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Monday, 2 March 2020

पत्नी "वामांगी" क्यों कहलाती है ?

पत्नी  "वामांगी"  क्यों कहलाती है ?

शास्त्रों में पत्नी को वामांगी कहा गया है , जिसका अर्थ होता है बायें अंग की अधिकारी । इसीलिये  पुरुष के शरीर का बायां हिस्सा स्त्री का माना जाता है । इसका कारण यह है कि भगवान शिव के बायें अंग से स्त्री की उत्पत्ति हुई है जिसका प्रतीक है उनका "अर्धनारीश्वर रूप" । यही कारण है कि हस्तरेखा विज्ञान के अनुसार पुरुष के दायें हाथ से पुरुष की और बायें  हाथ से स्त्री की स्थिति देखने की बात कही गयी है ।

स्त्री पुरुष की वामांगी होती है , अतः सोते समय और सभा में, सिंदूरदान,  आशीर्वाद ग्रहण करते समय और भोजन के समय स्त्री पति के बायीं तरफ रहने से  शुभ फल की प्राप्ति होती है । जो कर्म संसारिक होते हैं उसमें पत्नी पति के बायीं ओर बैठती है क्योंकि यह कर्म स्त्री प्रधान कर्म माने जाते हैं ।

वामांगी होने पर भी शास्त्रोक्त कथन है कि कुछ कार्यों में स्त्री को दायीं तरफ रहना चाहिये , जैसे कन्यादान, विवाह, यज्ञकर्म, जातकर्म, नामकरण और अन्न प्राशन के समय पत्नी को पति के दायीं तरफ बैठना चाहिये क्योंकि यह सभी कार्य  पारलौकिक माने जाते हैं और इन्हें पुरुष प्रधान माना गया है। इसलिए इन कर्मों में पत्नी के दायीं तरफ बैठने के नियम हैं ।

वामांगी के अतिरिक्त पत्नी को पति की अर्द्धांगिनी भी कहा जाता है, जिसका अर्थ है पत्नी, पति के शरीर का आधा अंग होती है ।  दोनों शब्दों का सार एक ही है जिसके अनुसार पत्नी के बिना पति अधूरा है । पत्नी ही पति के जीवन को पूर्ण करती है, उसे खुशहाली प्रदान करती है, उसके परिवार का ख्याल रखती है, और उसे सभी सुख प्रदान करती है ।

"सा भार्या या गृहे दक्षा सा भार्या या प्रियंवदा ।
सा भार्या या पतिप्राणा सा भार्या या पतिव्रता" ।।

अनजान गोपी

अनजान गोपी

वृन्दावन में आज महारास की रात्रि ‘शरद पूर्णिमा’ है… सारी गोपियाँ अलग अलग वेश में कान्हा जी को रिझाने के लिए निधिवन में इकट्ठी हुई हैं…

ललिता ने हज़ारों कमल-पुष्पों से स्वयं को ऊपर से नीचे तक सजा रखा है…ताकि वे कृष्णा के हाथ के कमल से ज्यादा सुन्दर दिख सकें…..

विशाखा ने स्वयं को एक मुरली की तरह सजा लिया है… ताकि कान्हा की बंसी को मात दे सकें…

एक गोपी ने खुद को सुदर्शन चक्र, एक ने गदा और एक ने खुद को शंख बना रखा है…

सभी गोपियाँ एक घेरा बनाकर कृष्णा के इंतज़ार में कड़ी हैं….सिवाय घेरे के बीच में खड़ी दो गोपियों के….

ललिता ने चुपके से विशाखा के कान में कहा… “हे सखी!!!… घेरे के बीच में खड़ी इन दो सुंदरियों को देखो…तो…एक तो हमारी राधारानी हैं… जिन्होंने खुद को कृष्ण के रूप में सजा रखा है…परन्तु ये दूसरी गोपी कौन है???…क्या तुम इसे जानती हो???”

“ना री सखी..!!! इसे तो ब्रज मे पहली बार ही देखूं…. पतों नये कौन है…लेकिन चाल-ढाल में तो हमारी राधे को टक्कर देवे है…परन्तु वाको घूघट ही इत्तो लंबो है… की सूरत देखवे में ना आवे…” विशाखा ने तिरछी नज़रों से अनजान गोपी को देखते हुए कहा…

तभी अचानक मुरली-मनोहर वहां प्रगट हो गए… और सारी गोपियाँ उनके साथ पहले नृत्य करने की स्पर्धा में लग गयीं….

परन्तु कान्हा जी ने ललिता, विशाखा समेत सभी गोपियों को अनदेखा कर दिया…

“ये ज़ालिम तो अपनी राधे के पास ही जाएगा… इसे हमारी क्या परवाह???” ललिता और विशाखा ने मुह चिड़ाते हुए कहा…

लेकिन वे सभी बहुत ही आश्चर्य में पड़ गयीं… जब उन्होंने देखा…. की कान्हा जी अपनी राधे को भी अनदेखा करते हुए….सबसे पहले उस अनजान गोपी के पास जाकर नृत्य करने लगे….

अब सारी सीमाएं पार हो चुकीं थीं…. राधे ने धैर्य खो दिया… और जल्दी से झपट कर उस अनजान गोपी का घूंघट खीच दिया…

सभी गोपियाँ एकदम चुप्प रह गयीं….जब उन्होंने पहले उस गोपी के लम्बे लम्बे बाल देखे… फिर एक त्रिशूल देखा….फिर एक डमरू देखा….और आखिर में गोपी के गले में लिपटा हुआ सांप देखा…

गोपी के रूप में महारास में आये महादेव को देखकर सभी गोपियाँ उनके चरणों में जा लिपटी…

“भगवान् शिव…सिर्फ इसी शर्त पर समुद्र –मंथन के समय विष पान को तैयार हुए थे…की मेरी हर महारास का आरम्भ इनके साथ मेरे नृत्य से ही होगा…..” कृष्ण जी ने रहस्य से पर्दा उठाया…
“बोलो गोपेश्वर महादेव की..जय!!!!!!!!” वे सभी एक स्वर में बोल उठे

प्रेम के वशआते है प्रभु

प्रेम के वशआते है प्रभु

वृन्दावन में बिहारी जी की अनन्य भक्त थी । नाम था कांता बाई...

बिहारी जी को अपना लाला कहा करती थी उन्हें लाड दुलार से रखा करती और दिन रात उनकी सेवा में लीन रहती थी। क्या मजाल कि उनके लल्ला को जरा भी तकलीफ हो जाए।

एक दिन की बात है कांता बाई अपने लल्ला को विश्राम करवा कर खुद भी तनिक देर विश्राम करने लगी तभी उसे जोर से हिचकिया आने लगी...

