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Sunday, 19 May 2019

हर हर शिव शम्भू जय जय तेरा

हर हर शिव शम्भू जय जय तेरा

एक बिल्व पत्र एक फुल और एक लोटा जल धार ।
दयालु रीझ के देत हैं, चन्द्रमौलि भगवान शिवफल चार ।।
सदाशिव सर्व वरदाता, दिगम्बर हो तो ऐसा हो ।
हरे सब दु:ख भक्तन के, आशुतोष दयाकरहो तो ऐसा हो ।।
शिखर कैलाश के ऊपर, कल्पतरुओं की छाया मे ।
रमे नित संग माँ गिरिजा के, रमणधर गिरिजापतिहो तो ऐसा हो ।।
शीश पर गँग की धारा, सुहावने भाल मे लोचन ।
कला मस्तक मे चन्दर की, मनोहर भूतभावनहो तो ऐसा हो ।।
भयंकर हलाहल ज़हर जब निकला, क्षीरसागर के मंथन से ।
धरा सब कण्ठ मे पीकर, विषधर नीलकंठहो तो ऐसा हो ।।
सिरों को काट कर अपने, किया जब होम-हवन रावण ने ।
दिया सब राज दुनिया का, दिलावर औढ़रदानीहो तो ऐसा हो ।।
किया जब जा नन्दी ने वन मे, कठिन तप काल के डर से ।
बना मुख्य गण नन्ही को अपना, अमर किया महाकालहों तो ऐसा हो ।।
बनाये बीच अंतरिक्ष-सागर मे, नगर तीन दैत्य सेना ने ।
उड़ाये एक ही तीर से, त्रिपुरहर त्रिपुरारीहो तो ऐसा हो ।।
दक्ष के यज्ञ मे जा कर, तजी जब देह सती माँने ।
भेज वीरभद्र को पल भर मे यज्ञ विध्वंस करें, भयंकर महारूद्रहो तो ऐसा हो ।।
देव नर दैत्य गण सारे, जपे नित नाम शिवशंकरका ।
वो ब्रह्मानन्द दुनिया मे, उजागर शिवोऽमहो तो ऐसा हो ।।
सदाशिव सर्व वरदाता, दिगम्बर हो तो ऐसा हो ।
हरे सब दु:ख भक्तन के, आशुतोषदयाकर हो तो ऐसा हो ।।

।। हर हर शिव शम्भू जय जय तेरा ।।
।। हर हर महादेव ।।
।। शिव शिव महादेव ।।

एक खूबसूरत सोच

एक व्यक्ति एक दिन बिना बताए काम पर नहीं गया.....
मालिक ने, सोचा इस कि तन्खाह बढ़ा दी जाये तो यहऔर दिल्चसपी से काम करेगा... और उसकी तन्खाह बढ़ा दी... अगली बार जब उसको तन्खाह से ज़्यादा पैसे दिये तो वह कुछ नही बोला चुपचाप पैसे रख लिये... कुछ महीनों बाद वह फिर ग़ैर हाज़िर हो गया... मालिक को बहुत ग़ुस्सा आया... सोचा इसकी तन्खाह बढ़ाने का क्या फायदा हुआ यह नहीं सुधरेगाऔर उस ने बढ़ी हुई तन्खाह कम कर दी और इस बार उसको पहले वाली ही तन्खाह दी... वह इस बार भी चुपचाप ही रहा और ज़बान से कुछ ना बोला.... तब मालिक को बड़ा ताज्जुब हुआ…
उसने उससे पूछा कि जब मैने तुम्हारे ग़ैरहाज़िर होने के बाद तुम्हारी तन्खाह बढा कर दी तुम कुछ नही बोले और आज तुम्हारी ग़ैर हाज़री पर तन्खाह कम कर के दी फिर भी खामोश ही रहे.....!!
इस की क्या वजह है..? उसने जवाब दिया....जब मै पहले
ग़ैर हाज़िर हुआ था तो मेरे घर एक बच्चा पैदा हुआ था....!!
आपने मेरी तन्खाह बढ़ा कर दी तो मै समझ गया.....
परमात्मा ने उस बच्चे के पोषण का हिस्सा भेज दिया है......
और जब दोबारा मै ग़ैर हाजिर हुआ तो मेरी माता जी
का निधन हो गया था... जब आप ने मेरी तन्खाह कम
दी तो मैने यह मान लिया की मेरी माँ अपने हिस्से का
अपने साथ ले गयीं.....
फिर मै इस तनख्वाह की ख़ातिर क्यों परेशान होऊँ जिस का ज़िम्मा ख़ुद परमात्मा ने ले रखा है......!!

एक खूबसूरत सोच

अगर कोई पूछे जिंदगी में क्या खोया और क्या पाया,
तो बेशक कहना, जो कुछ खोया वो मेरी नादानी थी और जो भी पाया वो प्रभू की मेहेरबानी थी, खुबसूरत रिश्ता है मेरा और भगवान के बीच में, ज्यादा मैं मांगता. नहीं और कम वो देता नहीं.. I

देने वाला कौन ?

देने वाला कौन ?

आज हमने भंडारे में भोजन करवाया। आज हमने ये बांटा, आज हमने वो दान किया...

हम अक्सर ऐसा कहते और मानते हैं। इसी से सम्बंधित एक अविस्मरणीय कथा सुनिए...

एक लकड़हारा रात-दिन लकड़ियां काटता, मगर कठोर परिश्रम के बावजूद उसे आधा पेट भोजन ही मिल पाता था।

एक दिन उसकी मुलाकात एक साधु से हुई। लकड़हारे ने साधु से कहा कि जब भी आपकी प्रभु से मुलाकात हो जाए, मेरी एक फरियाद उनके सामने रखना और मेरे कष्ट का कारण पूछना।

कुछ दिनों बाद उसे वह साधु फिर मिला। 
लकड़हारे ने उसे अपनी फरियाद की याद दिलाई तो साधु ने कहा कि- "प्रभु ने बताया हैं कि लकड़हारे की आयु 60 वर्ष हैं और उसके भाग्य में पूरे जीवन के लिए सिर्फ पाँच बोरी अनाज हैं। इसलिए प्रभु उसे थोड़ा अनाज ही देते हैं ताकि वह 60 वर्ष तक जीवित रह सके।"

समय बीता। साधु उस लकड़हारे को फिर मिला तो लकड़हारे ने कहा---
"ऋषिवर...!! अब जब भी आपकी प्रभु से बात हो तो मेरी यह फरियाद उन तक पहुँचा देना कि वह मेरे जीवन का सारा अनाज एक साथ दे दें, ताकि कम से कम एक दिन तो मैं भरपेट भोजन कर सकूं।"

अगले दिन साधु ने कुछ ऐसा किया कि लकड़हारे के घर ढ़ेर सारा अनाज पहुँच गया। 

लकड़हारे ने समझा कि प्रभु ने उसकी फरियाद कबूल कर उसे उसका सारा हिस्सा भेज दिया हैं। 
उसने बिना कल की चिंता किए, सारे अनाज का भोजन बनाकर फकीरों और भूखों को खिला दिया और खुद भी भरपेट खाया।

लेकिन अगली सुबह उठने पर उसने देखा कि उतना ही अनाज उसके घर फिर पहुंच गया हैं। उसने फिर गरीबों को खिला दिया। फिर उसका भंडार भर गया। 
यह सिलसिला रोज-रोज चल पड़ा और लकड़हारा लकड़ियां काटने की जगह गरीबों को खाना खिलाने में व्यस्त रहने लगा।

कुछ दिन बाद वह साधु फिर लकड़हारे को मिला तो लकड़हारे ने कहा---"ऋषिवर ! आप तो कहते थे कि मेरे जीवन में सिर्फ पाँच बोरी अनाज हैं, लेकिन अब तो हर दिन मेरे घर पाँच बोरी अनाज आ जाता हैं।"

साधु ने समझाया, "तुमने अपने जीवन की परवाह ना करते हुए अपने हिस्से का अनाज गरीब व भूखों को खिला दिया। 
इसीलिए प्रभु अब उन गरीबों के हिस्से का अनाज तुम्हें दे रहे हैं।"

कथासार- किसी को भी कुछ भी देने की शक्ति हम में है ही नहीं, हम देते वक्त ये सोचते हैं, की जिसको कुछ दिया तो ये मैंने दिया!
दान, वस्तु, ज्ञान, यहाँ तक की अपने बच्चों को भी कुछ देते दिलाते हैं, तो कहते हैं मैंने दिलाया । 
वास्तविकता ये है कि वो उनका अपना है आप को सिर्फ परमात्मा ने निमित्त मात्र बनाया हैं। ताकी उन तक उनकी जरूरते पहुचाने के लिये। तो निमित्त होने का घमंड कैसा ??
दान किए से जाए दुःख, दूर होएं सब पाप।।
नाथ आकर द्वार पे, दूर करें संताप।

