अनजान गोपी
वृन्दावन में आज महारास की रात्रि ‘शरद पूर्णिमा’ है… सारी गोपियाँ अलग अलग वेश में कान्हा जी को रिझाने के लिए निधिवन में इकट्ठी हुई हैं…ललिता ने हज़ारों कमल-पुष्पों से स्वयं को ऊपर से नीचे तक सजा रखा है…ताकि वे कृष्णा के हाथ के कमल से ज्यादा सुन्दर दिख सकें…..
विशाखा ने स्वयं को एक मुरली की तरह सजा लिया है… ताकि कान्हा की बंसी को मात दे सकें…
एक गोपी ने खुद को सुदर्शन चक्र, एक ने गदा और एक ने खुद को शंख बना रखा है…
सभी गोपियाँ एक घेरा बनाकर कृष्णा के इंतज़ार में कड़ी हैं….सिवाय घेरे के बीच में खड़ी दो गोपियों के….
ललिता ने चुपके से विशाखा के कान में कहा… “हे सखी!!!… घेरे के बीच में खड़ी इन दो सुंदरियों को देखो…तो…एक तो हमारी राधारानी हैं… जिन्होंने खुद को कृष्ण के रूप में सजा रखा है…परन्तु ये दूसरी गोपी कौन है???…क्या तुम इसे जानती हो???”
“ना री सखी..!!! इसे तो ब्रज मे पहली बार ही देखूं…. पतों नये कौन है…लेकिन चाल-ढाल में तो हमारी राधे को टक्कर देवे है…परन्तु वाको घूघट ही इत्तो लंबो है… की सूरत देखवे में ना आवे…” विशाखा ने तिरछी नज़रों से अनजान गोपी को देखते हुए कहा…
तभी अचानक मुरली-मनोहर वहां प्रगट हो गए… और सारी गोपियाँ उनके साथ पहले नृत्य करने की स्पर्धा में लग गयीं….
परन्तु कान्हा जी ने ललिता, विशाखा समेत सभी गोपियों को अनदेखा कर दिया…
“ये ज़ालिम तो अपनी राधे के पास ही जाएगा… इसे हमारी क्या परवाह???” ललिता और विशाखा ने मुह चिड़ाते हुए कहा…
लेकिन वे सभी बहुत ही आश्चर्य में पड़ गयीं… जब उन्होंने देखा…. की कान्हा जी अपनी राधे को भी अनदेखा करते हुए….सबसे पहले उस अनजान गोपी के पास जाकर नृत्य करने लगे….
अब सारी सीमाएं पार हो चुकीं थीं…. राधे ने धैर्य खो दिया… और जल्दी से झपट कर उस अनजान गोपी का घूंघट खीच दिया…
सभी गोपियाँ एकदम चुप्प रह गयीं….जब उन्होंने पहले उस गोपी के लम्बे लम्बे बाल देखे… फिर एक त्रिशूल देखा….फिर एक डमरू देखा….और आखिर में गोपी के गले में लिपटा हुआ सांप देखा…
गोपी के रूप में महारास में आये महादेव को देखकर सभी गोपियाँ उनके चरणों में जा लिपटी…
“भगवान् शिव…सिर्फ इसी शर्त पर समुद्र –मंथन के समय विष पान को तैयार हुए थे…की मेरी हर महारास का आरम्भ इनके साथ मेरे नृत्य से ही होगा…..” कृष्ण जी ने रहस्य से पर्दा उठाया…
“बोलो गोपेश्वर महादेव की..जय!!!!!!!!” वे सभी एक स्वर में बोल उठे
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