और वो इतनी बेचैन हो गयी कि उसे कुछ भी नहीं सूझ रहा था। तभी कांता बाई कि पुत्री उसके घर पे आई, जिसका विवाह पास ही के गाँव में किया हुआ था तब कांता बाई की हिचकियां रुक गयी।

अच्छा महसूस करने लग गयी तो उसने अपनी पुत्री को सारा वृत्तांत सुनाया कि कैसे वो हिचकियो में बेचैन हो गयी।

तब पुत्री ने कहा कि माँ मैं तुम्हे सच्चे मन से याद कर रही थी उसी के कारण तुम्हे हिचकियां आ रही थीं और अब जब मैं आ गयी हूँ तो तुम्हारी हिचकिया भी बंद हो चुकी हैं।

कांता बाई हैरान रह गयी कि ऐसा भी भला होता है ? तब पुत्री ने कहा हाँ माँ ऐसा ही होता है, जब भी हम किसी अपने को मन से याद करते है तो हमारे अपने को हिचकियां आने लगती हैं।

तब कांता बाई ने सोचा कि मैं तो अपने ठाकुर को हर पल याद करती रहती हूँ यानी मेरे लल्ला को भी हिचकियां आती होंगी ??

हाय मेरा छोटा सा लल्ला हिचकियों में कितना बेचैन हो जाता होगा.! नहीं ऐसा नहीं होगा अब से मैं अपने लल्ला को जरा भी परेशान नहीं होने दूंगी और... उसी दिन से कांता बाई ने ठाकुर को याद करना छोड़ दिया।

अपने लल्ला को भी अपनी पुत्री को ही दे दिया सेवा करने के लिए। लेकिन कांता बाई ने एक पल के लिए भी अपने लल्ला को याद नहीं किया.। और ऐसा करते-करते हफ्ते बीत गए और फिर एक दिन...

जब कांता बाई सो रही थी तो साक्षात बांके बिहारी कांता बाई के सपने में आते है और कांता बाई के पैर पकड़ कर ख़ुशी के आंसू रोने लगते हैं.? कांता बाई फौरन जाग जाती है और उठ कर प्रणाम करते हुए रोने लगती है और कहती है कि...

प्रभु आप तो उन को भी नहीं मिल पाते जो समाधि लगाकर निरंतर आपका ध्यान करते रहते हैं। फिर मैं पापिन जिसने आपको याद भी करना छोड़ दिया है आप उसे दर्शन देने कैसे आ गए ??

तब बिहारी जी ने मुस्कुरा कर कहा- माँ, कोई भी मुझे याद करता है तो या तो उसके पीछे किसी वस्तु का स्वार्थ होता है। या फिर कोई साधू ही जब मुझे याद करता है तो उसके पीछे भी उसका मुक्ति पाने का स्वार्थ छिपा होता है।

लेकिन धन्य हो माँ तुम ऐसी पहली भक्त हो जिसने ये सोचकर मुझे याद करना छोड़ दिया कि कहीं मुझे हिचकियां आती होंगी। मेरी इतनी परवाह करने वाली माँ मैंने पहली बार देखी है।

तभी कांता बाई अपने मिटटी के शरीर को छोड़ कर अपने लल्ला में ही लीन हो जाती हैं।

इसलिए बंधुओ वो ठाकुर तुम्हारी भक्ति और चढ़ावे के भी भूखे नहीं हैं, वो तो केवल तुम्हारे प्रेम के भूखे है उनसे प्रेम करना सीखो
🌹💗राधे राधे💗🌹

🌹🌼जय श्री हरि🌼🌹

चलो आज सब राधा रानी की अष्ट सखियो के बारे मे जानते है

चलो आज सब राधा रानी की अष्ट सखियो के बारे मे जानते है

1. ललिता सखी-ये सखी सबसे चतुर और पिय सखी है। राधा रानी को तरह-तरह के खेल खिलाती है। कभी-कभी नौका-विहार,वन-विहार कराती है। ये सखी ठाकुर जी को हर समय बीडा (पान) देती रहती है। ये ऊँचे गाव मे रहती है।

2. विशाखा सखी-ये गौरांगी रंग की है।ठाकुर जी को सुदंर-सुदंर चुटकुले सुनाकर हँसाती है। ये सखी सुगन्धित दव्यो से बने चन्दन का लेप करती है। इनका गाँव कमईं है

3. चम्पकलता सखी-ये सखी ठाकुर जी को अत्यन्त पेम करती है। ये करहला गाव मे रहती है।इनका अंग वण पुष्प-छटा की तरह है।ये ठाकुर जी की रसोई सेवा करती है।

4. चित्रा सखी-ये सखी राधा रानी की अति मन भावँती सखी है। ये बरसाने मे चिकसौली गाव मे रहती है। जब ठाकुर जी 4 बजे सोकर उठते है तब यह सखी फल, शबत, मेवा लेकर खड़ी रहती है।

5. तुगंविधा सखी-ये सखी चदंन की लकड़ी के साथ कपूर हो ऐसे महकती है।ये युगलवर के दरबार मे नृत्य ,गायन करती है।ये वीणा बजाने मे चतुर है ये गौरा माँ पार्वती का अवतार है। इनका गाँव ढभाला है

6. इन्दुलेखा सखी-ये सखी अत्यन्त सुझबुझ वाली है। ये सुनहरा गाव मे रहती है।ये किसी कि भी हस्तरेखा को देखकर बता सकती है कि उसका क्या भविष्य है। ये पेम कहानियाँ सुनाती है। इनकी गाँव आँजनौक( अंजनवन) है

7. रगंदेवी सखी-ये बड़ी कोमल व सुदंर है।ये राधा रानी के नैनो मे काजल लगाती है और शिंगार करती है। इनका गाँव रॉकौंली

8. सुदेवी सखी-ये सबसे छोटी सखी है। बड़ी चतुर और पिय सखी है। ये सुनहरा गाव मे रहती है। ये ठाकुर जी को पानी पिलाने की सेवा करती है।

इस प्रकार लाड़ली लाल के बरसाना धाम के चारौं ओर गोलाकार मण्डल में इन सखियों के गाँव विराज मान है.
और बिल्कुल मध्य में बरसाना लाड़ली महल है.. जब भी किसी सखी की आवश्यकता पड़ती है उसे शिखर से आवाज लगाकर बुला लिया जाता है!
बरसाना तो साक्षात प्रेम (सुख) का सागर है!

🚩जय श्रीराधे कृष्णा🚩

कुल सौ प्रश्न किए थे यक्ष ने युधिष्ठिर से, लेकिन क्या आप इन प्रश्नों के जवाब जानते हैं?

कुल सौ प्रश्न किए थे यक्ष ने युधिष्ठिर से, लेकिन क्या आप इन प्रश्नों के जवाब जानते हैं?


