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Tuesday, 17 December 2019

शरद पूर्णिमा

🌏     वर्ष के बारह महीनों में ये पूर्णिमा ऐसी है, जो तन, मन और धन तीनों के लिए सर्वश्रेष्ठ होती है। इस पूर्णिमा को चंद्रमा की किरणों से अमृत की वर्षा होती है, तो धन की देवी महालक्ष्मी रात को ये देखने के लिए निकलती हैं कि कौन जाग रहा है और वह अपने कर्मनिष्ठ भक्तों को धन-धान्य से भरपूर करती हैं।

🌏    शरद पूर्णिमा का एक नाम कोजागरी पूर्णिमा भी है यानी लक्ष्मी जी पूछती हैं- कौन जाग रहा है? अश्विनी महीने की पूर्णिमा को चंद्रमा अश्विनी नक्षत्र में होता है इसलिए इस महीने का नाम अश्विनी पड़ा है।

🌓      एक महीने में चंद्रमा जिन 27 नक्षत्रों में भ्रमण करता है, उनमें ये सबसे पहला है और आश्विन नक्षत्र की पूर्णिमा आरोग्य देती है।

🌎    केवल शरद पूर्णिमा को ही चंद्रमा अपनी सोलह कलाओं से संपूर्ण होता है और पृथ्वी के सबसे ज्यादा निकट भी। चंद्रमा की किरणों से इस पूर्णिमा को अमृत बरसता है।

🌏    आयुर्वेदाचार्य वर्ष भर इस पूर्णिमा की प्रतीक्षा करते हैं। जीवनदायिनी रोगनाशक जड़ी-बूटियों को वह शरद पूर्णिमा की चांदनी में रखते हैं। अमृत से नहाई इन जड़ी-बूटियों से जब दवा बनायी जाती है तो वह रोगी के ऊपर तुंरत असर करती है।

🌓   चंद्रमा को वेदं-पुराणों में मन के समान माना गया है- चंद्रमा मनसो जात:। वायु पुराण में चंद्रमा को जल का कारक बताया गया है। प्राचीन ग्रंथों में चंद्रमा को औषधीश यानी औषधियों का स्वामी कहा गया है।

🌏   ब्रह्मपुराण के अनुसार- सोम या चंद्रमा से जो सुधामय तेज पृथ्वी पर गिरता है उसी से औषधियों की उत्पत्ति हुई और जब औषधी 16 कला संपूर्ण हो तो अनुमान लगाइए उस दिन औषधियों को कितना बल मिलेगा।

🌏   शरद पूर्णिमा की शीतल चांदनी में रखी खीर खाने से शरीर के सभी रोग दूर होते हैं। ज्येष्ठ, आषाढ़, सावन और भाद्रपद मास में शरीर में पित्त का जो संचय हो जाता है, शरद पूर्णिमा की शीतल धवल चांदनी में रखी खीर खाने से पित्त बाहर निकलता है।

🌓    लेकिन इस खीर को एक विशेष विधि से बनाया जाता है। पूरी रात चांद की चांदनी में रखने के बाद सुबह खाली पेट यह खीर खाने से सभी रोग दूर होते हैं, शरीर निरोगी होता है।

🌏   शरद पूर्णिमा को रास पूर्णिमा भी कहते हैं। स्वयं सोलह कला संपूर्ण भगवान श्रीकृष्ण से भी जुड़ी है यह पूर्णिमा। इस रात को अपनी राधा रानी और अन्य सखियों के साथ श्रीकृष्ण महारास रचाते हैं।

🌏   कहते हैं जब वृन्दावन में भगवान कृष्ण महारास रचा रहे थे तो चंद्रमा आसमान से सब देख रहा था और वह इतना भाव-विभोर हुआ कि उसने अपनी शीतलता के साथ पृथ्वी पर अमृत की वर्षा आरंभ कर दी।

🌓  गुजरात में शरद पूर्णिमा को लोग रास रचाते हैं और गरबा खेलते हैं। मणिपुर में भी श्रीकृष्ण भक्त रास रचाते हैं। पश्चिम बंगाल और ओडिशा में शरद पूर्णिमा की रात को महालक्ष्मी की विधि-विधान के साथ पूजा की जाती है। मान्यता है कि इस पूर्णिमा को जो महालक्ष्मी का पूजन करते हैं और रात भर जागते हैं, उनकी सभी कामनाओं की पूर्ति होती है।

🌏   ओडिशा में शरद पूर्णिमा को कुमार पूर्णिमा के नाम से मनाया जाता है। आदिदेव महादेव और देवी पार्वती के पुत्र कार्तिकेय का जन्म इसी पूर्णिमा को हुआ था। गौर वर्ण, आकर्षक, सुंदर कार्तिकेय की पूजा कुंवारी लड़कियां उनके जैसा पति पाने के लिए करती हैं।

🌏   शरद पूर्णिमा ऐसे महीने में आती है, जब वर्षा ऋतु अंतिम समय पर होती है। शरद ऋतु अपने बाल्यकाल में होती है और हेमंत ऋतु आरंभ हो चुकी होती है और इसी पूर्णिमा से कार्तिक स्नान प्रारंभ हो जाता है।

श्री हनुमान चालीसा अर्थ सहित

हम सब हनुमान चालीसा पढते हैं, सब रटा रटाया।
क्या हमे चालीसा पढते समय पता भी होता है कि हम हनुमानजी से क्या कह रहे हैं या क्या मांग रहे हैं?
बस रटा रटाया बोलते जाते हैं। आनंद और फल शायद तभी मिलेगा जब हमें इसका मतलब भी पता हो।
तो लीजिए पेश है श्री हनुमान चालीसा अर्थ सहित!!

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श्री गुरु चरण सरोज रज, निज मन मुकुरु सुधारि।
बरनऊँ रघुवर बिमल जसु, जो दायकु फल चारि।
📯《अर्थ》→ गुरु महाराज के चरण.कमलों की धूलि से अपने मन रुपी दर्पण को पवित्र करके श्री रघुवीर के निर्मल यश का वर्णन करता हूँ, जो चारों फल धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को देने वाला हे।★
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बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरो पवन कुमार।
बल बुद्धि विद्या देहु मोहिं, हरहु कलेश विकार।★
📯《अर्थ》→ हे पवन कुमार! मैं आपको सुमिरन.करता हूँ। आप तो जानते ही हैं, कि मेरा शरीर और बुद्धि निर्बल है। मुझे शारीरिक बल, सदबुद्धि एवं ज्ञान दीजिए और मेरे दुःखों व दोषों का नाश कर दीजिए।★
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जय हनुमान ज्ञान गुण सागर, जय कपीस तिहुँ लोक उजागर॥1॥★
📯《अर्थ 》→ श्री हनुमान जी! आपकी जय हो। आपका ज्ञान और गुण अथाह है। हे कपीश्वर! आपकी जय हो! तीनों लोकों,स्वर्ग लोक, भूलोक और पाताल लोक में आपकी कीर्ति है।★
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राम दूत अतुलित बलधामा, अंजनी पुत्र पवन सुत नामा॥2॥★
📯《अर्थ》→ हे पवनसुत अंजनी नंदन! आपके समान दूसरा बलवान नही है।★
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महावीर विक्रम बजरंगी, कुमति निवार सुमति के संगी॥3॥★
📯《अर्थ》→ हे महावीर बजरंग बली! आप विशेष पराक्रम वाले है। आप खराब बुद्धि को दूर करते है, और अच्छी बुद्धि वालो के साथी, सहायक है।★
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कंचन बरन बिराज सुबेसा, कानन कुण्डल कुंचित केसा॥4॥★
📯《अर्थ》→ आप सुनहले रंग, सुन्दर वस्त्रों, कानों में कुण्डल और घुंघराले बालों से सुशोभित हैं।★
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हाथ ब्रज और ध्वजा विराजे, काँधे मूँज जनेऊ साजै॥5॥★
📯《अर्थ》→ आपके हाथ मे बज्र और ध्वजा है और कन्धे पर मूंज के जनेऊ की शोभा है।★
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शंकर सुवन केसरी नंदन, तेज प्रताप महा जग वंदन॥6॥★
📯《अर्थ 》→ हे शंकर के अवतार! हे केसरी नंदन! आपके पराक्रम और महान यश की संसार भर मे वन्दना होती है।★
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विद्यावान गुणी अति चातुर, राम काज करिबे को आतुर॥7॥★
📯《अर्थ 》→ आप प्रकान्ड विद्या निधान है, गुणवान और अत्यन्त कार्य कुशल होकर श्री राम काज करने के लिए आतुर रहते है।★
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प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया, राम लखन सीता मन बसिया॥8॥★
📯《अर्थ 》→ आप श्री राम चरित सुनने मे आनन्द रस लेते है। श्री राम, सीता और लखन आपके हृदय मे बसे रहते है।★
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सूक्ष्म रुप धरि सियहिं दिखावा, बिकट रुप धरि लंक जरावा॥9॥★
📯《अर्थ》→ आपने अपना बहुत छोटा रुप धारण करके सीता जी को दिखलाया और भयंकर रूप करके.लंका को जलाया।★
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भीम रुप धरि असुर संहारे, रामचन्द्र के काज संवारे॥10॥★
📯《अर्थ 》→ आपने विकराल रुप धारण करके.राक्षसों को मारा और श्री रामचन्द्र जी के उदेश्यों को सफल कराया।★
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लाय सजीवन लखन जियाये, श्री रघुवीर हरषि उर लाये॥11॥★
📯《अर्थ 》→ आपने संजीवनी बुटी लाकर लक्ष्मणजी को जिलाया जिससे श्री रघुवीर ने हर्षित होकर आपको हृदय से लगा लिया।★
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रघुपति कीन्हीं बहुत बड़ाई, तुम मम प्रिय भरत सम भाई॥12॥★
📯《अर्थ 》→ श्री रामचन्द्र ने आपकी बहुत प्रशंसा की और कहा की तुम मेरे भरत जैसे प्यारे भाई हो।★
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सहस बदन तुम्हरो जस गावैं, अस कहि श्री पति कंठ लगावैं॥13॥★
📯《अर्थ 》→ श्री राम ने आपको यह कहकर हृदय से.लगा लिया की तुम्हारा यश हजार मुख से सराहनीय है।★
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सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा, नारद,सारद सहित अहीसा॥14॥★
📯《अर्थ》→श्री सनक, श्री सनातन, श्री सनन्दन, श्री सनत्कुमार आदि मुनि ब्रह्मा आदि देवता नारद जी, सरस्वती जी, शेषनाग जी सब आपका गुण गान करते है।★
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जम कुबेर दिगपाल जहाँ ते, कबि कोबिद कहि सके कहाँ ते॥15॥★
📯《अर्थ 》→ यमराज,कुबेर आदि सब दिशाओं के रक्षक, कवि विद्वान, पंडित या कोई भी आपके यश का पूर्णतः वर्णन नहीं कर सकते।★
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तुम उपकार सुग्रीवहि कीन्हा, राम मिलाय राजपद दीन्हा॥16॥★
📯《अर्थ 》→ आपनें सुग्रीव जी को श्रीराम से मिलाकर उपकार किया, जिसके कारण वे राजा बने।★
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तुम्हरो मंत्र विभीषण माना, लंकेस्वर भए सब जग जाना ॥17॥★
📯《अर्थ 》→ आपके उपदेश का विभिषण जी ने पालन किया जिससे वे लंका के राजा बने, इसको सब संसार जानता है।★
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जुग सहस्त्र जोजन पर भानू, लील्यो ताहि मधुर फल जानू॥18॥★
📯《अर्थ 》→ जो सूर्य इतने योजन दूरी पर है की उस पर पहुँचने के लिए हजार युग लगे। दो हजार योजन की दूरी पर स्थित सूर्य को आपने एक मीठा फल समझ कर निगल लिया।★
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प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहि, जलधि लांघि गये अचरज नाहीं॥19॥★
📯《अर्थ 》→ आपने श्री रामचन्द्र जी की अंगूठी मुँह मे रखकर समुद्र को लांघ लिया, इसमें कोई आश्चर्य नही है।★
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दुर्गम काज जगत के जेते, सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते॥20॥★
📯《अर्थ 》→ संसार मे जितने भी कठिन से कठिन काम हो, वो आपकी कृपा से सहज हो जाते है।★
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राम दुआरे तुम रखवारे, होत न आज्ञा बिनु पैसारे॥21॥★
📯《अर्थ 》→ श्री रामचन्द्र जी के द्वार के आप.रखवाले है, जिसमे आपकी आज्ञा बिना किसी को प्रवेश नही मिलता अर्थात आपकी प्रसन्नता के बिना राम कृपा दुर्लभ है।★
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सब सुख लहै तुम्हारी सरना, तुम रक्षक काहू.को डरना॥22॥★
📯《अर्थ 》→ जो भी आपकी शरण मे आते है, उस सभी को आन्नद प्राप्त होता है, और जब आप रक्षक. है, तो फिर किसी का डर नही रहता।★
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आपन तेज सम्हारो आपै, तीनों लोक हाँक ते काँपै॥23॥★
📯《अर्थ. 》→ आपके सिवाय आपके वेग को कोई नही रोक सकता, आपकी गर्जना से तीनों लोक काँप जाते है।★
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भूत पिशाच निकट नहिं आवै, महावीर जब नाम सुनावै॥24॥★
📯《अर्थ 》→ जहाँ महावीर हनुमान जी का नाम सुनाया जाता है, वहाँ भूत, पिशाच पास भी नही फटक सकते।★
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नासै रोग हरै सब पीरा, जपत निरंतर हनुमत बीरा॥25॥★
📯《अर्थ 》→ वीर हनुमान जी! आपका निरंतर जप करने से सब रोग चले जाते है,और सब पीड़ा मिट जाती है।★
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संकट तें हनुमान छुड़ावै, मन क्रम बचन ध्यान जो लावै॥26॥★
📯《अर्थ 》→ हे हनुमान जी! विचार करने मे, कर्म करने मे और बोलने मे, जिनका ध्यान आपमे रहता है, उनको सब संकटो से आप छुड़ाते है।★
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सब पर राम तपस्वी राजा, तिनके काज सकल तुम साजा॥ 27॥★
📯《अर्थ 》→ तपस्वी राजा श्री रामचन्द्र जी सबसे श्रेष्ठ है, उनके सब कार्यो को आपने सहज मे कर दिया।★
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और मनोरथ जो कोइ लावै, सोई अमित जीवन फल पावै॥28॥★
📯《अर्थ 》→ जिस पर आपकी कृपा हो, वह कोई भी अभिलाषा करे तो उसे ऐसा फल मिलता है जिसकी जीवन मे कोई सीमा नही होती।★
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चारों जुग परताप तुम्हारा, है परसिद्ध जगत उजियारा॥29॥★
📯《अर्थ 》→ चारो युगों सतयुग, त्रेता, द्वापर तथा कलियुग मे आपका यश फैला हुआ है, जगत मे आपकी कीर्ति सर्वत्र प्रकाशमान है।★
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साधु सन्त के तुम रखवारे, असुर निकंदन राम दुलारे॥30॥★
📯《अर्थ 》→ हे श्री राम के दुलारे ! आप.सज्जनों की रक्षा करते है और दुष्टों का नाश करते है।★
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अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता, अस बर दीन जानकी माता॥३१॥★
📯《अर्थ 》→ आपको माता श्री जानकी से ऐसा वरदान मिला हुआ है, जिससे आप किसी को भी आठों सिद्धियां और नौ निधियां दे सकते है।★
1.) अणिमा → जिससे साधक किसी को दिखाई नही पड़ता और कठिन से कठिन पदार्थ मे प्रवेश कर.जाता है।★
2.) महिमा → जिसमे योगी अपने को बहुत बड़ा बना देता है।★
3.) गरिमा → जिससे साधक अपने को चाहे जितना भारी बना लेता है।★
4.) लघिमा → जिससे जितना चाहे उतना हल्का बन जाता है।★
5.) प्राप्ति → जिससे इच्छित पदार्थ की प्राप्ति होती है।★
6.) प्राकाम्य → जिससे इच्छा करने पर वह पृथ्वी मे समा सकता है, आकाश मे उड़ सकता है।★
7.) ईशित्व → जिससे सब पर शासन का सामर्थय हो जाता है।★
8.)वशित्व → जिससे दूसरो को वश मे किया जाता है।★
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राम रसायन तुम्हरे पासा, सदा रहो रघुपति के दासा॥32॥★
📯《अर्थ 》→ आप निरंतर श्री रघुनाथ जी की शरण मे रहते है, जिससे आपके पास बुढ़ापा और असाध्य रोगों के नाश के लिए राम नाम औषधि है।★
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तुम्हरे भजन राम को पावै, जनम जनम के दुख बिसरावै॥33॥★
📯《अर्थ 》→ आपका भजन करने से श्री राम.जी प्राप्त होते है, और जन्म जन्मांतर के दुःख दूर होते है।★
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अन्त काल रघुबर पुर जाई, जहाँ जन्म हरि भक्त कहाई॥34॥★
📯《अर्थ 》→ अंत समय श्री रघुनाथ जी के धाम को जाते है और यदि फिर भी जन्म लेंगे तो भक्ति करेंगे और श्री राम भक्त कहलायेंगे।★
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और देवता चित न धरई, हनुमत सेई सर्व सुख करई॥35॥★
📯《अर्थ 》→ हे हनुमान जी! आपकी सेवा करने से सब प्रकार के सुख मिलते है, फिर अन्य किसी देवता की आवश्यकता नही रहती।★
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संकट कटै मिटै सब पीरा, जो सुमिरै हनुमत बलबीरा॥36॥★
📯《अर्थ 》→ हे वीर हनुमान जी! जो आपका सुमिरन करता रहता है, उसके सब संकट कट जाते है और सब पीड़ा मिट जाती है।★
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जय जय जय हनुमान गोसाईं, कृपा करहु गुरु देव की नाई॥37॥★
📯《अर्थ 》→ हे स्वामी हनुमान जी! आपकी जय हो, जय हो, जय हो! आप मुझपर कृपालु श्री गुरु जी के समान कृपा कीजिए।★
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जो सत बार पाठ कर कोई, छुटहि बँदि महा सुख होई॥38॥★
📯《अर्थ 》→ जो कोई इस हनुमान चालीसा का सौ बार पाठ करेगा वह सब बन्धनों से छुट जायेगा और उसे परमानन्द मिलेगा।★
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जो यह पढ़ै हनुमान चालीसा, होय सिद्धि साखी गौरीसा॥39॥★
📯《अर्थ 》→ भगवान शंकर ने यह हनुमान चालीसा लिखवाया, इसलिए वे साक्षी है कि जो इसे पढ़ेगा उसे निश्चय ही सफलता प्राप्त होगी।★
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तुलसीदास सदा हरि चेरा, कीजै नाथ हृदय मँह डेरा॥40॥★
📯《अर्थ 》→ हे नाथ हनुमान जी! तुलसीदास सदा ही श्री राम का दास है।इसलिए आप उसके हृदय मे निवास कीजिए।★
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पवन तनय संकट हरन, मंगल मूरति रुप।
राम लखन सीता सहित, हृदय बसहु सुर भूप॥★
📯《अर्थ 》→ हे संकट मोचन पवन कुमार! आप आनन्द मंगलो के स्वरुप है। हे देवराज! आप श्री राम, सीता जी और लक्ष्मण सहित मेरे हृदय मे निवास कीजिए।★
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🌹सीता राम दुत हनुमान जी को समर्पित🌹
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🙏🌹🙏🌹🙏🌹🙏🌹🙏
कृपया आगे भी औरौं को भेजें🙏।। जय श्री राम 🙏🚩🚩🚩🚩🚩

