ओ३म्
प्रश्न:― कृपया बताईये कि भक्ति किसे कहते हैं और उसका स्वरुप क्या है?
उत्तर:― जिन साधनों से ईश्वर का साक्षात्कार होता है, उसे भक्ति कहते हैं। उस भक्ति के तीन भाग हैं―स्तुति, प्रार्थना, उपासना।
स्तुति:― स्तुति का अर्थ है ईश्वर के गुण गान करना, उसके गुणों का चिन्तन करना और उन्हें अपने जीवन में धारण करना, तथा जीवन में उन गुणों को धारण कर उनसे लाभ उठाना। मनुष्य का यह स्वाभाविक गुण है कि वह प्रत्येक वस्तु के गुणों को जानना चाहता है, छोटा बच्चा भी जब किसी वस्तु को देखता है, तो पूछता है कि यह क्या है, ऐसी क्यों है, इसका नाम क्या है इत्यादि।
प्रार्थना:― प्रार्थना का अर्थ है, किसी वस्तु के गुण जानने के पश्चात् उस वस्तु को पाने की प्रबल इच्छा का उत्पन्न हो जाना। यह स्वाभाविक ही है। प्रार्थना का सीधा अर्थ है, किसी से कुछ मांगना, ईश्वर से कुछ मांगने का नाम प्रार्थना है। यह तीन प्रकार की है। यथा―
(1) प्रथम उत्तम प्रार्थना ― जिससे संसार के प्राणी मात्र का भला हो ऐसी प्रार्थना करना उत्तम प्रार्थना है। यथा―
निस्सन्तान संतानयुक्त हों, सन्तान वाले पुत्र पौत्रों से युक्त हों, निर्धन धन सम्पन्न हों, तथा सब लोग सौ वर्ष की दीर्घायु को देखें। समय-समय पर वर्षा हो। पृथिवी माता हरे भरे अन्नों से सुशोभित हो, सारा देश क्षोभ से रहित हो। देश के ज्ञानी, विज्ञानी, ब्राह्मण निर्भय होकर विचरें। संसार के सब प्राणी सुखी हों, कोई भी दुःखी दृष्टि गोचर न हो। सब रोग रहित होकर भद्र को देखें।
(2) द्वितीय मध्यम प्रार्थना ― जिसमें आत्म कल्याण और आत्महित की भावना हो यथा ―
हे प्रभो ! मेरा जीवन शुद्ध और पवित्र हो, बल, बुद्धि, यश, तेज, सत्यता, उदारता आदि शुभ गुणों का मेरे जीवन में वास हो। मैं विषयों, व्यसनों, दुर्गुणों एवं मृत्यु से पृथक् होकर मोक्षानन्द का लाभ करूँ।मृत्यु र्मुक्षीय माऽमृतात्"
(3) तृतीय निकृष्ट प्रार्थना ― जिसमें अपना स्वार्थ और अन्यों के बुरे की भावना भरी हो। यथा मुझे धन, पशु, सन्तान, सुख की प्राप्ति हो जाय और मेरे शत्रु इन वस्तुओं से रहित होकर दुःख, दारिद्रय, और रोगों को प्राप्त कर मौत के दर्शन करें। ऐसी प्रार्थना ईश्वर कभी स्वीकार नहीं करते।
उपासना:― भक्ति का तीसरा अंग उपासना है इसका अर्थ है ईश्वर के समीप बैठना, ईश्वर के गुणों को अपने में धारण करके उस जैसा हो जाना। इस अवस्था को प्राप्त कर भक्त कह उठता है, अहं ब्रह्माऽस्मि" मैं ब्रह्मस्थ हो गया हूँ। जीव किसी अवस्था में भी ब्रह्म नहीं हो सकता। हाँ, समाधि अवस्था में कुछ समय के लिए वह अपने को ब्रह्म समान समझने लगता है जैसे लोहा, आग में पड़कर आग के समान हो जाता है। परन्तु आग नहीं बन जाता, आग से पृथक् होने पर पुनः लोहा ही रहता है।इसी प्रकार भक्ति द्वारा ईश्वर के कुछ गुण उपासक में आ जाते हैं।
ईश्वर की भक्ति
प्रश्न:― कृपया बताईये कि भक्ति किसे कहते हैं और उसका स्वरुप क्या है?
