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Sunday, 19 May 2019

श्रीराम जय राम जय-जय राम

श्रीराम जय राम जय-जय राम 
जय सियाराम जय-जय हनुमान ।।
श्रीराम द्वारा हनुमान मान भंग।
जे रामेस्वर दरसनु करिहहिं।
ते तनु तजि मम लोक सिधरिहहिं॥
जो गंगाजलु आनि चढ़ाइहि।
सो साजुज्य मुक्ति नर पाइहि॥
जो कोई मनुष्य (मेरे द्वारा स्थापित किए हुए इन) रामेश्वरजी शि़वॅळि़गंँ का दर्शन करेंगे,
वे शरीर छोड़कर मेरे लोक को जाएँगे और जो गंगाजल लाकर इन पर चढ़ावेगा,
वह मनुष्य सायुज्य मुक्ति पावेगा
अर्थात्‌ मेरे साथ एकीकार हो जाएगा॥ म..
जब समुद्र पर सेतुबंधन का कार्य हो रहा था तब भगवान राम ने वहाँ गणेशजी और नवग्रहों की स्थापना के पश्चात शि़वॅळि़गंँ स्थापित करने का विचार किया।
उन्होंने शुभ मुहूर्त में शि़वॅळि़गंँ लाने के लिए हनुमानजी को काशी भेजा। हनुमानजी पवन वेग से काशी जा पहुँचे।
उन्हें देख भोलेनाथ बोले-“पवनपुत्र!”
दक्षिण में शि़वॅळि़गंँ की स्थापना करके भगवान श्रीराम मेरी ही इच्छा पूर्ण कर रहे हैं क्योंकि महर्षि अगस्त्य विन्ध्याचल पर्वत को झुकाकर वहाँ प्रस्थान तो कर गए लेकिन वे मेरी प्रतीक्षा में हैं।
इसलिए मुझे भी वहाँ जाना था।
तुम शीघ्र ही मेरे प्रतीक को वहाँ ले जाओ।
यह बात सुनकर हनुमान गर्व से फूल गए और सोचने लगे कि केवल वे ही यह कार्य शीघ्र-अतिशीघ्र कर सकते हैं।
यहाँ हनुमानजी को अभिमान हुआ और वहाँ भगवान राम ने उनके मन के भाव को जान लिया।
भक्त के कल्याण के लिए भगवान सदैव तत्पर रहते हैं।
हनुमान भी अहंकार के पाश में बंध गए थे।
अतः भगवान राम ने उन पर कृपा करने का निश्चय कर लिया।
उसी समय वारनराज सुग्रीव को बुलवाया और कहा-
“हे कपिश्रेष्ठ! शुभ मुहूर्त समाप्त होने वाला है और अभी तक हनुमान नहीं पहुँचे।
इसलिए मैं बालू का शिवलिंग बनाकर उसे यहाँ स्थापित कर देता हूँ।”
तत्पश्चात उन्होंने सभी ऋषि-मुनियों से आज्ञा प्राप्त करके पूजा-अर्चनादि की और बालू का शिवलिंग स्थापित कर दिया। ऋषि-मुनियों को दक्षिणा देने के लिए श्रीराम ने कौस्तुम मणि का स्मरण किया तो वह मणि उनके समक्ष उपस्थित हो गई।
भगवान श्रीराम ने उसे गले में धारण किया।
मणि के प्रभाव से देखते-ही-देखते वहाँ दान-दक्षिणा के लिए धन, अन्न, वस्त्र आदि एकत्रित हो गए।
उन्होंने ऋषि-मुनियों को भेंटें दीं।
फिर ऋषि-मुनि वहाँ से चले गए।
मार्ग में हनुमानजी से उनकी भेंट हुई। हनुमानजी ने पूछा कि वे कहाँ से पधार रहे हैं?
उन्होंने सारी घटना बता दी। यह सुनकर हनुमानजी को क्रोध आ गया। वे पलक झपकते ही श्रीराम के समक्ष उपस्थिति हुए और रुष्ट स्वर में बोले-
“भगवन! यदि आपको बालू का ही शिवलिंग स्थापित करना था तो मुझे काशी किसलिए भेजा था? आपने मेरा और मेरे भक्तिभाव का उपहास किया है।”
🔃श्रीराम मुस्कराते हुए बोले-
“पवनपुत्र! शुभ मुहूर्त समाप्त हो रहा था,
इसलिए मैंने बालू का शिवलिंग स्थापित कर दिया।
मैं तुम्हारा परिश्रम व्यर्थ नहीं जाने दूँगा।
मैंने जो शिवलिंग स्थापित किया है तुम उसे उखाड़ दो, मैं तुम्हारे लाए हुए शिवलिंग को यहाँ स्थापित कर देता हूँ।”
हनुमान प्रसन्न होकर बोले-
“ठीक है भगवन! मैं अभी इस शिविलंग को उखाड़ फेंकता हूँ।”
उन्होंने शिवलिंग को उखाड़ने का भरपूर प्रयास किया, लेकिन पूरी शक्ति लगाकर भी वे उसे हिला तक न सके।
तब उन्होंने उसे अपनी पूंछ से लपेटा और उखाड़ने का प्रयास किया।
किंतु वह नहीं उखड़ा।
अब हनुमान को स्वयं पर पश्चात्ताप होने लगा।
उनका अहंकार चूर-चूर हो गया था
और वे प्रभु श्रीराम के चरणों में गिरकर क्षमा माँगने लगे।
इस प्रकार हनुमान के अहम का नाश हुआ।
श्रीराम जी ने जहाँ बालू का शिवलिंग स्थापित किया था उसके उत्तर दिशा की ओर हनुमान द्वारा लाए शिवलिंग को स्थापित करते हुए कहा कि इस शिवलिंग की पूजा-अर्चना करने के बाद मेरे द्वारा स्थापित शिवलिंग की पूजा करने पर ही भक्तजन पुण्य प्राप्त करेंगे।
यह शिवलिंग आज भी रामेश्वरम में स्थापित है और भारत का एक प्रसिद्ध तीर्थ स्थल है।
* होइ अकाम जो छल तजि सेइहि।
भगति मोरि तेहि संकर देइहि॥
* मम कृत सेतु जो दरसनु करिही।
सो बिनु श्रम भवसागर तरिही॥
श्रीराम भगवान का यह कथन सत्य है कि जिन्हें श्रीशि़वॅ बाबा की भक्ति चाहिए उन्हें श्रीहरि व उनके अवतारों के गुण, नाम, रूपों और लीलाओं का गुणगान करना चाहिए।
श्रीहरि के अवतारों सहित उनके धामों के दर्शन करने चाहिए।
प्रसन्न होकर श्रीहरि, श्रीराम, श्रीकृष्ण कृपा स्वरूप श्रीशि़वॅ बाबा की भक्ति प्रदान करते हैं। 
जो छल-कपट छोड़कर और निष्काम होकर श्रीरामेश्वरजी की सेवा करेंगे,
उन्हें शंकरजी मेरी भक्ति देंगे और जो मेरे बनाए सेतु का दर्शन करेगा,
वह बिना ही परिश्रम संसार रूपी समुद्र से तर जाएगें ((पार हो जाएगें))॥ म.. 
श्रीशि़वॅ बाबा जी के साथ-साथ श्रीराम प्रभु की कृपा आशीर्वाद प्राप्त हो जाएगा तो भव सागर पार तो उतरेगें ही ना ।। 
जय-जय श्रीशि़वॅ हर-हर श्रीशि़वॅ 
श्रीराम जय राम जय-जय राम। 
जय सियाराम जय-जय हनुमान।।

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