श्रीमद्भगवद्गीता

द्वापर युग में मार्गशीर्ष शुक्‍ल एकादशी को भगवान श्रीकृष्‍ण ने अर्जुन को श्रीमद्भगवद् गीता का उपदेश दिया था। इसलिए इस दिन को गीता जयंती के पर्व के रूप में मनाया जाता हैं।

नैनं छिद्रन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावक: ।
न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुत ॥
(द्वितीय अध्याय, श्लोक 23)

इस श्लोक का अर्थ है: आत्मा को न शस्त्र काट सकते हैं, न आग उसे जला सकती है। न पानी उसे भिगो सकता है, न हवा उसे सुखा सकती है। (यहां भगवान श्रीकृष्ण ने आत्मा के अजर-अमर और शाश्वत होने की बात की है।

ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते।
सङ्गात्संजायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते॥
(द्वितीय अध्याय, श्लोक 62)

इस श्लोक का अर्थ है: विषयों (वस्तुओं) के बारे में सोचते रहने से मनुष्य को उनसे आसक्ति हो जाती है। इससे उनमें कामना यानी इच्छा पैदा होती है और कामनाओं में विघ्न आने से क्रोध की उत्पत्ति होती है। (यहां भगवान श्रीकृष्ण ने विषयासक्ति के दुष्परिणाम के बारे में बताया है।)

हतो वा प्राप्यसि स्वर्गम्, जित्वा वा भोक्ष्यसे महिम्।
तस्मात् उत्तिष्ठ कौन्तेय युद्धाय कृतनिश्चय:॥
(द्वितीय अध्याय, श्लोक 37)

इस श्लोक का अर्थ है: यदि तुम (अर्जुन) युद्ध में वीरगति को प्राप्त होते हो तो तुम्हें स्वर्ग मिलेगा और यदि विजयी होते हो तो धरती का सुख को भोगोगे… इसलिए उठो, हे कौन्तेय (अर्जुन), और निश्चय करके युद्ध करो। (यहां भगवान श्रीकृष्ण ने वर्तमान कर्म के परिणाम की चर्चा की है, तात्पर्य यह कि वर्तमान कर्म से श्रेयस्कर और कुछ नहीं है।)

क्रोधाद्भवति संमोह: संमोहात्स्मृतिविभ्रम:।
स्मृतिभ्रंशाद्बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति॥
(द्वितीय अध्याय, श्लोक 63)

इस श्लोक का अर्थ है: क्रोध से मनुष्य की मति मारी जाती है यानी मूढ़ हो जाती है जिससे स्मृति भ्रमित हो जाती है। स्मृति-भ्रम हो जाने से मनुष्य की बुद्धि नष्ट हो जाती है और बुद्धि का नाश हो जाने पर मनुष्य खुद अपना ही का नाश कर बैठता है।

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत:।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥
(चतुर्थ अध्याय, श्लोक 7)

इस श्लोक का अर्थ है: हे भारत (अर्जुन), जब-जब धर्म ग्लानि यानी उसका लोप होता है और अधर्म में वृद्धि होती है, तब-तब मैं (श्रीकृष्ण) धर्म के अभ्युत्थान के लिए स्वयम् की रचना करता हूं अर्थात अवतार लेता हूं।

यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जन:।
स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते॥
(तृतीय अध्याय, श्लोक 21)

इस श्लोक का अर्थ है: श्रेष्ठ पुरुष जो-जो आचरण यानी जो-जो काम करते हैं, दूसरे मनुष्य (आम इंसान) भी वैसा ही आचरण, वैसा ही काम करते हैं। वह (श्रेष्ठ पुरुष) जो प्रमाण या उदाहरण प्रस्तुत करता है, समस्त मानव-समुदाय उसी का अनुसरण करने लग जाते हैं।

परित्राणाय साधूनाम् विनाशाय च दुष्कृताम्।
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे-युगे॥
(चतुर्थ अध्याय, श्लोक 8)

इस श्लोक का अर्थ है: सज्जन पुरुषों के कल्याण के लिए और दुष्कर्मियों के विनाश के लिए… और धर्म की स्थापना के लिए मैं (श्रीकृष्ण) युगों-युगों से प्रत्येक युग में जन्म लेता आया हूं।

श्रद्धावान्ल्लभते ज्ञानं तत्पर: संयतेन्द्रिय:।
ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति॥
(चतुर्थ अध्याय, श्लोक 39)

इस श्लोक का अर्थ है: श्रद्धा रखने वाले मनुष्य, अपनी इन्द्रियों पर संयम रखने वाले मनुष्य, साधनपारायण हो अपनी तत्परता से ज्ञान प्राप्त कते हैं, फिर ज्ञान मिल जाने पर जल्द ही परम-शान्ति (भगवत्प्राप्तिरूप परम शान्ति) को प्राप्त होते हैं।

सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुच:॥
(अठारहवां अध्याय, श्लोक 66)

इस श्लोक का अर्थ है: (हे अर्जुन) सभी धर्मों को त्याग कर अर्थात हर आश्रय को त्याग कर केवल मेरी शरण में आओ, मैं (श्रीकृष्ण) तुम्हें सभी पापों से मुक्ति दिला दूंगा, इसलिए शोक मत करो।

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥
(द्वितीय अध्याय, श्लोक 47)

इस श्लोक का अर्थ है: कर्म पर ही तुम्हारा अधिकार है, लेकिन कर्म के फलों में कभी नहीं… इसलिए कर्म को फल के लिए मत करो और न ही काम करने में तुम्हारी आसक्ति हो। (यह श्रीमद्भवद्गीता के सर्वाधिक महत्वपूर्ण श्लोकों में से एक है, जो कर्मयोग दर्शन का मूल आधार है।)

