जानिए माँ सीता की रक्षा हेतु अपने प्राण देने वाला जटायु वास्तव में कौन था।
भगवान विष्णु के अवतार श्रीराम की सेवा में और माता जानकी की रक्षा हेतु दुष्ट रावण के साथ युद्ध करने के बाद जटायु ने अपने प्राण गवाएं परन्तु क्या आप जानते है वह अपने वंश में पहला नहीं था जो भगवान श्रीराम अर्थात विष्णु के काम आया था. वह एक महान वंश का पक्षी था. वह भगवान विष्णु के वाहन गरुड़ का संबंध में भतीजा लगता था और भगवान सूर्य के सारथी अरण का पुत्र था.
कश्यप ऋषि को उनकी पत्नी विनीता से दो पुत्र उत्पन्न हुए . एक का नाम गरुड़ रखा गया जो कि बाद में भगवान विष्णु का वाहन बना और दुसरें का नाम अरुण रखा गया जो भगवान सूर्य की सेवा में चला गया. यह जटायु उसी अरुण का पुत्र था और उसका एक भाई भी था जिसका नाम सम्पाति था. क्योकि भगवान विष्णु भी श्रीराम के रूप में सूर्यवंश में आए थे इसलिए यह कहा जाता है कि इस वंश की सेवा में सिर्फ जटायु ने ही नहीं उनके पिता अरुण और चाचा गरुड़ ने भी की थी.
सिर्फ जटायु ने ही नहीं उसके बड़े भाई सम्पाति ने भी समुद्र के किनारे हताश वानर सेना को माता सीता की खबर देकर श्रीराम की सहायता की थी. जटायु और सम्पाति जब युवा अवस्था में थे तब बड़े बलवान थे. उन्हें अपनी पंखो की शक्ति पर गर्व था. इस लिए उन दोनों ने सूर्य के रथ को पकड़ने के लिए दोड़ लगाईं थी. जब सूर्य की प्रचंड गर्मी के कारण जटायु के प्राण संकट में आए तो सम्पाति ने अपने पंखो के द्वारा छाया करके अपने छोटे भाई जटायु के प्राण तो बचा लिए परन्तु सम्पाति के पंख बुरी तरह जल गए और वह बेहोश होकर समुद्र के किनारे आकर गिर गया. जहाँ पर ऋषियों ने उसका उपचार करके ठीक तो कर दिया परन्तु फिर कभी वह अपने प्रिय भाई जटायु से नहीं मिल पाया.
जटायु ने देवासुर संग्राम में भी भाग लिया था और राजा दशरथ के साथ मिलकर असुरो के विरद्ध युद्ध किया था. इसलिए उसकी राजा दशरथ से मित्रता थी. जब जटायु की मृत्यु हुई तो श्रराम ने एक पुत्र की तरह जटायु का अग्नि संस्कार किया था. दोस्तों महानता जटायु को विरासत में मिली थी. जटायु महान ऋषि कश्यप के वंश में जन्मा था. सूर्य के सारथि अरुण जैसे महान पिता का वह पुत्र, पक्षियों के राजा गरुड़ जो विष्णु की सेवा में रहते थे ऐसे महान चाचा का वह भतीजा और अपने भाई के लिए अपने प्राणों की भी चिंता न करने वाले महान भाई सम्पाति का वह भाई था और भगवान श्रीराम का वह अनन्य सेवक था. भले ही रावण के द्वारा हरण किए जाते समय वह माता सीता की रक्षा न कर सका परन्तु अपने प्राण देकर जटायु ने स्वयं को अमर बना दिया.
भगवान विष्णु के अवतार श्रीराम की सेवा में और माता जानकी की रक्षा हेतु दुष्ट रावण के साथ युद्ध करने के बाद जटायु ने अपने प्राण गवाएं परन्तु क्या आप जानते है वह अपने वंश में पहला नहीं था जो भगवान श्रीराम अर्थात विष्णु के काम आया था. वह एक महान वंश का पक्षी था. वह भगवान विष्णु के वाहन गरुड़ का संबंध में भतीजा लगता था और भगवान सूर्य के सारथी अरण का पुत्र था.
कश्यप ऋषि को उनकी पत्नी विनीता से दो पुत्र उत्पन्न हुए . एक का नाम गरुड़ रखा गया जो कि बाद में भगवान विष्णु का वाहन बना और दुसरें का नाम अरुण रखा गया जो भगवान सूर्य की सेवा में चला गया. यह जटायु उसी अरुण का पुत्र था और उसका एक भाई भी था जिसका नाम सम्पाति था. क्योकि भगवान विष्णु भी श्रीराम के रूप में सूर्यवंश में आए थे इसलिए यह कहा जाता है कि इस वंश की सेवा में सिर्फ जटायु ने ही नहीं उनके पिता अरुण और चाचा गरुड़ ने भी की थी.
सिर्फ जटायु ने ही नहीं उसके बड़े भाई सम्पाति ने भी समुद्र के किनारे हताश वानर सेना को माता सीता की खबर देकर श्रीराम की सहायता की थी. जटायु और सम्पाति जब युवा अवस्था में थे तब बड़े बलवान थे. उन्हें अपनी पंखो की शक्ति पर गर्व था. इस लिए उन दोनों ने सूर्य के रथ को पकड़ने के लिए दोड़ लगाईं थी. जब सूर्य की प्रचंड गर्मी के कारण जटायु के प्राण संकट में आए तो सम्पाति ने अपने पंखो के द्वारा छाया करके अपने छोटे भाई जटायु के प्राण तो बचा लिए परन्तु सम्पाति के पंख बुरी तरह जल गए और वह बेहोश होकर समुद्र के किनारे आकर गिर गया. जहाँ पर ऋषियों ने उसका उपचार करके ठीक तो कर दिया परन्तु फिर कभी वह अपने प्रिय भाई जटायु से नहीं मिल पाया.
जटायु ने देवासुर संग्राम में भी भाग लिया था और राजा दशरथ के साथ मिलकर असुरो के विरद्ध युद्ध किया था. इसलिए उसकी राजा दशरथ से मित्रता थी. जब जटायु की मृत्यु हुई तो श्रराम ने एक पुत्र की तरह जटायु का अग्नि संस्कार किया था. दोस्तों महानता जटायु को विरासत में मिली थी. जटायु महान ऋषि कश्यप के वंश में जन्मा था. सूर्य के सारथि अरुण जैसे महान पिता का वह पुत्र, पक्षियों के राजा गरुड़ जो विष्णु की सेवा में रहते थे ऐसे महान चाचा का वह भतीजा और अपने भाई के लिए अपने प्राणों की भी चिंता न करने वाले महान भाई सम्पाति का वह भाई था और भगवान श्रीराम का वह अनन्य सेवक था. भले ही रावण के द्वारा हरण किए जाते समय वह माता सीता की रक्षा न कर सका परन्तु अपने प्राण देकर जटायु ने स्वयं को अमर बना दिया.
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