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Wednesday, 17 August 2022

भगवान श्रीकृष्ण की 16 कलाओं के बारे में जानिए

 

भगवान विष्‍णु के सभी अवतारों में से कृष्‍णजी को सर्वश्रेष्‍ठ माना गया है क्‍योंकि उनके पास 16 कलाएं थीं। ये 16 कलाएं मानव जीवन के लिए भी बहुत उपयोगी मानी गई हैं।  आज और कल कृष्‍ण जन्‍माष्‍टमी देश भर में जोर-शोर से मनाई जाएगी। भगवान कृष्‍ण के जन्‍मोत्‍सव को लेकर मंदिरों और घरों में कई प्रकार के आयोजन होते हैं और भक्‍तजन कान्‍हाजी के जन्‍म की खुशियां मनाते हैं। पौराणिक मान्‍यताओं के अनुसार, भगवान विष्णु के सभी अवतारों में भगवान श्रीकृष्ण श्रेष्ठ अवतार हैं, क्‍योंकि वे 16 कला संपन्‍न अवतार कहलाते हैं। ऐसा माना जाता है कि बाकी अवतारों में विष्‍णुजी ने कुछ कलाओं के साथ अवतार लिया तो वे संपूर्ण अवतार नहीं कहलाए। कहते हैं कि कृष्‍णजी की अगर इन 16 कलाओं में से एक भी आपने सीख ली तो आप भी अपने जीवन में खास मुकाम हासिल कर सकते हें। तो चलिए जानते हैं कि कौन सी हैं कान्‍हाजी की ये 16 कलाएं।


श्री संपदा

इसका तात्पर्य है कि जिसके पास भी श्री कला या संपदा होगी वह धनी होगा। धनी होने का अर्थ सिर्फ पैसा पूंजी जोड़ने से नहीं है बल्कि मन वचन कर्म से धनी होना चाहिये। ऐसा व्यक्ति जिसके पास यदि कोई आस लेकर आता है तो वह उसे निराश नहीं लौटने देता। श्री संपदा युक्त व्यक्ति के पास मां लक्ष्मी का स्थायी निवास होता है। इस कला से संपन्न व्यक्ति समृद्धशाली जीवनयापन करता है।


भू संपदा

इसका अभिप्राय है कि इस कला से युक्त व्यक्ति बड़े भू-भाग का स्वामी हो, या किसी बड़े भू-भाग पर आधिपत्य अर्थात राज करने की क्षमता रखता हो। इस गुण वाले व्यक्ति को भू कला से संपन्न माना जाता है।

 

कीर्ति संपदा

कीर्ति अर्थात ख्याति जो विश्व प्रसिद्ध हो लोगों के बीच काफी लोकप्रिय, विश्वसनीय माना जाता हो व जन कल्याण कार्यों में पहल करने में हमेशा आगे रहता हो ऐसा व्यक्ति कीर्ति कला या संपदा युक्त माना जाता है।


वाणी सम्मोहन

कुछ लोगों की आवाज़ में एक अलग तरह का सम्मोहन होता है। लोग ना चाहकर भी उनके बोलने के अंदाज की प्रशंसा करते हैं। ऐसे लोग वाणी कला युक्त होते हैं इन पर मां सरस्वती की विशेष कृपा होती है। इन्हें सुनकर क्रोधी भी एकदम शांत हो जाता है। इन्हें सुनकर मन में भक्ति व प्रेम की भावना जाग जाती है।

 

लीला

इस कला से युक्त व्यक्ति चमत्कारी होता है उसके दर्शनों में एक अलग आनंद मिलता है। श्री हरि की कृपा से कुछ खास शक्ति इन्हें मिलती हैं और इनके व्‍यक्तित्‍व में अलग प्रकार की चमक होती है। ऐसे व्यक्ति जीवन को भगवान का दिया प्रसाद समझकर ही उसे ग्रहण करते हैं और हमेशा खुश रहते हैं।