‼ जय सियाराम ‼

Wednesday, 4 December 2019

रामचरित मानस के कुछ रोचक तथ्य

रामचरित मानस के कुछ रोचक तथ्य


मानस में राम शब्द

- 1443 बार आया है।

मानस में सीता शब्द

 - 147 बार आया है।

मानस में जानकी शब्द
 - 69 बार आया है।

मानस में बैदेही शब्द
 - 51 बार आया है।
मानस में बड़भागी शब्द 
 - 58 बार आया है।

मानस में कोटि शब्द
 - 125 बार आया है।

मानस में एक बार शब्द
 - 18 बार आया है।

मानस में मन्दिर शब्द
 - 35 बार आया है।

मानस में मरम शब्द
 - 40 बार आया है।

लंका में राम जी 
 - 111 दिन रहे।

लंका में सीताजी 
 - 435 दिन रहीं।

मानस में श्लोक संख्या
 - 27 है।

मानस में चोपाई संख्या

 - 4608 है।

मानस में दोहा संख्या
- 1074 है।

मानस में सोरठा संख्या
- 207 है।

मानस में छन्द संख्या
- 86 है।

सुग्रीव में बल था 
-10000 हाथियों का।

सीता रानी बनीं
 - 33वर्ष की उम्र में।

मानस रचना के समय तुलसीदास की उम्र 
 - 77 वर्ष थी।

पुष्पक विमान की चाल
 - 400 मील/घण्टा थी।

रामादल व रावण दल का युद्ध
 - 87 दिन चला।

राम रावण युद्ध
 - 32 दिन चला।

सेतु निर्माण
 - 5 दिन में हुआ।

नलनील के पिता
 - विश्वकर्मा जी हैं।

त्रिजटा के पिता
 - विभीषण हैं।

विश्वामित्र राम को ले गए
 - 10 दिन के लिए।

राम ने रावण को सबसे पहले मारा था
 - 6 वर्ष की उम्र में।

रावण को जिन्दा किया
 - सुखेन बेद ने नाभि में अमृत रखकर।


जय श्री राम
🙏 जय श्री राम   🙏

Sunday, 1 December 2019

शिव पुराण पर आधारित

शिव पुराण पर आधारित 

प्रश्न - 1. किसी भी कार्य, कथा,  पूजा को विघ्नो से दुर रखने के लिए किसकी पूजा की जाती है?
सही उत्तर - गणेशजी

प्रश्न - 2. पिनाकपाणि किसे कहा गया है
सही उत्तर - भगवान शिव

प्रश्न - 3. राजा दक्ष के यज्ञ में मां सती के योगाग्नि द्वारा दग्ध होने पर क्रोधित महादेव ने अपनी जटाओ से किसे प्रकट किया
सही उत्तर - वीरभद्र

प्रश्न -4. महादेव के गणाध्यक्ष नन्दी महाराज की पत्नी का नाम क्या है?
सही उत्तर - सुयशा

प्रश्न -5.भगवान शिव के वरदान से किसके शरीर की हड्डीया वज्र बन गई?
सही उत्तर - महर्षि दधिचि

प्रश्न -6. महामृत्युंजय मंत्र के कितने जाप करने पर भगवान शिव स्वप्न मे दर्शन देते हैं?
सही उत्तर - चार लाख

प्रश्न -7. सम्पूर्ण ब्रह्मांड का नाश होने पर भी किन 2 धामो का नाश कभी नहीं होता?
सही उत्तर - बैकुण्ठ और कैलाश

प्रश्न -8. ऐसा कौनसा राजा था जिसने अपने राज्य मे प्रत्येक व्यक्ति को शिवालय में दीपदान करना अनिवार्य कर दिया था
सही उत्तर - राजा दम

प्रश्न -9. शिव पुराण में कुल कितने भेद,  खण्ड या संहिताऐ है
सही उत्तर - 12

प्रश्न -10. महामुनी नारद शिवमाया से जिस कन्या पर मोहित हो गऐ थे उस कन्या का नाम क्या था
सही उत्तर - श्रीमती

प्रश्न- 11. मां पार्वती की माता मैना देवी ने महादेव की तपस्या करने से रोकने के लिए पार्वती को किस नाम से पुकारा था
सही उत्तर - उ मा  (अरी तपस्या ना कर)

प्रश्न -12. किसी समय असंख्य वर्षो तक समाधिस्थ महादेव की समाधी टुटने पर पसीने की बुंद पृथ्वी पर गिरने से किस लाल कान्तिमय दिप्तीवान तेजस्वी बालक का जन्म हुआ
सही उत्तर - भौम (मंगल)

प्रश्न -13. मां पार्वती के भाई का नाम क्या है?
सही उत्तर - मैनाक

प्रश्न -14. तपस्यारत मां पार्वती की परिक्षा लेने महादेव ने किसे भेजा?
सही उत्तर -सप्तरिषियो को

प्रश्न -15. सर्वव्यापी भगवान शिव ने अपने वाम भाग पे अमृत मल कर किसे प्रकट किया
सही उत्तर -भगवान विष्णु

प्रश्न -16. कामदेव की पत्नी रति के पिता का नाम क्या है?
सही उत्तर - दक्ष

प्रश्न- 17. मां सती की माता का नाम क्या है?
सही उत्तर -वीरीणी

प्रश्न-18. राजा दक्ष ने कितनी पुत्रियों का विवाह चन्द्रमा के साथ किया?
सही उत्तर -27

प्रश्न -19. माता सती का वरण करने के लिए भगवान शिव ने दक्ष के पास किसे भेजा?
सही उत्तर -ब्रह्मा जी

प्रश्न -20. दक्ष ने भगवान शिव से यज्ञ की रक्षा के लिए किससे प्रार्थना की?
सही उत्तर -भगवान विष्णु से

प्रश्न - 21. महादेवजी को क्या चढाने से लक्ष्मी की प्राप्ति होती है?
सही उत्तर - चावल (अखण्ड होने चाहिए)

प्रश्न - 22. दर्पक किसे कहा गया है
सही उत्तर - कामदेव

प्रश्न - 23. ब्रह्मा जी ने महादेव की अश्व रुपी क्रोधाग्नि को कहां स्थापित कर दिया था ?
सही उत्तर - समुद्र में

प्रश्न - 24. भगवान कार्तिकेय माता - पिता से रुष्ट हो कर कहाँ चले गऐ ?
सही उत्तर - क्रौंच पर्वत पर

प्रश्न - 25. भगवान गणेशजी की पत्नीया सिद्धी और बुद्धि किसकी पुत्रियाँ है ?
सही उत्तर - प्रजापति विश्वरूप

प्रश्न - 26. गणेशजी के पुत्र लाभ की माता का नाम क्या है ?
सही उत्तर - बुद्धि

प्रश्न - 27. तारकासुर के पुत्रो का वध करने के लिए महादेव जिस रथ पर चढके युद्ध करने गऐ उस रथ का नाम क्या था ?
सही उत्तर - सर्वदेवमय रथ

प्रश्न - 28. सदैव पूजनीय तुलसी के पति शंखचूड़ के पिता का नाम क्या है ?
सही उत्तर - दानवराज दम्भ

प्रश्न - 29. दानवराज शंखचूड़ को मरने के बाद कौनसा रूप प्राप्त हुआ ?
सही उत्तर - श्री कृष्ण पार्षद

प्रश्न - 30. तुलसी ने जिस शरीर को छोडा वह नदी रूप में परिवर्तित हो गया उस नदी का नाम क्या है ?
सही उत्तर - गण्डकी

प्रश्न - 31. परम शिव भक्त बाणासुर और श्री कृष्ण युद्ध में श्री कृष्ण ने शिवजी के आदेशानुसार महादेव पर कौनसे अस्त्र का संधान किया ?
सही उत्तर - जृम्भाण्स्त्र

प्रश्न - 32. कृतिवासा किसे कहा गया है ?
सही उत्तर - भगवान शिव को

प्रश्न - 33. शिवजी के ग्यारह रुद्र अवतार -- कपाली,, पिंगल,, भीम,, विरुपाक्ष,, विलोहित,, शास्ता,, अजपाद,, अहिर्बुध्न्य,, शम्भू,, चण्ड,, तथा भव की माता का नाम क्या है ?
सही उत्तर - सुरभी

प्रश्न - 34. शिव अवतार पिप्पलाद के पिता का नाम क्या है
सही उत्तर - महर्षि दधिचि

प्रश्न - 35. अवधूत वेशधारी महादेव के नेत्रो की अग्नि से किस दैत्य का प्राकट्य हुआ जिसे सिन्धुपुत्र भी कहा जाता है ?
सही उत्तर - दैत्यराज जलंधर

प्रश्न - 36. बालक उपमन्यु ने किसकी तपस्या की ?
सही उत्तर - भगवान शिव की

प्रश्न - 37. किरात वेशधारी महादेव ने किस दैत्य का वध किया जो शूकर का ऱुप धरके अर्जुन पर आक्रमण करने आया था ?
सही उत्तर - मूक नामक दैत्य

प्रश्न - 38. द्वादश ज्योतिर्लिंगो मे किस ज्योतिर्लिंग के पूजन से पापो और रोगो से मुक्ति मिल जाती हैं ?
सही उत्तर - सोमनाथ

प्रश्न - 39. गंगाजी ने सती अनुसुया के आश्रम मे निवास करने के बदले कितने वर्षो की शिव पूजा का फल मांगा ?
सही उत्तर - 1 वर्ष

प्रश्न - 40. सोमनाथ ज्योतिर्लिंग के उपलिंग का नाम क्या है ?
सही उत्तर - अन्तकेश्वर (यह महि नदी और समुद्र के संगम पर स्थित है)

प्रश्न -41 . मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग स्थान पर पुत्र कार्तिकेय से मिलने भगवान शिव किस तिथी को आते है?
सही उत्तर - अमावस्या

प्रश्न -42. मोक्षदायिनी नगरी काशी मे सिद्ध पुरुष किस महायोग का नित्य अभ्यास करते हैं ?
सही उत्तर - पाशुपत योग

प्रश्न -43. त्रिवर्गस्वर्ग साधन किसे कहा गया है
सही उत्तर - महादेव

प्रश्न -44. ब्रह्महत्या,  शराबी,  चोर गुरुपत्नि पर कुदृष्टि रखने वाला कौनसा पापी कहा गया है ?
सही उत्तर - महापातकी

प्रश्न -45. नरको के कितने प्रकार है
सही उत्तर - 28

प्रश्न -46. भगवान विष्णु के कान के मैल से कौनसे 2 असुर उत्पन्न हुऐ
सही उत्तर - मधु -कैटभ

प्रश्न -47. किस राक्षस का वध करने के कारण देवी का नाम दुर्गा पढा
सही उत्तर - दुर्गम

प्रश्न -48. यदि अचानक मनुष्य को नीली मक्खिया घेर ले तो उसकी मृत्यु कितने महिने मे हो जाती है
सही उत्तर - 1 महिना

प्रश्न -49. कुल कितने पुराण है?
सही उत्तर - 18

प्रश्न -50. महर्षि वेदव्यास ने 1 लाख श्लोक वाले शिवपुराण को संक्षिप्त करके कितने श्लोक का कर दिया
सही उत्तर - 24000

प्रश्न -51. वायुदेव ने 19 वे कल्प का नाम क्या बताया है
सही उत्तर - श्वेतलोहित कल्प

प्रश्न -52. ब्रह्माजी द्वारा सृष्टि निर्माण हेतू तपस्या से मुर्छित होने पर उनके मुख से कौन प्रकट हुऐ
सही उत्तर - रुद्र

प्रश्न -53. नर्मदा से प्रकट हुए शिवलिंग को नर्मदेश्वर के अलावा क्या कहा जाता है
सही उत्तर - बाणलिंग

प्रश्न -54. भगवान शिव ने उपमन्यु की परिक्षा लेने के लिए किसका वेश धरा
सही उत्तर - ईन्द्र

प्रश्न -55. सनत्कुमार किसके पुत्र है?
सही उत्तर - ब्रह्मा जी के

प्रश्न -56 . मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग स्थान पर पुत्र कार्तिकेय से मिलने माता पार्वती किस तिथी को आती है?
सही उत्तर - पुर्णीमा

प्रश्न -57. बृहस्पति के किस राशी मे आने पर सभी देवता त्रयंबकेश्वर गौतमी के तट पर आते हैं?
सही उत्तर - सिंह राशी

प्रश्न- 58. भीम नामक दैत्य जो महादेव द्वारा मारा गया किसका पुत्र था
सही उत्तर - कुंभकर्ण

प्रश्न -59. धर्मकृद्धसम्भव किसे कहा गया है
सही उत्तर - शिव को

प्रश्न -60. शिव पुराण को कितनी बार पढने से प्राचीन काल में भक्तो द्वारा साक्षात शिव के दर्शन किऐ गऐ
सही उत्तर - 7 बार

भूतनाथ महादेव

भूतनाथ महादेव


भगवान शिव का एक नाम भूतनाथ भी है। अपने भक्तों पर शिव हर रूप में अपार कृपा

मान्यता के अनुसार तत्कालीन राजा को सूचना मिली की जंगल में एक सुनसान जगह पर हर रोज गाय के थनों से खुद ही दूध बहता है। थोड़े ‌दिनों में यह खबर लोगों में आग की तरह फैल गई।
इसी दौरान राजा अजबेर सैन के सपने में भगवान शिव ने दर्शन दिए और उसे बताया कि जिस स्‍थान पर गाय के थनों से दूध बहता है। वहां शिवलिंग स्‍थापित है। उन्होंने राजा को कहा कि यहां पर एक भव्य मंदिर बनवाकर इसे भूतनाथ का नाम दिया जाए।
भगवान के निर्देशानुसार जब राजा ने मौके का मुआयना करवाया तो यह बात सच्ची हुई। जमीन में भविष्यवाणी के अनुसार शिवलिंग स्‍थापित था और गाय शिवलिंग को प्रभु कृपा से हर रोज दूध चढ़ाती थी।