पुराण का वैज्ञानिक महत्व

पुराण का वैज्ञानिक महत्व

माँ, मैं एक आनुवंशिक वैज्ञानिक हूँ। मैं अमेरिका में मानव के विकास पर काम कर रहा हूं। विकास का सिद्धांत, चार्ल्स डार्विन, आपने उसके बारे में सुना है?" वासु ने पूछा।
उसकी मां उसके पास बैठी और मुस्कुराकर बोली, “मैं डार्विन के बारे में जानती हूं, वासु। मैं यह भी जानती हूं कि तुम जो सोचते हो कि उसने जो भी खोज की, वह वास्तव में भारत के लिए बहुत पुरानी खबर है। 
निश्चित रूप से मां!” वासु ने व्यंग्यपूर्वक कहा।
यदि तुम कुछ होशियार हो, तो इसे सुनो,” उसकी मां ने प्रतिकार किया। क्या तुमने दशावतार के बारे में सुना है? विष्णु के दस अवतार? वासु ने सहमति में सिर हिलाया। 
तो मैं तुम्हें बताती हूं कि तुम और मि.डार्विन क्या नहीं जानते हैं।
पहलाअवतार था मत्स्यअवतार, यानि मछली। ऐसा इसलिए कि जीवन पानी में आरम्भ हुआ। यह बात सही है या नहीं?” वासु अब और अधिक ध्यानपूर्वक सुनने लगा। 
“उसके बाद आया *कूर्मअवतार, जिसका अर्थ है कछुआ, क्योंकि जीवन पानी से जमीन की ओर चला गया। उभयचर (ऎम्फिबिअन)। तो कछुए ने समुद्र से जमीन की ओर विकास को दर्शाया।“ 
“तीसरा था #वराह, जंगली सूअर, जिसका मतलब है जंगली जानवर जिनमें बहुत अधिक बुद्धि नहीं होती है। तुम उन्हें डायनासोर कहते हो, सही है?” वासु ने आंखें फैलाते हुए सहमति जताई। 
"चौथा अवतार था नृसिंहअवतार, आधा मानव, आधा पशु, जंगली जानवरों से बुद्धिमान जीवों तक विकास।“ 
पांचवें वामनअवतार था, बौना जो वास्तव में लंबा बढ़ सकता था। क्या तुम जानते हो ऐसा क्यों है? क्योंकि मनुष्य दो प्रकार के होते थे, होमो इरेक्टस और होमो सेपिअंस, और होमो सेपिअंस ने लड़ाई जीत ली।" वासु देख रहा था कि उसकी माँ पूर्ण प्रवाह में थी और वह स्तब्ध था।
"छठा अवतार था परशुराम – वे, जिनके पास कुल्हाड़ी की ताकत थी; वो मानव जो गुफा और वन में रहने वाला था। गुस्सैल, और सामाजिक नहीं।“
“सातवां अवतार था राम, सोच युक्त प्रथम सामाजिक व्यक्ति, जिन्होंने समाज के नियम बनाए और समस्त रिश्तों का आधार।“
“आठवां अवतार था कृष्ण, राजनेता, राजनीतिज्ञ, प्रेमी जिन्होंने ने समाज के नियमों का आनन्द लेते हुए यह सिखाया कि सामाजिक ढांचे में कैसे रहकर फला-फूला जा सकता है।“
नवां अवतार था बुद्ध, वे व्यक्ति जो नृसिंह से उठे और मानव के सही स्वभाव को खोजा। उन्होंने मानव द्वारा ज्ञान की अंतिम खोज की पहचान की।
“और अंत में कल्कि आएगा, वह मानव जिसपर तुम काम कर रहे हो। वह मानव जो आनुवंशिक रूप से अति-श्रेष्ठ होगा।"
वासु अपनी मां को अवाक होकर देखता रहा। “यह अद्भुत है मां, आपका दर्शन. वास्तव में अर्थपूर्ण है।
“बिल्कुल अर्थपूर्ण है वासु! सिर्फ आपका देखने का नज़रिया ऐसा होना चाहिए – धार्मिक या वैज्ञानिक। जैसा आप कहना चाहें।

प्रभु श्री राम के दादा परदादा का नाम क्या था?

प्रभु श्री राम के दादा परदादा का नाम क्या था?

1 - ब्रह्मा जी से मरीचि हुए,
2 - मरीचि के पुत्र कश्यप हुए,
3 - कश्यप के पुत्र विवस्वान थे,
4 - विवस्वान के वैवस्वत मनु हुए.वैवस्वत मनु के समय जल प्रलय हुआ था,
5 - वैवस्वतमनु के दस पुत्रों में से एक का नाम इक्ष्वाकु था, इक्ष्वाकु ने अयोध्या को अपनी राजधानी बनाया और इस प्रकार इक्ष्वाकु कुलकी स्थापना की |
6 - इक्ष्वाकु के पुत्र कुक्षि हुए,
7 - कुक्षि के पुत्र का नाम विकुक्षि था,
8 - विकुक्षि के पुत्र बाण हुए,
9 - बाण के पुत्र अनरण्य हुए,
10- अनरण्य से पृथु हुए,
11- पृथु से त्रिशंकु का जन्म हुआ,
12- त्रिशंकु के पुत्र धुंधुमार हुए,
13- धुन्धुमार के पुत्र का नाम युवनाश्व था,
14- युवनाश्व के पुत्र मान्धाता हुए,
15- मान्धाता से सुसन्धि का जन्म हुआ,
16- सुसन्धि के दो पुत्र हुए- ध्रुवसन्धि एवं प्रसेनजित,
17- ध्रुवसन्धि के पुत्र भरत हुए,
18- भरत के पुत्र असित हुए,
19- असित के पुत्र सगर हुए,
20- सगर के पुत्र का नाम असमंज था,
21- असमंज के पुत्र अंशुमान हुए,
22- अंशुमान के पुत्र दिलीप हुए,
23- दिलीप के पुत्र भगीरथ हुए, भागीरथ ने ही गंगा को पृथ्वी पर उतारा था.भागीरथ के पुत्र ककुत्स्थ थे |
24- ककुत्स्थ के पुत्र रघु हुए, रघु के अत्यंत तेजस्वी और पराक्रमी नरेश होने के कारण उनके बाद इस वंश का नाम रघुवंश हो गया, तब से श्री राम के कुल को रघु कुल भी कहा जाता है |
25- रघु के पुत्र प्रवृद्ध हुए,
26- प्रवृद्ध के पुत्र शंखण थे,
27- शंखण के पुत्र सुदर्शन हुए,
28- सुदर्शन के पुत्र का नाम अग्निवर्ण था,
29- अग्निवर्ण के पुत्र शीघ्रग हुए,
30- शीघ्रग के पुत्र मरु हुए,
31- मरु के पुत्र प्रशुश्रुक थे,
32- प्रशुश्रुक के पुत्र अम्बरीष हुए,
33- अम्बरीष के पुत्र का नाम नहुष था,
34- नहुष के पुत्र ययाति हुए,
35- ययाति के पुत्र नाभाग हुए,
36- नाभाग के पुत्र का नाम अज था,
37- अज के पुत्र दशरथ हुए,
38- दशरथ के चार पुत्र राम, भरत, लक्ष्मण तथा शत्रुघ्न हुए |
इस प्रकार ब्रह्मा की उन्चालिसवी (39) पीढ़ी में श्रीराम का जन्म हुआ 

