सफलता मिलेगी। आपके सोचे हुए कार्य पूर्ण हो जाएंगे और परेशानियां दूर हो जाएंगी।

वेदों को सरल रुप में प्रस्तुत करते हैं हमारे ये पुराण!!!!!!

वेदों को सरल रुप में प्रस्तुत करते हैं हमारे ये पुराण!!!!!!

महृर्षि वेदव्यास ने अठारह पुराणों का संस्कृत भाषा में संकलन किया है। ब्रह्मा, विष्णु तथा महेश उन पुराणों के मुख्य देव हैं। त्रिमूर्ति के प्रत्येक भगवान स्वरूप को छः पुराण समर्पित किये गये हैं। आइए जानते है 18 पुराणों के बारे में।

 पुराण विश्व साहित्य के प्रचीनत्म ग्रँथ हैं। उन में लिखित ज्ञान और नैतिकता की बातें आज भी प्रासंगिक, अमूल्य तथा मानव सभ्यता की आधारशिला हैं। वेदों की भाषा तथा शैली कठिन है। पुराण उसी ज्ञान के सहज तथा रोचक संस्करण हैं। उन में जटिल तथ्यों को कथाओं के माध्यम से समझाया गया है। पुराणों का विषय नैतिकता, विचार, भूगोल, खगोल, राजनीति, संस्कृति, सामाजिक परम्परायें, विज्ञान तथा अन्य विषय हैं।

महृर्षि वेदव्यास ने 18 पुराणों का संस्कृत भाषा में संकलन किया है। ब्रह्मा, विष्णु तथा महेश उन पुराणों के मुख्य देव हैं। त्रिमूर्ति के प्रत्येक भगवान स्वरूप को छः पुराण समर्पित किये गये हैं। आइए जानते है 18 पुराणों के बारे में।

1.ब्रह्म पुराणब्रह्म पुराण सब से प्राचीन है। इस पुराण में 246 अध्याय  तथा 14000 श्र्लोक हैं। इस ग्रंथ में ब्रह्मा की महानता के अतिरिक्त सृष्टि की उत्पत्ति, गंगा आवतरण तथा रामायण और कृष्णावतार की कथायें भी संकलित हैं। इस ग्रंथ से सृष्टि की उत्पत्ति से लेकर सिन्धु घाटी सभ्यता तक की कुछ ना कुछ जानकारी प्राप्त की जा सकती है।

2. पद्म पुराणपद्म पुराण में 55000 श्र्लोक हैं और यह ग्रंथ पाँच खण्डों में विभाजित है जिन के नाम सृष्टिखण्ड, स्वर्गखण्ड, उत्तरखण्ड, भूमिखण्ड तथा पातालखण्ड हैं। इस ग्रंथ में पृथ्वी आकाश, तथा नक्षत्रों की उत्पति के बारे में उल्लेख किया गया है। चार प्रकार से जीवों की उत्पत्ति होती है जिन्हें उदिभज, स्वेदज, अणडज तथा जरायुज की श्रेणा में रखा गया है। यह वर्गीकरण पुर्णत्या वैज्ञायानिक है। भारत के सभी पर्वतों तथा नदियों के बारे में भी विस्तरित वर्णन है। इस पुराण में शकुन्तला दुष्यन्त से ले कर भगवान राम तक के कई पूर्वजों का इतिहास है। शकुन्तला दुष्यन्त के पुत्र भरत के नाम से हमारे देश का नाम जम्बूदीप से भरतखण्ड और पश्चात भारत पडा था।

3. विष्णु पुराण : - विष्णु पुराण में 6 अँश तथा 23000 श्र्लोक हैं। इस ग्रंथ में भगवान विष्णु, बालक ध्रुव, तथा कृष्णावतार की कथायें संकलित हैं। इस के अतिरिक्त सम्राट पृथु की कथा भी शामिल है जिस के कारण हमारी धरती का नाम पृथ्वी पडा था। इस पुराण में सू्र्यवँशी तथा चन्द्रवँशी राजाओं का इतिहास है।

भारत की राष्ट्रीय पहचान सदियों पुरानी है जिस का प्रमाण विष्णु पुराण के निम्नलिखित शलोक में मिलता हैःउत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्। वर्षं तद भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः।(साधारण शब्दों में इस का अर्थ है कि वह भूगौलिक क्षेत्र जो उत्तर में हिमालय तथा दक्षिण में सागर से घिरा हुआ है भारत देश है तथा उस में निवास करने वाले सभी जन भारत देश की ही संतान हैं।) भारत देश और भारत वासियों की इस से स्पष्ट पहचान और क्या हो सकती है? विष्णु पुराण वास्तव में ऐक ऐतिहासिक ग्रंथ है।

4 - शिव पुराणशिव पुराण में 24000 श्र्लोक हैं तथा यह सात संहिताओं में विभाजित है। इस ग्रंथ में भगवान शिव की महानता तथा उन से सम्बन्धित घटनाओं को दर्शाया गया है। इस ग्रंथ को वायु पुराण भी कहते हैं। इस में कैलाश पर्वत, शिवलिंग तथा रुद्राक्ष का वर्णन और महत्व, सप्ताह के दिनों के नामों की रचना, प्रजापतियों तथा काम पर विजय पाने के सम्बन्ध में वर्णन किया गया है। सप्ताह के दिनों के नाम हमारे सौर मण्डल के ग्रहों पर आधारित हैं और आज भी लगभग समस्त विश्व में प्रयोग किये जाते हैं।

5. भागवत पुराणभागवत पुराण में 18000 श्र्लोक हैं तथा 12 स्कंध हैं। इस ग्रंथ में अध्यात्मिक विषयों पर वार्तालाप है। भक्ति, ज्ञान तथा वैराग्य की महानता को दर्शाया गया है। विष्णु और कृष्णावतार की कथाओं के अतिरिक्त महाभारत काल से पूर्व के कई राजाओं, ऋषि मुनियों तथा असुरों की कथायें भी संकलित हैं। इस ग्रंथ में महाभारत युद्ध के पश्चात श्रीकृष्ण का देहत्याग, द्वारिका नगरी के जलमग्न होने और यदु वंशियों के नाश तक का विवरण भी दिया गया है।

6. नारद पुराणनारद पुराण में 25000 श्र्लोक हैं तथा इस के दो भाग हैं। इस ग्रंथ में सभी 18 पुराणों का सार दिया गया है। प्रथम भाग में मन्त्र तथा मृत्यु पश्चात के क्रम आदि के विधान हैं। गंगा अवतरण की कथा भी विस्तार पूर्वक दी गयी है। दूसरे भाग में संगीत के सातों स्वरों, सप्तक के मन्द्र, मध्य तथा तार स्थानों, मूर्छनाओं, शुद्ध एवं कूट तानो और स्वरमण्डल का ज्ञान लिखित है।

 संगीत पद्धति का यह ज्ञान आज भी भारतीय संगीत का आधार है। जो पाश्चात्य संगीत की चकाचौंध से चकित हो जाते हैं उन के लिये उल्लेखनीय तथ्य यह है कि नारद पुराण के कई शताब्दी पश्चात तक भी पाश्चात्य संगीत में केवल पाँच स्वर होते थे तथा संगीत की थ्योरी का विकास शून्य के बराबर था। मूर्छनाओं के आधार पर ही पाश्चात्य संगीत के स्केल बने हैं।

7. मार्कण्डेय पुराणअन्य पुराणों की अपेक्षा यह छोटा पुराण है। मार्कण्डेय पुराण में 9000 श्र्लोक तथा 137 अध्याय हैं। इस ग्रंथ में सामाजिक न्याय और योग के विषय में ऋषिमार्कण्डेय तथा ऋषि जैमिनि के मध्य वार्तालाप है। इस के अतिरिक्त भगवती दुर्गा तथा श्रीक़ृष्ण से जुड़ी हुयी कथायें भी संकलित हैं।

8. अग्नि पुराणअग्नि पुराण में 383 अध्याय तथा 15000 श्र्लोक हैं। इस पुराण को भारतीय संस्कृति का ज्ञानकोष (इनसाईक्लोपीडिया) कह सकते है। इस ग्रंथ में मत्स्यावतार, रामायण तथा महाभारत की संक्षिप्त कथायें भी संकलित हैं। इस के अतिरिक्त कई विषयों पर वार्तालाप है जिन में धनुर्वेद, गान्धर्व वेद तथा आयुर्वेद मुख्य हैं। धनुर्वेद, गान्धर्व वेद तथा आयुर्वेद को उप-वेद भी कहा जाता है।

9. भविष्य पुराणभविष्य पुराण में 129 अध्याय तथा 28000 श्र्लोक हैं। इस ग्रंथ में सूर्य का महत्व, वर्ष के 12 महीनों का निर्माण, भारत के सामाजिक, धार्मिक तथा शैक्षिक विधानों आदि कई विषयों पर वार्तालाप है। इस पुराण में साँपों की पहचान, विष तथा विषदंश सम्बन्धी महत्वपूर्ण जानकारी भी दी गयी है। इस पुराण की कई कथायें बाईबल की कथाओं से भी मेल खाती हैं।

इस पुराण में पुराने राजवँशों के अतिरिक्त भविष्य में आने वाले  नन्द वँश, मौर्य वँशों, मुग़ल वँश, छत्रपति शिवा जी और महारानी विक्टोरिया तक का वृतान्त भी दिया गया है। ईसा के भारत आगमन तथा मुहम्मद और कुतुबुद्दीन ऐबक का जिक्र भी इस पुराण में दिया गया है। इस के अतिरिक्त विक्रम बेताल तथा बेताल पच्चीसी की कथाओं का विवरण भी है। सत्य नारायण की कथा भी इसी पुराण से ली गयी है।

10. ब्रह्म वैवर्त पुराण8000 श्र्लोक तथा 218 अध्याय हैं। इस ग्रंथ में ब्रह्मा, गणेश, तुल्सी, सावित्री, लक्ष्मी, सरस्वती तथा क़ृष्ण की महानता को दर्शाया गया है तथा उन से जुड़ी हुयी कथायें संकलित हैं। इस पुराण में आयुर्वेद सम्बन्धी ज्ञान भी संकलित है।

11. लिंग पुराणलिंग पुराण में 11000 श्र्लोक और 163 अध्याय हैं। सृष्टि की उत्पत्ति तथा खगौलिक काल में युग, कल्प आदि की तालिका का वर्णन है। राजा अम्बरीष की कथा भी इसी पुराण में लिखित है। इस ग्रंथ में अघोर मंत्रों तथा अघोर विद्या के सम्बन्ध में भी उल्लेख किया गया है।