सन् 1527 में राजा अजबेर सैन ने शिखारा शैली से मंदिर का निर्माण करवाया। मंदिर निर्माण से आज तक यहां पर भगवान भूतनाथ की श्रद्धापूर्वक पूजा अर्चना की जाती है। देश विदेश से आने वाले सैलानियों के लिए भी मंडी शहर में बसा यह मंदिर का आकर्षण का केंद्र बना रहता है।
बाबा भूतनाथ मंदिर में हर वर्ष शिवरात्रि का त्यौहार हर्षोल्लास से मनाया जाता है। शिवरात्रि से पहले ही इस मंदिर में भक्तों का तांता लगना शुरू हो जाता है
शिवरात्रि का त्यौहार यहां पर हर वर्ष पूरे एक सप्ताह तक मनाया जाता है। अंतर्राष्ट्रीय शिवरात्रि के मेले का इतिहास भी इसी भूतनाथ मंदिर के साथ जुड़ा है। जिसमे देश के ही नहीं विदेशी पर्यटक भी सम्मिलित होते हैं

मुक्तेश्वर महादेव

मुक्तेश्वर महादेव


मुक्तेश्वर महादेव धाम द्वापर युग में पांडवों द्वारा अपने वनवास के बारहवें वर्ष में स्थापित किया गया था। पांडव अपने प्रवास के क्रम में दसूहा जिला-होशियारपुर से होते हुए माता चिंतपूर्णी के दर्शन करते हुए आए तथा इस शांत एवं निर्जन स्थान को अपने निवास के लिए चुना।
मान्यता है कि वे इस स्थान पर करीब छ: मास तक रुके। पांडवों ने यहां पर पांच गुफाओं का निर्माण किया तथा एक रसोई घर भी बनाया। मुक्तेश्वर महादेव का शिवलिंग स्थापित कर उनसे होने वाले संभावित युद्ध के लिए वरदान भी प्राप्त किया। रसोई घर को आज द्रौपदी की रसोई के नाम से जाना जाता है। समय के कालक्रम में एक गुफा आज बंद हो चुकी है।

पांडव अपने अज्ञातवास के प्रारंभ होने से पहले रावी नदी पार कर के विराट राज्य की सीमा में प्रवेश कर गए जिसका केंद्र आज जम्मू-कश्मीर के अखनूर में माना जाता है। मुक्तेश्वर महादेव का वर्णन स्कंद पुराण में भी मिलता है। गुफा नं. 3 के ऊपरी भाग में चक्र अंकित है जिसके नीचे पांडव ध्यान, योग एवं क्रिया साधना किया करते थे।
प्रतिवर्ष महाशिवरात्रि, चैत्र चतुर्दशी, बैसाखी एवं सोमवती अमावस्या को धाम परिसर में विशाल मेला लगता है। इस पावन अवसर पर स्नान एवं बाबा के दर्शन करने पर हरिद्वार के बराबर पुण्य प्राप्त होता है। व्यक्ति यहां बैसाखी के अवसर पर अपने पितरों की मुक्ति के लिए पिंडदान करते हैं। इसीलिए मुक्तेश्वर धाम छोटा हरिद्वार के नाम से विख्यात है। लोग यहां अपने स्वजनों की अस्थियां भी प्रवाहित करते हैं।

पठानकोट से 25 किलोमीटर और शाहपुर कंडी से 2 किलोमीटर दूर इस पावन धाम को अब शाहपुर कंडी बराज प्रोजैक्ट से खतरा उत्पन्न हो गया है। शाहपुर कंडी का 206 मैगावाट के पावर प्लांट बनने से जो झील बनेगी वह इस अति प्राचीन एवं पांडवों द्वारा स्थापित धाम के अस्तिव को सदा के लिए समाप्त कर देगी क्योंकि झील के पानी से इसकी प्राचीन गुफाएं सदा के लिए पानी में डूब जाएंगी।

मार्च 1995 में पंजाब सरकार ने एक नोटीफिकेशन के जरिए यह आदेश जारी किया था कि इस धाम की 22 कनाल भूमि का बैराज प्रोजैक्ट द्वारा अधिग्रहण नहीं किया जा सकता।

आज इसे डूबने से कैसे बचाया जाए इसके बारे में पंजाब सरकार एवं शाहपुर कंडी बैराज प्रशासन पूरी तरह चुप है। उन्होंने इसे बचाने के लिए अभी तक कोई ठोस नीति नहीं बनाई है। इस धाम को आज एक दीवार बनाकर बचाया जा सकता है। अक्तूबर 2014 में और जून 2015 में जन रैली निकाल कर प्रशासन और सरकार को जनभावना से अवगत कराया गया था लेकिन अभी तक इसे बचाने के लिए कुछ भी नहीं किया गया है

जनता एवं श्रद्धालुओं की आस्था एवं उनके इसे बचाने की जबरदस्त मांग के बावजूद सरकार एवं शाहपुर कंडी बैराज प्रशासन ने अभी तक कोई प्रभावी कदम नहीं उठाया है जिससे लोगों मे रोष बढ़ रहा है

वामदेवेश्वर महादेव

वामदेवेश्वर महादेव


त्रेता युग से विराजे है बाबा भोलेनाथ
उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र में बांदा जिले के पहाडो मे विराजते है बाबा वामदेवेश्वर महादेव
यहां के श्रद्धालुओ का कहना है कि यूं तो बांबेश्वर में स्थित शिवलिंग की स्थापना का कही भी स्पष्ट उल्लेख नही है। बतातें है कि त्रेता युग में महर्षि बामदेव ने बांबेश्वर शिखर पर स्थित गुफा में तप व साधना की थी। यहां पर इन्हे सत्यम शिवम सुंदरम का बोध हुआ था। यही पर उन्हे भगवान शिव से साक्षात्कार हुआ। उसी समय शिवलिंग प्रगट हुए। जो बामदेवेश्वर के नाम से प्रसिद्ध हुए।
बांबेश्वर शिखर के ऊपर सिद्धबाबा का मंदिर है। शिवमंदिर आने वाले ज्यादातर भक्त सिद्धबाबा के यहां माथा टेकने के लिए जाते है। कहते है यहां पर जो भी कामना की जाती है वह पूरी होती है। लोग यहां पर अपनी अर्जी एक कपडे़ में बांध देते है पूरी होने पर यहां पूजन को आते है। शिवरात्रि पर बाबा के दरबार में श्रद्धालुओं को तांता लगा रहा। भक्तों पूजन के बाद शिखर की मनोहारी छटाओं को आंनद भी लिया।
 शिवलिंग काफी प्राचीन है। यहां पर पूजन-अर्जन करने से भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूरी होती है। उनके भक्त पर किसी भी प्रकार संकट नही आता है।-

- वैसे भी शिव औद्यड़दानी है। उनसे मांगी गई हर मनोकामना पूरी होती है
यहां पर भक्त शुद्ध भावना से जो भी मांगता है। सब कुछ मिलता है। परिवार में किसी भी प्रकार का संकट नही आता है यदि आ भी गया तो वह कट जाता है।-

शिव तो महामृत्युंजय है। शिव ही तो संसार के पालक है। उनके पूजन अर्चन से बीमारी तो दूर काल भी दूर भाग जाता है। उनके भक्त को किसी भी प्रकार का कष्ट नही होता है,

कालीनाथ महाकालेश्वर महादेव

कालीनाथ महाकालेश्वर महादेव


इस मंदिर में धंसता जा रहा शिवलिंग, तपस्या के बाद मां काली को मिले थे महादेव

आज हम आपको एक ऐसी जगह के बारे में बताने जा रहे हैं जिसके बारे में शायद ही आपने पहले सुना होगा। यह जगह हिमाचल के कांगड़ा देहरा के परागपुर गांव विराजित श्री कालीनाथ महाकालेश्‍वर महादेव मंदिर ब्यास नदी के तट पर स्थित है। यहां पर स्‍थापित शिवलिंग भी अपने आप में अद्वितीय है। मान्यता है कि इस शिवलिंग में महाकाली और भगवान शिव दोनों का वास है। इसके समीप ही श्मशानघाट है जहां पर हिंदू धर्म के लोग अंतिम संस्कार करने आते हैं। महाशिवरात्रि पर यहां बड़े पैमाने पर मेला लगता है।

ऐसे मिले मां काली को शिव

बताया जाता है कि वास्तु कला से निर्मित इस मंदिर में महादेव की पिंडी भू-गर्भ में स्थित है। मान्यता है कि मां काली ने शिव को पति के रूप में पाने के लिए यह आकर अतिंम तपस्या की थी। मां काली युद्ध के बाद शिव के मानव रूपी शव को लेकर पूरी पृथ्वी में जगह-जगह तपस्या करने लगी। शिव ने काली मां पर दया कर शर्त रखी कि जिस स्थान पर राक्षसों का खून नहीं गिरा होगा, वहीं मैं तुम्हें मिलूंगा। कालेश्वर मंदिर वही स्थान है। यहीं पर काली मां को शिव प्राप्त हुए थे। शिवलिंग के बारे में मान्यता है कि यह हर साल एक जो के दाने के बराबर पालात में धंसता जा रहा है। कालेश्वर तीर्थ स्थल के पास प्राचीन पंचतीर्थी सरोवर भी है। जहां स्नान करने से फल प्राप्त होता है। यह पंचतीर्थी तीर्थ स्थल पांडवों ने बनाया था

मां काली के क्रोध को शांत करने के लिए पैरो में लेट गए शिव

इस पवित्र तीर्थ स्थल के दर्शनों के लिए दूर-दूर से श्रद्धालु आते हैं। पौराणिक कथा के अनुसार, जालंधर दैत्य की इस पवित्र भूमि पर महाकाली ने भगवान शंकर को खुश करने के लिए दाहिने पैर के अंगूठे के बल पर 14 हजार साल तक जाप किया। इसका जिक्र ऋग्वेद और स्कंद पुराण में है। राक्षसो से युद्ध के बाद मां काली क्रोधित हो उठी थी। उनके क्रोध को शांत करने के लिए शिव उनके पैरो में लेट गए। इसके बाद उनका क्रोध शांत हो गया। पुराणों की मानें तो यहां पांडव अज्ञात वास में रहे। इसका प्रमाण यहां मौजूद है। क्योंकि पांडवों की मां ने जब स्नान की इच्छा जताई तो अर्जुन ने पहाड़ से मां गंगा को प्रकट किया। योगी शिव नंद स्वामी बताते हैं कि ये हिमाचल के तपो स्थलों में सबसे मान्य तपो स्थल है। मां चिंतपूर्णी के इर्द-गिर्द चारों तरफ रुद्र महादेव मंदिर है। उन्ही में से एक है काली नाथ महाकालेश्वर मंदिर
संकलन :- मुकेश

श्री मद्-भगवत गीता के बारे में

श्री मद्-भगवत गीता के बारे में


किसको किसने सुनाई?
श्रीकृष्ण ने अर्जुन को सुनाई।

कब सुनाई?
आज से लगभग 7 हज़ार साल पहले सुनाई।

भगवान ने किस दिन गीता सुनाई?
रविवार के दिन।


कोनसी तिथि को?
एकादशी

कहा सुनाई?
कुरुक्षेत्र की रणभूमि में।

कितनी देर में सुनाई?
लगभग 45 मिनट में

क्यू सुनाई?
 कर्त्तव्य से भटके हुए अर्जुन को कर्त्तव्य सिखाने के लिए और आने वाली पीढियों को धर्म-ज्ञान सिखाने के लिए।

कितने अध्याय है?
कुल 18 अध्याय

कितने श्लोक है?
700 श्लोक

गीता में क्या-क्या बताया गया है?
ज्ञान-भक्ति-कर्म योग मार्गो की विस्तृत व्याख्या की गयी है, इन मार्गो पर चलने से व्यक्ति निश्चित ही परमपद का अधिकारी बन जाता है।

गीता को अर्जुन के अलावा और किन किन लोगो ने सुना?
धृतराष्ट्र एवं संजय ने

अर्जुन से पहले गीता का पावन ज्ञान किन्हें मिला था?
 भगवान सूर्यदेव को

गीता की गिनती किन धर्म-ग्रंथो में आती है?
उपनिषदों में

गीता किस महाग्रंथ का भाग है....?
गीता महाभारत के एक अध्याय शांति-पर्व का एक हिस्सा है।

गीता का दूसरा नाम क्या है?
 गीतोपनिषद

गीता का सार क्या है?
प्रभु श्रीकृष्ण की शरण लेना

गीता में किसने कितने श्लोक कहे है?
श्रीकृष्ण जी ने- 574
अर्जुन ने- 85
धृतराष्ट्र ने- 1
संजय ने- 40

अधूरा ज्ञान खतरनाक होता है।

33 करोड नहीँ
33 कोटी देवी देवता हैँ हिंदू धर्म मेँ।

कोटि = प्रकार।
देवभाषा संस्कृत में कोटि के दो अर्थ होते है,
कोटि का मतलब प्रकार होता है और एक अर्थ करोड़ भी होता।

हिन्दू धर्म का दुष्प्रचार करने के लिए ये बात उडाई गयी की हिन्दुओ के 33 करोड़ देवी देवता हैं और अब तो मुर्ख हिन्दू खुद ही गाते फिरते हैं की हमारे 33 करोड़ देवी देवता है!