उपवास - और – व्रत

उपवास - और – व्रत

धार्मिक मान्यताओं में उपवास और व्रत का एक अलग ही महत्व है, नवरात्रि के अवसर हो तो क्या कहने. हम करने को उपवास कर तो लेते है लेकिन इसका आशय नहीं समझते है हम समझते है अन्न जल का त्याग ही उपवास है जबकि बहुत सारे लोग फलो का सेवन जरुर करते है उपवास में. भगवान ओशो ने इसे क्लियर करने कि कोशिश की है आईये पढ़ते है और समझते है।
उपवास का मतलब होता है, अपने पास रहना। इसका अन्य कोई मतलब ही नहीं होता। आत्मा के पास निवास करना उपवास है। जैसे उपनिषद का अर्थ है गुरु के पास बैठना। लेकिन अब उपवास का अर्थ फास्टिंग या अनशन हो रहा है - भूखे रहना। 
यह ठीक नहीं। यह उपवास नहीं चल सकता, न खाने वाला। अगर न खाने पर जोर दिया, तो वह दमन और काया को कष्ट देने वाली बात है। क्या महावीर की तरह चार महीने तक कोई आदमी बिना खाए रह सकता है? हां, उपवास में रहकर रह सकता है। क्योंकि उपवास का मतलब न खाना नहीं है। 
उपवास का मतलब है कि एक व्यक्ति अपनी आत्मा (अंतस) में इतना लीन हो गया कि शरीर का उसे पता ही नहीं है। जब शरीर का पता नहींहै, तो भोजन भी नहीं करेगा। अपने भीतर ऐसा लीन हो गया है कि दिन बीत जाते हैं, रातें बीत जाती हैं, उसे शरीर का पता नहीं। 
एक संन्यासी मेरे पास आए। मैंने कहा, आप खाना खा लें। तो उन्होंने कहा, आज तो मेरा उपवास है। मैंने कहा, कैसा उपवास करते हैं? उन्होंने कहा, आप इतना भी नहीं जानते कि उपवास कैसे करते हैं? खाना नहीं लेते दिन भर। मैंने कहा, इसको आप उपवास समझते हैं? फिर अनशन क्या है? उन्होंने कहा, दोनों एक ही चीज हैं। नाम बदल जाने से क्या फर्क पड़ता है। तो मैंने कहा, फिर आप अनशन ही करते हैं, उपवास नहीं। 
जब आप अनशन करेंगे, तो ध्यान रहे, आप पूरे समय शरीर के पास रहेंगे। तब आप आत्मा के पास रह भी नहीं सकते। अनशन का मतलब ही यही है कि नहीं खाया, जबकि खाने का खयाल है। ऐसे में दिन भर शरीर के पास ही मन घूमेगा। बार-बार खयाल आएगा कि भूख लगी है, प्यास लगी है। सोचेंगे कि कल क्या खाएंगे, परसों क्या खाएंगे। .. 
तो मैंने उनसे कहा कि उपवास से अनशन तो बिलकुल उल्टा है। दोनों में भोजन नहीं किया जाता, फिर भी दोनों उल्टी ही बातें हैं, क्योंकि अनशन में आदमी शरीर के पास रहता है- चौबीस घंटे, जितना कि खाना खाने वाला भी नहीं रहता। दो बार खा लिया और बात खत्म हो गई। वहीं अनशन करने वाला दिन भर खाता रहता है, मन ही मन में खाना चलता रहता है। 
जबकि उपवास का मतलब है कि किसी दिन ऐसी मस्ती में अपने भीतर चले आएं कि शरीर की कोई याद ही न रहे। 
संन्यासी से मैंने कहा कि आप जिस दिन भी ध्यान करें, तो उस दिन ध्यान में ऐसे डूब जाएं कि उठने का मन न हो तो उठें मत। जब उठने का मन हो, तब उठ जाएं। उन्हें मैं तब ध्यान कराता था। 
उनके साथ एक युवक भी आया हुआ था। उसने एक दिन सुबह आकर मुझसे कहा, आज चार बजे से वे ध्यान में गए हैं तो नौ बज गया, अभी तक उठे नहीं हैं। उन्होंने कह दिया है कि उठाना मत। लेकिन मुझे बहुत डर लग रहा है, वे पड़े हैं। मैंने कहा, उन्हें पड़ा रहने दो। उठाना मत। 
ग्यारह बजे रात वे संन्यासी मेरे पास फिर आए और उन्होंने कहा कि आज समझा कि उपवास का क्या अर्थ है! कितना भेद है उपवास और अनशन में। आज सच में मेरा उपवास हो गया। हद दरजे का हुआ है। 
जब आप भीतर चले जाते हैं, तो बाहर का स्मरण छूट जाता है। हमारा शरीर इतना अद्भुत यंत्र है कि जब हम भीतर होते हैं तो शरीर आटोमैटिक हो जाता है, अपनी व्यवस्था पूरी करने लगता है। आपको कोई चिंता करने की जरूरत नहीं रहती। साधना का मतलब यह है कि शरीर ऐसा हो कि जब आप भीतर चले जाएं, तो उसे आपकी कोई जरूरत न हो। वह अपनी व्यवस्था कर ले। वह स्वचालित यंत्र की तरह अपना काम करता रहे और आपकी प्रतीक्षा करे कि जब आप बाहर आएंगे, तब वह आपको खबर देगा कि मुझे भूख लगी है, मुझे प्यास लगी है। अन्यथा वह चुपचाप झेलेगा और आपको खबर भी नहीं देगा। 
इसलिए उपवास को फास्टिंग या अनशन मत कहो। उपवास को कहो आत्मा के निकट होना। आत्मा के निकट होकर शरीर भूल जाता है कि उसे क्या चाहिए।

ऐसे है भगवान कृष्ण।

ऐसे है भगवान कृष्ण।


एक बार गोपियों ने श्री कृष्ण से कहा कि ‘हे कृष्ण हमे अगस्त्य ऋषि को भोग लगाने जाना है, और ये यमुना जी बीच में पड़ती है अब बताओ कैसे जाएं?
भगवान श्री कृष्ण ने कहा कि जब तुम यमुना जी के पास जाओ तो कहना – हे यमुना जी अगर श्री कृष्ण ब्रह्मचारी है तो हमें रास्ता दो.
गोपियाँ हंसने लगी कि लो ये कृष्ण भी अपने आप को ब्रह्मचारी समझते है, सारा दिन तो हमारे पीछे पीछे घूमता है, कभी हमारे वस्त्र चुराता है कभी मटकिया फोड़ता है … खैर फिर भी हम बोल देंगी.
गोपियाँ यमुना जी के पास जाकर कहती है, हे यमुना जी अगर श्री कृष्ण ब्रह्मचारी है तो हमे रास्ता दें, और गोपियों के कहते ही यमुना जी ने रास्ता दे दिया.
गोपियाँ तो सन्न रह गई ये क्या हुआ, कृष्ण ब्रह्मचारी!!!!
अब गोपियां अगस्त्य ऋषि को भोजन करवा कर वापस आने लगी तो अगस्त्य ऋषि से कहा कि अब हम घर कैसे जाएं, यमुनाजी बीच में है.
अगस्त्य ऋषि ने कहा कि तुम यमुना जी को कहना कि अगर अगस्त्यजी निराहार है तो हमें रास्ता दें.
गोपियाँ मन में सोचने लगी कि अभी हम इतना सारा भोजन लाई सो सब गटक गये और अब अपने आप को निराहार बता रहे हैं?
गोपियां यमुना जी के पास जाकर बोली, हे यमुना जी अगर अगस्त्य ऋषि निराहार है तो हमे रास्ता दें, और यमुना जी ने रास्ता दे दिया.
गोपियां आश्चर्य करने लगी कि जो खाता है वो निराहार कैसे हो सकता है?
और जो दिन रात हमारे पीछे पीछे फिरता है वो कृष्ण ब्रह्मचारी कैसे हो सकता है?
इसी उधेड़बुन में गोपियों ने कृष्ण के पास आकर फिर से वही प्रश्न किया.
भगवान श्री कृष्ण कहने लगे गोपियों मुझे तुमारी देह से कोई लेना देना नहीं है, मैं तो तुम्हारे प्रेम के भाव को देख कर तुम्हारे पीछे आता हूँ. मैंने कभी वासना के तहत संसार नहीं भोगा मैं तो निर्मोही हूँ इसलिए यमुना ने आप को मार्ग दिया.
तब गोपियां बोली भगवन मुनिराज ने तो हमारे सामने भोजन ग्रहण किया फिर भी वो बोले कि अगत्स्य आजन्म उपवासी हो तो हे यमुना मैया मार्ग दें!
और बड़े आश्चर्य की बात है कि यमुना ने मार्ग दे दिया!
श्री कृष्ण हंसने लगे और बोले कि अगत्स्य आजन्म उपवासी हैं.
अगत्स्य मुनि भोजन ग्रहण करने से पहले मुझे भोग लगाते हैं.
और उनका भोजन में कोई मोह नहीं होता उनको कतई मन में नहीं होता कि में भोजन करूं या भोजन कर रहा हूँ.
वो तो अपने अंदर रह रहे मुझे भोजन करा रहे होते हैं, इसलिए वो आजन्म उपवासी हैं.
जो मुझसे प्रेम करता है, मैं उनका सच में ऋणी हूँ, मैं तुम सबका ऋणी हूँ…

दुर्गा द्वात्रिंशन्नाममाला

।। दुर्गा द्वात्रिंशन्नाममाला ।।

यदि कोई व्यक्ति कभी किसी घोर संकट में फंस गया हो उसको सभी मदद के दरवाजे बंद नजर आ रहे हो अगर उसकी खुद की परछाई भी उसका साथ ना दे पा रही हो ऐसे सर्वथा विपरीत परिस्तिथि में भी अगर वह माँ भगवती के शरण में चला जाये और यह उनकी दुर्गा द्वात्रिंशन्नाममाला अर्थात माँ दुर्गा के अति शक्तिशाली 32 नामों का जप नियमपूर्वक करें तो उसकी निश्चित ही सभी शत्रुओ से रक्षा हो जाती है । 

इस उपाय के बारे में स्वयं माँ दुर्गा ने कहा है की ’’जो मानव नित्य मेरे इन नामों का उच्चारण करेगा वह हर शत्रु हर प्रकार के भय से हमेशा मुक्त रहेगा।
माँ दुर्गा के इन नामो का जप पूर्ण श्रद्धा से करना चाहिए और मन में किसी भी प्रकार की शंका नहीं होनी चाहिए ।

