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Wednesday, 15 May 2019

आज की चर्चा का विषय

आज की चर्चा का विषय

क्या है उज्जैन तीर्थ का महत्व, क्यूँ इस स्थान को तीर्थ श्रेष्ठ कहा जाता हैं और क्या विशेषता है इस भूमि की।

सनत्कुमार उवाच
पृथिव्या नैमिषं तीर्थमुत्तमं तीर्थपुष्करम्
त्रयाणामपिलोकानां कुरुक्षेत्रं च प्रशस्यते ॥
कुरुक्षेत्रादृशगुणा पुण्या वाराणसीमता
तस्मादृशगुणं व्यास ! महाकालवनोत्तमम् ॥
प्रभासाद्यानितीर्थानि पृथिव्यामिहयानितु
प्रभासामुत्तमंतीर्थं क्षेत्रमाद्यंपिनाकिन: ॥
श्रीशैलमुत्तमंतीर्थं देवदारुवनं तथा॥
तस्मादप्युत्तमा व्यास ! पुण्या वाराणसी मता
तस्मादृशगुणं प्रोक्तं सर्वतीर्थोत्तमं यत: ॥
महाकालवनं गुह्यं सिद्धिक्षेत्रं तथोषरम्
किञ्जिद्गुह्यान्यथान्यानि श्मशानान्यूषराणिच ॥
सर्वतस्तुसमाख्यातं महाकालवनं मुने !
श्मशानमूषरं क्षेत्रं पीठन्तु वनमेव च 
पञ्चैकत्र न लभ्यनते महाकालपुरादृते ॥