कुल 33 प्रकार के देवी देवता हैँ हिँदू धर्म मे :-
12 प्रकार हैँ
आदित्य , धाता, मित, आर्यमा, शक्रा, वरुण, अँश, भाग, विवास्वान, पूष, सविता, तवास्था, और विष्णु...!
8 प्रकार हे :-
वासु:, धर, ध्रुव, सोम, अह, अनिल, अनल, प्रत्युष और प्रभाष।

11 प्रकार है :-
रुद्र:, बहुरु, त्रयँबक, अपराजिता, बृषाकापि, शंभू, कार्नी, रेवात, मृगव्याध, शर्वा और कपाली।

एवँ
दो प्रकार हैँ अश्विनी और कुमार।

कुल:-
12+8+11+2=33 कोटी

सभी शिव प्रेमी ध्यान दें

सभी शिव प्रेमी ध्यान दें

महादेव
जिनकी माया महान तपस्वी, रिषी, मुनी, संत, महात्मा भी नहीं जान सके जिनके आगे सभी देव नतमस्तक हुऐ

महादेव
निराकार है, कण - कण में विधमान है सर्वशक्तिमान होते हुऐ भी पल मे मान जाते हैं
सिर्फ एक लोटा जल से ही रीझ जाते है

महादेव
जिनसे देवो ने ही नही दानवो ने भी तपस्या कर सिद्धिया प्राप्त की

महादेव
जिनकी महिमा का बखान देवता भी नहीं कर सके हम मनुष्यो के वश में कहां की उनकी महिमा का वर्णन कर सके

महादेव
जिन्होने सम्पूर्ण जगत मे जहां जहां भी उनके भक्तो पर संकट आया वहां प्रकट होकर भक्तो को संकट से निकालकर उनका उद्धार किया

विष्णु के तीन अवतार

क्या आप जानते है कि वराह नाम से विष्णु के तीन अवतार लिए थे


आपने भगवान विष्णु के वराह अवतार का नाम तो सुना ही होगा जिन्होंने हिरण्याक्ष का वध किया था। लेकिन वे दरअसल आदि वराह थे। आदि वराह से पहले नील वराह और उनके बाद श्वेत वराह हुए जिनके बारे में कम ही लोग जानते होंगे। तीनों के काल को मिलाकर वराह काल कहा गया जो वर्तमान में भी जारी है। नील वराह का अवतरण हिमयुग के अंतिम चरण में जब हुआ जब धरती पर जल ही जल फैलने लगा था और रहने के लिए कोई जगह नहीं बची थी।

1. नील वराह काल :  - पाद्मकल्प के अंत के बाद महाप्रलय हुई। सूर्य के भीषण ताप के चलते धरती के सभी वन-जंगल आदि सूख गए। समुद्र का जल भी जल गया। ज्वालामुखी फूट पड़े। सघन ताप के कारण सूखा हुआ जल वाष्प बनकर आकाश में मेघों के रूप में स्थिर होता गया। अंत में न रुकने वाली जलप्रलय का सिलसिला शुरू हुआ। चक्रवात उठने लगे और देखते ही देखते समस्त धरती जल में डूब गई।

यह देख ब्रह्मा को चिंता होने लगी, तब उन्होंने जल में निवास करने वाले विष्णु का स्मरण किया और फिर विष्णु ने नील वराह रूप में प्रकट होकर इस धरती के कुछ हिस्से को जल से मुक्त किया।

पुराणकार कहते हैं कि इस काल में महामानव नील वराह देव ने अपनी पत्नी नयनादेवी के साथ अपनी संपूर्ण वराही सेना को प्रकट किया और धरती को जल से बचाने के लिए तीक्ष्ण दरातों, पाद प्रहारों, फावड़ों और कुदालियों और गैतियों द्वारा धरती को समतल कर रहने लायक बनाया। इसके लिए उन्होंने पर्वतों का छेदन तथा गर्तों के पूरण हेतु मृत्तिका के टीलों को जल में डालकर भूमि को बड़े श्रम के साथ समतल करने का प्रयास किया।

यह एक प्रकार का यज्ञ ही था इसलिए नील वराह को यज्ञ वराह भी कहा गया। नील वराह के इस कार्य को आकाश के सभी देवदूत देख रहे थे। प्रलयकाल का जल उतर जाने के बाद भगवान के प्रयत्नों से अनेक सुगंधित वन और पुष्कर-पुष्करिणी सरोवर निर्मित हुए, वृक्ष, लताएं उग आईं और धरती पर फिर से हरियाली छा गई। संभवत: इसी काल में मधु और कैटभ का वध किया गया था।

आदि वराह :  - नील वराह कल्प के बाद आदि वराह कल्प शुरू हुआ। इस कल्प में भगवान विष्णु ने आदि वराह नाम से अवतार लिया। यह वह काल था जबकि दिति और कश्यप के दो भयानक असुर पुत्र हिरण्यकश्यप और हिरण्याक्ष का आतंक था। दोनों को ही ब्रह्माजी से वरदान मिला हुआ था। इस काल में हिमयुग समाप्ति की ओर चल रहा था।

ऋषि कश्यप की सृष्टि में अर्थात उनके कुल के विस्तार के समय भगवान विष्णु ने आदि वराह का अवतार लिया। आदि वराह को कपिल वराह भी कहा गया है। वराह इसलिए कि उन्होंने वराह जाति में ही जन्म लिया था। उस काल में वराह अर्थात वन में रहने वाली जाति होती थी। शोधकर्ताओं के अनुसार कश्यप का क्षेत्र कैस्पियन सागर के पास से कश्मीर तक था। भगवान आदि वराह ने नील वराह के कार्य को ही आगे बढ़ाया था।

हिरण्याक्ष का वध :  - ऋषि कश्यप का पुत्र हिरण्याक्ष का दक्षिण भारत पर राज था। ब्रह्मा से युद्ध में अजेय और अमरता का वर मिलने के कारण उसका धरती पर आतंक हो चला था। हिरण्याक्ष भगवान वराह रूपी विष्णु के पीछे लग गया था और वह उनके धरती निर्माण के कार्य की खिल्ली उड़ाकर उनको युद्ध के लिए ललकारता था। वराह भगवान न जब रसातल से बाहर निकलकर धरती को समुद्र के ऊपर स्थापित कर दिया, तब उनका ध्यान हिरण्याक्ष पर गया।

आदि वराह के साथ भी महाप्रबल वराह सेना थी। उन्होंने अपनी सेना को लेकर हिरण्याक्ष के क्षेत्र पर चढ़ाई कर दी और विन्ध्यगिरि के पाद प्रसूत जल समुद्र को पार कर उन्होंने हिरण्याक्ष के नगर को घेर लिया। संगमनेर में महासंग्राम हुआ और अंतत: हिरण्याक्ष का अंत हुआ। आज भी दक्षिण भारत में हिंगोली, हिंगनघाट, हींगना नदी तथा हिरण्याक्षगण हैंगड़े नामों से कई स्थान हैं।

हिरण्याक्ष के वध के बाद भगवान विष्णु ने नृसिंह अवतार लेकर हिरण्याक्ष के भाई हिरण्यकश्यप का वध किया था। वराह देव ने दक्षिण के महाराष्ट्र प्रदेश में अपने नाम से एक पुरी भी बसाई जिसमें हिरण्याक्ष के बचे-खुचे दुष्ट असुरों को नियंत्रित रखने के लिए अपनी सेना का एक अंग भी यहां छोड़ दिया। यह पुरी आज वहां बारामती कराड़ के नाम से प्रसिद्ध है। वराह देव कोटि का वर्णन वेदों में भी उपलब्ध है। ऋग्वेद में वराह द्वारा चोरी गई हुई पृथ्वी का उद्वार तथा विन्ध्या पर्वत को पार करने का का वर्णन है।

भगवती दुर्गा के रणसंग्राम में अपनी विशाल देव सेनाओं वराही सेना और नारसिंही सेना लेकर उनका स्वयं संचालन करते हुए विजयश्री से विभूषित हुई थीं। वराही नारसिंही च भीम भैरव नादिनी कहकर दुर्गाम्बा के रण में इन्हें याद किया गया है।

श्वेत वराह :  - भगवान श्वेत वराह का युद्ध राजा विमति से हुआ था। इतिहास की दृष्टि से यह घटना अतिमहत्वपूर्ण है। द्रविड़ देश में सुमति नाम का राजा था। वह अपने पुत्रों को राज्य देकर तीर्थयात्रा को निकला। तीर्थयात्रा के भ्रमण में मार्ग में ही कहीं उसकी मृत्यु हो गई, तब एक दिन महर्षि नारद ने सुमति के पुत्र विमति को जाकर भड़काया कहा- 'पिता का ऋण उतारे वही पुत्र है।'

विमति ने मंत्रियों से पूछा कि पिता का ऋण कैसे उतरे? मंत्रियों ने कहा- 'राजन् आपके पिताजी को तीर्थों ने मारा है, सो तीर्थों को बदलें।' राजा ने कहा- 'तीर्थ तो अगणित हैं।' तब एक मंत्री ने कहा- 'जो सब तीर्थों की प्रमुख नगरी है, उसी को नष्ट कर दिया जाए।'

दक्षिण देश के इस शक्तिशाली राजा ने तब निर्णय किया और उसके निर्णय से उत्तर भारत की तीर्थ नगरी के लोगों में भय व्याप्त हो गया। तब वहां के लोगों ने सलाह-मशविरा करके उत्तरी ध्रुव के बर्फीले इलाके की ओर प्रस्थान किया। वहां के क्षेत्र को उस काल में स्वर्ग या देवलोक कहा जाता था। वहां श्वेतद्वीप पर उनके दर्शन वहां के देवता श्वेत वराह से हुए। श्वेत वराह ने उन विष्णु भक्त प्रजा को अभयदान दिया और विमति से युद्ध कर सैन्य सहित राजा विमति को पराजित किया।

पुराणों की वंशावली के अनुसार सुमति जैन संप्रदाय के सुमतिनाथ तीर्थकर हैं और वे योगेश्वर ऋषभदेव के पौत्र तथा भरत के पुत्र हैं। उनका समय शोधित काल गणना से 8,118 वि.पू. है। उल्लेखनीय है कि भगवान नारायण ने अपने भक्त ध्रुव को उत्तर ध्रुव का एक क्षेत्र दिया था। यहीं पर शिव पुत्र स्कंद का एक देश था और यहीं पर नारद मुनि भी रहते थे। उत्तर ध्रुव में कुछ कुरु भी रहते थे और यहीं पर श्वेत वराह नाम की जाति भी रहती थी।

नेपाल के पशुपतिनाथ मंदिर का इतिहास और पौराणिक मान्यता

नेपाल के पशुपतिनाथ मंदिर का इतिहास और पौराणिक मान्यता


विश्व में दो पशुपतिनाथ मंदिर प्रसिद्ध है एक नेपाल के काठमांडू का और दूसरा भारत के मंदसौर का। दोनों ही मंदिर में मुर्तियां समान आकृति वाली है। नेपाल का मंदिर बागमती नदी के किनारे काठमांडू में स्थित है और इसे यूनेस्को की विश्व धरोहर में शामिल किया गया है। यह मंदिर भव्य है और यहां पर देश-विदेश से पर्यटक आते हैं।

पशुपति का अर्थ ......

पशु अर्थात जीव या प्राणी और पति का अर्थ है स्वामी और नाथ का अर्थ है मालिक या भगवान। इसका मतलब यह कि संसार के समस्त जीवों के स्वामी या भगवान हैं पशुपतिनाथ। दूसरे अर्थों में पशुपतिनाथ का अर्थ है जीवन का मालिक।

मंदिर का इतिहास ......

माना जाता है कि यह लिंग, वेद लिखे जाने से पहले ही स्थापित हो गया था। पशुपति काठमांडू घाटी के प्राचीन शासकों के अधिष्ठाता देवता रहे हैं। पाशुपत संप्रदाय के इस मंदिर के निर्माण का कोई प्रमाणित इतिहास तो नहीं है किन्तु कुछ जगह पर यह उल्लेख मिलता है कि मंदिर का निर्माण सोमदेव राजवंश के पशुप्रेक्ष ने तीसरी सदी ईसा पूर्व में कराया था।

605 ईस्वी में अमशुवर्मन ने भगवान के चरण छूकर अपने को अनुग्रहीत माना था। बाद में इस मंदिर का पुन: निर्माण लगभग 11वीं सदी में किया गया था। दीमक की वजह से मंदिर को बहुत नुकसान हुआ, जिसकी कारण लगभग 17वीं सदी में इसका पुनर्निर्माण किया गया। बाद में मध्य युग तक मंदिर की कई नकलों का निर्माण कर लिया गया। ऐसे मंदिरों में भक्तपुर (1480), ललितपुर (1566) और बनारस (19वीं शताब्दी के प्रारंभ में) शामिल हैं। मूल मंदिर कई बार नष्ट हुआ है। इसे वर्तमान स्वरूप नरेश भूपलेंद्र मल्ला ने 1697 में प्रदान किया।

अप्रैल 2015 में आए विनाशकारी भूकंप में पशुपतिनाथ मंदिर के विश्व विरासत स्थल की कुछ बाहरी इमारतें पूरी तरह नष्ट हो गयी थी जबकि पशुपतिनाथ का मुख्य मंदिर और मंदिर की गर्भगृह को किसी भी प्रकार की हानि नहीं हुई थी।

मंदिर के पुजारी : पशुपतिनाथ मंदिर में भगवान की सेवा करने के लिए 1747 से ही नेपाल के राजाओं ने भारतीय ब्राह्मणों को आमंत्रित किया था। बाद में 'माल्ला राजवंश' के एक राजा ने दक्षिण भारतीय ब्राह्मण को मंदिर का प्रधान पुरोहित नियुक्त कर दिया। दक्षिण भारतीय भट्ट ब्राह्मण ही इस मंदिर के प्रधान पुजारी नियुक्त होते रहे थे। वर्तमान में प्रचंड सरकार के काल में भारतीय ब्राह्मणों का एकाधिकार खत्म कर नेपाली लोगों को पूजा का प्रभाव सौंप दिया गया।

कब खुलता है मंदिर ......