यह तब की बात है जब पाण्डव अपने तेरह वर्ष के अज्ञातवास पर थे, और इस दौरान वे घने जंगलों में वास कर रहे थे। सभी भाई पेड़ की छाया में बैठकर विश्राम कर रहे थे कि अचानक हैरान और परेशान एक मुनि उनके पास पहुंचे। उन्होंने बताया कि एक हिरण उनके हाथों से यज्ञ की लकड़ी लेकर भाग गया, उन्हें वह वापस चाहिए।


पांचों भाइयों ने मुनि की सहायता करने हेतु उस हिरण की खोज आरंभ कर दी। खोज करते हुए वे सभी काफी आगे निकल गए, गर्मी का समय था तो वे काफी थक भी गए। अब उन्हें इस तपती गर्मी में अपनी प्यास बुझाने के लिए पानी चाहिए था, लेकिन दूर-दूर तक उन्हें कोई जलाशय ना दिखा।


अंतत: पानी खोजने का काम सबसे छोटे भाई सहदेव को सौंपा गया। कुछ दूर चलने पर सहदेव को एक जलाशय दिखाई दिया। वह वहां पहुंचा और उसने देखा कि जलाशय में बेहद ठंडा पानी है, पानी साथ ले जाने की बजाय सबसे पहले अपनी प्यास बुझाने के लिए सहदेव पानी पीने के लिए जैसे ही आगे बढ़ा तो एक आवाज़ सुनाई दी।


यह आवाज़ अदृश्य यक्ष की थी जो चाहता था कि सहदेव पहले उसके प्रश्नों का उत्तर दे और फिर पानी पीये। लेकिन सहदेव ने यक्ष की एक ना सुनी और जैसे ही पानी अपने होठों से लगाया वह चक्कर खाकर गिर गया। यक्ष ने उसे मूर्छित कर दिया....


जब काफी देर तक सहदेव ना लौटा तो अन्य भाईयों को चिंता होने लगी। फिर एक-एक करके क्रमानुसार नकुल, अर्जुन और भीम सभी उस जलाशय पर पहुंचे और यक्ष की चेतावनी सुने बिना पानी पी लिया और बदले में यक्ष ने उन्हें मूर्छित कर दिया।


अब बचे थे युधिष्ठिर... सभी भाई कब से निकले थे लेकिन वापस ना लौटे। अब आखिरकार युधिष्ठिर ने सबको खोजने का फैसला किया और निकल पड़े। जब वे जलाशय के पास पहुंचे तो उन्होंने देखा कि उनके चारो भाई जमीन पर गिरे हुए हैं, लेकिन क्यों, इस बात से अनजान थे युधिष्ठिर।


उन्होंने अपने सामने शीतल जल का जलाशय देखा, और कुछ भी अन्य करने से पहले अपनी प्यास बुझाने के लिए जैसे ही आगे बढ़े तो उन्हें एक आवाज़ सुनाई दी। यक्ष ने उन्हें चेतावनी दी कि वे पहले उसके प्रश्नों का उत्तर दें, तभी वह उन्हें पानी पीने देगा।


कुछ धैर्य दिखाते हुए युधिष्ठिर मान गए और कहा कि पूछो तुम्हें क्या पूछना है। युधिष्ठिर के आग्रह पर यक्ष ने उनसे कुल सौ सवाल पूछे लेकिन यहां हम आपके सामने कुछ गिने-चुने सवाल रखने जा रहे हैं। साथ ही जानिए इन सवालों पर युधिष्ठिर का क्या जवाब था....


यक्ष ने अपना पहला सवाल किया... उसने युधिष्ठिर से पूछा कि कौन हूं मैं?


 जिस पर जवाब आया कि ‘तुम न शरीर हो, न इन्द्रियां, न मन, न बुद्धि। तुम शुद्ध चेतना हो, वह चेतना जो सर्वसाक्षी है।


अगला प्रश्न... यक्ष - जीवन का उद्देश्य क्या है?

 युधिष्ठिर - जीवन का उद्देश्य उसी चेतना को जानना है जो जन्म और मरण के बन्धन से मुक्त है। उसे जानना ही मोक्ष है।

यक्ष - जन्म का कारण क्या है?

 युधिष्ठिर - अतृप्त वासनाएं, कामनाएं और कर्मफल ये ही जन्म का कारण हैं। फिर अगला प्रश्न... यक्ष - जन्म और मरण के बन्धन से मुक्त कौन है? युधिष्ठिर - जिसने स्वयं को, उस आत्मा को जान लिया वह जन्म और मरण के बन्धन से मुक्त है।

इन सवालों के बाद भी यक्ष नहीं रुके, वे एक के बाद एक सवाल करते रहे, तब तक जब तक आगे से कोई जवाब ना आए। उनका अगला सवाल था कि वासना और जन्म का सम्बन्ध क्या है?

जिस पर जवाब आया कि ‘जैसी वासनाएं वैसा ही जन्म होता है। यदि वासनाएं पशु जैसी तो पशु योनि में जन्म। यदि वासनाएं मनुष्य जैसी तो मनुष्य योनि में जन्म’।

यक्ष – संसार में दुःख क्यों है?

 युधिष्ठिर – लालच, स्वार्थ, भय संसार के दुःख का कारण हैं।

 यक्ष – तो फिर ईश्वर ने दुःख की रचना क्यों की?

युधिष्ठिर – ईश्वर ने संसार की रचना की और मनुष्य ने अपने विचार और कर्मों से दुःख और सुख की रचना की।

यक्ष – क्या ईश्वर है? कौन है वह? क्या रूप है उसका? क्या वह स्त्री है या पुरुष?

युधिष्ठिर – हे यक्ष! कारण के बिना कार्य नहीं। यह संसार उस कारण के अस्तित्व का प्रमाण है। तुम हो इसलिए वह भी है उस महान कारण को ही अध्यात्म में ईश्वर कहा गया है। वह न स्त्री है न पुरुष।

यक्ष – उसका स्वरूप क्या है?

युधिष्ठिर – वह सत्-चित्-आनन्द है, वह अनाकार ही सभी रूपों में अपने आप को स्वयं को व्यक्त करता है।

 यक्ष – वह अनाकार स्वयं करता क्या है?

 युधिष्ठिर – वह ईश्वर संसार की रचना, पालन और संहार करता है।ईश्वर की रचना किसने की?

यक्ष – यदि ईश्वर ने संसार की रचना की तो फिर ईश्वर की रचना किसने की?

 युधिष्ठिर – वह अजन्मा अमृत और अकारण है।

यक्ष – भाग्य क्या है?

 युधिष्ठिर – हर क्रिया, हर कार्य का एक परिणाम है। परिणाम अच्छा भी हो सकता है, बुरा भी हो सकता है। यह परिणाम ही भाग्य है। आज का प्रयत्न कल का भाग्य है।

यक्ष – सुख और शान्ति का रहस्य क्या है?

 युधिष्ठिर – सत्य, सदाचार, प्रेम और क्षमा सुख का कारण हैं। असत्य, अनाचार, घृणा और क्रोध का त्याग शान्ति का मार्ग है।

यक्ष – चित्त पर नियंत्रण कैसे संभव है?

 युधिष्ठिर – इच्छाएं, कामनाएं चित्त में उद्वेग उत्पन्न करती हैं। इच्छाओं पर विजय चित्त पर विजय है।

यक्ष – सच्चा प्रेम क्या है?

 युधिष्ठिर – स्वयं को सभी में देखना सच्चा प्रेम है। स्वयं को सर्वव्याप्त देखना सच्चा प्रेम है। स्वयं को सभी के साथ एक देखना सच्चा प्रेम है।

यक्ष – तो फिर मनुष्य सभी से प्रेम क्यों नहीं करता?