कांति

कांति वह कला है जिससे चेहरे पर एक अलग नूर पैदा होता है, जिससे देखने मात्र से आप सुध-बुध खोकर उसके हो जाते हैं। यानी उनके रूप सौंदर्य से आप प्रभावित होते हैं। चाहकर भी आपका मन उनकी आभा से हटने का नाम नहीं लेता और आप उन्हें निहारे जाते हैं। ऐसे व्यक्ति को कांति कला से युक्त माना जा सकता है।

 

विद्या

विद्या भी एक कला है जिसके पास विद्या होती है उसमें अनेक गुण अपने आप आ जाते हैं विद्या से संपन्न व्यक्ति वेदों का ज्ञाता, संगीत व कला का मर्मज्ञ, युद्ध कला में पारंगत, राजनीति व कूटनीति में माहिर होता है।


विमल

विमल यानी छल-कपट, भेदभाव से रहित निष्पक्ष जिसके मन में किसी भी प्रकार मैल ना हो, कोई दोष न हो, जो आचार-विचार और व्यवहार से निर्मल हो, ऐसे व्यक्तित्व का धनी ही विमल कला युक्त होता है।

 

उत्कर्षिणि शक्ति

उत्कर्षिणि का अर्थ है प्रेरित करने की क्षमता। जो लोगों को उनके कर्तव्‍यों के प्रति जागृत करे और उन्‍हें प्रेरित करे। जो लोगों को मंजिल पाने के लिए प्रोत्साहित कर सके। किसी विशेष लक्ष्य को भेदने के लिए उचित मार्गदर्शन कर उसे वह लक्ष्य हासिल करने के लिए प्रेरित कर सके जिस प्रकार भगवान श्री कृष्ण ने युद्धभूमि में हथियार डाल चुके अर्जुन को गीतोपदेश से प्रेरित किया। ऐसी क्षमता रखने वाला व्यक्ति उत्कर्षिणि शक्ति से संपन्न व्यक्ति माना जाता है।

 

नीर-क्षीर विवेक

ऐसा ज्ञान रखने वाला व्यक्ति जो अपने ज्ञान से न्यायोचित फैसले लेता हो इस कला से संपन्न माना जा सकता है। ऐसा व्यक्ति विवेकशील तो होता ही है साथ ही वह अपने विवेक से लोगों को सही मार्ग सुझाने में भी सक्षम होता है।

 

कर्मण्यता

इस तरह के गुणों वाला व्यक्ति सिर्फ उपदेश देने में ही नहीं बल्कि स्वयं भी कर्मठ होता है। इस तरह के व्यक्ति खाली दूसरों को कर्म करने का उपदेश नहीं देते बल्कि स्वयं भी कर्म के सिद्धांत पर ही चलते हैं।

 

योगशक्ति

योग भी एक कला है। योग का साधारण शब्दों में अर्थ है जोड़ना यहां पर इसका आध्यात्मिक अर्थ आत्मा को परमात्मा से जोड़ने के लिए भी है। ऐसे व्यक्ति बेहद आकर्षक होते हैं और अपनी इस कला से ही वे दूसरों के मन पर राज करते हैं।

 

सत्य धारणा

कहते हैं सच बहुत कड़वा होता है इसलिए सत्य को धारण करना सबके बस में नहीं होता विरले ही होते हैं जो सत्य का मार्ग अपनाते हैं और किसी भी प्रकार की कठिन से कठिन परिस्थिति में भी सत्य का दामन नहीं छोड़ते। इस कला से संपन्न व्यक्तियों को सत्यवादी कहा जाता है। लोक कल्याण व सांस्कृतिक उत्थान के लिए ये कटु से कटु सत्य भी सबके सामने रखते हैं।

 

विनय

इसका अभिप्राय है विनयशीलता यानी जिसे अहं का भाव छूता भी न हो। जिसके पास चाहे कितना ही ज्ञान हो, चाहे वह कितना भी धनवान हो, बलवान हो मगर अहंकार उसके पास न फटके। शालीनता से व्यवहार करने वाला व्यक्ति इस कला में पारंगत हो सकता है।

 