ये मंदिर प्रत्येक दिन प्रातः 4 बजे से रात्रि 9 बजे तक खुला रहता है। केवल दोपहर के समय और साय पांच बजे मंदिर के पट बंद कर दिए जाते है। मंदिर में जाने का सबसे उत्तम समय सुबह सुबह जल्दी और देर शाम का होता है। पुरे मंदिर परिसर का भ्रमण करने के लिए 90 से 120 मिनट का समय लगता है।

मंदिर का परिचय .....

नेपाल में पशुपतिनाथ का मंदिर काठमांडू के पास देवपाटन गांव में बागमती नदी के किनारे स्थित है। मंदिर में भगवान शिव की एक पांच मुंह वाली मूर्ति है। पशुपतिनाथ विग्रह में चारों दिशाओं में एक मुख और एकमुख ऊपर की ओर है। प्रत्येक मुख के दाएं हाथ में रुद्राक्ष की माला और बाएं हाथ में कमंदल मौजूद है। मान्यता अनुसार पशुपतिनाथ मंदिर का ज्योतिर्लिंग पारस पत्थर के समान है।

कहते हैं कि ये पांचों मुंह अलग-अलग दिशा और गुणों का परिचय देते हैं। पूर्व दिशा की ओर वाले मुख को तत्पुरुष और पश्चिम की ओर वाले मुख को सद्ज्योत कहते हैं। उत्तर दिशा की ओर वाले मुख को वामवेद या अर्धनारीश्वर कहते हैं और दक्षिण दिशा वाले मुख को अघोरा कहते हैं। जो मुख ऊपर की ओर है उसे ईशान मुख कहा जाता है।

इस मंदिर में भगवान शिव की मूर्ति तक पहुंचने के चार दरवाजे बने हुए हैं। वे चारों दरवाजे चांदी के हैं। पश्चिमी द्वार की ठीक सामने शिव जी के बैल नंदी की विशाल प्रतिमा है जिसका निर्माण पीतल से किया गया है। इस परिसर में वैष्णव और शैव परंपरा के कई मंदिर और प्रतिमाएं है। पशुपतिनाथ मंदिर को शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक, केदारनाथ मंदिर का आधा भाग माना जाता है।

यह मंदिर हिंदू और बौद्ध वास्तुकला का एक अच्छा मिश्रण है। मुख्य पगोडा शैली का मंदिर सुरक्षित आंगन में स्थित है जिसका संरक्षण नेपाल पुलिस द्वारा किया जाता है। यह मंदिर लगभग 264 हेक्टर क्षेत्र में फैला हुआ है, जिसमें 518 मंदिर और स्मारक सम्मिलित है। मंदिर की द्वी स्तरीय छत का निर्माण तांबे से किया गया है जिनपर सोने की परत चढाई गई है। मंदिर वर्गाकार के एक चबूतरे पर बना है जिसकी आधार से शिखर तक की ऊंचाई 23m 7cm है। मंदिर का शिखर सोने का है जिसे गजुर कहते हैं। परिसर के भीतर दो गर्भगृह है एक भीतर और दुसरी बाहर। भीतरी गर्भगृह वह स्थान है जहां शिव की प्रतिमा को स्थापित किया गया है जबकि बाहरी गर्भगृह एक खुला गलियारा है।

भीतरी आंगन में मौजूद मंदिर और प्रतिमाओं में वासुकि नाथ मंदिर, उन्मत्ता भैरव मंदिर, सूर्य नारायण मंदिर, कीर्ति मुख भैरव मंदिर, बूदानिल कंठ मंदिर हनुमान मूर्ति, और 184 शिवलिंग मूर्तियां प्रमुख रूम से मौजूद है जबकि बाहरी परिसर में राम मंदिर, विराट स्वरूप मंदिर, 12 ज्योतिर्लिंग और पंद्र शिवालय गुह्येश्वरी मंदिर के दर्शन किए जाते हैं। पशुपतिनाथ मंदिर के बाहर आर्य घाट स्थिति है। पौराणिक काल से ही केवल इसी घाट के पानी को मंदिर के भीतर ले जाए जाने का प्रावधान है।

मंदिर दर्शन की मान्यता ......

पशुपतिनाथ मंदिर के संबंध में यह मान्यता है कि जो भी व्यक्ति इस स्थान के दर्शन करता है उसे किसी भी जन्म में फिर कभी पशु योनि प्राप्त नहीं होती है। हालांकि शर्त यह है कि पहले शिवलिंग के पहले नंदी के दर्शन ना करे। यदि वो ऐसा करता है तो फिर अलगे जन्म में उसे पशु बनना पड़ता है। मंदिर की महिमा के बारे में आसपास के लोगों से आप काफी कहानियां भी सुन सकते हैं। मंदिर में अगर कोई घंटा-आधा घंटा ध्यान करता है तो वह जीव कई प्रकार की समस्याओं से मुक्त भी हो जाता है।

पौराणिक कथा.....

1. एक पौराणिक कथा के अनुसार भगवान शिव यहां पर चिंकारे का रूप धारण कर निद्रा में चले बैठे थे। जब देवताओं ने उन्हें खोजा और उन्हें वाराणसी वापस लाने का प्रयास किया तो उन्होंने नदी के दूसरे किनारे पर छलांग लगा दी। कहा जाता हैं इस दौरान उनका सींग चार टुकडों में टूट गया था। इसके बाद भगवान पशुपति चतुर्मुख लिंग के रूप में यहां प्रकट हुए थे।

2.दूसरी कथा एक चरवाहे से जुड़ी है। कहते हैं कि इस शिवलिंग को एक चरवाहे द्वारा खोजा गया था जिसकी गाय का अपने दूध से अभिषेक कर शिवलिंग के स्थान का पता लगाया था।

3.तीसरी कथा भारत के उत्तराखंड राज्य से जुडी एक पौराणिक कथा से है। इस कथा के अनुसार इस मंदिर का संबंध केदारनाथ मंदिर से है। कहा जाता है जब पांडवों को स्वर्गप्रयाण के समय शिवजी ने भैंसे के स्वरूप में दर्शन दिए थे जो बाद में धरती में समा गए लेकिन पूर्णतः समाने से पूर्व भीम ने उनकी पुंछ पकड़ ली थी। जिस स्थान पर भीम ने इस कार्य को किया था उसे वर्तमान में केदारनाथ धाम के नाम से जाना जाता है। एवं जिस स्थान पर उनका मुख धरती से बाहर आया उसे पशुपतिनाथ कहा जाता है। पुराणों में पंचकेदार की कथा नाम से इस कथा का विस्तार से उल्लेख मिलता है।

श्री बांके बिहारी मंदिर, वृंदावन की कथा व महत्व---

श्री बांके बिहारी मंदिर, वृंदावन की कथा व महत्व


बांके बिहारी मंदिर भारत में मथुरा जिले के वृंदावन धाम में रमण रेती पर स्थित है। यह भारत के प्राचीन और प्रसिद्ध मंदिरों में से एक है। बांके बिहारी कृष्ण का ही एक रूप है जो इसमें प्रदर्शित किया गया है। इसका निर्माण 1863 में स्वामी हरिदास ने करवाया था

श्री बाँकेबिहारी जी का संक्षिप्त इतिहास ----

श्रीधाम वृन्दावन, यह एक ऐसी पावन भूमि है, जिस भूमि पर आने मात्र से ही सभी पापों का नाश हो जाता है। ऐसा आख़िर कौन व्यक्ति होगा जो इस पवित्र भूमि पर आना नहीं चाहेगा तथा श्री बाँकेबिहारी जी के दर्शन कर अपने को कृतार्थ करना नहीं चाहेगा। यह मन्दिर श्री वृन्दावन धाम के एक सुन्दर इलाके में स्थित है। कहा जाता है कि इस मन्दिर का निर्माण स्वामी श्री हरिदास जी के वंशजो के सामूहिक प्रयास से किया गया।

मन्दिर निर्माण के शुरूआत में किसी दान-दाता का धन इसमें नहीं लगाया गया। श्रीहरिदास स्वामी विषय उदासीन वैष्णव थे। उनके भजन–कीर्तन से प्रसन्न हो निधिवन से श्री बाँकेबिहारीजी प्रकट हुये थे। स्वामी हरिदास जी का जन्म संवत 1536 में भाद्रपद महिने के शुक्ल पक्ष में अष्टमी के दिन वृन्दावन के निकट राजपुर नामक गाँव में हूआ था। इनके आराध्यदेव श्याम–सलोनी सूरत बाले श्रीबाँकेबिहारी जी थे। इनके पिता का नाम गंगाधर एवं माता का नाम श्रीमती चित्रा देवी था। हरिदास जी, स्वामी आशुधीर देव जी के शिष्य थे। इन्हें देखते ही आशुधीर देवजी जान गये थे कि ये सखी ललिताजी के अवतार हैं तथा राधाष्टमी के दिन भक्ति प्रदायनी श्री राधा जी के मंगल–महोत्सव का दर्शन लाभ हेतु ही यहाँ पधारे है। हरिदासजी को रसनिधि सखी का अवतार माना गया है। ये बचपन से ही संसार से ऊबे रहते थे। किशोरावस्था में इन्होंने आशुधीर जी से युगल मन्त्र दीक्षा ली तथा यमुना समीप निकुंज में एकान्त स्थान पर जाकर ध्यान-मग्न रहने लगे। जब ये 25 वर्ष के हुए तब इन्होंने अपने गुरु जी से विरक्तावेष प्राप्त किया एवं संसार से दूर होकर निकुंज बिहारी जी के नित्य लीलाओं का चिन्तन करने में रह गये। निकुंज वन में ही स्वामी हरिदासजी को बिहारीजी की मूर्ति निकालने का स्वप्नादेश हुआ था। तब उनकी आज्ञानुसार मनोहर श्यामवर्ण छवि वाले श्रीविग्रह को धरा को गोद से बाहर निकाला गया। यही सुन्दर मूर्ति जग में श्रीबाँकेबिहारी जी के नाम से विख्यात हुई यह मूर्ति मार्गशीर्ष, शुक्ला के पंचमी तिथि को निकाला गया था। अतः प्राकट्य तिथि को हम विहार पंचमी के रूप में बड़े ही उल्लास के साथ मानते है।युगल किशोर सरकार की मूर्ति राधा कृष्ण की संयुक्त छवि या ऐकीकृत छवि के कारण बाँके बिहारी जी के छवि के मध्य ऐक अलौकिक प्रकाश की अनुभूति होती है,जो बाँके बिहारी जी में राधा तत्व का परिचायक है। स्वामी हरिदास