युधिष्ठिर – जो स्वयं को सभी में नहीं देख सकता वह सभी से प्रेम नहीं कर सकता।

 यक्ष – आसक्ति क्या है?

युधिष्ठिर – प्रेम में मांग, अपेक्षा, अधिकार आसक्ति है।

यक्ष – बुद्धिमान कौन है?

युधिष्ठिर – जिसके पास विवेक है।

यक्ष – नशा क्या है?

युधिष्ठिर – आसक्ति।

 यक्ष – चोर कौन है?

युधिष्ठिर – इन्द्रियों के आकर्षण, जो इन्द्रियों को हर लेते हैं चोर हैं।

यक्ष – जागते हुए भी कौन सोया हुआ है?

 युधिष्ठिर – जो आत्मा को नहीं जानता वह जागते हुए भी सोया है।

यक्ष – कमल के पत्ते में पड़े जल की तरह अस्थायी क्या है?

युधिष्ठिर – यौवन, धन और जीवन।

यक्ष – नरक क्या है?

 युधिष्ठिर – इन्द्रियों की दासता नरक है।

यक्ष – मुक्ति क्या है?

युधिष्ठिर – अनासक्ति ही मुक्ति है।

 यक्ष – दुर्भाग्य का कारण क्या है?

युधिष्ठिर – मद और अहंकार।

यक्ष – सौभाग्य का कारण क्या है?

युधिष्ठिर – सत्संग और सबके प्रति मैत्री भाव।

 यक्ष – सारे दुःखों का नाश कौन कर सकता है?

युधिष्ठिर – जो सब छोड़ने को तैयार हो।

यक्ष – मृत्यु के समान यातना कौन देता है?

 युधिष्ठिर – गुप्त रूप से किया गया अपराध।

 यक्ष – दिन-रात किस बात का विचार करना चाहिए?

 युधिष्ठिर – सांसारिक सुखों की क्षण-भंगुरता का।

यक्ष – संसार को कौन जीतता है?

युधिष्ठिर – जिसमें सत्य और श्रद्धा है।

यक्ष – भय से मुक्ति कैसे संभव है?

युधिष्ठिर – वैराग्य से।

यक्ष – मुक्त कौन है?

युधिष्ठिर – जो अज्ञान से परे है।

यक्ष – अज्ञान क्या है?

 युधिष्ठिर – आत्मज्ञान का अभाव अज्ञान है।

 यक्ष – दुःखों से मुक्त कौन है?

 युधिष्ठिर – जो कभी क्रोध नहीं करता।

 यक्ष – वह क्या है जो अस्तित्व में है और नहीं भी?

 युधिष्ठिर – माया।

यक्ष – माया क्या है?

युधिष्ठिर – नाम और रूपधारी नाशवान जगत।

 यक्ष – परम सत्य क्या है?

युधिष्ठिर – ब्रह्म।…!

फिर वापस जाग गए सभी भाई

युधिष्ठिर द्वारा जैसे ही सभी प्रश्नों का उत्तर दे दिया गया तब यक्ष ने उन्हें कहा कि वह उनके सभी भाईयों को जीवित कर देगा। और यह कहते हुए अन्य चार पांडव वापस जीवित हो गए।

जीवन की सात मर्यादाओं का भंग न करो

जीवन की सात मर्यादाओं का भंग न करो

क्रान्तदर्शी विद्वानों ने व्यक्ति को पाप से बचाने के लिए सात मर्यादाओं का निर्माण किया है उन मर्यादाओं का उल्लंघन किसी को कभी भूलकर भी नहीं करना चाहिए यथा―

(1) स्तेय - चोरी न करना, मालिक की दृष्टि बचाकर उसकी वस्तु का अपने लिये उपयोग करना यह साधारण चोरी है। उसकी उपस्थिति में बलपूर्वक छीन लेना 'लूट' कहाता है, जो व्यापारी पूरे पैसे लेकर कम तोलता है, कम नापता है, बढ़िया पैसे माल के लेकर घटिया देता है, वस्तुओं में मिलावट करके बेचता है, पूरा वेतन लेकर कम काम करता है, जो अधिकारी या नौकर घूंस (रिश्वत) लेता है, जो आवश्यकता से अधिक संग्रह करता है वह चोर, डाकू, लुटेरा है। सब प्रकार की चोरी, डाका, लूट से बचना ही अस्तेय है। अर्थात् प्रत्येक प्रकार की शारीरिक , मानसिक चोरी का त्याग अस्तेय है।

(2). तल्पारोहण त्याग -  किसी भी पराई स्त्री से भोग करना तल्पारोहण कहलाता है। परस्त्री सम्पर्क का दोष दर्शाते हुए नीतिकारों ने कहा है:―
बधो बन्धो धनभ्रंशस्तापः शोक कुलक्षयः ।
आयासः कलहो मृत्युर्लभ्यन्ते पर दारकै ।।

भावार्थ - पराई स्त्री से सहवास करने वालों को कतल होना, कैद में पड़ना, धन का नाश, सन्ताप प्राप्ति, शोकाकुलता, कुल का नाश, थकान का आना, कलह और मृत्यु से दो चार होना पड़ता है।अतः इससे बचना बहुत आवश्यक है।_

(3). भ्रूण हत्या का त्याग - अर्थात् गर्भपात से बचना अथवा अण्डे, माँस, आदि का न खाना, किसी कवि का वचन है

पेट भर सकती हैं तेरा जब सिर्फ दो रोटियाँ ।
किस लिये फिर ढूंढता है बे-जुबां की बोटियां ।
गर हिरस है तो हिरस का पेट भर सकता नहीं ।
दुनिया का सब कुछ मिले तो तृप्त कर सकता नहीं।

(4). मादक वस्तुओं का त्याग - सुरापान, भंग, चरस, अफीम,तम्बाकू, बीड़ी,सिगरेट आदि बुद्धिनाशक वस्तुओं का त्याग, नशीली वस्तुओं का प्रयोग बड़ा हानिकारक है। क्योंकि नशीले पदार्थों के सेवन से बुद्धि विकृत होकर चित्त में भ्रान्ति हो जाती है, चित्त के भ्रान्त होने पर मनुष्य पाप करता है, पाप करके दुर्गति को प्राप्त होता है।

(5). दुष्कृत कर्मों का त्याग - बुरे कर्मों की बार-बार जीवन में आवृत्ति नहीं करनी चाहिए, बुरे कर्मों से सदा बचना चाहिए,
भलाई कर चलो जग में तुम्हारा भी भला होगा ।तुम्हारे कर्म का लेखा किसी दिन बरमला होगा ।

(6). ब्रह्महत्या से बचना - अर्थात् भक्ति का त्याग न करना, भक्ति तीन प्रकार की होती है―जाति भक्ति, देश भक्ति,प्रभु भक्ति अथवा किसी ईश्वरभक्त, वेदपाठी सदाचारी विद्वान् की हत्या न करना या उसे किसी प्रकार से कष्ट न पहुँचाना।

(7). पाप करके उसे न छिपाना - पाप छिपाने से बढ़ता और प्रकट करने से घटता है। इसलिये बुद्धिमान को पाप करके छिपाना नहीं चाहिए।