12.वराह पुराणवराह पुराण में 217 स्कन्ध तथा 10000 श्र्लोक हैं। इस ग्रंथ में वराह अवतार की कथा के अतिरिक्त भागवत गीता महामात्या का भी विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया है। इस पुराण में सृष्टि के विकास, स्वर्ग, पाताल तथा अन्य लोकों का वर्णन भी दिया गया है। श्राद्ध पद्धति, सूर्य के उत्तरायण तथा दक्षिणायन विचरने, अमावस और पूर्णमासी के कारणों का वर्णन है। महत्व की बात यह है कि जो भूगौलिक और खगौलिक तथ्य इस पुराण में संकलित हैं वही तथ्य पाश्चात्य जगत के वैज्ञिानिकों को पंद्रहवी शताब्दी के बाद ही पता चले थे।

13. स्कन्द पुराणस्कन्द पुराण सब से विशाल पुराण है तथा इस पुराण में 89000 श्र्लोक और छः खण्ड हैं। स्कन्द पुराण में प्राचीन भारत का भूगौलिक वर्णन है जिस में 28 नक्षत्रों, 18 नदियों, अरुणाचल प्रदेश का सौंदर्य, भारत में स्थित 45 ज्योतिर्लिंगों, तथा गंगा अवतरण के आख्यान शामिल हैं। इसी पुराण में स्याहाद्री पर्वत श्रंखला तथा कन्या कुमारी मन्दिर का उल्लेख भी किया गया है। इसी पुराण में सोमदेव, तारा तथा उन के पुत्र बुद्ध ग्रह की उत्पत्ति की अलंकारमयी कथा भी है।

15. वामन पुराणवामन पुराण में 15 अध्याय तथा 10000 श्र्लोक तथा दो खण्ड हैं। इस पुराण का केवल प्रथम खण्ड ही उपलब्ध है। इस पुराण में वामन अवतार की कथा विस्तार से कही गयी हैं जो भरूचकच्छ (गुजरात) में हुआ था। इस के अतिरिक्त इस ग्रंथ में भी सृष्टि, जम्बूदूीप तथा अन्य सात दूीपों की उत्पत्ति, पृथ्वी की भूगौलिक स्थिति, महत्वशाली पर्वतों, नदियों तथा भारत के खण्डों का जिक्र है।

15. कुर्मा पुराणकुर्मा पुराण में 18000 श्र्लोक तथा चार खण्ड हैं। इस पुराण में चारों वेदों का सार संक्षिप्त रूप में दिया गया है। कुर्मा पुराण में कुर्मा अवतार से सम्बन्धित सागर मंथन की कथा  विस्तार पूर्वक लिखी गयी है। इस में ब्रह्मा, शिव, विष्णु, पृथ्वी, गंगा की उत्पत्ति, चारों युगों, मानव जीवन के चार आश्रम धर्मों, तथा चन्द्रवँशी राजाओं के बारे में भी वर्णन है।

16. मतस्य पुराणमतस्य पुराण में 290 अध्याय तथा 14000 श्र्लोक हैं। इस ग्रंथ में मतस्य अवतार की कथा का विस्तरित उल्लेख किया गया है। सृष्टि की उत्पत्ति हमारे सौर मण्डल के सभी ग्रहों, चारों युगों तथा चन्द्रवँशी राजाओं का इतिहास वर्णित है। कच, देवयानी, शर्मिष्ठा तथा राजा ययाति की रोचक कथा भी इसी पुराण में है।

17. गरुड़ पुराणगरुड़ पुराण में २७९ अध्याय तथा १८००० श्र्लोक हैं। इस ग्रंथ में मृत्यु पश्चात की घटनाओं, प्रेत लोक, यम लोक, नरक तथा 84 लाख योनियों के नरक स्वरुपी जीवन आदि के बारे में विस्तार से बताया गया है। इस पुराण में कई सूर्यवँशी तथा चन्द्रवँशी राजाओं का वर्णन भी है। साधारण लोग इस ग्रंथ को पढ़ने से हिचकिचाते हैं क्योंकि इस ग्रंथ को किसी परिचित की मृत्यु होने के पश्चात ही पढ़वाया जाता है।

 वास्तव में इस पुराण में मृत्यु पश्चात पुनर्जन्म होने पर गर्भ में स्थित भ्रूण की वैज्ञानिक अवस्था सांकेतिक रूप से बखान की गयी है जिसे वैतरणी नदी आदि की संज्ञा दी गयी है। समस्त यूरोप में उस समय तक भ्रूण के विकास के बारे में कोई भी वैज्ञानिक जानकारी नहीं थी।

18. ब्रह्माण्ड पुराण ब्रह्माण्ड पुराण में १२००० श्र्लोक तथा पू्र्व, मध्य और उत्तर तीन भाग हैं। मान्यता है कि अध्यात्म रामायण पहले ब्रह्माण्ड पुराण का ही एक अंश थी जो अभी एक पृथक ग्रंथ है। इस पुराण में ब्रह्माण्ड में स्थित ग्रहों के बारे में वर्णन किया गया है। कई सूर्यवँशी तथा चन्द्रवँशी राजाओं का इतिहास भी संकलित है।

सृष्टि की उत्पत्ति के समय से ले कर अभी तक सात मनोवन्तर (काल) बीत चुके हैं जिन का विस्तरित वर्णन इस ग्रंथ में किया गया है। परशुराम की कथा भी इस पुराण में दी गयी है। इस ग्रँथ को विश्व का प्रथम खगोल शास्त्र कह सकते है। भारत के ऋषि इस पुराण के ज्ञान को इण्डोनेशिया भी ले कर गये थे जिस के प्रमाण इण्डोनेशिया की भाषा में मिलते है।

दिवाली की रात में कहां-कहां दीपक लगाने चाहिए।

दिवाली की रात में कहां-कहां दीपक लगाने चाहिए।

👉🏿1- पीपल के पेड़ के नीचे दीपावली की रात एक दीपक लगाकर घर लौट आएं। दीपक लगाने के बाद पीछे मुड़कर नहीं देखना चाहिए। ऐसा करने पर आपकी धन से जुड़ी समस्याएं दूर हो सकती हैं।

👉🏿2- यदि संभव हो सके तो दिवाली की रात के समय किसी श्मशान में दीपक लगाएं। यदि यह संभव ना हो तो किसी सुनसान इलाके में स्थित मंदिर में दीपक लगा सकते हैं।

👉🏿3- धन प्राप्ति की कामना करने वाले व्यक्ति को दीपावली की रात मुख्य दरवाजे की चौखट के दोनों ओर दीपक अवश्य लगाना चाहिए।

👉🏿4- हमारे घर के आसपास वाले चौराहे पर रात के समय दीपक लगाना चाहिए। ऐसा करने पर पैसों से जुड़ी समस्याएं समाप्त हो सकती हैं।

👉🏿5- घर के पूजन स्थल में दीपक लगाएं, जो पूरी रात बुझना नहीं चाहिए। ऐसा करने पर महालक्ष्मी प्रसन्न होती हैं।

👉🏿6- किसी बिल्व पत्र के पेड़ के नीचे दीपावली की शाम दीपक लगाएं। बिल्व पत्र भगवान शिव का प्रिय वृक्ष है। अत: यहां दीपक लगाने पर उनकी कृपा प्राप्त होती है।

👉🏿7- घर के आसपास जो भी मंदिर हो वहां रात के समय दीपक अवश्य लगाएं। इससे सभी देवी-देवताओं की कृपा प्राप्त होती है।

👉🏿8- घर के आंगन में भी दीपक लगाना चाहिए। ध्यान रखें यह दीपक भी रातभर बुझना नहीं चाहिए।

👉🏿9- घर के पास कोई नदी या तालब हो तो बहा पर रात के समय दीपक अवश्य लगाएं। इस से दोषो से मुक्ति मिलती है !

👉🏿10- तुलसी जी और के पेड़ और सालिगराम के पास रात के समय दीपक अवश्य लगाएं। ऐसा करने पर महालक्ष्मी प्रसन्न होती हैं।

👉🏿11- पित्रो का दीपक गया तीर्थ के नाम से घर के दक्षिण में लगाये ! इस से पितृ दोष से मुक्ति मिलती है।लक्ष्मी प्राप्ति के सूत्र :-

🗣प्रत्येक गृहस्थ इन सूत्रों-नियमों का पालन कर जीवन में लक्ष्मी को स्थायित्व प्रदान कर सकता है। आप भी अवश्य अपनाएं -

👉🏿1. जीवन में सफल रहना है या लक्ष्मी को स्थापित करना है तो प्रत्येक दशा में सर्वप्रथम दरिद्रता विनाशक प्रयोग करना ही होगा। यह सत्य है की लक्ष्मी धनदात्री हैं, वैभव प्रदायक हैं, लेकिन दरिद्रता जीवन की एक अलग स्थिति होती है और उस स्थिति का विनाश अलग ढंग से सर्वप्रथम करना आवश्यक होता है।

👉🏿2. लक्ष्मी का एक विशिष्ट स्वरूप है "बीज लक्ष्मी"। एक वृक्ष की ही भांति एक छोटे से बीज में सिमट जाता है - लक्ष्मी का विशाल स्वरूप। बीज लक्ष्मी साधना में भी उतर आया है भगवती महालक्ष्मी के पूर्ण स्वरूप के साथ-साथ जीवन में उन्नति का रहस्य।

👉🏿3. लक्ष्मी समुद्र तनया है, समुद्र से उत्पत्ति है उनकी, और समुद्र से प्राप्त विविध रत्न सहोदर हैं उनके, चाहे वह दक्षिणवर्ती शंख हो या मोती शंख, गोमती चक्र, स्वर्ण पात्र, कुबेर पात्र, लक्ष्मी प्रकाम्य क्षिरोदभव, वर-वरद, लक्ष्मी चैतन्य सभी उनके भ्रातृवत ही हैं और इनकी गृह में उपस्थिति आह्लादित करती है, लक्ष्मी को विवश कर देती है उन्हें गृह में स्थापित कर देने को।

👉🏿4. समुद्र मंथन में प्राप्त कर रत्न "लक्ष्मी" का वरण यदि किसी ने किया तो वे साक्षात भगवान् विष्णु। आपने पति की अनुपस्थिति में लक्ष्मी किसी गृह में झांकने तक की भी कल्पना नहीं कर करतीं और भगवान् विष्णु की उपस्थिति का प्रतीक है शालिग्राम, अनंत महायंत्र एवं शंख। शंख, शालिग्राम एवं तुलसी का वृक्ष - इनसे मिलकर बनता है पूर्ण रूप से भगवान् लक्ष्मी - नारायण की उपस्थिति का वातावरण।