आधिपत्य

आधिपत्य वैसे यह शब्द सुनने में तो शक्ति का सूचक लगता है, लेकिन यह भी एक गुण है। असल में यहां आधिपत्य का तात्पर्य जोर जबरदस्ती से किसी पर अपना अधिकार जमाने से नहीं है परंतु एक ऐसा गुण है जिसमें व्यक्ति का व्यक्तित्व ही ऐसा प्रभावशाली होता है कि लोग स्वयं उसका आधिपत्य स्वीकार कर लें, क्योंकि उन्हें उसके आधिपत्य में सरंक्षण का आभास व सुरक्षा का विश्वास होता है।

 

अनुग्रह क्षमता

जिसमें अनुग्रह की क्षमता होती है वह हमेशा दूसरों के कल्याण में लगा रहता है, परोपकार के कार्यों को करता रहता है। उनके पास जो भी सहायता के लिये पहुंचता वह अपनी सामर्थ्‍य के अनुसार उक्त व्यक्ति की सहायता भी करते हैं।

Thursday, 15 July 2021

महाशिवरात्रि पर शिव पूजा की थाली में रखें ये सामग्री

हिंदू पंचांग अनुसार महाशिवरात्रि का दिन बेहद ही खास होता है। इस दिन भगवान शिव की विशेष पूजा अर्चना की जाती है। वैसे तो हर महीने शिवरात्रि आती है लेकिन फाल्गुन मास की चतुर्दशी को आने वाली महाशिवरात्रि का विशेष महत्व होता है। हिन्दू पंचांग के अनुसार, महाशिवरात्रि का त्योहार प्रति वर्ष फाल्गुन माह कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि को मनाया जाता है।

यह त्योहार भगवान शिव और माता पार्वती के विवाहोत्सव के रूप में मनाया जाता है। इस बार फाल्गुन माह के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि 11 मार्च (गुरुवार) को पड़ रही है। महाशिवरात्रि शिव और शक्ति के मिलन का पर्व है। धार्मिक मान्यताओं अनुसार इस दिन व्रत पूजन करने से सभी कष्ट दूर हो जाते हैं।


महाशिवरात्रि पूजा सामग्री

इस बार महाशिवरात्रि का पावन पर्व 11 मार्च यानी कल मनाया जाएगा। इस पावन पर्व पर शिव के साथ माता पार्वती की पूजा की जाती है। शिवरात्रि के दिन रात में पूजा करना सबसे फलदायी माना गया है। इस दिन भगवान शिव की पूजा विशेष सामग्रियों के साथ की जाती है।


शिवरात्रि के दिन शिव की पूजा में पुष्प, बिल्वपत्र, भांग, धतूरा, बेर, जौ की बालें, आम्र मंजरी, मंदार पुष्प, गाय का कच्चा दूध, गन्ने का रस, दही, देसी घी, शहद, गंगा जल, साफ जल, कपूर, धूप, दीपक, रूई, चंदन, पंच फल, पंच मेवा, पंच रस, गंध रोली, इत्र, मौली जनेऊ, शिव और मां पार्वती के श्रृंगार की सामग्री, वस्त्राभूषण, रत्न, पंच मिष्ठान्न, दक्षिणा, पूजा के बर्तन, कुशासन का इस्तेमाल किया जाता है।


महाशिवरात्रि पर्व मनाने को लेकर कई कथाएं प्रचलित हैं। इनमें से सबसे प्रसिद्ध कथा के अनुसार ये पर्व शिव और माता पार्वती के मिलन की रात के रूप में मनाया जाता है। ऐसा माना जाता है कि इस दिन पार्वती जी का विवाह भगवान शिव से हुआ था।

Wednesday, 14 July 2021

 हनुमान जी का कर्ज़ा


राम जी लंका पर विजय प्राप्त करके आए तो कुछ दिन पश्चात राम जी ने विभीषण, जामवंत, सुग्रीव और अंगद आदि को अयोध्या से विदा कर दिया।

तो सब ने सोचा हनुमान जी को प्रभु बाद में विदा करेंगे, लेकिन राम जी ने हनुमान जी को विदा ही नहीं किया।

अब प्रजा बात बनाने लगी कि क्या बात है कि सब गए परन्तु अयोध्या से हनुमान जी नहीं गये।

अब दरबार में कानाफूसी शुरू हुई कि हनुमान जी से कौन कहे जाने के लिए, तो सबसे पहले माता सीता जी की बारी आई कि आप ही बोलो कि हनुमान जी चले जायें।

माता सीता बोलीं मै तो लंका में विकल पड़ी थी, मेरा तो एक-एक दिन एक-एक कल्प के समान बीत रहा था।

वो तो हनुमान जी थे, जो प्रभु मुद्रिका ले के गये, और धीरज बंधवाया कि...!