जो उपरोक्त मर्यादाओं का पालन करता है वही श्रेष्ठ पुरुष है। उस पर पाप का कभी भी आक्रमण नहीं होता, वह सदा सुख की और अग्रसर होता है। वेद का सन्देश इस प्रकार है–

भावार्थ -  क्रान्तदर्शी विद्वानों ने सात मर्यादाएं बनाई हैं उनमें से एक को भी जो तोड़ता है वह पापी है। निश्चय से दीर्घायु की इच्छा वाले जितेन्द्रिय उत्पादक ईश्वर के आश्रय में रहते हुए और कुमार्गों का त्याग करके उत्तम लोकों को प्राप्त करते हैं उत्तम गति पाते हैं।

रहस्यमई “चूडामणि” का अदभुत रहस्य “

रहस्यमई “चूडामणि” का अदभुत रहस्य “ 

आज हम रामायण में वर्णित चूडामणि की कथा बता रहे है। इस कथा में आप जानेंगे की-

1. कहाँ से आई चूडा मणि ?
2. किसने दी सीता जी को चूडामणि ?
3. क्यों दिया लंका में हनुमानजी को सीता जी ने चूडामणि ?
4. कैसे हुआ वैष्णो माता का जन्म?

चूडामणि कहाँ से आई?

सागर मंथन से चौदह रत्न निकले, उसी समय सागर से दो देवियों का जन्म हुआ –
1.  रत्नाकर नन्दिनी.   2.  महालक्ष्मी

रत्नाकर नन्दिनी ने अपना तन मन श्री हरि ( विष्णु जी ) को देखते ही समर्पित कर दिया ! जब उनसे मिलने के लिए आगे बढीं तो सागर ने अपनी पुत्री को विश्वकर्मा द्वारा निर्मित दिव्य रत्न जटित चूडा मणि प्रदान की ( जो सुर पूजित मणि से बनी) थी।

इतने में महालक्षमी का प्रादुर्भाव हो गया और लक्षमी जी ने विष्णु जी को देखा और मनही मन वरण कर लिया यह देखकर रत्नाकर नन्दिनी मन ही मन अकुलाकर रह गईं सब के मन की बात जानने वाले श्रीहरि रत्नाकर नन्दिनी के पास पहुँचे और धीरे से बोले ,मैं तुम्हारा भाव जानता हूँ, पृथ्वी को भार- निवृत करने के लिए जब – जब मैं अवतार ग्रहण करूँगा , तब-तब तुम मेरी संहारिणी शक्ति के रूपमे धरती पे अवतार लोगी , सम्पूर्ण रूप से तुम्हे कलियुग मे श्री कल्कि रूप में अंगीकार करूँगा अभी सतयुग है तुम त्रेता , द्वापर में, त्रिकूट शिखरपर, वैष्णवी नाम से अपने अर्चकों की मनोकामना की पूर्ति करती हुई तपस्या करो।

तपस्या के लिए बिदा होते हुए रत्नाकर नन्दिनी ने अपने केश पास से चूडामणि निकाल कर निशानी के तौर पर श्री विष्णु जी को दे दिया वहीं पर साथ में इन्द्र देव खडे थे , इन्द्र चूडा मणि पाने के लिए लालायित हो गये, विष्णु जी ने वो चूडा मणि इन्द्र देव को दे दिया , इन्द्र देव ने उसे इन्द्राणी के जूडे में स्थापित कर दिया।

शम्बरासुर नाम का एक असुर हुआ जिसने स्वर्ग पर चढाई कर दी इन्द्र और सारे देवता युद्ध में उससे हार के छुप गये कुछ दिन बाद इन्द्र देव अयोध्या राजा दशरथ के पास पहुँचे सहायता पाने के लिए इन्द्र की ओर से राजा दशरथ कैकेई के साथ शम्बरासुर से युद्ध करने के लिए स्वर्ग आये और युद्ध में शम्बरासुर दशरथ के हाथों मारा गया।

युद्ध जीतने की खुशी में इन्द्र देव तथा इन्द्राणी ने दशरथ तथा कैकेई का भव्य स्वागत किया और उपहार भेंट किये। इन्द्र देव ने दशरथ जी को ” स्वर्ग गंगा मन्दाकिनी के दिव्य हंसों के चार पंख प्रदान किये। इन्द्राणी ने कैकेई को वही दिव्य चूडामणि भेंट की और वरदान दिया जिस नारी के केशपास में ये चूडामणि रहेगी उसका सौभाग्य अक्षत–अक्षय तथा अखन्ड रहेगा , और जिस राज्य में वो नारी रहे गी उस राज्य को कोई भी शत्रु पराजित नही कर पायेगा।

उपहार प्राप्त कर राजा दशरथ और कैकेई अयोध्या वापस आ गये। रानी सुमित्रा के अदभुत प्रेम को देख कर कैकेई ने वह चूडामणि सुमित्रा को भेंट कर दिया। इस चूडामणि की समानता विश्वभर के किसी भी आभूषण से नही हो सकती।

जब श्री राम जी का व्याह माता सीता के साथ सम्पन्न हुआ । सीता जी को व्याह कर श्री राम जी अयोध्या धाम आये सारे रीति- रिवाज सम्पन्न हुए। तीनों माताओं ने मुह दिखाई की प्रथा निभाई।

सर्व प्रथम रानी सुमित्रा ने मुँहदिखाई में सीता जी को वही चूडामणि प्रदान कर दी। कैकेई ने सीता जी को मुँह दिखाई में कनक भवन प्रदान किया। अंत में कौशिल्या जी ने सीता जी को मुँह दिखाई में प्रभु श्री राम जी का हाथ सीता जी के हाथ में सौंप दिया। संसार में इससे बडी मुँह दिखाई और क्या होगी। जनक जीने सीता जी का हाथ राम को सौंपा और कौशिल्या जीने राम का हाथ सीता जी को सौंप दिया।

राम की महिमा राम ही जाने हम जैसे तुक्ष दीन हीन अग्यानी व्यक्ति कौशिल्या की सीता राम के प्रति ममता का बखान नही कर सकते।

सीताहरण के पश्चात माता का पता लगाने के लिए जब हनुमान जी लंका पहुँचते हैं हनुमान जी की भेंट अशोक वाटिका में सीता जी से होती है। हनुमान जी ने प्रभु की दी हुई मुद्रिका सीतामाता को देते हैं और कहते हैं –

मातु मोहि दीजे कछु चीन्हा
जैसे रघुनायक मोहि दीन्हा

चूडामणि उतारि तब दयऊ
हरष समेत पवन सुत लयऊ

सीता जी ने वही चूडा मणि उतार कर हनुमान जी को दे दिया , यह सोंच कर यदि मेरे साथ ये चूडामणि रहेगी तो रावण का बिनाश होना सम्भव नही है। हनुमान जी लंका से वापस आकर वो चूडामणि भगवान श्री राम को दे कर माताजी के वियोग का हाल बताया।