श्री बाँकेबिहारी जी निधिवन में ही बहुत समय तक स्वामी जी द्वारा सेवित होते रहे थे। फिर जब मन्दिर का निर्माण कार्य सम्पन्न हो गया, तब उनको वहाँ लाकर स्थापित कर दिया गया। सनाढय वंश परम्परागत श्रीकृष्ण यति जी, बिहारी जी के भोग एवं अन्य सेवा व्यवस्था सम्भाले रहे। फिर इन्होंने संवत 1975 में हरगुलाल सेठ जी को श्रीबिहारी जी की सेवा व्यवस्था सम्भालने हेतु नियुक्त किया। तब इस सेठ ने वेरी, कोलकत्ता, रोहतक, इत्यादि स्थानों पर श्रीबाँकेबिहारी ट्रस्टों की स्थापना की। इसके अलावा अन्य भक्तों का सहयोग भी इसमें काफी सहायता प्रदान कर रहा है। आनन्द का विषय है कि जब काला पहाड़ के उत्पात की आशंका से अनेकों विग्रह स्थानान्तरित हुए। परन्तु श्रीबाँकेविहारी जी यहां से स्थानान्तरित नहीं हुए। आज भी उनकी यहां प्रेम सहित पूजा चल रही हैं। कालान्तर में स्वामी हरिदास जी के उपासना पद्धति में परिवर्तन लाकर एक नये सम्प्रदाय, निम्बार्क संप्रदाय से स्वतंत्र होकर सखीभाव संप्रदाय बना। इसी पद्धति अनुसार वृन्दावन के सभी मन्दिरों में सेवा एवं महोत्सव आदि मनाये जाते हैं। श्रीबाँकेबिहारी जी मन्दिर में केवल शरद पूर्णिमा के दिन श्री श्रीबाँकेबिहारी जी वंशीधारण करते हैं। केवल श्रावन तीज के दिन ही ठाकुर जी झूले पर बैठते हैं एवं जन्माष्टमी के दिन ही केवल उनकी मंगला–आरती होती हैं। जिसके दर्शन सौभाग्यशाली व्यक्ति को ही प्राप्त होते हैं। और चरण दर्शन केवल अक्षय तृतीया के दिन ही होता है। इन चरण-कमलों का जो दर्शन करता है उसका तो बेड़ा ही पार लग जाता है। स्वामी हरिदास जी संगीत के प्रसिद्ध गायक एवं तानसेन के गुरु थे। एक दिन प्रातःकाल स्वामी जी देखने लगे कि उनके बिस्तर पर कोई रजाई ओढ़कर सो रहा हैं। यह देखकर स्वामी जी बोले– अरे मेरे बिस्तर पर कौन सो रहा हैं। वहाँ श्रीबिहारी जी स्वयं सो रहे थे। शब्द सुनते ही बिहारी जी निकल भागे। किन्तु वे अपने चुड़ा एवं वंशी, को विस्तर पर रखकर चले गये। स्वामी जी, वृद्ध अवस्था में दृष्टि जीर्ण होने के कारण उनकों कुछ नजर नहीं आय। इसके पश्चात श्री बाँकेबिहारीजी मन्दिर के पुजारी ने जब मन्दिर के कपाट खोले तो उन्हें श्री बाँकेविहारीजी मन्दिर के पुजारी ने जब मन्दिर में कपट खोले तो उन्हें श्रीबाँकेबिहारी जी के पलने में चुड़ा एवं वंशी नजर नहीं आयी। किन्तु मन्दिर का दरवाजा बन्द था। आश्चर्यचकित होकर पुजारी जी निधिवन में स्वामी जी के पास आये एवं स्वामी जी को सभी बातें बतायी। स्वामी जी बोले कि प्रातःकाल कोई मेरे पंलग पर सोया हुआ था। वो जाते वक्त कुछ छोड़ गया हैं। तब पुजारी जी ने प्रत्यक्ष देखा कि पंलग पर श्रीबाँकेबिहारी जी की चुड़ा–वंशी विराजमान हैं। इससे प्रमाणित होता है कि श्रीबाँकेबिहारी जी रात को रास करने के लिए निधिवन जाते हैं।

इसी कारण से प्रातः श्रीबिहारी जी की मंगला–आरती नहीं होती हैं। कारण–रात्रि में रास करके यहां बिहारी जी आते है। अतः प्रातः शयन में बाधा डालकर उनकी आरती करना अपराध हैं। स्वामी हरिदास जी के दर्शन प्राप्त करने के लिए अनेकों सम्राट यहाँ आते थे। एक बार दिल्ली के सम्राट अकबर, स्वामी जी के दर्शन हेतु यहाँ आये थे। ठाकुर जी के दर्शन प्रातः 9 बजे से दोपहर 12 बजे तक एवं सायं 6 बजे से रात्रि 9 बजे तक होते हैं। विशेष तिथि उपलक्ष्यानुसार समय के परिवर्तन कर दिया जाता हैं।

श्रीबाँकेबिहारी जी के दर्शन सम्बन्ध में अनेकों कहानियाँ प्रचलित हैं। जिनमें से एक तथा दो निम्नलिखित हैं– एक बार एक भक्तिमती ने अपने पति को बहुत अनुनय–विनय के पश्चात वृन्दावन जाने के लिए राजी किया। दोनों वृन्दावन आकर श्रीबाँकेबिहारी जी के दर्शन करने लगे। कुछ दिन श्रीबिहारी जी के दर्शन करने के पश्चात उसके पति ने जब स्वगृह वापस लौटने कि चेष्टा की तो भक्तिमति ने श्रीबिहारी जी दर्शन लाभ से वंचित होना पड़ेगा, ऐसा सोचकर वो रोने लगी। संसार बंधन के लिए स्वगृह जायेंगे, इसलिए वो श्रीबिहारी जी के निकट रोते–रोते प्रार्थना करने लगी कि– 'हे प्रभु में घर जा रही हुँ, किन्तु तुम चिरकाल मेरे ही पास निवास करना, ऐसा प्रार्थना करने के पश्चात वे दोनों रेलवे स्टेशन की ओर घोड़ागाड़ी में बैठकर चल दिये। उस समय श्रीबाँकेविहारी जी एक गोप बालक का रूप धारण कर घोड़ागाड़ी के पीछे आकर उनको साथ लेकर ले जाने के लिये भक्तिमति से प्रार्थना करने लगे। इधर पुजारी ने मंदिर में ठाकुर जी को न देखकर उन्होंने भक्तिमति के प्रेमयुक्त घटना को जान लिया एवं तत्काल वे घोड़ा गाड़ी के पीछे दौड़े। गाड़ी में बालक रूपी श्रीबाँकेबिहारी जी से प्रार्थना करने लगे। दोनों में ऐसा वार्तालाप चलते समय वो बालक उनके मध्य से गायब हो गया। तब पुजारी जी मन्दिर लौटकर पुन श्रीबाँकेबिहारी जी के दर्शन करने लगे।

इधर भक्त तथा भक्तिमति श्रीबाँकेबिहारी जी की स्वयं कृपा जानकर दोनों ने संसार का गमन त्याग कर श्रीबाँकेबिहारी जी के चरणों में अपने जीवन को समर्पित कर दिया। ऐसे ही अनेकों कारण से श्रीबाँकेबिहारी जी के झलक दर्शन अर्थात झाँकी दर्शन होते हैं।

झाँकी का अर्थ-----

श्रीबिहारी जी मन्दिर के सामने के दरवाजे पर एक पर्दा लगा रहता है और वो पर्दा एक दो मिनट के अंतराल पर बन्द एवं खोला जाता हैं और भी किंवदंती हैं।

एक बार एक भक्त देखता रहा कि उसकी भक्ति के वशीभूत होकर श्रीबाँकेबिहारी जी भाग गये। पुजारी जी ने जब मन्दिर की कपाट खोला तो उन्हें श्रीबाँकेबिहारी जी नहीं दिखाई दिये। पता चला कि वे अपने एक भक्त की गवाही देने अलीगढ़ चले गये हैं। तभी से ऐसा नियम बना दिया कि झलक दर्शन में ठाकुर जी का पर्दा खुलता एवं बन्द होता रहेगा। ऐसी ही बहुत सारी कहानियाँ प्रचलित है।

श्री बांके बिहारी प्रतिमा प्राकट्य स्थल------

स्वामी हरिदासजी के द्वारा निधिवन स्थित विशाखा कुण्ड से श्रीबाँकेबिहारी जी प्रकटित हुए थे। इस मन्दिर में कृष्ण के साथ श्रीराधिका विग्रह की स्थापना नहीं हुई। वैशाख मास की अक्षय तृतीया के दिन श्रीबाँकेबिहारी के श्रीचरणों का दर्शन होता है। पहले ये निधिवन में ही विराजमान थे। बाद में वर्तमान मन्दिर में पधारे हैं। यवनों के उपद्रव के समय श्रीबाँकेबिहारी जी गुप्त रूप से वृन्दावन में ही रहे, बाहर नहीं गये। श्रीबाँकेबिहारी जी का झाँकी दर्शन विशेष रूप में होता है। यहाँ झाँकी दर्शन का कारण उनका भक्तवात्सल्य एवं रसिकता है।

एक समय उनके दर्शन के लिए एक भक्त महानुभाव उपस्थित हुए। वे बहुत देर तक एक-टक से इन्हें निहारते रहे। रसिक बाँकेबिहारी जी उन पर रीझ गये और उनके साथ ही उनके गाँव में चले गये। बाद में बिहारी जी के गोस्वामियों को पता लगने पर उनका पीछा किया और बहुत अनुनय-विनय कर ठाकुरजी को लौटा-कर श्रीमन्दिर में पधराया। इसलिए बिहारी जी के झाँकी दर्शन की व्यवस्था की गई ताकि कोई उनसे नजर न लड़ा सके। यहाँ एक विलक्षण बात यह है कि यहाँ मंगल आरती नहीं होती। यहाँ के गोसाईयों का कहना हे कि ठाकुरजी नित्य-रात्रि में रास में थककर भोर में शयन करते हैं। उस समय इन्हें जगाना उचित नहीं है। लोगों की आस्था इतनी है कि गत आश्विन शुक्ल पंचमी को दर्शनार्थ आये भक्तों में से एक जिन्हें आँखों से कुछ नहीं दिखता था,जिज्ञासा बस पूछा बाबा आप देखने में असमर्थ है, फिर भी बिहारी जी के दर्शन हेतु पधारे हैं। उन्होंने उत्तर दिया लाला मुझे नहीं दिखता है,पर बिहारी जी मुझे देख रहे हैं।

Nice Lines

👉 स्वर्ग में सब कुछ हैं,
  लेकिन
     मौत नहीं है।

 👉 गीता में सब कुछ हैं,
   लेकिन
     झूठ नहीं है।

👉 दुनिया में सब कुछ हैं,
   लेकिन
किसी को सुकून नहीं
           और

👉आज के इंसान में सब कुछ है,
 लेकिन
सब्र नहीं है।

👉  राजा भोज ने कवि कालीदास से दस सर्वश्रेष्ठ सवाल किए..

1- दुनियां में भगवान की सर्वश्रेष्ठ रचना क्या है ..?
            उत्तर - ''मां''

2- सर्वश्रेष्ठ फूल कौन सा है .. ?
 उत्तर -
"कपास का फूल"

3- सर्वश्र॓ष्ठ सुगंध कौन सी है ?
 उत्तर - वर्षा से भीगी मिट्टी की सुगंध

4- सर्वश्र॓ष्ठ मिठास कौनसी.. ?
  उत्तर - "वाणी की"

5- सर्वश्रेष्ठ दूध ?
       उत्तर - "मां का"

6 - सबसे से काला क्या है ...?
     उत्तर - "कलंक"

7- सबसे भारी क्या है?
         उत्तर - "पाप"

8- सबसे सस्ता क्या है ?
      उत्तर -  "सलाह"

9 - सबसे महंगा क्या है ?
   उत्तर -  "सहयोग"

10 - सबसे कड़वा क्या है?
       उत्तर - "सत्य"

🎐अगर मेरे पास एक रुपया है,
एवं आपके पास भी एक रुपया है
और हम एक दूसरे से बदल ले तो दोनों के पास एक एक रुपया ही रहेगा ।

         किन्तु

अगर मेरे पास एक  अच्छा विचार है,
 एवं
आपके पास भी एक अच्छा विचार है,
और दोनों आपस में बदल लें
तो दोनों के पास दो दो विचार होंगे !

      है न ……!!

तो अच्छे विचारों का आदान प्रदान जारी रखिये...।
           और
 अपनी मानसिक पूंजी बढ़ाते रहिये।

   🚩☝ मंजिल वही, सोच नई☝🚩

ऊपर जाने पर एक सवाल ये भी पूँछा जायेगा,
कि
अपनी अँगुलियों के नाम बताओ ।
जवाब:-
अपने हाथ की छोटी उँगली से नंबर शुरू करें :-
  (1)जल
     (2) पथ्वी
        (3)आकाश
          (4)वायू
             (5) अग्नि

ये वो बातें हैं जो
बहुत कम लोगों को मालूम होंगी।

पांच जगह हँसना करोड़ों पाप के बराबर है।
  1. श्मशान में
    2. अर्थी के पीछे
      3. शोक में
        4. मन्दिर में
           5. कथा में,

सिर्फ 1 बार भेजो बहुत लोग इन पापों से बचेंगे ।।
अगर👇
👉अकेले हो..?
परमात्मा को याद करो ।

👉परेशान हो?
    ग्रँथ पढ़ो ।

👉उदास हो?
कथाए पढो ।

👉टेन्शन मे हो?
भगवत गीता पढो ।

👉फ्री हो?
अच्छी चीजें फॉरवार्ड करो।
👉हे परमात्मा हम पर और
समस्त प्राणियों पर कृपा करो......।

सूचना👇
👉क्या आप जानते हैं ..?
👇
हिन्दू ग्रंथ
 गीता को सुनने,
पढ़ने से कैन्सर नहीं होता है,
बल्कि कैन्सर अगर हो तो वो भी खत्म हो जाता है।

👉उपवास करने से तेज़ बढ़ता है,
सर दर्द और बाल गिरने से बचाव होता है।
👉आरती----के दौरान ताली बजाने से
दिल मजबूत होता है।
श्रीमद भगवत गीता ।
🙏🏻🙏🏻🙏🏻