माँ दूर्गा के ३२ नाम
दूर्गा, दुर्गातिश्मनी, दुर्गापद्धिनिवारिणी, दुर्गमच्छेदिनी, दुर्गसाधिनी, दुर्गनाशिनी, दुर्गतोद्वारिणी, दुर्गनिहन्त्री, दुर्गमापहा, दुर्गमज्ञानदा, दुर्गदैत्यलोकदाव्नला, दुर्गमा ,दुर्गमालोका, दुर्ग्मात्मस्वरुपिणी, दुर्गमार्गप्रदा, दुर्गमविद्या, दुर्गमाश्रिता, दुर्गमज्ञानसंस्थाना, दुर्गमध्यांन्भासिनी, दुर्गमोहा, दुर्गमगा, दुर्गमार्थस्वरुपिणी, दुर्गमासुरसंहत्री, दुर्गामयुध्धारिणी ,दुर्गमांगी, दुर्गमता, दुर्गम्या, दुर्गमेश्वरी, दुर्गभीमा, दुर्गभामा, दुर्गभा, दुर्गदारिणी

अगर परिवार के सदस्य 1 निश्चित समय पर सरसों के तेल का दीपक लगाकर सामूहिक 11 पाठ 21 दिन तक करें तो बहुत जल्दी लाभ होगा
पाठ के पहले गणेशजी व गुरु स्मरण व 1 पाठ कुंजिका स्तोत्र का कर लें
दीपक सरसों के तेल का लगाएं

श्री पंचमुखी महाभगवद्धनुमदारती

श्री पंचमुखी महाभगवद्धनुमदारती
1.
जय-जय पंचमुखी हनुमाना।।3।।
प्रथमहि वानर वदन विराजे।।2।।
छबि बल काम कोट तंहराजे।।2।।
पशुपति शंभु भवेश समाना।।1।।
जय-जय पंचमुखी हनुमाना।।3।।
अतुलित बल तनु तेज विराजे।।2।।
रवि शशि कोट तेज छवि राजे।।2।।
रघुवर भक्त लसत तपखाना।।1।।
जय-जय पंचमुखी हनुमाना।।3।।
अञ्जनि पुत्र पवन सुत राजे।।2।।
महिमा शेष कोटि कहि राजे।।2।।
रघुवर लक्ष्मण करत बखाना।।1।।
जय-जय पंचमुखी हनुमाना।।3।।
दिग मंडल यश वृन्द विराजे।।2।।
अद्भुत रूप राम वर काजे।।2।।
तनुधर पंचमुखी हनुमाना।।3।।
जय-जय पंचमुखी हनुमाना।।3।।
भक्त शिरोमणि राज विराजे।।2।।
भक्त हृदय मानस वर राजे।।2।।
ईश्वर अव्यय आद्य समाना।।1।।
जय-जय पंचमुखी हनुमाना।।3।।

2 
दूसर मुख नरहरी1 विराजे।।2।।
शोभा धाम भक्त किय राजे।।2।।
अनुपम ब्रह्मरूप भगवाना।।1।।
जय-जय पंचमुखी हनुमाना।।3।।
 
3. 
तीसर तनखग`1 राज विराजे।।2।।
महिमा वेद बखानत राजे।।2।।
हनुमत अच्युत हरि सुखखाना।।1।।
जय-जय पंचमुखी हनुमाना।।3।।

4. 
सूर्यरूप वाराह`2 विराजे।।2।।
वेद तत्व परमेश्वर राजे।।2।।
जय दाता भिलषित वर दाना।।1।।
जय-जय पंचमुखी हनुमाना।।3।।

5.
ऊर्ध्व हयानन3 राज विराजे।।2।।
सद्ज्ञानाग्र वरद विभुराजे।।2।।
धन्य-धन्य दरशन भगवाना।।1।।
जय-जय पंचमुखी हनुमाना।।3।।
सर्वाभरण विचित्र विराजे।।2।।
कुण्डल मुकुट विभूषण राजे।।2।।
दशकर पंकज आयुध माना।।1।।
जय-जय पंचमुखी हनुमाना।।3।।
दिव्य वदनतिथि नयन विराजे।।2।।
शब सुन्दर आसन विधि राजे।।2।।
युगल चरण नखद्युति हरखाना।।1।।
जय-जय पंचमुखी हनुमाना।।3।।
महाराज शुभ धाम विराजे।।2।।
रोम-रोम रघ

रामचरितमानस की चौपाइयों

रामचरितमानस की चौपाइयों में ऐसी क्षमता है कि इन चौपाइयों के जप से ही मनुष्य बड़े-से-बड़े संकट में भी मुक्त हो जाता है।

इन मंत्रो का जीवन में प्रयोग अवश्य करे 
प्रभु श्रीरामआप के जीवन को सुखमय बना देगे।
1. रक्षा के लिए
मामभिरक्षक रघुकुल नायक |
घृत वर चाप रुचिर कर सायक ||

2. विपत्ति दूर करने के लिए
राजिव नयन धरे धनु सायक |
भक्त विपत्ति भंजन सुखदायक ||

3. सहायता के लिए
मोरे हित हरि सम नहि कोऊ |
एहि अवसर सहाय सोई होऊ ||

4. सब काम बनाने के लिए
वंदौ बाल रुप सोई रामू |
सब सिधि सुलभ जपत जोहि नामू ||

5. वश मे करने के लिए
सुमिर पवन सुत पावन नामू |
अपने वश कर राखे राम ||
6. संकट से बचने के लिए
दीन दयालु विरद संभारी |
हरहु नाथ मम संकट भारी ||

7. विघ्न विनाश के लिए
सकल विघ्न व्यापहि नहि तेही |
राम सुकृपा बिलोकहि जेहि ||

8. रोग विनाश के लिए
राम कृपा नाशहि सव रोगा |
जो यहि भाँति बनहि संयोगा ||

9. ज्वार ताप दूर करने के लिए
दैहिक दैविक भोतिक तापा |
राम राज्य नहि काहुहि व्यापा ||

10. दुःख नाश के लिए
राम भक्ति मणि उस बस जाके |
दुःख लवलेस न सपनेहु ताके ||

11. खोई चीज पाने के लिए
गई बहोरि गरीब नेवाजू |
सरल सबल साहिब रघुराजू ||

12. अनुराग बढाने के लिए
सीता राम चरण रत मोरे |
अनुदिन बढे अनुग्रह तोरे ||

13. घर मे सुख लाने के लिए
जै सकाम नर सुनहि जे गावहि |
सुख सम्पत्ति नाना विधि पावहिं ||

14. सुधार करने के लिए
मोहि सुधारहि सोई सब भाँती |
जासु कृपा नहि कृपा अघाती ||

15. विद्या पाने के लिए
गुरू गृह पढन गए रघुराई |
अल्प काल विधा सब आई ||

16. सरस्वती निवास के लिए
जेहि पर कृपा करहि जन जानी |
कवि उर अजिर नचावहि बानी ||

17. निर्मल बुद्धि के लिए
ताके युग पदं कमल मनाऊँ |
जासु कृपा निर्मल मति पाऊँ ||

18. मोह नाश के लिए
होय विवेक मोह भ्रम भागा |
तब रघुनाथ चरण अनुरागा ||

19. प्रेम बढाने के लिए
सब नर करहिं परस्पर प्रीती |
चलत स्वधर्म कीरत श्रुति रीती ||

20. प्रीति बढाने के लिए
बैर न कर काह सन कोई |
जासन बैर प्रीति कर सोई ||

21. सुख प्रप्ति के लिए
अनुजन संयुत भोजन करही |
देखि सकल जननी सुख भरहीं ||

22. भाई का प्रेम पाने के लिए
सेवाहि सानुकूल सब भाई |
राम चरण रति अति अधिकाई ||

23. बैर दूर करने के लिए
बैर न कर काहू सन कोई |
राम प्रताप विषमता खोई ||

24. मेल कराने के लिए
गरल सुधा रिपु करही मिलाई |
गोपद सिंधु अनल सितलाई ||

25. शत्रु नाश के लिए
जाके सुमिरन ते रिपु नासा |
नाम शत्रुघ्न वेद प्रकाशा ||

26. रोजगार पाने के लिए
विश्व भरण पोषण करि जोई |
ताकर नाम भरत अस होई ||

27. इच्छा पूरी करने के लिए
राम सदा सेवक रूचि राखी |
वेद पुराण साधु सुर साखी ||

28. पाप विनाश के लिए
पापी जाकर नाम सुमिरहीं |
अति अपार भव भवसागर तरहीं ||

29. अल्प मृत्यु न होने के लिए
अल्प मृत्यु नहि कबजिहूँ पीरा |
सब सुन्दर सब निरूज शरीरा ||

30. दरिद्रता दूर के लिए
नहि दरिद्र कोऊ दुःखी न दीना |
नहि कोऊ अबुध न लक्षण हीना |

31. प्रभु दर्शन पाने के लिए
अतिशय प्रीति देख रघुवीरा |
प्रकटे ह्रदय हरण भव पीरा ||

32. शोक दूर करने के लिए
नयन बन्त रघुपतहिं बिलोकी |
आए जन्म फल होहिं विशोकी ||

33. क्षमा माँगने के लिए
अनुचित बहुत कहहूँ अज्ञाता |
क्षमहुँ क्षमा मन्दिर दोऊ भ्राता ||

🙏
🌹
जयश्रीराम 🌹

तुलसी कौन थी?

तुलसी कौन थी?