पौराणिक आठ दिव्य बालक

पौराणिक आठ दिव्य बालक

हमारे धर्म ग्रंथों में ऐसे अनेक बच्चों के बारे में बताया गया है जिन्होंने कम उम्र में ही कुछ ऐसे काम किए, जिन्हें करना किसी के बस में नहीं था। लेकिन अपनी ईमानदारी, निष्ठा व समर्पण के बल पर उन्होंने मुश्किल काम भी बहुत आसानी से कर दिए। आज हम आपको 8 ऐसे ही बच्चों के बारे में बता रहे हैं-

1. बालक ध्रुव

बालक ध्रुव की कथा का वर्णन श्रीमद्भागवत में मिलता है। उसके अनुसार ध्रुव के पिता का नाम उत्तानपाद था। उनकी दो पत्नियां थीं, सुनीति और सुरुचि। ध्रुव सुनीति का पुत्र था। एक बार सुरुचि ने बालक ध्रुव को यह कहकर राजा उत्तानपाद की गोद से उतार दिया कि मेरे गर्भ से पैदा होने वाला ही गोद और सिंहासन का अधिकारी है। बालक ध्रुव रोते हुए अपनी मां सुनीति के पास पहुंचा। मां ने उसे भगवान की भक्ति के माध्यम से ही लोक-परलोक के सुख पाने का रास्ता सूझाया।

माता की बात सुनकर ध्रुव ने घर छोड़ दिया और वन में पहुंच गया। यहां देवर्षि नारद की कृपा से ऊं नमो भगवते वासुदेवाय मंत्र की दीक्षा ली। यमुना नदी के किनारे मधुवन में बालक ध्रुव ने इस महामंत्र को बोल घोर तप किया। इतने छोटे बालक की तपस्या से खुश होकर भगवान विष्णु प्रकट हुए। भगवान विष्णु ने बालक ध्रुव को ध्रुवलोक प्रदान किया। आकाश में दिखाई देने वाला ध्रुव तारा बालक ध्रुव का ही प्रतीक है।

2. गुरुभक्त आरुणि

महाभारत के अनुसार आयोदधौम्य नाम के एक ऋषि थे। उनके एक शिष्य का नाम आरुणि था। वह पांचालदेश का रहने वाला था। आरुणि अपने गुरु की हर आज्ञा का पालन करता था। एक दिन गुरुजी ने उसे खेत की मेढ़ बांधने के लिए भेजा। गुरु की आज्ञा से आरुणि खेत पर गया और मेढ़ बांधने का प्रयास करने लगा। काफी प्रयत्न करने के बाद भी जब वह खेत की मेढ़ नहीं बांध पाया तो मेढ़ के स्थान पर वह स्वयं लेट गया ताकि पानी खेत के अंदर न आ सके।

जब बहुत देर तक आरुणि आश्रम नहीं लौटा तो उसके गुरु अपने अन्य शिष्यों के साथ उसे ढूंढते हुए खेत तक आ गए। यहां आकर उन्होंने आरुणि को आवाज लगाई। गुरु की आवाज सुनकर आरुणि उठकर खड़ा हो गया। जब उसने पूरी बात अपने गुरु को बताई तो आरुणि की गुरुभक्ति देखकर गुरु आयोदधौम्य बहुत प्रसन्न हुए और उसे सारे वेद और धर्मशास्त्रों का ज्ञान हो जाने का आशीर्वाद दिया।

3. परमज्ञानी अष्टावक्र

प्राचीन काल में कहोड नामक एक ब्राह्मण थे। उनकी पत्नी का नाम सुजाता था। समय आने पर सुजाता गर्भवती हुई। एक दिन जब कहोड वेदपाठ कर रहे थे, तभी सुजाता के गर्भ में स्थित शिशु बोला – पिताजी। आप रातभर वेदपाठ करते हैं, किंतु वह ठीक से नहीं होता। गर्भस्थ शिशु के इस प्रकार कहने पर कहोड क्रोधित होकर बोले कि- तू पेट में ही ऐसी टेढ़ी-मेढ़ी बातें करता है, इसलिए तू आठ स्थानों से टेढ़ा उत्पन्न होगा। इस घटना के कुछ दिन बाद कहोड राजा जनक के पास धन की इच्छा से गए।

वहां बंदी नामक विद्वान से वे शास्त्रार्थ में हार गए। नियमानुसार उन्हें जल में डूबा दिया गया। कुछ दिनों बाद अष्टावक्र का जन्म हुआ किंतु उसकी माता ने उसे कुछ नहीं बताया। जब अष्टावक्र 12 वर्ष का हुआ, तब एक दिन उसने अपनी माता से पिता के बारे पूछा। तब माता ने उसे पूरी बात सच-सच बता दी। अष्टावक्र भी राजा जनक के दरबार में शास्त्रार्थ करने के लिए गया। यहां अष्टावक्र और बंदी के बीच शास्त्रार्थ हुआ, जिसमें अष्टावक्र ने उसे पराजित कर दिया।

अष्टावक्र ने राजा से कहा कि बंदी को भी नियमानुसार जल में डूबा देना चाहिए। तब बंदी ने बताया कि वह जल के स्वामी वरुणदेव का पुत्र है। उसने जितने भी विद्वानों को शास्त्रार्थ में हराकर जल में डुबाया है, वे सभी वरुण लोक में हैं। उसी समय जल में डूबे हुए सभी ब्राह्मण पुन: बाहर आ गए। अष्टावक्र के पिता कहोड भी जल से निकल आए। अष्टावक्र के विषय में जानकर उन्हें बहुत प्रसन्न हुई और पिता के आशीर्वाद से अष्टावक्र का शरीर सीधा हो गया।

4. आस्तिक

महाभारत के अनुसार आस्तिक ने ही राजा जनमेजय के सर्प यज्ञ को रुकवाया था। आस्तिक के पिता जरत्कारु ऋषि थे और उनकी माता का नाम भी जरत्कारु था। आस्तिक की माता नागराज वासुकि की बहन थी। जब राजा जनमेजय को पता चला कि उनके पिता की मृत्यु तक्षक नाग द्वारा काटने पर हुई थी तो उन्होंने सर्प यज्ञ करने का निर्णय लिया। उस यज्ञ में दूर-दूर से भयानक सर्प आकर गिरने लगे। जब यह बात नागराज वासुकि को पता चली तो उन्होंने आस्तिक से इस यज्ञ को रोकने के लिए निवेदन किया।
आस्तिक यज्ञ स्थल पर जाकर ज्ञान की बातें करने लगे, जिसे सुनकर राजा जनमेजय बहुत प्रसन्न हुए। जनमेजय ने आस्तिक को वरदान मांगने के लिए कहा, तब आस्तिक ने राजा से सर्प यज्ञ बंद करने के लिए निवेदन किया। राजा जनमेजय ने पहले तो ऐसा करने से इनकार कर दिया, लेकिन बाद में वहां उपस्थित ब्राह्मणों के कहने पर उन्होंने सर्प यज्ञ रोक दिया और आस्तिक की प्रशंसा की।