👉🏿5. लक्ष्मी का नाम कमला है। कमलवत उनकी आंखे हैं अथवा उनका आसन कमल ही है और सर्वाधिक प्रिय है - लक्ष्मी को पदम। कमल - गट्टे की माला स्वयं धारण करना आधार और आसन देना है लक्ष्मी को आपने शरीर में लक्ष्मी को समाहित करने के लिए।

👉🏿6. लक्ष्मी की पूर्णता होती है विघ्न विनाशक श्री गणपति की उपस्तिथि से जो मंगल कर्ता है और प्रत्येक साधना में प्रथम पूज्य। भगवान् गणपति के किसी भी विग्रह की स्थापना किए बिना लक्ष्मी की साधना तो ऐसी है, ज्यों कोई अपना धन भण्डार भरकर उसे खुला छोड़ दे।

👉🏿7. लक्ष्मी का वास वही सम्भव है, जहां व्यक्ति सदैव सुरुचिपूर्ण वेशभूषा में रहे, स्वच्छ और पवित्र रहे तथा आन्तरिक रूप से निर्मल हो। गंदे, मैले, असभ्य और बक्वासी व्यक्तियों के जीवन में लक्ष्मी का वास संभव ही नहीं।

👉🏿8. लक्ष्मी का आगमन होता है, जहां पौरुष हो, जहां उद्यम हो, जहां गतिशीलता हो। उद्यमशील व्यक्तित्व ही प्रतिरूप होता है भगवान् श्री नारायण का, जो प्रत्येक क्षण गतिशील है, पालन में संलग्न है, ऐसे ही व्यक्तियों के जीवन में संलग्न है। ऐसे ही व्यक्तियों के जीवन में लक्ष्मी गृहलक्ष्मी बनकर, संतान लक्ष्मी बनकर आय, यश, श्री कई-कई रूपों मे प्रकट होती है।

👉🏿9. जो साधक गृहस्थ है, उन्हें अपने जीवन मे हवन को महत्वपूर्ण स्थान देना चाहिए और प्रत्येक माह की शुक्ल पंचमी को श्री सूक्त के पदों से एक कमल गट्टे का बीज और शुद्ध घृत के द्वारा आहुति प्रदान करना फलदायक होता है।

👉🏿10. आपने दैनिक जीवन क्रम में नित्य महालक्ष्मी की किसी ऐसी साधना - विधि को सम्मिलित करना है, जो आपके अनुकूल हो, और यदि इस विषय में निर्णय - अनिर्णय की स्थिति हो तो नित्य प्रति, सूर्योदय काल में निम्न मन्त्र की एक माला का मंत्र जप तो कमल गट्टे की माला से अवश्य करना चाहिए।

🗣मंत्र: ॐ श्रीं श्रीं कमले कमलालाये प्रसीद प्रसीद मम गृहे आगच्छ आगच्छ महालक्ष्म्यै नमः।

कार्तिक माह की श्रेष्ठता अथवा महत्ता

कार्तिक माह की श्रेष्ठता अथवा महत्ता

पर्वों और दान-पुण्य का सबसे बड़ा महीना कार्तिक मास इस बार 25 अक्टूबर से शुरू हो रहा है, जो 23 नवंबर, शुक्रवार को समाप्त होगा। हिंदू धर्म के इस पवित्र महीने में मंदिरों में धार्मिक अनुष्ठान चलेंगे। श्रद्धालु तुलसी-शालिगराम पूजन करेंगे और देव आराधना के साथ धन-संपत्ति, व्यापार-कारोबार में वृद्धि के लिए पूजा-अर्चना कर कामना करेंगे।

एक बार ब्रह्मा जी ने नारद जी को कार्तिक माह के विषय में बताते हुए कहा कि कार्तिक माह भगवान विष्णु जी को सदैव ही प्रिय है. इस मास में भगवान विष्णु जी का ध्यान करते हुए कोई भी पुण्य कार्य किया जाये उसका फल अवश्य मिलता है. सभी योनियों में से मनुष्य योनि को सर्वश्रेष्ठ तथा दुर्लभ कहा गया है, अत: प्रत्येक मनुष्य को कार्तिक माह में पुण्य कर्म करने चाहिए क्योंकि इस माह में सभी देवतागण मनुष्य के समीप हो जाते हैं.

इस माह में देवता मनुष्य द्वारा किये हुए स्नान, व्रत, वस्त्र, भोजन, चांदी, स्वर्ण, भूमि आदि दिये गये दान को विधिपूर्वक ग्रहण करते हैं. इन सभी में से अन्न दान, जो कि सभी पापों का नाश करता है, का अधिक महत्व है. कार्तिक माह में मनुष्य जिस किसी मनोकामना से दान अधिक करता है उसे वह अक्षय रूप में प्राप्त होता है. यदि कोई मनुष्य दान देने में असमर्थ हो तो उसे कार्तिक मास में प्रतिदिन भगवान के नामों का स्मरण करना चाहिए तथा गंगा जी में स्नान करते हुए कार्तिक माह की कथा पढ़नी चाहिए, ऎसा करने से भी मनुष्य पुण्य का भागी बनता है.

इस माह में भगवान को प्रसन्न करने के लिए किसी भी मन्दिर में भजन-कीर्तन करना चाहिए. स्वयं दीपदान करना चाहिए अथवा दूसरे के दीपक की रक्षा करनी चाहिए. भगवान का सारूप्य तथा मोक्षपद प्राप्त करने के लिए तुलसी तथा आँवले के वृक्ष को भगवद स्वरुप मानकर उसका पूजन करना चाहिए.

जो मनुष्य कार्तिक माह में जमीन पर सोता है उसके सभी पाप युगों-युगों के लिए नष्ट हो जाते हैं. मनुष्य अरुणोदय काल में जागरण कर गंगा में स्नान कर के करोड़ो जन्मों के कल्मषों को धो डालता है.

ॐ नमो नारायणया ॐ नमः शिवाय, ॐ नमो नारायणया ॐ नमः शिवाय, ॐ नमो नारायणया ॐ नमः शिवाय

ॐ नमो भगवाते वासुदेवया नमः, ॐ नमो भगवाते वासुदेवया नमः, ॐ नमो भगवाते वासुदेवया नमः,

गोविन्द गोविन्द हरे मुरारे, गोविन्द गोविन्द मुकुन्द कृष्ण।

गोविन्द गोविन्द रथांगपाणे, गोविन्द दामोदर माधवेति।।

कार्तिक माह में प्रतिदिन इस प्रकार भगवान का कीर्तन करें. कार्तिक माह में गीता जी का पाठ करने से बड़ा कोई पुण्य नही है. सात समुद्रों तक की पृथ्वी को दान कर के जो फल प्राप्त होता है, वही फल कार्तिक माह में स्नान व दान का है. कार्तिक माह में अन्न दान को सर्वश्रेष्ठ कहा गया है क्योंकि यह संसार अन्न के आधार पर ही जीवित रहता है.

ॐ नमो भगवाते वासुदेवया नमः, ॐ नमो भगवाते वासुदेवया नमः, ॐ नमो भगवाते वासुदेवया नमः

शरद पूर्णमासी

शरद पूर्णमासी


ज्‍योतिष के अनुसार, पूरे साल में केवल इसी दिन चंद्रमा सोलह कलाओं से परिपूर्ण होता है

शरद पूर्णिमा के शुभ अवसर पर अपने इष्ट देव का पूजन करना चाहिए. इन्द्र और महालक्ष्मी जी का पूजन करके घी के दीपक जलाकर उसकी गन्ध पुष्प आदि से पूजा करनी चाहिए. .

इसके बाद उनके मंत्र की कम से कम 11 माला जाप करें.

मंत्र है- "ॐ ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद महालक्ष्मये नमः"

इस दिन सायंकाल में चन्द्रोदय होने पर घी मिश्रित खीर तैयार करे और बहुत-से पात्रों में डालकर उसे चन्द्रमा की चाँदनी में रखे . जब एक प्रहर (३ घंटे) बीत जाएँ, तब लक्ष्मीजी को सारी खीर अर्पण करें . . तत्पश्चात परिजनों . . मित्रों के साथ खीर ग्रहण करे
इस रात्रि की मध्यरात्रि में देवी महालक्ष्मी अपने कर-कमलों में वर और अभय लिए संसार में विचरती हैं . . अतः इस रात्रि को जागरण अवश्य करना चाहिये

146, गायत्री मंत्र का संकलन।।

146, गायत्री मंत्र का संकलन।।
॥ गायत्रीमन्त्राः ॥
         सर्व गायत्री
1 सूर्य ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात् ॥

 2 ॐ आदित्याय विद्महे सहस्रकिरणाय धीमहि तन्नो भानुः प्रचोदयात् ॥

 3 ॐ प्रभाकराय विद्महे दिवाकराय धीमहि तन्नः सूर्यः प्रचोदयात् ॥

4 ॐ अश्वध्वजाय विद्महे पाशहस्ताय धीमहि तन्नः सूर्यः प्रचोदयात् ॥

5 ॐ भास्कराय विद्महे महद्द्युतिकराय धीमहि तन्न आदित्यः प्रचोदयात् ॥

6 ॐ आदित्याय विद्महे सहस्रकराय धीमहि तन्नः सूर्यः प्रचोदयात् ॥

7 ॐ भास्कराय विद्महे महातेजाय धीमहि तन्नः सूर्यः प्रचोदयात् ॥

8 ॐ भास्कराय विद्महे महाद्द्युतिकराय धीमहि तन्नः सूर्यः प्रचोदयात् ॥

9 चन्द्र ॐ क्षीरपुत्राय विद्महे महाकालाय धीमहि तन्नश्चन्द्रः प्रचोदयात् ॥

10 ॐ क्षीरपुत्राय विद्महे अमृतत्वाय धीमहि तन्नश्चन्द्रः प्रचोदयात् ॥

11 ॐ निशाकराय विद्महे कलानाथाय धीमहि तन्नः सोमः प्रचोदयात् ॥

12 अङ्गारक, भौम, मङ्गल, कुज ॐ वीरध्वजाय विद्महे विघ्नहस्ताय धीमहि तन्नो भौमः प्रचोदयात् ॥