तुलसी(पौधा) पूर्व जन्म मे एक लड़की थी जिस का नाम वृंदा था, राक्षस कुल में उसका जन्म हुआ था बचपन से ही भगवान विष्णु की भक्त थी.बड़े ही प्रेम से भगवान की सेवा, पूजा किया करती थी.जब वह बड़ी हुई तो उनका विवाह राक्षस कुल में दानव राज जलंधर से हो गया। जलंधर समुद्र से उत्पन्न हुआ था.
वृंदा बड़ी ही पतिव्रता स्त्री थी सदा अपने पति की सेवा किया करती थी.
एक बार देवताओ और दानवों में युद्ध हुआ जब जलंधर युद्ध पर जाने लगे तो वृंदा ने कहा - स्वामी आप युद्ध पर जा रहे है आप जब तक युद्ध में रहेगे में पूजा में बैठ कर``` आपकी जीत के लिये अनुष्ठान करुगी,और जब तक आप वापस नहीं आ जाते, मैं अपना संकल्पनही छोडूगी। जलंधर तो युद्ध में चले गये,और वृंदा व्रत का संकल्प लेकर पूजा में बैठ गयी, उनके व्रत के प्रभाव से देवता भी जलंधर को ना जीत सके, सारे देवता जब हारने लगे तो विष्णु जी के पास गये।
सबने भगवान से प्रार्थना की तो भगवान कहने लगे कि – वृंदा मेरी परम भक्त है में उसके साथ छल नहीं कर सकता ।
फिर देवता बोले - भगवान दूसरा कोई उपाय भी तो नहीं है अब आप ही हमारी मदद कर सकते है।
भगवान ने जलंधर का ही रूप रखा और वृंदा के महल में पँहुच गये जैसे ही वृंदा ने अपने पति को देखा, वे तुरंत पूजा मे से उठ गई और उनके चरणों को छू लिए,जैसे ही उनका संकल्प टूटा, युद्ध में देवताओ ने जलंधर को मार दिया और उसका सिर काट कर अलग कर दिया,उनका सिर वृंदा के महल में गिरा जब वृंदा ने देखा कि मेरे पति का सिर तो कटा पडा है तो फिर ये जो मेरे सामने खड़े है ये कौन है?
उन्होंने पूँछा - आप कौन हो जिसका स्पर्श मैने किया, तब भगवान अपने रूप में आ गये पर वे कुछ ना बोल सके,वृंदा सारी बात समझ गई, उन्होंने भगवान को श्राप दे दिया आप पत्थर के हो जाओ, और भगवान तुंरत पत्थर के हो गये।
सभी देवता हाहाकार करने लगे लक्ष्मी जी रोने लगे और प्रार्थना करने लगे यब वृंदा जी ने भगवान को वापस वैसा ही कर दिया और अपने पति का सिर लेकर वे
सती हो गयी।
उनकी राख से एक पौधा निकला तब
भगवान विष्णु जी ने कहा –आज से
इनका नाम तुलसी है, और मेरा एक रूप इस पत्थर के रूप में रहेगा जिसे शालिग्राम के नाम से तुलसी जी के साथ ही पूजा जायेगा और में बिना तुलसी जी के भोग स्वीकार नहीं करुगा। तब से तुलसी जी कि पूजा सभी करने लगे। और तुलसी जी का विवाह शालिग्राम जी के साथ कार्तिक मास में किया जाता है. देव-उठावनी एकादशी के दिन इसे तुलसी विवाह के रूप में मनाया जाता है !

श्री हनुमान चालीसा

श्री हनुमान चालीसा 
श्रीगुरु चरन सरोज रज, निज मनु मुकुर सुधारी
बरनौ रघुबर बिमल जसु, जो दायकू फल चारि
बुध्दि हीन तनु जानिके सुमिरौ पवन कुमार |
बल बुध्दि विद्या देहु मोंही , हरहु कलेश विकार ||

चोपाई 
जय हनुमान ज्ञान गुन सागर |
जय कपीस तिहुं लोक उजागर ||
राम दूत अतुलित बल धामा |
अंजनी पुत्र पवन सुत नामा ||
महाबीर बिक्रम बजरंगी|
कुमति निवार सुमति के संगी ||
कंचन बरन बिराज सुबेसा |
कानन कुण्डल कुंचित केसा ||
हाथ वज्र औ ध्वजा विराजे|
काँधे मूंज जनेऊ साजे||
संकर सुवन केसरी नंदन |
तेज प्रताप महा जग बंदन||
विद्यावान गुनी अति चातुर |
राम काज करिबे को आतुर ||
प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया |
राम लखन सीता मन बसिया ||
सुकसम रूप धरी सियहि दिखावा |
बिकट रूप धरी लंक जरावा ||
भीम रूप धरी असुर संहारे |
रामचंद्र के काज संवारे ||
लाय संजीवनी लखन जियाये |
श्रीरघुवीर हरषि उर लाये ||
रघुपति कीन्हीं बहुत बड़ाई |
तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई ||
सहस बदन तुम्हरो जस गावे |
अस कही श्रीपति कंठ लगावे ||
सनकादिक ब्रह्मादी मुनीसा|
नारद सारद सहित अहीसा ||
जम कुबेर दिगपाल जहा ते|
कबि कोबिद कही सके कहा ते||
तुम उपकार सुग्रीवहीं कीन्हा |
राम मिलाय राज पद दीन्हा ||
तुम्हरो मंत्र विभिषण माना |
लंकेश्वर भए सब जग जाना ||
जुग सहस्र योजन पर भानू |
लील्यो ताहि मधुर फल जाणू ||
प्रभु मुद्रिका मेली मुख माहीं|
जलधि लांघी गए अचरज नाहीं||
दुर्गम काज जगत के जेते |
सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते ||
राम दुआरे तुम रखवारे |
होत न आग्यां बिनु पैसारे ||
सब सुख लहै तुम्हारी सरना |
तुम रक्षक काहू को डरना ||
आपन तेज सम्हारो आपे |
तीनों लोक हांक ते काँपे ||
भुत पिशाच निकट नहिं आवे |
महावीर जब नाम सुनावे ||
नासै रोग हरे सब पीरा |
जपत निरंतर हनुमत बीरा ||
संकट से हनुमान छुडावे |
मन क्रम बचन ध्यान जो लावै||
सब पर राम तपस्वी राजा |
तिन के काज सकल तुम साजा ||
और मनोरथ जो कोई लावे |
सोई अमित जीवन फल पावे ||
चारों जुग प्रताप तुम्हारा |
है प्रसिद्ध जगत उजियारा ||
साधु संत के तुम रखवारे |
असुर निकंदन राम दुलारे ||
अष्ट सिद्धि नौनिधि के दाता |
अस बर दीन जानकी माता ||
राम रसायन तुम्हरे पासा |
सदा रहो रघुपति के दासा ||
तुम्हरे भजन राम को पावे |
जनम जनम के दुःख बिस्रावे ||
अंत काल रघुबर पुर जाई |
जहा जनम हरी भक्त कहाई ||
और देवता चित्त न धरई |
हनुमत सेई सर्व सुख करई||
संकट कटे मिटे सब पीरा |
जो सुमिरै हनुमत बलबीरा ||
जय जय जय हनुमान गोसाई |
कृपा करहु गुरु देव के नाइ ||
जो सत बार पाठ कर कोई |
छूटही बंदी महा सुख होई ||
जो यहे पढे हनुमान चालीसा |
होय सिद्धि साखी गौरीसा ||
तुलसीदास सदा हरी चेरा |
कीजै नाथ हृदये मह डेरा ||

दोहा
पवन तनय संकट हरन, मंगल मूर्ति रूप |
राम लखन सीता सहित , ह्रुदय बसहु सुर भूप

प्रभु से मानसिक वार्तालाप

प्रभु से मानसिक वार्तालाप

1. हे नाथ! आप मुझे मुझसे अधिक जानते है । इसलिए मेरी इच्छा कभी पूर्ण न हो । आपकी इच्छा पूर्ण हो ।
2. हे नाथ! मेरे मन, वचन, कर्म से कभी भी किसी को भी किंचिन्मात्र दुःख न पहुँचे यह कृपा बनाये रखे ।
3. हे नाथ! मैं कभी न पाप देखूँ, न सुनू और न किसी के पाप का बखान करूँ । 
4. हे नाथ! शरीर के सभी इन्द्रियों से आठो पहर केवल आपके प्रेम भरी लीला का ही आस्वादन करता रहूँ ।
5. हे नाथ! प्रतिकूल से प्रतिकूल परिस्थिति में भी आपके मंगलमय विधान देख सदैव प्रसन्न रहूँ ।
6. हे नाथ! अपने ऊपर महान से महान विपत्ति आने पर भी दूसरों को खुशी दिया करू ।
7. हे नाथ! अगर कभी किसी कारणवश मेरे वजह से किसी को दुःख पहुँचे तो उसी समय उसके चरणों में पड़कर क्षमा माँग लू ।
8. हे नाथ! आठो पहर रोम रोम से आपके नाम का जप होता रहे ।
9. हे नाथ! मेरे आचरण श्रीमद्भगवद्गीता और श्रीरामचरितमानस के अनुकूल हो ।
10. हे नाथ! हरेक परिस्थिति में आपकी कृपा के दर्शन हो ।

शिव कौन है?