सुंदरकांड पाठ के लाभ

सुंदरकांड पाठ के लाभ


(1) सुन्दरकाण्ड का पाठ :~
ऐसी मान्यता है कि हनुमान जी से जुड़ा कोई भी मंत्र या पाठ अन्य किसी भी मंत्र से अधिक शक्तिशाली होता है। हनुमान जी अपने भक्तों को उनकी उपासना के फल में बल और शक्ति प्रदान करते हैं।

(2) सुन्दरकाण्ड के फायदे :~
लेकिन आज हम विशेष रूप से सुंदरकांड पाठ के महत्व और उससे मिलने वाले लाभ पर बात करेंगे। भक्तों द्वारा हनुमान जी को प्रसन्न करने के लिए अमूमन हनुमान चालीसा का पाठ किया जाता है। हनुमान चालीसा बड़े-बूढ़ों से लेकर बच्चों तक को जल्दी याद हो जाता है।

(3) हनुमान चालीसा :~
लेकिन हनुमान चालीसा के अलावा यदि आप सुंदरकांड पाठ के लाभ जान लेंगे तो इसे रोजाना करना पसंद करेंगे। हिन्दू धर्म की प्रसिद्ध मान्यता के अनुसार सुंदरकांड का पाठ करने वाले भक्त की मनोकामना जल्द पूर्ण हो जाती है।

(4) सुंदरकांड अध्याय :~
सुंदरकांड, गोस्वामी तुलसीदास द्वारा लिखी गई रामचरितमानस के सात अध्यायों में से पांचवा अध्याय है। रामचरित मानस के सभी अध्याय भगवान की भक्ति के लिए हैं, लेकिन सुंदरकांड का महत्व अधिक बताया गया है।

(5) सुंदरकांड पाठ का महत्व :~
जहां एक ओर पूर्ण रामचरितमानस में भगवान के गुणों को दर्शाया गया है, उनकी महिमा बताई गई है लेकिन दूसरी ओर रामचरितमानस के सुंदरकांड की कथा सबसे अलग है। इसमें भगवान राम के गुणों की नहीं बल्कि उनके भक्त के गुणों और उसकी विजय की बात बताई गई है।

(6) हनुमान पाठ के लाभ :~
सुंदरकांड का पाठ करने वाले भक्त को हनुमान जी बल प्रदान करते हैं। उसके आसपास भी नकारात्मक शक्ति भटक नहीं सकती, इस तरह की शक्ति प्राप्त करता है वह भक्त। यह भी माना जाता है कि जब भक्त का आत्मविश्वास कम हो जाए या जीवन में कोई काम ना बन रहा हो, तो सुंदरकांड का पाठ करने से सभी काम अपने आप ही बनने लगते हैं।

(7) शास्त्रीय मान्यताएं :~
किंतु केवल शास्त्रीय मान्यताओं ने ही नहीं, विज्ञान ने भी सुंदरकांड के पाठ के महत्व को समझाया है। विभिन्न मनोवैज्ञानिकों की राय में सुंदरकांड का पाठ भक्त के आत्मविश्वास और इच्छाशक्ति को बढ़ाता है।

(8) सुंदराकांड पाठ का अर्थ :~
इस पाठ की एक-एक पंक्ति और उससे जुड़ा अर्थ, भक्त को जीवन में कभी ना हार मानने की सीख प्रदान करता है। मनोवैज्ञानिकों के अनुसार किसी बड़ी परीक्षा में सफल होना हो तो परीक्षा से पहले सुंदरकांड का पाठ अवश्य करना चाहिए।

(9) सुंदराकांड पाठ का महत्व :~
यदि संभव हो तो विद्यार्थियों को सुंदरकांड का पाठ करना चाहिए। यह पाठ उनके भीतर आत्मविश्वास को जगाएगा और उन्हें सफलता के और करीब ले जाएगा।

(10) सफलता के सूत्र :~
आपको शायद मालूम ना हो, लेकिन यदि आप सुंदरकांड के पाठ की पंक्तियों के अर्थ जानेंगे तो आपको यह मालूम होगा कि इसमें जीवन की सफलता के सूत्र भी बताए गए हैं।

(11) सफल जीवन के मंत्र :~
यह सूत्र यदि व्यक्ति अपने जीवन पर अमल कर ले तो उसे सफल होने से कोई नहीं रोक सकता। इसलिए यह राय दी जाती है कि यदि रामचरित्मानस का पूर्ण पाठ कोई ना कर पाए, तो कम से कम सुंदरकांड का पाठ अवश्य कर लेना चाहिए।

(12) इस समय करें सुंदराकांड का पाठ :~
यहां तक कि यह भी कहा जाता है कि जब घर पर रामायण पाठ रखा जाए तो उस पूर्ण पाठ में से सुंदरकांड का पाठ घर के किसी सदस्य को ही करना चाहिए। इससे घर में सकारात्मक शक्तियों का प्रवाह होता है।

(13) ज्योतिष के लाभ :~
ज्योतिष के नजरिये से यदि देखा जाए तो यह पाठ घर के सभी सदस्यों के ऊपर मंडरा रहे अशुभ ग्रहों छुटकारा दिलाता है। यदि स्वयं यह पाठ ना कर सकें, तो कम से कम घर के सभी सदस्यों को यह पाठ सुनना जरूर चाहिए। अशुभ ग्रहों का दोष दूर करने में लाभकारी है सुंदरकांड का पाठ।

(14) आत्मा की शुद्धि :~
सुंदरकांड पाठ करने से आत्मिक लाभ मिलता है। आत्मा शुद्ध होती है। सुंदरकांड का पाठ करने से आत्मा परमात्मा से मिलने के लिए तैयार होती है। मनुष्य इस जीवन रूपी दुनिया में जो करना आया है वही करता है। और सुंदर कांड पाठ करने से आत्मा की शुद्धि होती है।

(15) रोगों को दूर भगाए :~
सुंदरकांड का पाठ एक तीर से कई निशाने लगाने का नाम है। पाठ करने से रोग दूर रहते हैं। इससे आपकी दरिद्रता खत्म होती है।

(16) मानसिक सुख :~
अगर कोई व्यक्ति लगातार सुंदरकांड का पाठ करता है तो उसे अनेक लाभ मिलते हैं। सुंदरकांड पाठ निरंतर करने से मानसिक सुख शांति प्राप्त होती है।

(17) अनहोनी दूर करे :~
अगर आप किसी ऐसी जगह पर रहते हैं जो सूनसान है। और आपको हमेशा किसी अनहोनी का डर रहता है। तो आप सुंदरकांड का पाठ करें। इससे आपके पास आने वाली हर समस्या दूर रहती है।

(18) बच्चे आदर ना करें तो सुंदरकांड का पाठ :~
अगर आपके बच्चे आपकी सुनते नहीं और बड़ों का आदर नहीं करते हैं तो आप अपने बच्चों को सुंदरकांड का पाठ करने के लिए प्रेरित कर सकते हैं। अगर वे अपने संस्कारों को भूल गए हैं तो आप बच्चों को सुंदरकांड का पाठ बच्चों से करवा सकते हैं।

(19) कर्ज से छुटकारा :~
अगर आप पर बहुत सारा कर्ज हो गया है तो आपको सुंदरकांड का पाठ करना चाहिए। सुंदरकांड का पाठ कर्ज से मुक्ति दिलाता है।

(20) मन के भय से मुक्ति :~
अगर आपको रात को डर लगता है और बुरे सपने आते हैं तो आपको सुंदरकांड पाठ करना चाहिए। जिस तरह से हनुमान चालिसा का पाठ करने से मन के भय से मुक्ति मिलती है। ठीक उसी तरह से सुंदरकांड का पाठ करने से मन के भय से मुक्ति मिलती है।

(21) हनुमान की कृपा :~
सुंदरकांड का पाठ करने से हनुमान की कृपा बनी रहती है। सिर्फ हनुमान ही नहीं भगवान राम की भी कृपा बनी रहती है। यदि आप दोनों भगवान की कृपा पाना चाहते हैं तो सुंदरकांड का पाठ करें।

(22) गृह क्लेश से छुटकारा :~
सुंदरकांड का पाठ करने से गृह क्लेश से छुटकारा मिलता है। इसका पाठ करने से सकारात्मक शक्ति घऱ में आती है। जिससे घऱ में पैदा होने वाली नकारात्मक शक्तियों को से छुटकारा मिलता है।

(23) विद्यार्थियों के लिए लाभदायक :~
यदि विद्यार्थी सुंदरकांड का पाठ करते हैं तो उन्हें उनके छात्र जीवन में सफलता मिलती है। उनका पढ़ाई में मन लगता है। और परीक्षा में अंक ठीक आते हैं। इसलिए विद्यार्थियों को सुंदरकांड का पाठ अवश्य करना चाहिए।

(24) घऱ में सकारात्मक शक्तियों का वास :~
ऐसा माना जाता है कि सुंदरकांड का पाठ करने से घर में माहौल सकारात्मक और प्रेम पूर्वक रहता है। यदि सुंदरकांड का पाठ घऱ के ही किसी सदस्य द्वारा किया जाता है तो और भी अधिक फायदेमंद होता है।

(25) अशुभ ग्रहों को दूर करे :~
सुंदरकांड का पाठ करने से अशुभ ग्रहों की स्थिति को शुभ बनाया जा सकता है। इसलिए नियमित सुंदरकांड का पाठ करना चाहिए।

(26) कभी हार ना मानना :~
जीवन में ऐसे कई पड़ाव आता हैं जब हम अपना बल हार जाते हैं। मन दुखी हो जाता है। तो ऐसे में आपको हार नहीं मानना चाहिए। क्योंकि सुंदरकांड का पाठ आपको जीवन में कभी हार ना मानने की शक्ति देता है।

जय श्री राम

सर्व देवता गायत्री मंत्र

सर्व देवता गायत्री मंत्र  


गणेश
ॐ एकदन्ताय विद्महे वक्रतुंडाय धीमहि । तन्नो दन्ती प्रचोदयात् ।

शिव
ॐ तत्पुरुषाय विद्महे महादेवाय धीमहि । तन्नो रुद्रा: प्रचोदयात् ।

गौरी
ॐ सुभगायै - विद्महे काममालिन्यै धीमहि । तन्नो गौरी प्रचोदयात् ।

विष्णु
ॐ नारायणाय - विद्महे वासुदेवाय धीमहि । तन्नो विष्णु प्रचोदयात् ।

तुलसी
ॐ तुलसीपत्रायै विद्महे विष्णुप्रियायै धीमहि । तन्नो वृंदा प्रचोदयात् ।

शंख
ॐ पांचजन्याय विद्महे पावमानाय धीमहि । तन्नो शंख: प्रचोदयात् ।

गरुड
ॐ वैनतेयाय विद्महे स्वर्णपक्षाय धीमहि । तन्नो गरुड: प्रचोदयात् ।

देवी
ॐ देव्यै ब्रम्हाण्यै विद्महे महाशक्तयै च धीमहि । तन्नो देवी प्रचोदयात् ।

लक्ष्मी
ॐ महालक्ष्मीच विद्महे विष्णुपत्नीचधीमहि - धीमहि । तन्नो लक्ष्मी: प्रचोदयात् ।

नृसिंह
ॐ वज्रनखाय विद्महे तीक्ष्णदंष्ट्राय धीमहि । तन्नो नृसिंह: प्रचोदयात् ।

सूर्य
ॐ भास्काराय विद्महे महत्द्युतिकराय धीमहि । तन्नो सूर्य: प्रचोदयात् ।

राम
ॐ दाशरथाय विद्महे सीतावराय धीमहि । तन्नो राम: प्रचोदयात् ।

लक्ष्मण
ॐ दाशरथाय विद्महे उर्मिलेशाय धीमहि । तन्नो लक्ष्मण: प्रचोदयात् ।

हनुमान
ॐ अंजनीजाय विद्महे वायुपुत्राय धीमहि । तन्नो वीर: प्रचोदयात् ।

कृष्ण
ॐ देवकीनंदनाय विद्महे वासुदेवाय धीमहि । तन्नो कृष्ण: प्रचोदयात् ।

गोपाल
ॐ गोपीप्रियया विद्महे वासुदेवाय - धीमहि । तन्नो गोप: प्रचोदयात् ।
दत्त
ॐ दिगम्बराय विद्महे अवधूताय धीमहि । तन्नो दत्त: प्रचोदयात् ।

गुरु
ॐ जलबिंबाय विद्महे नीलपुरुषाय धीमहि । तन्नोऽम्बु प्रचोदयात् ।

अग्नि
ॐ महाज्वालाय विद्महे अग्निमयाय धीमहि । तन्नोऽग्नि: प्रचोदयात् ।

चन्द्र
ॐ क्षीरपुत्राय विद्महे अमृतत्वाय धीमहि । तन्नो्श्चन्द्र: प्रचोदयात् ।

गंगा
ॐ भागीरथ्यैच विद्महे विष्णुपद्यै च - धीमहि । तन्नो गंगा प्रचोदयात् ।

हंस
ॐ परमहंसाय विद्महे धीमहि महत्तत्वाय धीमहि । तन्नो हंस प्रचोदयात् ।

॥ यो देव सवितास्माकं मन: प्राणेन्द्रियक्रिया: । प्रचोदयति तद्भर्ग: वरेण्यं समुपास्महे ॥