13 ॐ अङ्गारकाय विद्महे भूमिपालाय धीमहि तन्नः कुजः प्रचोदयात् ॥

 14 ॐ चित्रिपुत्राय विद्महे लोहिताङ्गाय धीमहि तन्नो भौमः प्रचोदयात् ॥

15 ॐ अङ्गारकाय विद्महे शक्तिहस्ताय धीमहि तन्नो भौमः प्रचोदयात् ॥

 16 बुध ॐ गजध्वजाय विद्महे सुखहस्ताय धीमहि तन्नो बुधः प्रचोदयात् ॥

 17 ॐ चन्द्रपुत्राय विद्महे रोहिणी प्रियाय धीमहि तन्नो बुधः
प्रचोदयात् ॥

18 ॐ सौम्यरूपाय विद्महे वाणेशाय धीमहि तन्नो बुधः प्रचोदयात् ॥

19 गुरु ॐ वृषभध्वजाय विद्महे क्रुनिहस्ताय धीमहि तन्नो गुरुः प्रचोदयात् ॥

 20 ॐ सुराचार्याय विद्महे सुरश्रेष्ठाय धीमहि तन्नो गुरुः प्रचोदयात् ॥

 21 शुक्र ॐ अश्वध्वजाय विद्महे धनुर्हस्ताय धीमहि तन्नः शुक्रः प्रचोदयात् ॥

22 ॐ रजदाभाय विद्महे भृगुसुताय धीमहि तन्नः शुक्रः प्रचोदयात् ॥

23 ॐ भृगुसुताय विद्महे दिव्यदेहाय धीमहि तन्नः शुक्रः प्रचोदयात् ॥

 24 शनीश्वर, शनैश्चर, शनी ॐ काकध्वजाय विद्महे खड्गहस्ताय धीमहि तन्नो मन्दः प्रचोदयात् ॥

25 ॐ शनैश्चराय विद्महे सूर्यपुत्राय धीमहि तन्नो मन्दः प्रचोदयात् ॥

 26 ॐ सूर्यपुत्राय विद्महे मृत्युरूपाय धीमहि तन्नः सौरिः प्रचोदयात् ॥

27 राहु ॐ नाकध्वजाय विद्महे पद्महस्ताय धीमहि तन्नो राहुः प्रचोदयात् ॥

28 ॐ शिरोरूपाय विद्महे अमृतेशाय धीमहि तन्नो राहुः प्रचोदयात् ॥

29 केतु ॐ अश्वध्वजाय विद्महे शूलहस्ताय धीमहि तन्नः केतुः प्रचोदयात् ॥

30 ॐ चित्रवर्णाय विद्महे सर्परूपाय धीमहि तन्नः केतुः प्रचोदयात् ॥

31 ॐ गदाहस्ताय विद्महे अमृतेशाय धीमहि तन्नः केतुः प्रचोदयात् ॥

32 पृथ्वी ॐ पृथ्वी देव्यै विद्महे सहस्रमर्त्यै च धीमहि तन्नः पृथ्वी प्रचोदयात् ॥

33 ब्रह्मा ॐ चतुर्मुखाय विद्महे हंसारूढाय धीमहि तन्नो ब्रह्मा प्रचोदयात् ॥

34 ॐ वेदात्मनाय विद्महे हिरण्यगर्भाय धीमहि तन्नो ब्रह्मा प्रचोदयात् ॥

35 ॐ चतुर्मुखाय विद्महे कमण्डलुधराय धीमहि तन्नो ब्रह्मा प्रचोदयात् ॥

36 ॐ परमेश्वराय विद्महे परमतत्त्वाय धीमहि तन्नो ब्रह्मा प्रचोदयात् ॥

37 विष्णु ॐ नारायणाय विद्महे वासुदेवाय धीमहि तन्नो विष्णुः प्रचोदयात् ॥

38 नारायण ॐ नारायणाय विद्महे वासुदेवाय धीमहि तन्नो विष्णुः प्रचोदयात् ॥

39 वेङ्कटेश्वर ॐ निरञ्जनाय विद्महे निरपाशाय (?) धीमहि तन्नः श्रीनिवासः प्रचोदयात् ॥

40 राम ॐ रघुवंश्याय विद्महे सीतावल्लभाय धीमहि तन्नो रामः प्रचोदयात् ॥

41 ॐ दाशरथाय विद्महे सीतावल्लभाय धीमहि तन्नो रामः प्रचोदयात् ॥

42 ॐ भरताग्रजाय विद्महे सीतावल्लभाय धीमहि तन्नो रामः प्रचोदयात् ॥

43 ॐ भरताग्रजाय विद्महे रघुनन्दनाय धीमहि तन्नो रामः प्रचोदयात् ॥

44 कृष्ण ॐ देवकीनन्दनाय विद्महे वासुदेवाय धीमहि तन्नः कृष्णः प्रचोदयात् ॥

45 ॐ दामोदराय विद्महे रुक्मिणीवल्लभाय धीमहि तन्नः कृष्णः प्रचोदयात् ॥

46 ॐ गोविन्दाय विद्महे गोपीवल्लभाय धीमहि तन्नः कृष्णः प्रचोदयात् ।

47 गोपाल ॐ गोपालाय विद्महे गोपीजनवल्लभाय धीमहि तन्नो गोपालः प्रचोदयात् ॥

48 पाण्डुरङ्ग ॐ भक्तवरदाय विद्महे पाण्डुरङ्गाय धीमहि तन्नः कृष्णः प्रचोदयात् ॥

49 नृसिंह ॐ वज्रनखाय विद्महे तीक्ष्णदंष्ट्राय धीमहि तन्नो नारसिꣳहः प्रचोदयात् ॥

50 ॐ नृसिंहाय विद्महे वज्रनखाय धीमहि तन्नः सिंहः प्रचोदयात् ॥

51 परशुराम ॐ जामदग्न्याय विद्महे महावीराय धीमहि तन्नः परशुरामः प्रचोदयात् ॥

52 इन्द्र ॐ सहस्रनेत्राय विद्महे वज्रहस्ताय धीमहि तन्न इन्द्रः प्रचोदयात् ॥

53 हनुमान ॐ आञ्जनेयाय विद्महे महाबलाय धीमहि तन्नो हनूमान् प्रचोदयात् ॥

54 ॐ आञ्जनेयाय विद्महे वायुपुत्राय धीमहि तन्नो हनूमान् प्रचोदयात् ॥

55 मारुती ॐ मरुत्पुत्राय विद्महे आञ्जनेयाय धीमहि तन्नो मारुतिः प्रचोदयात् ॥

56 दुर्गा ॐ कात्यायनाय विद्महे कन्यकुमारी च धीमहि तन्नो दुर्गा प्रचोदयात् ॥

57 ॐ महाशूलिन्यै विद्महे महादुर्गायै धीमहि तन्नो भगवती प्रचोदयात् ॥

58 ॐ गिरिजायै च विद्महे शिवप्रियायै च धीमहि तन्नो दुर्गा प्रचोदयात् ॥

59 शक्ति ॐ सर्वसंमोहिन्यै विद्महे विश्वजनन्यै च धीमहि तन्नः शक्तिः प्रचोदयात् ॥

60 काली ॐ कालिकायै च विद्महे श्मशानवासिन्यै च धीमहि तन्न अघोरा प्रचोदयात् ॥

61 ॐ आद्यायै च विद्महे परमेश्वर्यै च धीमहि तन्नः कालीः प्रचोदयात् ॥

62 देवी ॐ महाशूलिन्यै च विद्महे महादुर्गायै धीमहि तन्नो भगवती प्रचोदयात् ॥

63 ॐ वाग्देव्यै च विद्महे कामराज्ञै च धीमहि तन्नो देवी प्रचोदयात् ॥

64 गौरी ॐ सुभगायै च विद्महे काममालिन्यै च धीमहि तन्नो गौरी प्रचोदयात् ॥

65 लक्ष्मी ॐ महालक्ष्मी च विद्महे विष्णुपत्नीश्च धीमहि तन्नो लक्ष्मीः प्रचोदयात् ॥

66 ॐ महादेव्यै च विद्महे विष्णुपत्न्यै च धीमहि तन्नो लक्ष्मीः प्रचोदयात् ॥

67 सरस्वती ॐ वाग्देव्यै च विद्महे विरिञ्चिपत्न्यै च धीमहि तन्नो वाणी प्रचोदयात् ॥

68 सीता ॐ जनकनन्दिन्यै विद्महे भूमिजायै च धीमहि तन्नः सीता प्रचोदयात् ॥

69 राधा ॐ वृषभानुजायै विद्महे कृष्णप्रियायै धीमहि तन्नो राधा प्रचोदयात् ॥

70 अन्नपूर्णा ॐ भगवत्यै च विद्महे माहेश्वर्यै च धीमहि तन्न अन्नपूर्णा प्रचोदयात् ॥

71 तुलसी ॐ तुलसीदेव्यै च विद्महे विष्णुप्रियायै च धीमहि तन्नो बृन्दः प्रचोदयात् ॥

72 महादेव ॐ तत्पुरुषाय विद्महे महादेवाय धीमहि तन्नो रुद्रः प्रचोदयात् ॥

73 रुद्र ॐ पुरुषस्य विद्महे सहस्राक्षस्य धीमहि तन्नो रुद्रः प्रचोदयात् ॥

74 ॐ तत्पुरुषाय विद्महे महादेवाय धीमहि तन्नो रुद्रः प्रचोदयात् ॥

75 शङ्कर ॐ सदाशिवाय विद्महे सहस्राक्ष्याय धीमहि तन्नः साम्बः प्रचोदयात् ॥

76 नन्दिकेश्वर ॐ तत्पुरुषाय विद्महे नन्दिकेश्वराय धीमहि तन्नो वृषभः प्रचोदयात् ॥

77 गणेश ॐ तत्कराटाय विद्महे हस्तिमुखाय धीमहि तन्नो दन्ती प्रचोदयात् ॥

78 ॐ तत्पुरुषाय विद्महे वक्रतुण्डाय धीमहि तन्नो दन्तिः प्रचोदयात् ॥

79 ॐ तत्पुरुषाय विद्महे हस्तिमुखाय धीमहि तन्नो दन्ती प्रचोदयात् ॥

80 ॐ एकदन्ताय विद्महे वक्रतुण्डाय धीमहि तन्नो दन्तिः प्रचोदयात् ॥

81 ॐ लम्बोदराय विद्महे महोदराय धीमहि तन्नो दन्तिः प्रचोदयात् ॥

82 षण्मुख ॐ षण्मुखाय विद्महे महासेनाय धीमहि तन्नः स्कन्दः प्रचोदयात्॥

83 ॐ षण्मुखाय विद्महे महासेनाय धीमहि तन्नः षष्ठः प्रचोदयात् ॥

84 सुब्रह्मण्य ॐ तत्पुरुषाय विद्महे महासेनाय धीमहि तन्नः षण्मुखः प्रचोदयात् ॥

85 ॐ ॐ ॐकाराय विद्महे डमरुजातस्य धीमहि! तन्नः प्रणवः प्रचोदयात् ॥

86 अजपा ॐ हंस हंसाय विद्महे सोऽहं हंसाय धीमहि तन्नो हंसः प्रचोदयात् ॥

87 दक्षिणामूर्ति ॐ दक्षिणामूर्तये विद्महे ध्यानस्थाय धीमहि तन्नो धीशः प्रचोदयात् ॥

