|| श्रीहरि: ||
सन्त-वाणी
आपने भगवान्के होते हुए भी अपने को भगवान्का नहीं माना और संसारके नहीं होते हुए भी अपने को संसारका मान लिया, यह बहुत बड़ी भूल है । आप संसार का काम करो, पर भगवान्के होकर करो । आप किसी बैंक, रेलवे, फैक्टरी आदि में काम करते हैं तो उसी के कर्मचारी कहलाने पर भी क्या आप पिता के नहीं होते ? क्या आप पिता को छोड़कर कर्मचारी होते हो ? इसी तरह आप संसारका कोई भी काम करो, अपनेको भगवान्का मानते हुए ही करो । आप कैसे ही हों, हो भगवान्के ही । भगवान् हमारे परमपिता हैं‒यह आप अभी-अभी स्वीकार कर लो । हम साक्षात् भगवान्के बेटा-बेटी हैं । यह कोई नयी बात नहीं है । आप सदासे ही भगवान्के हो‒‘ईस्वर अंश जीव अबिनासी’ (मानस, उत्तर॰ ११७ । १) । भगवान् भी कहते हैं‒‘ममैवांशो जीवलोके’ (गीता १५ । ७) ‘सब मम प्रिय सब मम उपजाए’ (मानस, उत्तर॰ ८६ । २) । भगवान्को आप चाहे जैसे मान लो, वे वैसे ही हैं, पर आपके भीतर सन्देह नहीं रहना चाहिये ।
अगर आप अपना कल्याण चाहते हो तो अपना सम्बन्ध भगवान्से मानो और अपना समय भगवान्को दो । समय देनेका तात्पर्य है‒हरेक काम भगवान्के लिये करो ।
कोई पूछे कि आप कौन हो, तो आपके भीतर सबसे पहले यह बात आनी चाहिये कि मैं भगवान्का हूँ । मैं भगवान्का हूँ‒यह घरके भीतर गड़ा हुआ धन है, जिसको न जाननेके कारण आप गरीब होकर दुःख पा रहे हैं !
जय जय श्री हरि
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