कछुक दिवस जननी धरु धीरा।

कपिन्ह सहित अइहहिं रघुबीरा।।

निसिचर मारि तोहि लै जैहहिं।

तिहुँ पुर नारदादि जसु गैहहिं॥


मैं तो अपने बेटे से बिल्कुल भी नहीं बोलूंगी अयोध्या छोड़कर जाने के लिए, आप किसी और से बुलावा लो।

अब बारी आई लखन जी की। तो लक्ष्मण जी ने कहा, मै तो लंका के रणभूमि में वैसे ही मरणासन्न अवस्था में पड़ा था।  पूरा राम दल विलाप कर रहा था।

प्रभु प्रलाप सुनि कान बिकल भए बानर निकर।

आइ गयउ हनुमान जिमि करुना महँ बीर रस।।

ये तो जो खड़ा है, वो हनुमान जी का लक्ष्मण है। मैं कैसे बोलूं, किस मुंह से बोलूं कि हनुमान जी अयोध्या से चले जाएं।

अब बारी आयी भरत जी की। अरे! भरत जी तो इतना रोये, कि राम जी को अयोध्या से निकलवाने का कलंक तो वैसे ही लगा है मुझ पे। हनुमान जी का, सब मिलके और लगवा दो।

और दूसरी बात ये कि...!

बीतें अवधि रहहिं जौं प्राना। 

अधम कवन जग मोहि समाना॥

मैंने तो नंदीग्राम में ही अपनी चिता लगा ली थी, वो तो हनुमान जी थे जिन्होंने आकर ये खबर दी कि...!


रिपु रन जीति सुजस सुर गावत।

सीता सहित अनुज प्रभु आवत॥


मैं तो बिल्कुल न बोलूं हनुमान जी से अयोध्या छोड़कर चले जाओ, आप किसी और से बुलवा लो।


अब बचा कौन..? सिर्फ शत्रुघ्न भैया। जैसे ही सब ने उनकी तरफ देखा, तो शत्रुघ्न भैया बोल पड़े..


मैंने तो पूरी रामायण में कहीं नहीं बोला, तो आज ही क्यों बुलवा रहे हो, और वो भी हनुमान जी को अयोध्या से निकलने के लिए।


जिन्होंने ने माता सीता, लखन भैया, भरत भैया सब के प्राणों को संकट से उबारा हो, किसी अच्छे काम के लिए कहते बोल भी देता। मै तो बिल्कुल भी न बोलूं।


अब बचे तो मेरे राघवेन्द्र सरकार...


माता सीता ने कहा प्रभु! आप तो तीनों लोकों के स्वामी हो, और देखती हूं आप हनुमान जी से सकुचाते हैं। और आप खुद भी कहते हो कि...!


प्रति उपकार करौं का तोरा।

सनमुख होइ न सकत मन मोरा॥


आखिर आप के लिए क्या अदेय है प्रभु !


राघव जी ने कहा, देवी क़र्ज़दार जो हूं, हनुमान जी का, इसीलिए तो..


सनमुख होइ न सकत मन मोरा


देवी ! हनुमान जी का कर्ज़ा उतारना आसान नहीं है, इतनी सामर्थ राम में नहीं है, जो "राम नाम" में है।


क्योंकि कर्ज़ा उतारना भी तो बराबरी का ही पड़ेगा न...! यदि सुनना चाहती हो तो सुनो - हनुमान जी का कर्ज़ा कैसे उतारा जा सकता है।


पहले हनुमान विवाह करें,

लंकेश हरें इनकी जब नारी।

मुंदरी लै रघुनाथ चले,

निज पौरुष लांघि अगम्य जे वारी।


आयि कहें, सुधि सोच हरें,

तन से, मन से होई जाएं उपकारी।


तब रघुनाथ चुकायि सकें,

ऐसी हनुमान की दिव्य उधारी।।


देवी ! इतना आसान नहीं है, हनुमान जी का कर्ज़ा चुकाना। मैंने ऐसे ही नहीं कहा था कि...!


