शिव_उपदेश
धन का संचय, धन का वितरण एवं धन की उपयोगिता ??
धन का संचय, धन का वितरण एवं धन की उपयोगिता ??
धन आवश्यक है, क्योंकि; धन मूल आवश्यकताओं को पूरा करने में सहायक होता है। किन्तु जब मनुष्य इक्षाओं को आवश्यकता समझने लगे, तो धन कितना ही क्यों ना हो, पर्याप्त नही होता। क्योंकि इक्षायें अंतहीन हैं।
इसलिए मनुष्य कभी ना पूरी होने वाली इक्षाओं की पूर्ति हेतु; धन संचय को ही अपना जीवन का एक मात्र लक्ष्य समझ लेता है।
वो लोभी बन जाता है। वो भूल जाता है कि; इस जीवन का मूल लक्ष्य ईश्वर के समीप आना है।
ऐसे लोभी मनुष्यों को अपनी मृत्यु के समय भी यही दुःख रहता है कि; उन्होंने क्या कुछ नही पाया, क्या शेष रह गया है। ऐसे समय में वो एक पल भी ईश्वर का स्मरण नही करते। अपने जीवन की निरर्थकता और व्यर्थता का बोध नही होता उन्हें।
बिल्कुल उस व्यापारी की भांति, जिसके पास इस संसार में जीवन निर्वाह हेतु सब कुछ था। उसके पास घर था। छोटा था, किन्तु उसके परिवार के लिए पर्याप्त था। उसके परिवार की छोटी सी आवश्यकताओं को पूरा करने हेतु; भोजन और धन की भी कोई कमी नही थी।
किन्तु व्यापारी और धन संचय करने की चिंता में डूबा रहता था। सब कुछ होते हुए भी वह सुखी नही था। क्योंकि वह सिर्फ यही सोचता रहता था कि उसके पास क्या नही है।
एक दिन किसी ने उसे बताया कि; नारायण के वरदान से सब कुछ मिल सकता है। धन के लोभ में वह नारायण की तपस्या में निकल पड़ा। कई वर्षों तक वह नारायण की तपस्या करता रहा।
नारायण प्रसन्न हुए और वरदान मांगने को कहा।
व्यापारी ने माँगा:- मुझे समस्त संसार की भूमि चाहिए ?? संसार में जितना भी धन है, वो सब मेरा हो जाये।
व्यापारी ने माँगा:- मुझे समस्त संसार की भूमि चाहिए ?? संसार में जितना भी धन है, वो सब मेरा हो जाये।
नारायण ने पूछा- तुम्हें इतना धन क्यूँ चाहिए ??
व्यापारी ने कहा कि; वो सुखी रहना चाहता है। क्यूंकी धन संपत्ति ही सुख का माध्यम है।
व्यापारी ने कहा कि; वो सुखी रहना चाहता है। क्यूंकी धन संपत्ति ही सुख का माध्यम है।
नारायण ने कहा- संसार कि परिभाषा सभी मनुष्यों के लिए भिन्न होती है। जैसे, कुए मे रहने वाले मेंडक के लिए वो उसका संसार होता है।
किन्तु व्यापारी के लिए जो कुछ भी उसे दिखाई दे रहा था, वही संसार था।
किन्तु व्यापारी के लिए जो कुछ भी उसे दिखाई दे रहा था, वही संसार था।
नारायण ने वरदान दिया कि; जितना भी संसार तुम अपने नेत्रों से देख सको, वो तुम्हारा होगा। किन्तु जो तुम नहीं देखोगे, वो तुम्हारा नही होगा।
इस संसार का सबसे धनी और सुखी होने के लोभ में उसने सोचा कि अगर वो दौड़कर समस्त संसार को देख ले, तो वरदान अनुसार सब कुछ उसका हो जायेगा।
वो यहाँ से वहाँ, वहाँ से यहाँ चारों दिशाओं मे भागने लगा। उसे जो भी दिखा उसे अपना बनाता गया। किन्तु उसका लालच कम नहीं हुआ। अपितु ओर बढ़ता गया।
निरंतर भागते रहने के कारण उसका शरीर, उसका साथ देने में असमर्थ हो गया। और इस प्रकार अंत में उसके पास सिर्फ उतनी ही भूमि रही, जिस पर उसका मृत शरीर पड़ा हुआ था..... अकेला।
उसके पास उसके परिवार का सुख भी था। किन्तु उसने उसका आनंद नही उठाया।
इसलिए सुखी जीवन हेतु; धन कि प्रचुरता नही; अपितु अपनी इक्षाओं और आवश्यकतों में अंतर समझना अनिवार्य है।
धन चाहे कितना भी हो, किन्तु मूल आवश्यकताएँ तो केवल उतनी ही हैं।
1) तन ढंकने के लिए वस्त्र
2) पेट भरने के लिए आहार
3) शरण के लिए भवन
1) तन ढंकने के लिए वस्त्र
2) पेट भरने के लिए आहार
3) शरण के लिए भवन
इन आवश्यकताओं के पूर्ण होने के पश्चात, जो भी है... वो इक्षा है।
धनी व्यक्ति के पास जो भी अतिरिक्त धन होता है, वो उसे दान करना चाहिए। उनके उद्धार के लिए जो अपनी मूल आवश्यकताओं को पूरा नहीं कर सकते।
ऐसा करने से संसार मे समानता होगी। द्वेष नहीं होगा। सद्भावना बनी रहेगी।
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