उत्तर:― जिन साधनों से ईश्वर का साक्षात्कार होता है, उसे भक्ति कहते हैं। उस भक्ति के तीन भाग हैं―स्तुति, प्रार्थना, उपासना।
स्तुति:― स्तुति का अर्थ है ईश्वर के गुण गान करना, उसके गुणों का चिन्तन करना और उन्हें अपने जीवन में धारण करना, तथा जीवन में उन गुणों को धारण कर उनसे लाभ उठाना। मनुष्य का यह स्वाभाविक गुण है कि वह प्रत्येक वस्तु के गुणों को जानना चाहता है, छोटा बच्चा भी जब किसी वस्तु को देखता है, तो पूछता है कि यह क्या है, ऐसी क्यों है, इसका नाम क्या है इत्यादि।
प्रार्थना:― प्रार्थना का अर्थ है, किसी वस्तु के गुण जानने के पश्चात् उस वस्तु को पाने की प्रबल इच्छा का उत्पन्न हो जाना। यह स्वाभाविक ही है। प्रार्थना का सीधा अर्थ है, किसी से कुछ मांगना, ईश्वर से कुछ मांगने का नाम प्रार्थना है। यह तीन प्रकार की है। यथा―
(1) प्रथम उत्तम प्रार्थना ― जिससे संसार के प्राणी मात्र का भला हो ऐसी प्रार्थना करना उत्तम प्रार्थना है। यथा―
निस्सन्तान संतानयुक्त हों, सन्तान वाले पुत्र पौत्रों से युक्त हों, निर्धन धन सम्पन्न हों, तथा सब लोग सौ वर्ष की दीर्घायु को देखें। समय-समय पर वर्षा हो। पृथिवी माता हरे भरे अन्नों से सुशोभित हो, सारा देश क्षोभ से रहित हो। देश के ज्ञानी, विज्ञानी, ब्राह्मण निर्भय होकर विचरें। संसार के सब प्राणी सुखी हों, कोई भी दुःखी दृष्टि गोचर न हो। सब रोग रहित होकर भद्र को देखें।
(2) द्वितीय मध्यम प्रार्थना ― जिसमें आत्म कल्याण और आत्महित की भावना हो यथा ―
हे प्रभो ! मेरा जीवन शुद्ध और पवित्र हो, बल, बुद्धि, यश, तेज, सत्यता, उदारता आदि शुभ गुणों का मेरे जीवन में वास हो। मैं विषयों, व्यसनों, दुर्गुणों एवं मृत्यु से पृथक् होकर मोक्षानन्द का लाभ करूँ।मृत्यु र्मुक्षीय माऽमृतात्"
(3) तृतीय निकृष्ट प्रार्थना ― जिसमें अपना स्वार्थ और अन्यों के बुरे की भावना भरी हो। यथा मुझे धन, पशु, सन्तान, सुख की प्राप्ति हो जाय और मेरे शत्रु इन वस्तुओं से रहित होकर दुःख, दारिद्रय, और रोगों को प्राप्त कर मौत के दर्शन करें। ऐसी प्रार्थना ईश्वर कभी स्वीकार नहीं करते।
उपासना:― भक्ति का तीसरा अंग उपासना है इसका अर्थ है ईश्वर के समीप बैठना, ईश्वर के गुणों को अपने में धारण करके उस जैसा हो जाना। इस अवस्था को प्राप्त कर भक्त कह उठता है, अहं ब्रह्माऽस्मि" मैं ब्रह्मस्थ हो गया हूँ। जीव किसी अवस्था में भी ब्रह्म नहीं हो सकता। हाँ, समाधि अवस्था में कुछ समय के लिए वह अपने को ब्रह्म समान समझने लगता है जैसे लोहा, आग में पड़कर आग के समान हो जाता है। परन्तु आग नहीं बन जाता, आग से पृथक् होने पर पुनः लोहा ही रहता है।इसी प्रकार भक्ति द्वारा ईश्वर के कुछ गुण उपासक में आ जाते हैं।
No comments:
Post a Comment