"सुनु सुत तोहि उरिन मैं नाहीं"


मैंने बहुत सोच विचार कर कहा था। लेकिन यदि आप कहती हो तो कल राज्य सभा में बोलूंगा कि हनुमान जी भी कुछ मांग लें।


दूसरे दिन राज्य सभा में सब एकत्र हुए, सब बड़े उत्सुक थे कि हनुमान जी क्या मांगेंगे, और राम जी क्या देंगे।


राघव जी ने कहा ! हनुमान सब लोगों ने मेरी बहुत सहायता की और मैंने, सब को कोई न कोई पद दे दिया।


विभीषण और सुग्रीव को क्रमशः लंका और किष्कन्धा का राजपद, अंगद को युवराज पद। तो तुम भी अपनी इच्छा बताओ...?


हनुमान जी बोले ! प्रभु आप ने जितने नाम गिनाए, उन सब को एक एक पद मिला है, और आप कहते हो...!


तैं मम प्रिय लछिमन ते दूना


तो फिर यदि मैं दो पद मांगू तो..?


सब लोग सोचने लगे बात तो हनुमान जी भी ठीक ही कह रहे हैं। 


राम जी ने कहा ! ठीक है, मांग लो।


सब लोग बहुत खुश हुए कि आज हनुमान जी का कर्ज़ा चुकता हो जायेगा।


हनुमान जी ने कहा ! प्रभु जो पद आप ने सबको दिए हैं, उनके पद में राजमद हो सकता है, तो मुझे उस तरह के पद नहीं चाहिए, जिसमें राजमद की शंका हो।


तो फिर...! आप को कौन सा पद चाहिए ?


हनुमान जी ने राम जी के दोनों चरण पकड़ लिए, प्रभु ..! हनुमान को तो बस यही दो पद चाहिए।

हनुमत सम नहीं कोउ बड़भागी।

नहीं कोउ रामचरण अनुरागी।

Tuesday, 13 July 2021

अकबर ने एक ब्राह्मण को दयनीय हालत में जब भिक्षाटन करते देखा तो बीरबल की ओर व्यंग्य कसकर बोले...

अकबर ने एक ब्राह्मण को दयनीय हालत में जब भिक्षाटन करते देखा तो बीरबल की ओर व्यंग्य कसकर बोले - 'बीरबल ! ये हैं तुम्हारे ब्राह्मण ! जिन्हें ब्रह्म देवता के रुप में जाना जाता है । ये तो भिखारी हैं ।


बीरबल ने उस समय तो कुछ नहीं कहा । लेकिन जब अकबर महल में चला गया तो बीरबल वापिस आया और ब्राह्मण से पूछा कि वह भिक्षाटन क्यों करता है ?


ब्राह्मण ने कहा - 'मेरे पास धन, आभूषण, भूमि कुछ नहीं है और मैं ज्यादा शिक्षित भी नहीं हूँ । इसलिए परिवार के पोषण हेतू भिक्षाटन मेरी मजबूरी है ।


बीरबल ने पूछा - 'भिक्षाटन से दिन में कितना प्राप्त हो जाता है ?


ब्राह्मण ने जवाब दिया - 'छह से आठ अशर्फियाँ ।


बीरबल ने कहा - 'आपको यदि कुछ काम मिले तो क्या आप भिक्षा मांगना छोड़ देंगे ?'


ब्राह्मण ने पूछा - 'मुझे क्या करना होगा ?'