88 गुरु ॐ गुरुदेवाय विद्महे परब्रह्मणे धीमहि तन्नो गुरुः प्रचोदयात् ॥

89 हयग्रीव ॐ वागीश्वराय विद्महे हयग्रीवाय धीमहि तन्नो हंसः प्रचोदयात् ॥

90 अग्नि ॐ सप्तजिह्वाय विद्महे अग्निदेवाय धीमहि तन्न अग्निः प्रचोदयात् ॥

91 ॐ वैश्वानराय विद्महे लालीलाय धीमहि तन्न अग्निः प्रचोदयात् ॥

92 ॐ महाज्वालाय विद्महे अग्निदेवाय धीमहि तन्नो अग्निः प्रचोदयात् ॥

93 यम ॐ सूर्यपुत्राय विद्महे महाकालाय धीमहि तन्नो यमः प्रचोदयात् ॥

94 वरुण ॐ जलबिम्बाय विद्महे नीलपुरुषाय धीमहि तन्नो वरुणः प्रचोदयात् ॥

95 वैश्वानर ॐ पावकाय विद्महे सप्तजिह्वाय धीमहि तन्नो वैश्वानरः प्रचोदयात् ॥

96 मन्मथ ॐ कामदेवाय विद्महे पुष्पवनाय धीमहि तन्नः कामः प्रचोदयात् ॥

97 हंस ॐ हंस हंसाय विद्महे परमहंसाय धीमहि तन्नो हंसः प्रचोदयात् ॥

98 ॐ परमहंसाय विद्महे महत्तत्त्वाय धीमहि तन्नो हंसः प्रचोदयात् ॥

99 नन्दी ॐ तत्पुरुषाय विद्महे चक्रतुण्डाय धीमहि तन्नो नन्दिः प्रचोदयात् ॥

100 गरुड ॐ तत्पुरुषाय विद्महे सुवर्णपक्षाय धीमहि तन्नो गरुडः प्रचोदयात् ॥

101 सर्प ॐ नवकुलाय विद्महे विषदन्ताय धीमहि तन्नः सर्पः प्रचोदयात् ॥

102 पाञ्चजन्य ॐ पाञ्चजन्याय विद्महे पावमानाय धीमहि तन्नः शङ्खः प्रचोदयात् ॥

103 सुदर्शन ॐ सुदर्शनाय विद्महे महाज्वालाय धीमहि तन्नश्चक्रः प्रचोदयात् ॥

104 अग्नि ॐ रुद्रनेत्राय विद्महे शक्तिहस्ताय धीमहि तन्नो वह्निः प्रचोदयात् ॥

105 ॐ वैश्वानराय विद्महे लाललीलाय धीमहि तन्नोऽग्निः प्रचोदयात् ॥

106 ॐ महाज्वालाय विद्महे अग्निमथनाय धीमहि तन्नोऽग्निः प्रचोदयात् ॥

107 आकाश ॐ आकाशाय च विद्महे नभोदेवाय धीमहि तन्नो गगनं प्रचोदयात् ॥

108 अन्नपूर्णा ॐ भगवत्यै च विद्महे माहेश्वर्यै च धीमहि तन्नोऽन्नपूर्णा प्रचोदयात् ॥

109 बगलामुखी ॐ बगलामुख्यै च विद्महे स्तम्भिन्यै च धीमहि तन्नो देवी प्रचोदयात् ॥

110 बटुकभैरव ॐ तत्पुरुषाय विद्महे आपदुद्धारणाय धीमहि तन्नो बटुकः प्रचोदयात् ॥

111 भैरवी ॐ त्रिपुरायै च विद्महे भैरव्यै च धीमहि तन्नो देवी प्रचोदयात् ॥

112 भुवनेश्वरी ॐ नारायण्यै च विद्महे भुवनेश्वर्यै धीमहि तन्नो देवी प्रचोदयात् ॥

113 ब्रह्मा ॐ पद्मोद्भवाय विद्महे देववक्त्राय धीमहि तन्नः स्रष्टा प्रचोदयात् ॥

114 ॐ वेदात्मने च विद्महे हिरण्यगर्भाय धीमहि तन्नो ब्रह्मा प्रचोदयात् ॥

115 ॐ परमेश्वराय विद्महे परतत्त्वाय धीमहि तन्नो ब्रह्मा प्रचोदयात् ॥

116 चन्द्र ॐ क्षीरपुत्राय विद्महे अमृततत्त्वाय धीमहि तन्नश्चन्द्रः प्रचोदयात् ॥

117 छिन्नमस्ता ॐ वैरोचन्यै च विद्महे छिन्नमस्तायै धीमहि तन्नो देवी प्रचोदयात् ॥

118 दक्षिणामूर्ति ॐ दक्षिणामूर्तये विद्महे ध्यानस्थाय धीमहि तन्नो धीशः प्रचोदयात् ॥

119 देवी ॐ देव्यैब्रह्माण्यै विद्महे महाशक्त्यै च धीमहि तन्नो देवी प्रचोदयात् ॥

120 धूमावती ॐ धूमावत्यै च विद्महे संहारिण्यै च धीमहि तन्नो धूमा प्रचोदयात् ॥

121 दुर्गा ॐ कात्यायन्यै विद्महे कन्याकुमार्यै धीमहि तन्नो दुर्गा प्रचोदयात् ॥

122 ॐ महादेव्यै च विद्महे दुर्गायै च धीमहि तन्नो देवी प्रचोदयात् ॥

123 गणेश ॐ तत्पुरुषाय विद्महे वक्रतुण्डाय धीमहि तन्नो दन्ती प्रचोदयात् ॥

124 ॐ एकदन्ताय विद्महे वक्रतुण्डाय धीमहि तन्नो दन्ती प्रचोदयात् ॥

125 गरुड ॐ वैनतेयाय विद्महे सुवर्णपक्षाय धीमहि तन्नो गरुडः प्रचोदयात् ॥

126 ॐ तत्पुरुषाय विद्महे सुवर्णपर्णाय (सुवर्णपक्षाय) धीमहि तन्नो गरुडः प्रचोदयात् ॥

127 गौरी ॐ गणाम्बिकायै विद्महे कर्मसिद्ध्यै च धीमहि तन्नो गौरी प्रचोदयात् ॥

128 ॐ सुभगायै च विद्महे काममालायै धीमहि तन्नो गौरी प्रचोदयात् ॥

129 गोपाल ॐ गोपालाय विद्महे गोपीजनवल्लभाय धीमहि तन्नो गोपालः प्रचोदयात् ॥

130 गुरु ॐ गुरुदेवाय विद्महे परब्रह्माय धीमहि तन्नो गुरुः प्रचोदयात् ॥

131 हनुमत् ॐ रामदूताय विद्महे कपिराजाय धीमहि तन्नो हनुमान् प्रचोदयात् ॥

132 ॐ अञ्जनीजाय विद्महे वायुपुत्राय धीमहि तन्नो हनुमान् प्रचोदयात् ॥

133 हयग्रीव ॐ वागीश्वराय विद्महे हयग्रीवाय धीमहि तन्नो हंसः प्रचोदयात् ॥

134 इन्द्र, शक्र ॐ देवराजाय विद्महे वज्रहस्ताय धीमहि तन्नः शक्रः प्रचोदयात् ॥

135 ॐ तत्पुरुषाय विद्महे सहस्राक्षाय धीमहि तन्न इन्द्रः प्रचोदयात् ॥

136 जल ॐ ह्रीं जलबिम्बाय विद्महे मीनपुरुषाय धीमहि तन्नो विष्णुः प्रचोदयात् ॥

137 ॐ जलबिम्बाय विद्महे नीलपुरुषाय धीमहि तन्नस्त्वम्बु प्रचोदयात् ॥

138 जानकी ॐ जनकजायै विद्महे रामप्रियायै धीमहि तन्नः सीता प्रचोदयात् ॥

139 जयदुर्गा ॐ नारायण्यै विद्महे दुर्गायै च धीमहि तन्नो गौरी प्रचोदयात् ॥

140 काली ॐ कालिकायै विद्महे श्मशानवासिन्यै धीमहि तन्नोऽघोरा प्रचोदयात् ॥

141 काम ॐ मनोभवाय विद्महे कन्दर्पाय धीमहि तन्नः कामः प्रचोदयात् ॥

142 ॐ मन्मथेशाय विद्महे कामदेवाय धीमहि तन्नोऽनङ्गः प्रचोदयात् ॥

143 ॐ कामदेवाय विद्महे पुष्पबाणाय धीमहि तन्नोऽनङ्गः प्रचोदयात् ॥

144 कामकलाकाली ॐ अनङ्गाकुलायै विद्महे मदनातुरायै धीमहि तन्नः कामकलाकाली प्रचोदयात् ।। व

145 ॐ दामोदराय विद्महे वासुदेवाय धीमहि तन्नः कृष्णः प्रचोदयात् ॥

146 ॐ देवकीनन्दनाय विद्महे वासुदेवाय धीमहि तन्नः कृष्ण  प्रचोदयात्:

एक दिन कॉलेज में प्रोफेसर ने विद्यर्थियों से पूछा कि इस संसार में जो कुछ भी है उसे भगवान ने ही बनाया है न?

एक दिन कॉलेज में प्रोफेसर ने विद्यर्थियों से पूछा कि इस संसार में जो कुछ भी है उसे भगवान ने ही बनाया है न?

सभी ने कहा, “हां भगवान ने ही बनाया है।“
प्रोफेसर ने कहा कि इसका मतलब ये हुआ कि बुराई भी भगवान की बनाई चीज़ ही है।
प्रोफेसर ने इतना कहा तो एक विद्यार्थी उठ खड़ा हुआ और उसने कहा कि इतनी जल्दी इस निष्कर्ष पर मत पहुंचिए सर।
प्रोफेसर ने कहा, क्यों? अभी तो सबने कहा है कि सबकुछ भगवान का ही बनाया हुआ है फिर तुम ऐसा क्यों कह रहे हो?

विद्यार्थी ने कहा कि सर, मैं आपसे छोटे-छोटे दो सवाल पूछूंगा। फिर उसके बाद आपकी बात भी मान लूंगा।

प्रोफेसर ने कहा, "तुम संजय सिन्हा की तरह सवाल पर सवाल करते हो। खैर पूछो।"

विद्यार्थी ने पूछा , "सर क्या दुनिया में ठंड का कोई वजूद है?"

प्रोफेसर ने कहा, बिल्कुल है। सौ फीसदी है। हम ठंड को महसूस करते हैं।

विद्यार्थी ने कहा, "नहीं सर, ठंड कुछ है ही नहीं। ये असल में गर्मी की अनुपस्थिति का अहसास भर है। जहां गर्मी नहीं होती, वहां हम ठंड को महसूस करते हैं।"

प्रोफेसर चुप रहे।

विद्यार्थी ने फिर पूछा, "सर क्या अंधेरे का कोई अस्तित्व है?"