अर्थात्- सनत्कुमा कहते हैं!
पृथ्वी में नैमिष तथा पुष्कर तीर्थ उत्तम है।
कुरुक्षेत्र त्रैलोक्य के तीर्थों की अपेक्षा श्रेष्ठ हैं।
वाराणसी तो कुरुक्षेत्र की तुलना में दस गुना श्रेष्ठ हैं। हे व्यास ! महाकाल वन तो उक्त वाराणसी से भी दस गुना पुण्यप्रद क्षेत्र है। पृथ्वी पर जितने भी तीर्थ हैं, उनमें प्रभास अत्युत्तम हैं तथा पिनाकी का आद्यक्षेत्र हैं। श्रीशैल तथा देवदारु वन भी उत्कृष्ट तीर्थ है। महाकाल वन काशी की अपेक्षा दस गुना पुण्यप्रद हैं। महाकालवन तीर्थ गुप्त, सिद्धभूमि तथा ऊषर हैं। इस पृथ्वी पर कोई तीर्थ गुह्य, कोई तीर्थ श्मशान, कोई तीर्थ ऊषर होता हैं, लेकिन केवल महाकाल वन एक साथ *श्मशान, ऊषर, सिद्धक्षेत्र, पीठ, वन* इन पांचों प्रकार वाला है। महाकाल वन के अतिरिक्त किसी भी तीर्थ में एक साथ पांच गुण नहीं मिलते है।
॥ इति श्री बृहद स्कंद पुराणे (अवंतिका खंड) प्रथमोध्याय समाप्तम् ॥
*बृहद् स्कंद पुराण* में उज्जैन अर्थात् अवंतिका की भूमि की विशेषता के विषय में कहा गया है कि यहाँ की भूमि *कठोर एवं पाषाण* हैं यहाँ की भूमि मानव को पुण्य करने से रोकती हैं क्योंकि यदि सभी पुण्यो को करने लग गए तो फिर पाप कौन करेगा ? यहाँ की भूमि पर सबसे अधिक महत्व *दान-धर्म* का है। यहाँ की भूमि पर आकर या यहां पर रह कर यदि *दान-धर्म* नहीं किया तो अन्यत्र स्थानों पर उसका दान उसी प्रकार से व्यर्थ हो जाता हैं है जिस प्रकार से कच्चे मिट्टी के बर्तन में जल भरने पर जल व्यर्थ हो जाता हैं।
उज्जैन पूर्व के कालो में बहुधा नामों से विख्यात हुई जैसे *अवंतिका, उज्जयिनी, महाकाल वन, कनकश्रृंगा, कुशस्थली, चूडामणि, प्रतिकल्पा, कर्णिका* इत्यादि और इन प्रत्येक नामों के पीछे की एक कथा रही हैं।
विश्व में सिर्फ दो ही ऐसे स्थान हैं जहां पर *प्रलय अर्थात् विपलव* के समय भी उन स्थानों की हानि नहीं होती हैं *१) अवंतिका २) काशी।* और नवीन सृष्टि की रचना का कार्य *उज्जैन अर्थात् अवंतिका* से ही होता हैं। इस भूमि पर महर्षियों ने वो सारी व्यवस्था कर रखी थी जिसके लिए मनुष्य को दूरगामी यात्रा न करना पड़े। यहाँ पर *108 हनुमान मंदिर, अष्ट भैरव, विश्व के सात सागर, नौ नारायण, 84 दिव्य शिवलिंग* स्थापित है। यही *84 दिव्य शिवलिंग* वर्तमान में *84 कल्प* व्यतीत होने के प्रतीक हैं। यहाँ *भगवान सूर्य और भगवान शिव* एकसाथ विद्यमान हैं। भगवान सूर्य *अवंतिका* से ही अपने स्वर्ण के रथ पर आरूढ़ होकर समस्त विश्व समेत 14 भुवनों को प्रकाशित करते हैं । *भगवान सूर्य* के विलक्षण पुत्र *अंगराज कर्ण* का अंतिम संस्कार भी उज्जैन तीर्थ स्थल पर ही हुआ था। इसलिए यहाँ के *श्मशान घाट* को *चक्र तीर्थ* कहा जाता हैं। क्योंकि भगवान वासुदेव के चक्र *अंगराज कर्ण* के पार्थिव देह को उज्जैन लेकर आए थे। यहाँ पर स्थित *क्षिप्रा* नदी में तीन नदियाँ सूक्ष्म रूप में संगम करती हैं, *१) गंगा, २) गंधर्वती (गंधर्व लोक की नदी), ३) सरस्वती*। गंगा स्वयं एक बार अपने पापों को धोने *देवी क्षिप्रा* से संगम करती हैं। यहाँ एक विशेष स्थान है जो *गयाकोटि* के नाम से आदिकाल से विख्यात है *गया तीर्थ* पर पितृो के निमित्त किए गए कर्मों का *कोटि गुना अर्थात् करोड़ों गुना* फल *गयाकोटि* पर करने से प्राप्त होता हैं और इसीलिए इस स्थान का नाम *गयाकोटि* हैं। संसार में बहुत से लोगों के मस्तिष्क में यह भ्रांति हैं कि *देवी हरसिद्धि* उज्जयिनी की शक्तिपीठ हैं जबकि ऐसा बिलकुल भी नहीं है उज्जयिनी की शक्तिपीठ का नाम *अवंतिकेश्वरी* हैं। *देवी हरसिद्धि* को तो उज्जयिनी के *महानतम एवं चक्रवर्ती सम्राट राजा विक्रमादित्य* लेकर आए थे, गुजरात से। समुद्र मंथन से निकले बहुमूल्य रत्न और अन्य वस्तुओं की विभाजन भी *उज्जयिनी* में ही हुआ था। यहीं पर भगवान कृष्ण और भगवान शिव ने भगवान सूर्य की उपासना की जिसके फलस्वरूप भगवान सूर्य *कृष्णादित्य एवं शिवादित्य* के नाम से प्रसिद्ध हुए। मंगल ग्रह जिसे हम *अंगारक* के नाम से भी जानते हैं उसकी उत्पत्ति भी उज्जयिनी ही हुई थी और भगवान साम्ब सदाशिव ने *त्रिपुरासुर* एवं उसकी तीनों *पुरियो* का संघार *उज्जयिनी* से ही अपने *विजय नामक धनुष* से करा था जिसके बाद भगवान शिव *त्रिपुरांतकारी* कहलाए। आदिकाल से लेकर आज भी बहुत मात्रा में लोग *अवंतिका की यात्रा* करते हैं जिसमें *108 हनुमान मंदिर, अष्ट भैरव, विश्व के सात सागर, नौ नारायण और 84 दिव्य शिवलिंग* सम्मिलित रहते हैं और अंत में *भगवान कालेश्वर अर्थात् महाकाल* की परिक्रमा कर अपनी यात्रा को संपन्न करते हैं। *बृहद् स्कंद पुराण के अवंतिका खंड* में इस यात्रा के महत्व को बताया गया है और इससे प्राप्त होने वाले अनंत पुण्यो की भी व्याख्या हुई हैं। *भगवान वासुदेव और बलदाऊ* को यहीं पर मेरे प्रप्रपितामह * भगवान कृष्ण दैपायन महर्षि वेदव्यास जी* ने 16 दिनों तक पढ़ाया था।

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