बीरबल ने कहा - 'आपको ब्रह्ममुहूर्त में स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करके प्रतिदिन 101 माला गायत्री मन्त्र का जाप करना होगा और इसके लिए आपको प्रतिदिन भेंट स्वरूप 10 अशर्फियाँ प्राप्त होंगी ।'

बीरबल का प्रस्ताव ब्राह्मण ने स्वीकार कर लिया । अगले दिन से ब्राह्मण ने भिक्षाटन करना बन्द कर दिया और बड़ी श्रद्धा भाव से गायत्री मन्त्र जाप करना प्रारम्भ कर दिया और शाम को 10 अशर्फियाँ भेंट स्वरूप लेकर अपने घर लौट आता । ब्राह्मण की सच्ची श्रद्धा व लगन देखकर कुछ दिनों बाद बीरबल ने गायत्री मन्त्र जाप की संख्या और अशर्फियों की संख्या दोनों ही बढ़ा दीं ।

अब तो गायत्री मन्त्र की शक्ति के प्रभाव से ब्राह्मण को भूख, प्यास व शारीरिक व्याधि की तनिक भी चिन्ता नहीं रही । गायत्री मन्त्र जाप के कारण उसके चेहरे पर तेज झलकने लगा । लोगों का ध्यान ब्राह्मण की ओर आकर्षित होने लगा । दर्शनाभिलाषी उनके दर्शन कर मिठाई, फल, पैसे, कपड़े चढ़ाने लगे । अब तो उसे बीरबल से प्राप्त होने वाली अशर्फियों की भी आवश्यकता नहीं रही । यहाँ तक कि अब तो ब्राह्मण को श्रद्धा पूर्वक चढ़ाई गई वस्तुओं का भी कोई आकर्षण नहीं रहा । बस वह सदैव मन से गायत्री जाप में लीन रहने लगा ।

ब्राह्मण सन्त के नित्य गायत्री जप की खबर चारों ओर फैलने लगी । दूरदराज से श्रद्धालु दर्शन करने आने लगे । भक्तों ने ब्राह्मण की तपस्थली में मन्दिर व आश्रम का निर्माण करा दिया । ब्राह्मण के तप की प्रसिद्धि की खबर अकबर को भी मिली । बादशाह ने भी दर्शन हेतु जाने का फैंसला लिया और वह शाही तोहफे लेकर राजसी ठाठबाट में बीरबल के साथ सन्त से मिलने चल पड़े । वहाँ पहुँचकर शाही भेंटे अर्पण कर ब्राह्मण को प्रणाम किया । ऐसे तेजोमय सन्त के दर्शनों से हर्षित हृदय सहित बादशाह बीरबल के साथ बाहर आ गए ।

तब बीरबल ने पूछा - 'क्या आप इस सन्त को जानतें हैं ?'

अकबर ने कहा - 'नहीं, बीरबल मैं तो इससे आज पहली बार मिला हूँ ।'

फिर बीरबल ने कहा - 'महाराज ! आप इसे अच्छी तरह से जानते हो । यह वही भिखारी ब्राह्मण है, जिस पर आपने व्यंग्य कसकर कहा था कि ''ये हैं तुम्हारे ब्राह्मण ! जिन्हें ब्रह्म देवता कहा जाता है ?''

आज आप स्वयं उसी ब्राह्मण के पैरों में शीश नवा कर आए हैं । अकबर के आश्चर्य की सीमा नहीं रही । बीरबल से पूछा - 'लेकिन यह इतना बड़ा बदलाव कैसे हुआ ?

 बीरबल ने कहा - 'महाराज ! वह मूल रूप में ब्राह्मण ही है । परिस्थितिवश वह अपने धर्म की सच्चाई व शक्तियोंं से दूर था । धर्म के एक गायत्री मन्त्र ने ब्राह्मण को साक्षात् 'ब्रह्म' बना दिया और कैसे बादशाह को चरणों में गिरने के लिए विवश कर दिया । 'यही ब्राह्मण आधीन मन्त्रों का प्रभाव है । यह नियम सभी ब्राह्मणों पर सामान रूप से लागू होता है क्योंकि ब्राह्मण आसन और तप से दूर रहकर जी रहे हैं, इसीलिए पीड़ित हैं। वर्तमान में आवश्यकता है कि सभी ब्राह्मण पुनः अपने कर्म से जुड़ें, अपने संस्कारों को जानें और मानें । मूल ब्रह्मरूप में जो विलीन होने की क्षमता रखता है वही ब्राह्मण है । यदि ब्राह्मण अपने कर्मपथ पर दृढ़ता से चले तो देव शक्तियाँ उसके साथ चल पड़ती हैं ।