प्रोफेसर ने कहा, "बिल्कुल है। रात को अंधेरा होता है।"

विद्यार्थी ने कहा, "नहीं सर। अंधेरा कुछ होता ही नहीं। ये तो जहां रोशनी नहीं होती वहां अंधेरा होता है।

प्रोफेसर ने कहा, "तुम अपनी बात आगे बढ़ाओ।"

विद्यार्थी ने फिर कहा, "सर आप हमें सिर्फ लाइट एंड हीट (प्रकाश और ताप) ही पढ़ाते हैं। आप हमें कभी डार्क एंड कोल्ड (अंधेरा और ठंड) नहीं पढ़ाते। फिजिक्स में ऐसा कोई विषय ही नहीं। सर, ठीक इसी तरह ईश्वर ने सिर्फ अच्छा-अच्छा बनाया है। अब जहां अच्छा नहीं होता, वहां हमें बुराई नज़र आती है। पर बुराई को ईश्वर ने नहीं बनाया। ये सिर्फ अच्छाई की अनुपस्थिति भर है।"

दरअसल दुनिया में कहीं बुराई है ही नहीं। ये सिर्फ प्यार, विश्वास और ईश्वर में हमारी आस्था की कमी का नाम है।

ज़िंदगी में जब और जहां मौका मिले अच्छाई बांटिए। अच्छाई बढ़ेगी तो बुराई होगी ही नहीं। 

भगवान सूर्य की महिमा


भगवान सूर्य की महिमा


हिन्दू धर्म में विविधता है, यहा देवी देवता भी बहुत से है | इन्ही में से एक देवता है सूर्य देव जो साक्षात दर्शन देते है और व्यक्ति, पेड़ पौधो और जानवरो को जीवन प्रदान करते है | अन्धकार को दूर करने वाले और रोशनी देने वाले सूर्य देवता के बिना किसी का भी जीवन अपूर्ण है | वेदो और पुराणों में सूर्य देव की महिमा को विस्तार से बताया गया है | इनका विश्व प्रसिद्ध सूर्य मंदिर कोणार्क में है |

भगवान सूर्य देवता महिमा
कैसे हुआ भगवान सूर्य का जन्म ?
एक बार देवता और दानवो के युद्ध में देवता पराजित हो गये थे | देव माता अदिति बहुत उदास हुई और उन्होंने तब  देवताओ के स्वर्ग वापसी के  लिए घोर तपस्या की , उन्हें वरदान मिला की भगवान् सूर्य उन्हें विजय दिलवाएंगे और वे अदिति के पुत्र रूप में जल्द ही अवतार लेंगे | समय आने पर सूर्य देवता का जन्म हुआ और उन्होंने देवताओ को असुरो पर विजय दिलवाई |


सूर्य के माता पिता और परिवार
भगवान सूर्य के पिता का नाम महर्षि कश्यप थे  और उनकी माँ अदिति थी  | अदिति के गर्भ से जन्म लेने के कारण इनका नाम आदित्य भी पड़ा | इनके जयकारे और आरती में कश्यप नंदन भी आता है |

सूर्य की पत्नी और पुत्र पुत्रियाँ 
भगवान सूर्य की दो पत्नियाँ बताई गयी है एक संज्ञा और दूसरी छाया | इनके पुत्र मृत्यु के देवता यमराज और शनिदेव जी है जिन्हें मनुष्यों के ऊपर न्याय के लिए कार्य दिया गया है | इनके अलावा यमुना, तप्ति, अश्विनी तथा वैवस्वत मनु भी सूर्य की ही संताने है | मनु को पहला मनुष्य माना जाता है |

सूर्य देवता की सवारी – सात घोड़ो वाला रथ
भगवान सूर्य का वाहन सात  घोड़ो वाला एक रथ है जिसके सारथी अरुण देव है | सूर्य देवता इस रथ में सवार है और सम्पूर्ण जगत में प्रकाश फैला रहे है |

क्यों सूर्य देवता के रथ में सात ही घोड़े है ?
मान्यता है की यह घोड़े 7 इसलिए है की यह सप्ताह के सात दिनों को दर्शाते है | दूसरा तर्क यह भी है की ये रथ के प्रत्येक घोड़े एक अलग रंग वाले है जो मिलकर एक पूरा  सात रंगों वाला इन्द्रधनुष की रचना करते है |

कैसे करे सूर्य देवता की पूजा
हमारे धर्मग्रंथो में बताया गया है की सुबह सूर्योदय से पूर्व उठ कर हमें नित्य कार्यो को संपन्न करके भगवान सूर्य की उपासना करनी चाहिए | सूर्य उपासना के बहुत सारे लाभ है | फिर आप भगवान सूर्य को जल से अर्ध्य दे | फिर सूर्य के 21 नाम पढ़े और उनसे अच्छे दिन की मनोकामना मांगे |


भगवान सूर्य देव के 21 महान नाम
विकर्तन यानी विपत्तियों को नष्ट करने वाले
विवस्वान यानी प्रकाश रूप
मार्तंड
भास्कर
रवि
लोकप्रकाशक
श्रीमान
लोक चक्षु
गृहेश्वर
लोक साक्षी
त्रिलोकेश
कर्ता
हर्ता
तमिस्त्रहा
तपन
तापन
शुचि यानी पवित्रतम
ब्रह्मा
सप्ताश्ववाहन
गभस्तिहस्त
सर्वदेवनमस्कृत


 मुख्य त्यौहार

भगवान सूर्य के पूजन के लिए सबसे बड़ा दिन मकर संक्रांति का माना गया है | इस दिन गंगा सागर तीर्थ यात्रा पर लाखो भक्त मेले में शामिल होते है | देश के अन्य तीर्थ स्थल  जैसे  काशी (वाराणसी ) , त्रिवेणी संगम,  हरिद्वार , पुष्कर , उज्जैन की शिप्रा ,  लोहार्गल आदि तीर्थ स्थलों पर भारी संख्या में श्रद्धालु स्नान करते है और भगवान सूर्य को जल से अर्ध्य देते है |

भगवान कार्तिकेय देवताओ के सेनापति और स्कंद देवता के रूप में पूजे जाते है

भगवान कार्तिकेय देवताओ के सेनापति और स्कंद देवता के रूप में पूजे जाते है | इनके माता पिता पार्वती और भगवान शिव है | इन्हें दक्षिण भारत में ‘मुरुगन’ भी कहा जाता है। यह मुख्य रूप से दक्षिण भारत के तमिलनाडू में पूजे जाते है | भारत के अतिरिक्त इन्हे विश्व में श्रीलंका, मलेशिया, सिंगापुर आदि में अन्य रूपों में पूजा जाता है |

✨ कार्तिकेय हमेशा रहते है बालक रूप में । ✨
भगवान कार्तिकेय के छ: सिर बताये गये है | वे बहुत बड़े योधा भी है और तमिल लोगो के अनुसार उनका विवाह भी इंद्र की पुत्री देवसेना के साथ हुआ है | फिर भी ये हमेशा बालक रूप में रहते है | इसके पीछे एक रोचक श्राप है जो स्वयं इनकी माता ने इन्हे दिया था |

✨ महाशक्तिशाली असुरो के विनाश के लिए हुआ था जन्म । ✨
राजा दक्ष के हवन कुंड में माँ सती समा गयी थी और तब भगवान शिव हिमालय में घोर तपस्या में लिप्त हो गये थे | दूसरी तरफ तारकासुर नामक असुर ने महा तपस्या करके यह वरदान प्राप्त कर लिए की उसकी मृत्यु सिर्फ और सिर्फ शिव के पुत्र से ही होगी | हलाकि सती ने अपने दूसरा जीवन हिमालय की पुत्री के रूप में ले लिया था पर भोलनाथ की ध्यान अपने चरम पर था  |

✨ कामदेव के हाथो हुआ भोलनाथ का ध्यान भंग । ✨
तब कामदेव धर्म और देवताओ की रक्षा के लिए शिव के क्रोध का सामना करने के लिए तैयार हुए | उन्होंने अपने पुष्प काम बाणों से शिव की तपस्या को भंग कर दिया |  इस कार्य के लिए अपने त्रिनेत्र से शिव ने कामदेव को भस्म कर दिया | फिर उन्होंने पार्वती के साथ विवाह रचा लिया और पुत्र रूप में छ: जीवो वाले कार्तिकेय स्वामी का जन्म हुआ |

✨ कार्तिकेय ने किया तारकासुर का वध । ✨
जिस महान कार्य और वध के लिए भगवान कार्तिकेय का जन्म हुआ था , वो था महाशक्तिशाली असुर तारकासुर का वध | देवताओ ने अपना सेनापति कार्तिकेय जी को नियुक्त किया और उनकी अगुवाई में महायुद्ध लड़ा गया | इस युद्ध में शिव के पुत्र ने अपार शक्ति प्रदर्शन कर तारकासुर और सूरपद्म का विनाश किया |

✨ मोर है मुख्य वाहन ✨
हिन्दू देवी देवताओ के वाहन अलग अलग है और उसमे कार्तिकेय जी का वाहन मोर को बताया गया है |

✨ 140 फिट ऊँची प्रतिमा ✨
मलेशिया के गोम्बैक जिले में एक चूना पत्थर की पहाड़ी है | यहा  भगवान मुरुगन की विश्व में सर्वाधिक ऊंची प्रतिमा 140 फिट की है | यह स्वर्ण रंग की है | मूर्ति के पास से पहाड़ पर चढ़ने के लिए हजारो सीढिया बनी हुई है |

✨ बुद्धि के देवता और सबसे पहले पूजे जाने वाले पञ्च देवता में एक है भगवान श्री गणेश | भारत के सबसे बड़े त्यौहार दीपावली के दिन भी लक्ष्मी जी के साथ गणेश की पूजा विधि विधान से होती है | क्यों की समुन्द्र मंथन से निकली विष्णु प्रिय लक्ष्मी जी धन तो दे सकती है पर उससे सँभालने के लिए बुद्धि गणपति ही देते है | गणेश पुराण के अनुसार गणेश सबसे बड़े देवता है जिन्हें पाने के लिए भगवान शिव और पार्वती दोनों ने तपस्या की थी | तब कृष्ण के अवतार के रूप में गणेश जी का जन्म हुआ था ।