शिव कौन है?
महापुरूष हमें बताते हैं कि श्री राम ने रामेश्वरम में सर्वशक्तिमान शिव का आह्वान किया और श्री कृष्ण ने वृंदावन में गोपेश्वर में शिव का आह्वान करके उनकी पूजा अर्चनाकरनेकी पेशकश की। इन दोनो जगह पर आज भी प्रसिद्ध शिव मंदिर हैं ! इन कथाओं से यह भी सच्चाई ग्यात होती है कि शिव के रूपों को सभी देवी-देवता , श्री राम और श्री कृष्ण भी परम पिता के रूप में पूजे जाते हैं। 
शिव की छवि को एक लिंगा के रूप मैं दिखाया जाता हैं, जो साबित करता है कि वह निराकार है! उन्हे किसी भी देवी-देवताओं की तरह पुरुष या महिला या मानव रूप में नही दिखाया गया है, लेकिन,वह एक प्रकाश बिंदु हैं। यही कारण है कि भारत में आज भी प्रसिद्ध शिव मंदिरों में शिव के १२ रूप को ज्योतिर्लिंग मठ कहा जाता है। 
निराकार भगवान शिव को त्रिमूर्ति भी कहाँ जाता हैं जो ब्रह्मा, विष्णु और शंकर के तीन सूक्ष्म देवताओं के निर्माता के रूप में दर्शाया गया है। शिवलिंग पर तीन निशान यह प्रतीक हैं की उन्हे, त्रिमूर्ति, त्रिनेत्री (जो ज्ञान की तीसरी आंख है), त्रिकालदर्शी (जो समय के तीनो पहलुओं को देखते है) और त्रिलोकिनाथ (तीनों लोकों के भगवान) ! 
शिव को शंभू या स्वयंभू भी कहा जाता हैं जिसका अर्थ है कि शिव परमात्मा हैं और उनके ऊपर कोई निर्माता नही है ! शब्द शिव का शाब्दिक अर्थ परोपकारी , परम अन्तरात्मा शिव सभी मनुष्यों को मुक्ति और मोक्ष देता है। 
इस प्रकार वह सही मायने में परमात्मा है।
ऊँ नमः शिवाय !!

गायत्री मंत्र कब ज़रूरी है

गायत्री मंत्र कब ज़रूरी है

सुबह उठते वक़्त 8 बार
अष्ट कर्मों को जीतने के लिए !!

भोजन के समय 1 बार
अमृत समान भोजन प्राप्त होने के लिए !! 

बाहर जाते समय 3 बार
समृद्धि सफलता और सिद्धि के लिए !! 

मन्दिर में 12 बार
प्रभु के गुणों को याद करने के लिए !! 

छींक आए तब गायत्री मंत्र उच्चारण
1 बार अमंगल दूर करने के लिए !!

सोते समय 7 बार
सात प्रकार के भय दूर करने के लिए !! 

, ओउम् तीन अक्षरों से बना है।
अ उ म् । 
"अ" का अर्थ है उत्पन्न होना,
"उ" का तात्पर्य है उठना, उड़ना अर्थात् विकास, 
"म" का मतलब है मौन हो जाना अर्थात् "ब्रह्मलीन" हो जाना।
ॐ सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति और पूरी सृष्टि का द्योतक है।
ॐ का उच्चारण शारीरिक लाभ प्रदान करता है।
ॐ कैसे है स्वास्थ्यवर्द्धकऔर अपनाएं आरोग्य के लिए ॐ के

उच्चारण का मार्ग...

1. ॐ और थायराॅयडः-
ॐ का उच्चारण करने से गले में कंपन पैदा होती है जो थायरायड ग्रंथि पर सकारात्मक प्रभाव डालता है।
2. ॐ और घबराहटः-
अगर आपको घबराहट या अधीरता होती है तो ॐ के उच्चारण से उत्तम कुछ भी नहीं।
3. ॐ और तनावः-
यह शरीर के विषैले तत्त्वों को दूर करता है, अर्थात तनाव के कारण पैदा होने वाले द्रव्यों पर नियंत्रण करता है।
4. ॐ और खून का प्रवाहः-
यह हृदय और ख़ून के प्रवाह को संतुलित रखता है।
5. ॐ और पाचनः-
ॐ के उच्चारण से पाचन शक्ति तेज़ होती है।
6. ॐ लाए स्फूर्तिः-
इससे शरीर में फिर से युवावस्था वाली स्फूर्ति का संचार होता है।
7. ॐ और थकान:-
थकान से बचाने के लिए इससे उत्तम उपाय कुछ और नहीं।
8. ॐ और नींदः-
नींद न आने की समस्या इससे कुछ ही समय में दूर हो जाती है। रात को सोते समय नींद आने तक मन में इसको करने से निश्चिंत नींद आएगी।
9. ॐ और फेफड़े:-
कुछ विशेष प्राणायाम के साथ इसे करने से फेफड़ों में मज़बूती आती है।
10. ॐ और रीढ़ की हड्डी:-
ॐ के पहले शब्द का उच्चारण करने से कंपन पैदा होती है। इन कंपन से रीढ़ की हड्डी प्रभावित होती है और इसकी क्षमता बढ़ जाती है।
11. ॐ दूर करे तनावः-
ॐ का उच्चारण करने से पूरा शरीर तनाव-रहित हो जाता है।


जय श्रीराम

क्यों कहा जाता है भोले बाबा को कालो के काल महाकाल

क्यों कहा जाता है भोले बाबा को कालो के काल महाकाल
महाकाल को कालो का काल अर्थात काल का नियंत्रक कहा जाता है। संसार में सभी कुछ काल के आधीन हैं। जो व्यक्ति समय का सदुपयोग करते हुए उसके अनुसार चलता है, वही प्रगति करता है और जो समय को सम्मान नहीं देता, वह जीवन में पिछड़ जाता है। पौराणिक ग्रंथों में अवंतिका (उज्जयिनी) को काल के देवता भगवान महाकालेश्वर की नगरी के रूप में गौरव प्राप्त है। द्वादश ज्योतिर्लिगों में गिने जाने वाले भगवान महाकालेश्वर को शास्त्रों में मृत्युलोक (भूलोक) का अधिपति कहा गया है। सौरपुराण में महाकाल को दिव्यलिङ्ग कहा गया है-
महाकालस्य लिङ्गस्य दिव्यलिङ्ग: तदुच्यते।
मान्यता है कि पूर्वकाल में उज्जयिनी में घना वन था। महाकाल के यहां पधारने के बाद से वह क्षेत्र महाकाल-वन के नाम से जाना जाने लगा। स्कंदपुराण के अवंतीखंड में महाकाल-वन में महाकालेश्वर के निवास करने की कथा है। कथा के अनुसार, प्रलयकाल में सारा संसार गहरे अंधकार में डूब गया था। उस समय न सूर्य था और न ही चांद-तारे। महाकालेश्वर ने ब्रम्हा जी को उत्पन्न कर उन्हें सृष्टि के निर्माण का आदेश दिया। ब्रहमा जी के निवेदन करने पर श्रीमहाकालेश्वर ने महाकाल-वन में निवास करना स्वीकार किया। इससे स्पष्ट हो जाता है कि सृष्टि का प्रारंभ एवं कालचक्र का प्रवर्तन श्रीमहाकाल से ही हुआ है। धर्मग्रंथ कहते हैं
कालचक्र प्रवर्तको महाकाल: प्रतापन:।
अर्थात कालचक्र के प्रवर्तक महाकाल अत्यंत प्रतापी हैं।
द्वादश ज्योतिर्लिगों में मात्र महाकालेश्वर ही दक्षिण-मुखी हैं। यहां दक्षिण दिशा में मृत्यु के देवता यमराज मृत्यु के वाहक काल के साथ विराजते हैं। मान्यता है कि महाकाल अपनी दृष्टि से इन पर नियंत्रण रखते हैं।
नित्य प्रात: 4 से 6 के मध्य होने वाली श्रीमहाकालेश्वर की भस्म आरती अनूठी और विख्यात है। उज्जयिनी आने वाला प्रत्येक तीर्थयात्री इस आरती को देखने का इच्छुक होता है। यह आरती गाय के गोबर से बने उपलों (कण्डों) से निर्मित भस्म से होती है। आरती के समय महाकालेश्वर का दर्शन करके भक्तगण मंत्रमुग्ध हो जाते हैं।
उज्जयिनी में महाकालेश्वर-मंदिर कब बना, यह सही रूप से कह पाना कठिन है। निश्चित ही यह धर्मस्थल प्रागैतिहासिक देन है। समय-समय पर इसका जीर्णोद्धार होता रहा है। वेदव्यास, कालिदास, तुलसीदास और महाकवि रवींद्रनाथ टैगोर ने श्रीमहाकाल की वाड्.मयी अर्चना की है। मंदिर के वर्तमान स्वरूप का श्रेय अठारहवीं शताब्दी में मराठा शासक बाजीराव पेशवा प्रथम के समय राणोजी शिन्दे(सिंधिया) के शासनकाल में मालवा के सूबेदार रहे रामचंद्रबाबा शेणवी को जाता है।
श्री महाकालेश्वर मंदिर में साल-भर उत्सव होते रहते हैं। इनमें महाकालेश्वर नवरात्र लोकविख्यात है। फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष में महाशिवरात्रि के नौ दिन पूर्व से महाकालेश्वर का यह विशिष्ट नवरात्र प्रारंभ होता है, जिसका समापन श्रीमहाकाल के विवाहोत्सव के साथ होता है। नवरात्र के नौदिवसीय पर्वकाल में श्रीमहाकालेश्वर का नित नूतन श्रृंगार, पूजन, रुद्राभिषेक तथा हरि-हर कथा का आयोजन होता है। महाशिवरात्रि पर पुष्पों से महाकाल को सेहरा बांधा जाता है। महाकालेश्वर को देख भक्त कह उठते हैं-
महाकाल महादेव, महाकाल महाप्रभो। महाकाल महारुद्र, महाकाल नमोस्तु ते॥