परम ब्रम्हन महाकाल

Monday, 12 July 2021

जो कोई इन वृक्षों के पौधो का रोपण करेगा, उनकी देखभाल करेगा उसे नरक के दर्शन नही करना पड़ेंगे

 कृपया एक मिनिट निकाल कर अवश्य पढ़े।🙏🙏🙏

स्कन्द पुराण में एक अद्भुत श्लोक है।:

अश्वत्थमेकम् पिचुमन्दमेकम्न्य

ग्रोधमेकम्  दश चिञ्चिणीकान् ।

कपित्थबिल्वाऽऽमलकत्रयञ्च. पञ्चाऽऽम्रमुप्त्वा नरकन्न पश्येत्।।


अश्वत्थः = पिपल

पिचुमन्दः = नीम

न्यग्रोधः = वट वृक्ष

चिञ्चिणी = इमली 

कपित्थः = कविट 

बिल्वः = बेल

आमलकः = आवला

आम्रः = आम 

(उप्ति = पौधा लगाना) 


अर्थात- जो कोई इन वृक्षों के पौधो का  रोपण करेगा, उनकी देखभाल करेगा उसे नरक के दर्शन नही करना पड़ेंगे।


इस सीख का अनुसरण न करने के कारण हमें आज इस परिस्थिति के स्वरूप में नरक के दर्शन हो रहे हैं।. 

अभी भी कुछ बिगड़ा नही है, हम अभी भी अपनी गलती सुधार सकते हैं।


गुलमोहर, निलगिरी, जैसे वृक्ष अपने  देश के पर्यावरण के लिए घातक हैं। 


पश्चिमी देशों का अंधानुकरण कर हम ने अपना बड़ा नुकसान कर लिया है।


 

पीपल, बड़ और नीम जैसे वृक्ष रोपना बंद होने से सूखे की समस्या बढ़ रही है। ये।पढ़ कर हमें आश्चर्य होगा लेकिन ये सत्य है।.


( पिपल १००% कार्बन डाई ऑक्साइड शोषित करता है, बड़  ८०% और नीम ७५% शोषित करता है। ये सारे वृक्ष वातावरण में ऑक्सीजन की मात्रा बढ़ाते है साथ ही धरती के तापनाम को भी कम करते है।  ). 


हमने इन वृक्षों के पूजन की परंपरा को अंधविश्वास मानकर तथा तथाकथित साम्प्रदायिकता के चलते किसी वर्गविशेष की भावनाओं का ध्यान रखने के लिए इन वृक्षो से दूरी बनाकर  यूकेलिप्टस (नीलगिरी) के वृक्ष सड़क के दोनों ओर लगाने की शुरूआत की।  यूकेलिप्टस झट से बढ़ते है लेकिन  ये वृक्ष दलदली जमीन को सुखाने के लिए लगाए जाते हैं। इन वृक्षों से धरती का जलस्तर घट जाता है। विगत 40 वर्षों में नीलगिरी के वृक्षों को बहुतायात में लगा कर पर्यावरण की हानि की गई है।


पीपल को वृक्षों का राजा कहा जाता है। इस संबंध में शास्त्रों में एक श्लोक है -

मूले ब्रह्मा त्वचा विष्णु शाखा शंकरमेवच!!

पत्रे पत्रे सर्वदेवायाम् वृक्ष राज्ञो नमोस्तुते!!


इसका अर्थ समझना चाहिए।


आगामी वर्षों में प्रत्येक ५०० मीटर के अंतर पर यदि एक एक पिपल, बड़ , नीम आदि का वृक्षारोपण किया जाएगा तभी अपना भारत देश प्रदूषणमुक्त होगा। घरों में तुलसी के पौधे लगाना होंगे।

 हम अपने संगठित प्रयासों से ही अपने  "भारत  " को नैसर्गिक आपदा से बचा सकते है।


भविष्य में भरपूर मात्रा में नैसर्गिक ऑक्सीजन मिले इसके लिए आज से ही अभियान आरंभ करने की आवश्यकता है।


आइए हम बड़, पीपल,आम,इमली, आदी वृक्षों को लगाकर आने वाली पीढ़ी को निरोगी एवं सुजलां सुफलां पर्यावरण  देने का प्रयत्न करें। 