✨गणेश के एकदंत बनने की कथा ✨
आपने देखा होगा भगवान श्री गणेश की मूर्ति में एकदन्त आधा टुटा हुआ है | यह दांत कैसे टुटा , इसके पीछे पुराणों में अलग अलग कथाये बताई गयी है | कही लिखा हुआ है भगवान परशुराम जी ने इसे तोडा है | तो कही महाभारत काव्य को लिखने के लिए गणेश जी ने अपना एक दाँत तोड़ डाला।  कही यह भी लिखा है की कार्तिकेय ने खेल खेल में गणेश जी का दन्त तोड़ दिया था |

✨ गणेश और तुलसी जी की कहानी
तुलसी जी और गणेश ने एक दुसरे को श्राप दे दिया जिससे तुलसी का विवाह एक असुर से तो गणेश जी का विवाह अकारण ही हो गया | तभी से तुलसी जी गणेश जी की पूजा में नही चढ़ाई जाती है |

✨ गणेश ने किया कुबेर का घमंड चूर ✨
एक बार धन के देवता कुबेर को अत्यंत घमंड हो गया | उन्होंने महा भोज आयोजित किया | गणेश जी को उन्हें सबक सिखाना था | इसलिए लम्बोदर गणेश ने कुबेर के सारे खजाने ही खा लिए |

✨ गणेश और लक्ष्मी के साथ पूजे जाते है ✨
गणेश और लक्ष्मी जी की पूजा दीपावली पर की जाती है | गणेश प्रथम पूज्य देवता है तो धन की देवी लक्ष्मी जी को माना गया है | व्यक्ति के पास धन के साथ बुद्धि होना भी जरुरी है , इसी कारण गणेश जी और लक्ष्मी जी की पूजा एक साथ की जाती है |

✨ क्यों गणेश को सबसे पहले पूजा जाता है | ✨
बुद्धि के देवता ने अपने ज्ञान के बल पर छोटे से मूषक से सम्पूर्ण ब्रहमांड के साथ चक्कर लगा लिए थे | तब शिव ने इन्हे प्रथम पूज्य का वरदान दिया |

भारत की संस्कृति को पहचाने !

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दो पक्ष

  1. कृष्ण पक्ष
  2. शुक्ल पक्ष


तीन ऋण

  1. देवऋण
  2. पितृऋण
  3. ऋषिऋण


चार युग

  1. सतयुग
  2. त्रेतायुग
  3. द्वापरयुग
  4. कलियुग

चार धाम

  1. द्वारिका
  2. बद्रीनाथ
  3. जगन्नाथपुरी
  4. रामेश्वरमधाम


चार पीठ

  1. शारदा पीठ (द्वारिका)
  2. ज्योतिष पीठ (जोशीमठ बद्रिधाम) 
  3. गोवर्धन पीठ (जगन्नाथपुरी),
  4. शृंगेरीपीठ


चार वेद

  1. ऋग्वेद
  2. अथर्ववेद
  3. यजुर्वेद
  4. सामवेद


चार आश्रम

  1. ब्रह्मचर्य
  2. गृहस्थ
  3. वानप्रस्थ
  4. संन्यास


चार अंतःकरण

  1. मन
  2. बुद्धि
  3. चित्त
  4. अहंकार


पञ्च गव्य

  1. गाय का घी
  2. दूध
  3. दही
  4. गोमूत्र
  5. गोबर


पञ्च देव

  1. गणेश
  2. विष्णु
  3. शिव
  4. देवी
  5. सूर्य

पंच तत्त्व

  1. पृथ्वी
  2. जल
  3. अग्नि(तेज)
  4. वायु
  5. आकाश


छह (षट्दर्शन) दर्शन

  1. वैशेषिक
  2. न्याय
  3. सांख्य
  4. योग
  5. पूर्व मिसांसा
  6. उत्तर मिसांसा


सप्त ऋषि

  1. विश्वामित्र
  2. जमदाग्नि
  3. भरद्वाज
  4. गौतम
  5. अत्री
  6. वशिष्ठ और कश्यप


सप्त पुरी

  1. अयोध्यापुरी
  2. मथुरापुरी
  3. मायापुरी (हरिद्वार)
  4. काशीपुरी
  5. कांचीपुरी (शिन कांची-विष्णु कांची)
  6. अवंतिकापुरी
  7. द्वारिकापुरी


आठ योग

  1. यम
  2. नियम
  3. आसन
  4. प्राणायाम
  5. प्रत्याहार
  6. धारणा
  7. ध्यान
  8. समािध


आठ लक्ष्मी

  1. आग्घ
  2. विद्या
  3. सौभाग्य
  4. अमृत
  5. काम
  6. सत्य
  7. भोग
  8. योग लक्ष्मी


नव दुर्गा 

  1. शैल पुत्री
  2. ब्रह्मचारिणी
  3. चंद्रघंटा
  4. कुष्मांडा
  5. स्कंदमाता
  6. कात्यायिनी
  7. कालरात्रि
  8. महागौरी
  9. सिद्धिदात्री


दस दिशाएं

  1. पूर्व
  2. पश्चिम
  3. उत्तर
  4. दक्षिण
  5. ईशान
  6. नैऋत्य
  7. वायव्य
  8. अग्नि 
  9. आकाश
  10. पाताल


मुख्य ११ अवतार

  1. मत्स्य
  2. कश्यप
  3. वराह
  4. नरसिंह
  5. वामन
  6. परशुराम
  7. श्री राम
  8. कृष्ण-बलराम
  9. बुद्ध 
  10. कल्कि


बारह मास


  1. चैत्र
  2. वैशाख
  3. ज्येष्ठ
  4. अषाढ
  5. श्रावण
  6. भाद्रपद
  7. अश्विन
  8. कार्तिक
  9. मार्गशीर्ष
  10. पौष
  11. माघ
  12. फागुन


बारह राशी 


  1. मेष
  2. वृषभ
  3. मिथुन
  4. कर्क
  5. सिंह
  6. कन्या
  7. तुला
  8. वृश्चिक
  9. धनु
  10. मकर
  11. कुंभ
  12. कन्या


बारह ज्योतिर्लिंग

  1. सोमनाथ
  2. मल्लिकार्जुन
  3. महाकाल
  4. ओमकारेश्वर
  5. बैजनाथ
  6. रामेश्वरम
  7. विश्वनाथ
  8. त्र्यंबकेश्वर
  9. केदारनाथ
  10. घुष्मेश्वर
  11. भीमाशंकर
  12. नागेश्वर!


पंद्रह तिथियाँ

  1. प्रतिपदा
  2. द्वितीय
  3. तृतीय
  4. चतुर्थी
  5. पंचमी
  6. षष्ठी
  7. सप्तमी
  8. अष्टमी
  9. नवमी
  10. दशमी
  11. एकादशी
  12. द्वादशी
  13. त्रयोदशी
  14. चतुर्दशी
  15. पूर्णिमा, अमावास्या


स्मृतियां

  1. मनु
  2. विष्णु
  3. अत्री
  4. हारीत
  5. याज्ञवल्क्य
  6. उशना
  7. अंगीरा
  8. यम
  9. आपस्तम्ब
  10. सर्वत
  11. कात्यायन
  12. ब्रहस्पति
  13. पराशर
  14. व्यास
  15. शांख्य
  16. लिखित
  17. दक्ष
  18. शातातप
  19. वशिष्

श्रीकिशोरी जन्मोत्सव चर्चा

श्रीकिशोरी जन्मोत्सव चर्चा

श्रीवृषभानु गोप की पत्नी श्रीकीर्ति महारानी नित्य यमुना स्नान करतीं हैं ठाकुर जी का आराधन करतीं हैं , बस मन में एक ही कामना है , हे प्रभु मुझे एक सुंदर सी कन्या पुत्री रूप में प्राप्त हो जिसे मैं अपने हाथों से नहलाऊं , खिलाऊँ , उसका श्रृंगार करूँ , दुलार करूँ । प्रार्थना करते अरसों बीत गये पर फल अभी नहीं मिला ( मिलने में समय भी लगना ही चाहिये आखिर श्रीकृष्ण को भी फल प्रदान करने वाली को जो आना है ) लेकिन मन की अभिलाषा बस यही रही मेरी किशोरी । एक समय कीर्ति महारानी अपनी माँ के घर आयीं " रावल " । नित्य यमुना स्नान ,भगवान का ध्यान । भादौं की शुक्ला अष्टमी को स्नान करने ब्रह्म मुहूर्त में जमुना जल में डुबकी लगाई और ज्यौं ही बाहर सिर निकाला सुन्दर नील कमल पर कोटि कोटि चन्द्रों की आभा को अपने नख मणि में धारण करने वाली अत्यंत आभा युक्त एक छोटी सी छोरी को पाया , हृदय मयूर नृत्य कर गया , नेत्र पथरा गये , रोमावली पुलकित हो गयी । जल्दी से लाली को उठा हृदय से लगा लिया । दौड़ती हुईं श्रीगोप जी के पास आईं । अजी जल्दी उठिये । देखिये । अरे सुनिये तो । नजर पड़ी श्रीगोप जी झूम उठे । अरी कहाँ से लाई इसे ? आखों में प्रेमाश्रु लिये श्रीकीर्ति महारानी बोली अजी जमुना मैया कौ प्रसाद है ये । उनकी कृपा से ये लाली हमें पुत्री रूप में प्राप्त भई है । इतना सुनना ही था श्रीगोप जी तो गदगद हो गये । सारे रावल में हल्ला हो गया " कीर्ति के छोरी हुई है " जिसने सुना सब दौड़े चले आरहे हैं , बधाई गायीं जा रहीं हैं बड़ा आनन्द है और हो भी क्यों ना आनन्दकन्द परमानन्द श्रीकृष्ण को भी आनन्द सागर में गोता लगवाने वालीं स्वयं जो पधारीं हैं । लेकिन ये क्या ? ना तो रोती है , ना ही आँख खोलती है । हे प्रभु ये क्या हुआ इसे । बहुत चेष्टा की पर ना आँख खुली ना मुख से आवाज निकली । सब तरफ बातें होने लगीं अरी कीर्ति की छोरी ना तो बोलै ना आँख खोलै ऐसौ लगै गूंगी और अंधी हतै । हे जमुना महारानी ये कैसा आशीर्वाद दिया तुमने ? पर अब जो हो मेरी छोरी जैसी भी है मेरी है । वर्ष बीतने पर आरहा है पर स्थिति वही । खबर आई अरे नन्द जी के छोरा हुआ है सारे ग्वाल बाल जा रहे हैं गोकुल । श्रीकीर्ति महारानी भी सब सखियों के संग नन्द महल पहुँचीं , बधाई दी । अरे वाह जी लाला बड़ा सुंदर है हाय नजर ना लगे नन्द रानी । देर भले ही हो गयी लेकिन लाला का मुख देख के तो लगता है ऐसा लाला यदि देर से ही मिलता है तो बुढ़ापे में ही लाला मिले । तब तक श्रीकीर्ति जी ने अपनी लाली को रख दिया लाला के बगल में और जैसे ही लाला का हाथ लाली से छुआ मानो चमत्कार सा हो गया । नेत्र खुल गये , मुख से मधुर ध्वनि निकली । अरे ये क्या साल भर से जिसके नेत्र बन्द थे मुख से आवाज नहीं निकली आज नन्द महल में आते ही सब ठीक हो गया । अब तो हर्षोल्लास और बढ़ गया । खूब दूध दही की धार चली । रावल के गोप और गोकुल के ग्वाला , जम के खाये रबड़ी और मावा ।।