5. भक्त प्रह्लाद

बालक प्रह्लाद की कथा का वर्णन श्रीमद्भागवत में मिलता है। प्रह्लाद के पिता हिरण्यकश्यपु दैत्यों के राजा थे। वह भगवान विष्णु को अपना शत्रु मानता था परंतु प्रह्लाद भगवान विष्णु का परम भक्त था। जब यह बात हिरण्यकश्यपु को पता चली तो उसने प्रह्लाद पर अनेक अत्याचार किए, लेकिन फिर भी प्रह्लाद की ईश्वर भक्ति कम न हुई। अंत में स्वयं भगवान विष्णु प्रह्लाद की रक्षा के लिए नृसिंह अवतार लेकर प्रकट हुए। नृसिंह भगवान ने हिरण्यकश्यपु का वध कर दिया और प्रह्लाद को अपनी गोद में बैठा कर प्रेम किया।

6. गुरुभक्त उपमन्यु

गुरु आयोदधौम्य के एक शिष्य का नाम उपमन्यु था। वह बड़ा गुरुभक्त था। गुरु की आज्ञा से वह रोज गाय चराने जाता था। एक दिन गुरु ने उससे पूछा कि तुम अन्य शिष्यों से मोटे और बलवान दिख रहे हो। तुम क्या खाते हो? तब उपमन्यु ने बताया कि मैं भिक्षा मांगकर ग्रहण कर लेता हूं। गुरु ने उससे कहा कि मुझे निवेदन किया बिना तुम्हें भिक्षा का अन्न नहीं खाना चाहिए। उपमन्यु ने गुरुजी की बात मान ली।

कुछ दिनों बाद पुन: गुरुजी ने उपमन्यु से वही प्रश्न पूछा तो उसने बताया कि वह गायों का दूध पीकर अपनी भूख मिटाता है। तब गुरु ने उसे ऐसा करने से भी मना कर दिया, लेकिन इसके बाद भी उपमन्यु के पहले जैसे दिखने पर गुरुजी ने उससे पुन: वही प्रश्न किया। तब उपमन्यु ने बताया कि बछड़े गाय का दूध पीकर जो फेन (झाग) उगल देते हैं, वह उसका सेवन करता है। गुरु आयोदधौम्य ने उसे ऐसा करने से भी मना कर दिया।

जब उपमन्यु के सामने खाने-पीने के सभी रास्ते बंद हो गए तब उसने एक दिन भूख से व्याकुल होकर आकड़े के पत्ते खा लिए। वह पत्ते जहरीले थे। उन्हें खाकर उपमन्यु अंधा हो गया और वह वन में भटकने लगा। दिखाई न देने पर उपमन्यु एक कुएं में गिर गया। जब उपमन्यु शाम तक आश्रम नहीं लौटा तो गुरु अपने अन्य शिष्यों के साथ उसे ढूंढने वन में पहुंचे। वन में जाकर गुरु ने उसे आवाज लगाई तब उपमन्यु ने बताया कि वह कुएं में गिर गया है।

गुरु ने जब इसका कारण पूछा तो उसने सारी बात सच-सच बता दी। तब गुरु आयोदधौम्य ने उपमन्यु को देवताओं के चिकित्सक अश्विनी कुमार की स्तुति करने के लिए कहा। उपमन्यु ने ऐसा ही किया। स्तुति से प्रसन्न होकर अश्विनी कुमार प्रकट हुए और उपमन्यु को एक फल देकर बोले कि इसे खाने से तुम पहले की तरह स्वस्थ हो जाओगे। उपमन्यु ने कहा कि बिना अपने गुरु को निवेदन किए मैं यह फल नहीं खा सकता।

उपमन्यु की गुरुभक्ति से प्रसन्न होकर अश्विन कुमार ने उसे पुन: पहले की तरह स्वस्थ होने का वरदान दिया, जिससे उसकी आंखों की रोशनी भी पुन: लौट आई। गुरु के आशीर्वाद से उसे सारे वेद और धर्मशास्त्रों का ज्ञान हो गया।

7. मार्कण्डेय ऋषि

धर्म ग्रंथों के अनुसार मार्कण्डेय ऋषि अमर हैं। आठ अमर लोगों में मार्कण्डेय ऋषि का भी नाम आता है। इनके पिता मर्कण्डु ऋषि थे। जब मर्कण्डु ऋषि को कोई संतान नहीं हुई तो उन्होंने अपनी पत्नी के साथ भगवान शिव की आराधना की। उनकी तपस्या से प्रकट हुए भगवान शिव ने उनसे पूछा कि वे गुणहीन दीर्घायु पुत्र चाहते हैं या गुणवान 16 साल का अल्पायु पुत्र। तब मर्कण्डु ऋषि ने कहा कि उन्हें अल्पायु लेकिन गुणी पुत्र चाहिए। भगवान शिव ने उन्हें ये वरदान दे दिया।

जब मार्कण्डेय ऋषि 16 वर्ष के होने वाले थे, तब उन्हें ये बात अपनी माता द्वारा पता चली। अपनी मृत्यु के बारे में जानकर वे विचलित नहीं हुए और शिव भक्ति में लीन हो गए। इस दौरान सप्तऋषियों की सहायता से ब्रह्मदेव से उनको महामृत्युंजय मंत्र की दीक्षा मिली। इस मंत्र का प्रभाव यह हुआ कि जब यमराज तय समय पर उनके प्राण हरने आए तो शिव भक्ति में लीन मार्कण्डेय ऋषि को बचाने के लिए स्वयं भगवान शिव प्रकट हो गए और उन्होंने यमराज के वार को बेअसर कर दिया। बालक मार्कण्डेय की भक्ति देखकर भगवान शिव ने उन्हें अमर होने का वरदान दिया।

8. गुरुभक्त एकलव्य

एकलव्य की कथा का वर्णन महाभारत में मिलता है। उसके अनुसार एकलव्य निषादराज हिरण्यधनु का पुत्र था। वह गुरु द्रोणाचार्य के पास धनुर्विद्या सीखने गया था, लेकिन राजवंश का न होने के कारण द्रोणाचार्य ने उसे धनुर्विद्या सिखाने से मना कर दिया। तब एकलव्य ने द्रोणाचार्य की एक प्रतिमा बनाई और उसे ही गुरु मानकर धनुर्विद्या का अभ्यास करने लगा। एक बार गुरु द्रोणाचार्य के साथ सभी राजकुमार शिकार के लिए वन में गए।

उस वन में एकलव्य अभ्यास कर रहा था। अभ्यास के दौरान कुत्ते के भौंकने पर एकलव्य ने अपने बाणों से कुत्ते का मुंह बंद कर दिया। जब द्रोणाचार्य व राजकुमारों ने कुत्ते को इस हाल में देखा तो वे उस धनुर्धर को ढूंढने लगे, जिसने इतनी कुशलता से बाण चलाए थे। एकलव्य को ढूंढने पर द्रोणाचार्य ने उससे उसके गुरु के बारे में पूछा। एकलव्य ने बताया कि उसने प्रतिमा के रूप में ही द्रोणाचार्य को अपना गुरु माना है। तब गुरु द्रोणाचार्य ने गुरु दक्षिणा के रूप में एकलव्य से दाहिने हाथ का अंगूठा मांग लिया। एकलव्य ने बिना कुछ सोचे अपने अंगूठा द्रोणाचार्य को दे दिया।

भगवान को क्या पसंद है?