क्यों की जानी चाहिए चार धाम यात्रा

क्यों की जानी चाहिए चार धाम यात्रा

1. चार धाम यात्रा
हिन्दू धर्म में चार धाम की यात्रा का बेहद महत्व है। यदि आप एक हिन्दू परिवार से हैं तो अक्सर अपने घरे के बड़े-बुजुर्गों से या फिर अपने रिश्तेदारों से चार धाम की यात्रा पर जाने का जिक्र करते हुए अवश्य सुना होगा।
2. क्या है महत्व
यह एक धार्मिक यात्रा है, जिसमें पवित्र हिन्दू धामों के दर्शन किए जाते हैं। हिन्दू धर्म में चार मुख ऐसे धाम बताए गए हैं जिनके दर्शन करना ही चार धाम यात्रा है।
3. जानिए रोचक तथ्य
लेकिन क्या कभी आपके मन में यह सवाल आया है कि चार धाम की यात्रा क्यों की जाती है? या ऐसी धार्मिक यात्रा क्यों की जानी चाहिए? इसका महत्व क्या है एवं इस यात्रा से भक्त क्या लाभ पाता है?
4. चार धाम यात्रा
हिन्दू धर्म में चार धाम की यात्रा क्यों की जानी चाहिए, इसके पीछे कई सारे कारण है। कुछ कारण लोगों की भावनाओं से जुड़े हैं तो कुछ विभिन्न मान्यताओं पर आधारित हैं।
5. चार धाम यात्रा
लेकिन इससे भी पहले सवाल यह उठता है कि ये चार धाम कौन से हैं? आजकल लोगों में यह मत काफी प्रसिद्ध है कि सभी चार धाम उत्तराखंड में ही हैं और वे इस प्रकार हैं – यमुनोत्री, गंगोत्री, केदारनाथ और बद्रीनाथ।
6. चार धाम
लेकिन यदि हिन्दू धार्मिक इतिहास की नजर से देखा जाए तो चार धाम भारत की एक ही दिशा में ना होकर, चार दिशाओं में बने हुए हैं।
7. आद्यशंकराचार्यजी ने बताये थे चार धाम
प्राचीन समय से ही चारधाम तीर्थ के रूप मे मान्य थे, लेकिन इनकी महिमा का प्रचार आद्यशंकराचार्यजी ने किया था। माना जाता है, उन्होंने 4 धाम व 12 ज्योर्तिलिंग को सूचीबद्ध किया था।
8. आद्यशंकराचार्यजी ने बताये थे चार धाम
उनके अनुसार जिन चार धामों की प्रत्येक हिन्दू को जीवन में एक बार यात्रा अवश्य करनी चाहिए, वे इस प्रकर हैं - उत्तर में बद्रीनाथ, दक्षिण रामेश्वर, पूर्व में पुरी और पश्चिम में द्वारिका।
9. आद्यशंकराचार्यजी ने बताये थे चार धाम
आद्यशंकराचार्यजी ने यही चार धाम क्यों चुनें और इन्हीं दिशाओं में इनके होने का चयन क्यों किया, इसके पीछे भी एक खास कारण है।
10. क्या है कारण
दरअसल इन चारों धाम चार दिशा में स्थित करने के पीछे आद्यशंकराचार्यजी के कुछ सांस्कृतिक लक्ष्य थे। उनका यह मानना था कि प्रत्येक यात्री इन चार धामों के दर्शन के बहाने कम से कम पूरे भारत का दर्शन कर सके।
11. क्या है कारण
जो भी यात्री इन धामों की यात्रा के लिए निकले वह विविधता और अनेक रंगों से भरी भारतीय संस्कृति से परिचित हो। वो करीब से अपने देश की सभ्यता और परंपराओं को जाने।
12. धार्मिक कारण
लेकिन इसके अलावा चार धाम की यात्रा से क्या धार्मिक सुख मिलता है, यह जानते हैं आप? मान्यता है कि जो भी भक्त चार धाम की यात्रा करता है उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है।
13. धार्मिक कारण
वह जीवन-मरण के इस जंजाल से मुक्त हो जाता है और स्वर्ग की प्राप्ति करता है। इसके अलावा चार धाम की यात्रा उसके जीवन में अनेकों सुख लाती है। उसे तन एवं मन दोनों रूप से शांति प्रदान करती है।
14. वैज्ञानिक कारण
किंतु चार धाम की यात्रा करने के पीछे वैज्ञानिक कारण क्या हैं, यह भी जानने योग्य बात है। चार धाम की यात्रा हमें वैज्ञानिक रूप से कुछ खास लाभ देती है। यहां हम आपको चार धाम की यात्रा करने के कुछ वैज्ञानिक लाभ बताने जा रहे हैं, आशा है इन्हें जानने के बाद आप इस यात्रा पर जाने के लिए और भी इच्छुक होंगे।
15. वैज्ञानिक कारण
हिन्दू धर्म के ये चार धाम जिन-जिन जगहों पर बने हैं वहां का वातावरण स्वास्थ्य के अनुकूल होता है। उत्तराखंड में स्थित बद्रीनाथ यदि आप जाएं तो उससे बेहतर वातावरण आपको कहीं नहीं मिल सकता।
16. बद्रीनाथ मंंदिर का वातावरण
इस मंदिर के आसपास फैली हरी-भरी वादियां आपको यहीं बस जाने के लिए मजबूर करती हैं। इसके अलावा अन्य जितने भी धाम हैं वहां का वातावरण किसी ना किसी रूप से भक्तों को अपनी ओर खींचता है।
17. मानसिक शांति मिलती है
चार धाम यात्रा से स्वास्थ्य संबंधी दूसरा फायदा जो मिलता है वह है ‘मानसिक शांति’ का। चार धाम यात्रा करने वाला भक्त प्रभु का गुनगान करते हुए अपनी चिंताओं को भूल जाता है।
18. मानसिक तनाव कम होता है
जीवन की सभी कठिन समस्याओं को वे कम से कम उन पलों के लिए पीछे छोड़ देते हैं जब तक वे यात्रा कर रहे होते हैं। ऐसा करने से उनका मानसिक तनाव कम होता है, वे अंदरूनी खुशी को महसूस कर सकते हैं और खुलकर जीने की चाहत उनमें आती है।
19. चार धामों की विशेषता
चलिए अब आपको उन चार धामों की विशेषता बताते हैं, जिनके दर्शन मात्र से एक हिन्दू मोक्ष की प्राप्ति करता है। चारों दिशाओं में फैले इन चार धामों की अपनी अलग विशेषता है, यहां दर्शन करने से एक खास प्रकार का लाभ होता है।
20. बद्रीनाथ धाम
बद्रीनाथ उत्तर दिशा में स्थित एक मुख्य यात्राधाम माना जाता है। मन्दिर में नर-नारायण की पूजा होती है और अखण्ड दीप जलता है, जो कि अचल ज्ञानज्योति का प्रतीक है।
21. बद्रीनाथ धाम
कुछ वर्षों पहले तक लोगों को बद्रीनाथ जाने में कई दिक्कतें होती थीं, लेकिन अब जब इस धाम तक जाने का रास्ता सही बन गया है और साथ ही कई सुख सुविधाएं मौजूद हैं तो बड़ी संख्या में यहां भक्तों की भीड़ लगी रहती है।
22. बद्रीनाथ धाम
बद्रीनाथ धाम में तप्तकुण्ड काफी प्रसिद्ध है। यहां आकर यात्री एक बार इस कुण्ड में स्नान अवश्य करते हैं। यहां वनतुलसी की माला, चने की कच्ची दाल, गिरी का गोला और मिश्री आदि का प्रसाद चढ़ाया जाता है।
23. रामेश्वर धाम
हिन्दू धर्म में चार प्रसिद्ध धामों में से एक है रामेश्वरम, जो कि भारत के दक्षिणी कोने में स्थित है। इस धाम में भगवान शिव की पूजा लिंग रूप में की जाती है। यह शिवलिंग भगवान शिव को समर्पित बारह द्वादश ज्योतिर्लिंगों में से एक माना जाता है।
24. रामेश्वर धाम
कहा जाता है कि भारत के उत्तर मे काशी की जो मान्यता है, वही दक्षिण में रामेश्वरम् की है। रामेश्वरम चेन्नई से लगभग सवा चार सौ मील दक्षिण-पूर्व में है। यह हिंद महासागर और बंगाल की खाड़ी से चारों ओर से घिरा हुआ एक सुंदर शंख आकार का द्वीप है।
25. पुरी धाम
जब-जब श्रीकृष्ण का जिक्र हो और पुरी मंदिर का नाम ना लिया जाए, ऐसा हो नहीं सकता। लेकिन यहां भगवान कृष्ण “श्री जगन्नाथ” जी के नाम से प्रसिद्ध हैं। जगन्नाथ मंदिर भारत के ओडिशा राज्य के तटवर्ती शहर पुरी में स्थित है।
26. पुरी धाम
इस मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह मंदिर जहां स्थित है उस नगरी को ही जगन्नाथपुरी या पुरी कहा जाता है। इसी बात से इस मंदिर की महिमा का आभास होता है। मंदिर में स्थित भगवान की मूर्ति से लेकर इस मंदिर का ‘भोज’ सभी की अपनी महिमा है।
27. द्वारिका धाम
द्वारका भी भगवान विष्णु के दूसरे मानवरूपी अवतार भगवान श्रीकृष्ण को समर्पित पवित्र धाम है। यह जगह भारत के पश्चिम में समुद्र के किनारे पर बसी है।
28. द्वारिका धाम
यह जगह केवल एक जगह ना होकर एक प्राचीन नगरी है। आज से हजारों वर्ष पूर्व भगवान कृष्ण ने इसे बसाया था। कृष्ण मथुरा में उत्पन्न हुए, गोकुल में पले, पर राज उन्होंने द्वारका में ही किया।
29. द्वारिका धाम
माना गया है कि यहीं बैठकर उन्होने सारे देश की बागडोर अपने हाथ में संभाली। पांडवों को सहारा दिया। किंतु ऐसी मान्यता है कि असली द्वारका तो पानी में समा गई।
30. द्वारिका धाम
लेकिन कृष्ण की इस भूमि को आज भी पूज्य माना जाता है। इसलिए द्वारका धाम में श्रीकृष्ण स्वरूप का पूजन किया जाता है। आशा है कि इस जानकारी को प्राप्त करने के बाद आप चार धाम यात्रा से जुड़े भ्रमों से मुक्त हो पाएंगे।