नोट - श्रीकिशोरी जी का अवतार गोकुल के पास " रावल " नाम के ग्राम में हुआ है । बरसाने में तो उनके पिता जी का महल था । यह चित्र इसी कथा को कह रहा है यह रावल के मंदिर से खींचा गया है ।

श्रीअलबेली सरकार की जय हो ।

श्रीराधारानी की जय हो ।

श्रीवृषभानु दुलारी की जय हो ।

ज्योतिष के अनुसार, अगर इस दिन भगवान श्रीकृष्ण को प्रसन्न करने के लिए विशेष उपाय किए जाएं

ज्योतिष के अनुसार, अगर इस दिन भगवान श्रीकृष्ण को प्रसन्न करने के लिए विशेष उपाय किए जाएं तो माता लक्ष्मी भी प्रसन्न हो जाती हैं और भक्तों पर कृपा बरसाती हैं। ये उपाय करने से मनोकामना पूर्ति व धन प्राप्ति के योग भी बन सकते हैं।

 ये हैं जन्माष्टमी के अचूक 12 उपाय, 1 भी करेंगे तो होगा फायदा

  1. आमदनी नहीं बढ़ रही है या नौकरी में प्रमोशन नहीं हो रहा है तो जन्माष्टमी पर 7 कन्याओं को घर बुलाकर खीर या सफेद मिठाई खिलाएं। इसके बाद लगातार पांच शुक्रवार तक सात कन्याओं को खीर या सफेद मिठाई बांटें।
  2. जन्माष्टमी से शुरु कर 27 दिन लगातार नारियल व बादाम किसी कृष्ण मंदिर में चढ़ाने से सभी इच्छाएं पूरी हो सकती है।
  3. यदि पैसे की समस्या चल रही हो तो जन्माष्टमी पर सुबह स्नान आदि करने के बाद राधाकृष्ण मंदिर जाकर दर्शन करें व पीले फूलों की माला अर्पित  करें। इससे आपकी परेशानी कम हो सकती है।
  4. सुख-समृद्धि पाने के लिए जन्माष्टमी पर पीले चंदन या केसर से गुलाब जल मिलाकर माथे पर टीका अथवा बिंदी लगाएं। ऐसा रोज करें। इस उपाय से मन को शांति प्राप्त होगी और जीवन में सुख-समृद्धि आने के योग बनेंगे।
  5. लक्ष्मी कृपा पाने के लिए जन्माष्टमी पर कहीं केले के पौधे लगा दें। बाद में उनकी नियमित देखभाल करते रहे। जब पौधे फल देने लगे तो  इसका दान करें, स्वयं न खाएं।
  6. जन्माष्टमी पर भगवान श्रीकृष्ण को पान का पत्ता भेंट करें और उसके बाद इस पत्ते पर रोली (कुमकुम) से श्री यंत्र लिखकर तिजोरी में रख लें। इस उपाय से धन वृद्धि के योग बन सकते हैं।
  7. जन्माष्टमी पर भगवान श्रीकृष्ण को सफेद मिठाई या खीर का भोग लगाएं।इसमें तुलसी के पत्ते अवश्य डालें। इससे भगवान श्रीकृष्ण जल्दी ही प्रसन्न हो जाते हैं।
  8. जन्माष्टमी पर दक्षिणावर्ती शंख में जल भरकर भगवान श्रीकृष्ण का अभिषेक करें। इस उपाय से मां लक्ष्मी भी प्रसन्न होती हैं। ये उपाय करने वाले की हर इच्छा पूरी हो सकती है।
  9. कृष्ण मंदिर जाकर तुलसी की माला से नीचे लिखे मंत्र की 11 माला जप करें। इस उपाय से आपकी हर समस्या का समाधान हो सकताहै। मंत्र- क्लीं कृष्णाय वासुदेवाय हरि:परमात्मने प्रणत:क्लेशनाशाय गोविंदय नमो नम:
  10. भगवान श्रीकृष्ण को पीतांबर धारी भी कहते हैं, जिसका अर्थ है पीले रंग के कपड़े पहनने वाला। जन्माष्टमी पर पीले रंग के कपड़े, पीले फल व पीला अनाज दान करने से भगवान श्रीकृष्ण व माता लक्ष्मी दोनों प्रसन्न होते हैं।
  11. जन्माष्टमी की रात 12 बजे भगवान श्रीकृष्ण का केसर मिश्रित दूध से अभिषेक करें तो जीवन में सुख-समृद्धि आने के योग बनाते हैं।
  12. जन्माष्टमी को शाम के समय तुलसी को गाय के घी का दीपक लगाएं और ॐ वासुदेवाय नम: मंत्र बोलते हुए तुलसी की 11 परिक्रमा करें।

जन्माष्टमी व्रत-उपवास की महिमा 
जन्माष्टमी का व्रत रखना चाहिए, बड़ा लाभ होता है ।इससे सात जन्मों के पाप-ताप मिटते हैं ।
जन्माष्टमी एक तो उत्सव है, दूसरा महान पर्व है, तीसरा महान व्रत-उपवास और पावन दिन भी है।
 ‘वायु पुराण’ में और कई ग्रंथों में जन्माष्टमी के दिन की महिमा लिखी है। ‘जो जन्माष्टमी की रात्रि को उत्सव के पहले अन्न खाता है, भोजन कर लेता है वह नराधम है’ - ऐसा भी लिखा है, और जो उपवास करता है, जप-ध्यान करके उत्सव मना के फिर खाता है, वह अपने कुल की 21 पीढ़ियाँ तार लेता है और वह मनुष्य परमात्मा को साकार रूप में अथवा निराकार तत्त्व में पाने में सक्षमता की तरफ बहुत आगे बढ़ जाता है । इसका मतलब यह नहीं कि व्रत की महिमा सुनकर मधुमेह वाले या कमजोर लोग भी पूरा व्रत रखें ।
बालक, अति कमजोर तथा बूढ़े लोग अनुकूलता के अनुसार थोड़ा फल आदि खायें ।
जन्माष्टमी के दिन किया हुआ जप अनंत गुना फल देता है ।
उसमें भी जन्माष्टमी की पूरी रात जागरण करके जप-ध्यान का विशेष महत्त्व है। जिसको क्लीं कृष्णाय नमः मंत्र का  त्रिताप नष्ट होने में देर नहीं लगती ।
‘भविष्य पुराण’ के अनुसार जन्माष्टमी का व्रत संसार में सुख-शांति और प्राणीवर्ग को रोगरहित जीवन देनेवाला, अकाल मृत्यु को टालनेवाला, गर्भपात के कष्टों से बचानेवाला तथा दुर्भाग्य और कलह को दूर भगानेवाला होता है।
          

 कृष्ण नाम के उच्चारण का फल

 ब्रह्मवैवर्तपुराण के अनुसार
नाम्नां सहस्रं दिव्यानां त्रिरावृत्त्या चयत्फलम् ।।
एकावृत्त्या तु कृष्णस्य तत्फलं लभते नरः । कृष्णनाम्नः परं नाम न भूतं न भविष्यति ।।
सर्वेभ्यश्च परं नाम कृष्णेति वैदिका विदुः । कृष्ण कृष्णोति हे गोपि यस्तं स्मरति नित्यशः ।।
जलं भित्त्वा यथा पद्मं नरकादुद्धरेच्च सः । कृष्णेति मङ्गलं नाम यस्य वाचि प्रवर्तते ।।
भस्मीभवन्ति सद्यस्तु महापातककोटयः । अश्वमेधसहस्रेभ्यः फलं कृष्णजपस्य च ।।
वरं तेभ्यः पुनर्जन्म नातो भक्तपुनर्भवः । सर्वेषामपि यज्ञानां लक्षाणि च व्रतानि च ।।
तीर्थस्नानानि सर्वाणि तपांस्यनशनानि च । वेदपाठसहस्राणि प्रादक्षिण्यं भुवः शतम् ।।
कृष्णनामजपस्यास्य कलां नार्हन्ति षोडशीम् । (ब्रह्मवैवर्तपुराणम्, अध्यायः-१११)

विष्णु के सहस्र दिव्य नामों की तीन आवृत्ति करने से जो फल प्राप्त होता है; वह फल ‘कृष्ण’ नाम की एक आवृत्ति से ही मनुष्य को सुलभ हो जाता है। वैदिकों का कथन है कि ‘कृष्ण’ नाम से बढ़कर दूसरा नाम न हुआ है, न होगा। ‘कृष्ण’ नाम सभी नामों से परे है। हे गोपी! जो मनुष्य ‘कृष्ण-कृष्ण’ यों कहते हुए नित्य उनका स्मरण करता है; उसका उसी प्रकार नरक से उद्धार हो जाता है, जैसे कमल जल का भेदन करके ऊपर निकल आता है। ‘कृष्ण’ ऐसा मंगल नाम जिसकी वाणी में वर्तमान रहता है, उसके करोड़ों महापातक तुरंत ही भस्म हो जाते हैं। ‘कृष्ण’ नाम-जप का फल सहस्रों अश्वमेघ-यज्ञों के फल से भी श्रेष्ठ है; क्योंकि उनसे पुनर्जन्म की प्राप्ति होती है; परंतु नाम-जप से भक्त आवागमन से मुक्त हो जाता है। समस्त यज्ञ, लाखों व्रत तीर्थस्नान, सभी प्रकार के तप, उपवास, सहस्रों वेदपाठ, सैकड़ों बार पृथ्वी की प्रदक्षिणा- ये सभी इस ‘कृष्णनाम’- जप की सोलहवीं कला की समानता नहीं कर सकते ब्रह्माण्डपुराण, मध्यम भाग, अध्याय 36 में कहा गया है :

महस्रनाम्नां पुण्यानां त्रिरावृत्त्या तु यत्फलम् ।
एकावृत्त्या तु कृष्णस्य नामैकं तत्प्रयच्छति ॥१९॥
विष्णु के तीन हजार पवित्र नाम (विष्णुसहस्त्रनाम) जप के द्वारा प्राप्त परिणाम ( पुण्य ), केवलएक बार कृष्ण के पवित्र नाम जप के द्वारा प्राप्त किया जा सकता है ।