भगवान को क्या पसंद है ?

हम लोग हमेशा वही चीज चाहते हैं जो हमे पसंद होती है। चाहे वो संसार की वस्तु हो या व्यक्ति हो। जो चीज हमें पसंद नहीं है हम उसके बारे में न सोचते हैं न देखते हैं और न जानना चाहते हैं।
लेकिन धन्य है वो भक्त जो ये जानना चाहते हैं की हमारे भगवान को क्या पसंद है? ध्यान रखना कि भगवान हमारी किसी वस्तु के भूखे नहीं हैं, वो हमारे किसी 56 भोग के भूखे नहीं हैं। वो तो केवल भाव के भूखे हैं। केवल प्रेम के भूखे हैं।
अब संत जन जो कहते हैं वो सुनिये। भगवान को भक्त का प्रेम पसंद है, उसका भाव पसंद है और भगवान भक्त से उसका मन चाहते हैं। अगर आप सच में कुछ देना चाहते हो और भगवान की पसंद का ख्याल रखना चाहते हों तो खुद को भगवान को दे दो।
क्योकि याद रखना केवल वो ही हमारे हैं। भगवान से एक ही बात कहो-प्रभु! मैं आपका और आप मेरे।
आप भगवान को प्रेम से भोग लगाइये वो खा लेंगे। भगवान को आप प्रेम से सुलाये वो सो जायेंगे। भगवान को आप प्रेम से नहलाये वो नहा लेंगे।
जो भी काम करें बस मन लगा कर करें। भगवान को दिखावा पसंद नही है। वो तो केवल निष्कपट प्रेम ही पसंद करते हैं।
भगवान ने कहा है कि — ‘निर्मल मन जन सो मोहि पावा, मोहि कपट छल छिद्र न भावा’
भगवान कहते हैं जिसका मन गंगा जी की तरह निर्मल है , जो छल-छिद्र और कपट से रहित है वो मुझे अत्यंत प्रिय है।
श्रीमद् भागवत गीता में भगवान श्री कृष्ण अर्जुन से कहते हैं —मय्येव मन आधत्स्व मयि बुद्धिं निवेशय । निवसिष्यसि मय्येव अत ऊर्ध्वं न संशयः ॥ गीता 12.8 ||
हे अर्जुन! मुझमें मन को लगा और मुझमें ही बुद्धि का निवेश कर, इसके उपरांत तू मुझमें ही निवास करेगा, इसमें कुछ भी संशय नहीं है।भगवान कहते हैं कि जो भक्त किसी प्रकार की इच्छा नही रखता, शुद्ध मन से मेरी भक्ति करता है और सभी कर्मो को मुझे अर्पित करता है ऐसा भक्त मुझे प्रिय है।
                                                                    
       ।। जय सिया राम जी ।।
       ।। ॐ नमह शिवाय ।।

ईश्वर की भक्ति

ओ३म् 

ईश्वर की भक्ति


प्रश्न:― कृपया बताईये कि भक्ति किसे कहते हैं और उसका स्वरुप क्या है?

उत्तर:― जिन साधनों से ईश्वर का साक्षात्कार होता है, उसे भक्ति कहते हैं। उस भक्ति के तीन भाग हैं―स्तुति, प्रार्थना, उपासना।

स्तुति:― स्तुति का अर्थ है ईश्वर के गुण गान करना, उसके गुणों का चिन्तन करना और उन्हें अपने जीवन में धारण करना, तथा जीवन में उन गुणों को धारण कर उनसे लाभ उठाना। मनुष्य का यह स्वाभाविक गुण है कि वह प्रत्येक वस्तु के गुणों को जानना चाहता है, छोटा बच्चा भी जब किसी वस्तु को देखता है, तो पूछता है कि यह क्या है, ऐसी क्यों है, इसका नाम क्या है इत्यादि।

प्रार्थना:― प्रार्थना का अर्थ है, किसी वस्तु के गुण जानने के पश्चात् उस वस्तु को पाने की प्रबल इच्छा का उत्पन्न हो जाना। यह स्वाभाविक ही है। प्रार्थना का सीधा अर्थ है, किसी से कुछ मांगना, ईश्वर से कुछ मांगने का नाम प्रार्थना है। यह तीन प्रकार की है। यथा―

(1) प्रथम उत्तम प्रार्थना ― जिससे संसार के प्राणी मात्र का भला हो ऐसी प्रार्थना करना उत्तम प्रार्थना है। यथा―
निस्सन्तान संतानयुक्त हों, सन्तान वाले पुत्र पौत्रों से युक्त हों, निर्धन धन सम्पन्न हों, तथा सब लोग सौ वर्ष की दीर्घायु को देखें। समय-समय पर वर्षा हो। पृथिवी माता हरे भरे अन्नों से सुशोभित हो, सारा देश क्षोभ से रहित हो। देश के ज्ञानी, विज्ञानी, ब्राह्मण निर्भय होकर विचरें। संसार के सब प्राणी सुखी हों, कोई भी दुःखी दृष्टि गोचर न हो। सब रोग रहित होकर भद्र को देखें।

(2) द्वितीय मध्यम प्रार्थना ― जिसमें आत्म कल्याण और आत्महित की भावना हो यथा ―
हे प्रभो ! मेरा जीवन शुद्ध और पवित्र हो, बल, बुद्धि, यश, तेज, सत्यता, उदारता आदि शुभ गुणों का मेरे जीवन में वास हो। मैं विषयों, व्यसनों, दुर्गुणों एवं मृत्यु से पृथक् होकर मोक्षानन्द का लाभ करूँ।मृत्यु र्मुक्षीय माऽमृतात्"

(3) तृतीय निकृष्ट प्रार्थना ― जिसमें अपना स्वार्थ और अन्यों के बुरे की भावना भरी हो। यथा मुझे धन, पशु, सन्तान, सुख की प्राप्ति हो जाय और मेरे शत्रु इन वस्तुओं से रहित होकर दुःख, दारिद्रय, और रोगों को प्राप्त कर मौत के दर्शन करें। ऐसी प्रार्थना ईश्वर कभी स्वीकार नहीं करते।

उपासना:― भक्ति का तीसरा अंग उपासना है इसका अर्थ है ईश्वर के समीप बैठना, ईश्वर के गुणों को अपने में धारण करके उस जैसा हो जाना। इस अवस्था को प्राप्त कर भक्त कह उठता है, अहं ब्रह्माऽस्मि" मैं ब्रह्मस्थ हो गया हूँ। जीव किसी अवस्था में भी ब्रह्म नहीं हो सकता। हाँ, समाधि अवस्था में कुछ समय के लिए वह अपने को ब्रह्म समान समझने लगता है जैसे लोहा, आग में पड़कर आग के समान हो जाता है। परन्तु आग नहीं बन जाता, आग से पृथक् होने पर पुनः लोहा ही रहता है।इसी प्रकार भक्ति द्वारा ईश्वर के कुछ गुण उपासक में आ जाते हैं।