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Friday, 21 June 2019

पाताल भुवनेश्‍वर की गुफ़ा

भारत के प्राचीनतम ग्रन्थ स्कन्द पुराण में वर्णित पाताल भुवनेश्‍वर की गुफ़ा के सामने पत्थरों से बना एक-एक शिल्प तमाम रहस्यों को खुद में समेटे हुए है। किंवदन्ती है कि यहाँ पर पाण्डवों ने तपस्या की और कलियुग में आदि शंकराचार्य ने इसे पुनः खोजा। राज्य उत्तराखण्ड ज़िला पिथौरागढ़ मार्ग स्थिति उत्तराखंड के कुमाऊं मंडल के प्रसिद्ध नगर अल्मोड़ा से शेराघाट होते हुए 160 किलोमीटर की दूरी तय कर पहाड़ी वादियों के बीच बसे सीमान्त कस्बे गंगोलीहाट में स्थित है।
पाताल भुवनेश्वर गुफ़ा 'पाताल भुवनेश्वर का गुफ़ा मंदिर' उत्तराखंड के कुमाऊं मंडल के प्रसिद्ध नगर अल्मोड़ा से शेराघाट होते हुए 160 किलोमीटर की दूरी तय कर पहाड़ी वादियों के बीच बसे सीमान्त कस्बे गंगोलीहाट में स्थित है। पाताल भुवनेश्वर गुफ़ा किसी आश्चर्य से कम नहीं है। इसके रास्ते में दिखाई देती हैं धवल हिमालय पर्वत की नयनाभिराम नंदा देवी, पंचचूली, पिंडारी, ऊंटाधूरा आदि चोटियां। दिल्ली से चल कर पहले दिन 350 किमी की दूरी तय कर अल्मोड़ा पहुंच सकते हैं।

पौराणिक महत्व: स्कन्दपुराण में वर्णन है कि स्वयं महादेव शिव पाताल भुवनेश्वर में विराजमान रहते हैं और अन्य देवी देवता उनकी स्तुति करने यहाँ आते हैं। यह भी वर्णन है कि त्रेता युग में अयोध्या के सूर्यवंशी राजा ऋतुपर्ण जब एक जंगली हिरण का पीछा करते हुए इस गुफ़ा में प्रविष्ट हुए तो उन्होंने इस गुफ़ा के भीतर महादेव शिव सहित 33 करोड देवताओं के साक्षात दर्शन किये। द्वापर युग में पाण्डवों ने यहां चौपड़ खेला और कलयुग में जगदगुरु शंकराचार्य का 822 ई के आसपास इस गुफ़ा से साक्षात्कार हुआ तो उन्होंने यहां तांबे का एक शिवलिंग स्थापित किया। इसके बाद चन्द राजाओं ने इस गुफ़ा के विषय में जाना। और आज देश विदेश से सैलानी यहां आते हैं। और गुफ़ा के स्थपत्य को देख दांतो तले उंगली दबाने को मजबूर हो जाते हैं। मनुस्मृति में कहा गया है कि भगवान शंकर कैलाश में सिर्फ तपस्या करते थे। उनके समय बिताने के लिए विष्णुजी ने उनके लिये यह स्थान चुना। मान्यताएं चाहे कुछ भी हो पर एकबारगी गुफ़ा में बनी आकृतियों को देख लेने के बाद उनसे जुड़ी मान्यताओं पर भरोसा किये बिना नहीं रहा जाता। पाण्डवों के एक वर्ष के प्रवास के दौरान का दृश्य, उनके द्वारा जुए में हारना, सतयुग से कलयुग आने का चित्रण व कई प्राचीन शिल्प कला के दृष्य देखने को मिलते हैं। कुमाऊँ एक धार्मिक स्थल के साथ ही रोमांचक पर्यटक स्थल के रूप में जाना जाता है। भारत का प्राचीन स्कन्द पुराण ग्रन्थ और टटोलिये मानस खण्ड के 103वें अध्याय के 273 से 288 तक के श्लोकों में गुफ़ा का वर्णन पढ़ कर उपरोक्त प्रतिकात्मक मूर्तियां मानो साक्षात जागृत हो जाएंगी और आप अपने 33 करोड़ देवी-देवताओं के दर्शन कर रहे होंगे। शृण्यवन्तु मनयः सर्वे पापहरं नणाभ्‌ स्मराणत्‌ स्पर्च्चनादेव, पूजनात्‌ किं ब्रवीम्यहम्‌ सरयू रामयोर्मध्ये पातालभुवनेश्‍वरः [3] (अर्थात् व्यास जी ने कहा मैं ऐसे स्थान का वर्णन करता हूं जिसका पूजन करने के सम्बन्ध में तो कहना ही क्या, जिसका स्मरण और स्पर्च्च मात्र करने से ही सब पाप नष्ट हो जाते हैं वह सरयू, रामगंगा के मध्य पाताल भुवनेश्‍वर है)। भूमिगत गुफाओं में निर्मित आकृति 103वें अध्याय के श्लोक 21 से 27 के अनुसार ये भूतल का सबसे पावन क्षेत्र है। पाताल भुवनेश्‍वर वहाँ जागरूक है और उनका पूजन करने से अश्वमेध यज्ञ से हज़ार गुणा फल प्राप्त होता है अतः उससे बढ़कर कोई दूसरा स्थान नहीं है। चार धाम करने का यश यहीं प्राप्त हो जाता है। श्‍लोक 30-34 के अनुसार पाताल भुवनेश्‍वर के समीप जाने वाला व्यक्ति एक सौ कुलों का उद्धार कर शिव सायुज्य प्राप्त करता है। आश्चर्य ही है कि ज़मीन के इतने अन्दर होने के बावजूद यहां घुटन नहीं होती शान्ति मिलती है। देवदार के घने जंगलों के बीच बसी रहस्य और रोमांच से सराबोर पाताल भुवनेश्वर की गुफ़ा की सैलानियों के बीच आज एक अलग पहचान है। कुछ श्रृद्धा से, कुछ रोमान्च के अनुभव के लिये, और कुछ शीतलता और शान्ति की तलाश में यहां आते हैं। गुफ़ा के पास हरे भरे वातावरण में सुन्दर होटल भी पर्यटकों के लिये बने हैं। ख़ास बात यह है कि गंगोलीहाट में अकेली यही नहीं बल्कि दस से अधिक गुफ़ाएं हैं जहाँ इतिहास की कई परतें, मान्यताओं के कई मूक दस्तावेज खुद-ब-खुद खुल जाते हैं। आंखिर यूं ही गंगोलीहाट को गुफ़ाओं की नगरी नहीं कहा जाता। 

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