शिवरात्रि

शिवरात्रि

वह रात्रि है जिसका शिवतत्त्व से घनिष्ठ संबंध है। भगवान शिव की अतिप्रिय रात्रि को शिव रात्रि कहा जाता है। शिव पुराण के ईशान संहिता में बताया गया है कि फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी की रात्रि में आदिदेव भगवान शिव करोडों सूर्यों के समान प्रभाव वाले लिंग रूप में प्रकट हुए-
फाल्गुनकृष्णचतुर्दश्यामादिदेवो महानिशि
शिवलिंगतयोद्भूत: कोटिसूर्यसमप्रभ:॥

शिवरात्रि की रात फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी तिथि में चन्द्रमा सूर्य के समीप होता है। अत: इसी समय जीवन रूपी चन्द्रमा का शिवरूपी सूर्य के साथ योग मिलन होता है। अत: इस चतुर्दशी को शिवपूजा करने से जीव को अभीष्ट फल की प्राप्ति होती है। यही शिवरात्रि का महत्त्व है। महाशिवरात्रि का पर्व परमात्मा शिव के दिव्य अवतरण का मंगल सूचक पर्व है। उनके निराकार से साकार रूप में अवतरण की रात्रि ही महाशिवरात्रि कहलाती है। हमें काम, क्रोध, लोभ, मोह, मत्सर आदि विकारों से मुक्त करके परमसुख, शान्ति एवं ऐश्वर्य प्रदान करते हैं।
किसी मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी 'शिवरात्रि' कही जाती है, किन्तु माघ (फाल्गुन, पूर्णिमान्त) की चतुर्दशी सबसे महत्त्वपूर्ण है और महाशिवरात्रि कहलाती है। *गरुड़पुराण, स्कन्दपुराण, पद्मपुराण, अग्निपुराण, आदि पुराणों में उसका वर्णन है। कहीं-कहीं वर्णनों में अन्तर है, किंतु प्रमुख बातें एक सी हैं। सभी में इसकी प्रशंसा की गई है। जब व्यक्ति उस दिन उपवास करके बिल्व पत्तियों से शिव की पूजा करता है और रात्रि भर 'जारण' (जागरण) करता है, शिव उसे नरक से बचाते हैं और आनन्द एवं मोक्ष प्रदान करते हैं और व्यक्ति स्वयं शिव हो जाता है। दान, यज्ञ, तप, तीर्थ यात्राएँ, व्रत इसके कोटि अंश के बराबर भी नहीं हैं।

गरुड़पुराण में कथा
गरुड़पुराण में इसकी गाथा है- आबू पर्वत पर निषादों का राजा सुन्दरसेनक था, जो एक दिन अपने कुत्ते के साथ शिकार खेलने गया। वह कोई पशु मार न सका और भूख-प्यास से व्याकुल वह गहन वन में तालाब के किनारे रात्रि भर जागता रहा। एक बिल्ब (बेल) के पेड़ के नीचे शिवलिंग था, अपने शरीर को आराम देने के लिए उसने अनजाने में शिवलिंग पर गिरी बिल्व पत्तियाँ नीचे उतार लीं। अपने पैरों की धूल को स्वच्छ करने के लिए उसने तालाब से जल लेकर छिड़का और ऐसा करने से जल की बूँदें शिवलिंग पर गिरीं, उसका एक तीर भी उसके हाथ से शिवलिंग पर गिरा और उसे उठाने में उसे शिवलिंग के समक्ष झुकना पड़ा। इस प्रकार उसने अनजाने में ही शिवलिंग को नहलाया, छुआ और उसकी पूजा की और रात्रि भर जागता रहा। दूसरे दिन वह अपने घर लौट आया और पत्नी द्वारा दिया गया भोजन किया। आगे चलकर जब वह मरा और यमदूतों ने उसे पकड़ा तो शिव के सेवकों ने उनसे युद्ध किया उसे उनसे छीन लिया। वह पाप रहित हो गया और कुत्ते के साथ शिव का सेवक बना। इस प्रकार उसने अज्ञान में ही पुण्यफल प्राप्त किया। यदि इस प्रकार कोई भी व्यक्ति ज्ञान में करे तो वह अक्षय पुण्यफल प्राप्त करता है। 
अग्निपुराण, स्कन्दपुराण में कथा
अग्निपुराण में सुन्दरसेनक बहेलिया का उल्लेख हुआ है। स्कन्दपुराण में जो कथा आयी है, वह लम्बी है- चण्ड नामक एक दुष्ट किरात था। वह जाल में मछलियाँ पकड़ता था और बहुत से पशुओं और पक्षियों को मारता था। उसकी पत्नी भी बड़ी निर्मम थी। इस प्रकार बहुत से वर्ष बीत गए। एक दिन वह पात्र में जल लेकर एक बिल्व पेड़ पर चढ़ गया और एक बनैले शूकर को मारने की इच्छा से रात्रि भर जागता रहा और नीचे बहुत सी पत्तियाँ फेंकता रहा। उसने पात्र के जल से अपना मुख धोया, जिससे नीचे के शिवलिंग पर जल गिर पड़ा। इस प्रकार उसने सभी विधियों से शिव की पूजा की, अर्थात् स्नापन किया (नहलाया), बेल की पत्तियाँ चढ़ायीं, रात्रि भर जागता रहा और उस दिन भूखा ही रहा। वह नीचे उतरा और एक तालाब के पास जाकर मछली पकड़ने लगा। वह उस रात्रि घर नहीं जा सका था, अत: उसकी पत्नी बिना अन्न-जल के पड़ी रही और चिन्ताग्रस्त हो उठी। प्रात:काल वह भोजन लेकर पहुँची, अपने पति को एक नदी के तट पर देख, भोजन को तट पर ही रख कर नदी को पार करने लगी। दोनों ने स्नान किया, किन्तु इसके पूर्व कि किरात भोजन के पास पहुँचे, एक कुत्ते ने भोजन चट कर लिया। पत्नी ने कुत्ते को मारना चाहा किन्तु पति ने ऐसा नहीं करने दिया, क्योंकि अब उसका हृदय पसीज चुका था। तब तक (अमावस्या का) मध्याह्न हो चुका था। शिव के दूत पति-पत्नी को लेने आ गए, क्योंकि किरात ने अनजाने में शिव की पूजा कर ली थी और दोनों ने चतुर्दशी पर उपवास किया था। दोनों शिवलोक को गए। 

ऊँ नमः शिवाय हर हर महादेव