Sunday, 11 July 2021

पूजापाठ से जुड़ी हुईं महत्वपूर्ण बातें

★ एक हाथ से प्रणाम नही करना चाहिए।

★ सोए हुए व्यक्ति का चरण स्पर्श नहीं करना चाहिए। 

★ बड़ों को प्रणाम करते समय उनके दाहिने पैर पर दाहिने हाथ से और उनके बांये पैर को बांये हाथ से छूकर प्रणाम करें। 

★ जप करते समय जीभ या होंठ को नहीं हिलाना चाहिए। इसे उपांशु जप कहते हैं। इसका फल सौगुणा फलदायक होता हैं।

★ जप करते समय दाहिने हाथ को कपड़े या गौमुखी से ढककर रखना चाहिए। 

★ जप के बाद आसन के नीचे की भूमि को स्पर्श कर नेत्रों से लगाना चाहिए।

★ संक्रान्ति, द्वादशी, अमावस्या, पूर्णिमा, रविवार और सन्ध्या के समय तुलसी तोड़ना निषिद्ध हैं।

★ दीपक से दीपक को नही जलाना चाहिए।

★ यज्ञ, श्राद्ध आदि में काले तिल का प्रयोग करना चाहिए, सफेद तिल का नहीं। 

★ शनिवार को पीपल पर जल चढ़ाना चाहिए। पीपल की सात परिक्रमा करनी चाहिए। परिक्रमा करना श्रेष्ठ है, 

★ कूमड़ा-मतीरा-नारियल आदि को स्त्रियां नहीं तोड़े या चाकू आदि से नहीं काटें। यह उत्तम नही माना गया हैं। 

★ भोजन प्रसाद को लाघंना नहीं चाहिए।

★  देव प्रतिमा देखकर अवश्य प्रणाम करें।

★  किसी को भी कोई वस्तु या दान-दक्षिणा दाहिने हाथ से देना चाहिए।

★  एकादशी, अमावस्या, कृृष्ण चतुर्दशी, पूर्णिमा व्रत तथा श्राद्ध के दिन क्षौर-कर्म (दाढ़ी) नहीं बनाना चाहिए ।

★ बिना यज्ञोपवित या शिखा बंधन के जो भी कार्य, कर्म किया जाता है, वह निष्फल हो जाता हैं।

★ शंकर जी को बिल्वपत्र, विष्णु जी को तुलसी, गणेश जी को दूर्वा, लक्ष्मी जी को कमल प्रिय हैं।

★ शंकर जी को शिवरात्रि के सिवाय कुमकुम नहीं चढ़ती।

★ शिवजी को कुंद, विष्णु जी को धतूरा, देवी जी  को आक तथा मदार और सूर्य भगवानको तगर के फूल नहीं चढ़ावे।

★ अक्षत देवताओं को तीन बार तथा पितरों को एक बार धोकर चढ़ावे।

★ नये बिल्व पत्र नहीं मिले तो चढ़ाये हुए बिल्व पत्र धोकर फिर चढ़ाए जा सकते हैं।

★ विष्णु भगवान को चावल गणेश जी  को तुलसी, दुर्गा जी और सूर्य नारायण  को बिल्व पत्र नहीं चढ़ावें।

★ पत्र-पुष्प-फल का मुख नीचे करके नहीं चढ़ावें, जैसे उत्पन्न होते हों वैसे ही चढ़ावें।

★ किंतु बिल्वपत्र उलटा करके डंडी तोड़कर शंकर पर चढ़ावें। 

★पान की डंडी का अग्रभाग तोड़कर चढ़ावें।

★ सड़ा हुआ पान या पुष्प नहीं चढ़ावे।

★ गणेश को तुलसी भाद्र शुक्ल चतुर्थी को चढ़ती हैं।

★ पांच रात्रि तक कमल का फूल बासी नहीं होता है।

★ दस रात्रि तक तुलसी पत्र बासी नहीं होते हैं।

★ सभी धार्मिक कार्यो में पत्नी को दाहिने भाग में बिठाकर धार्मिक क्रियाएं सम्पन्न करनी चाहिए।

★ पूजन करनेवाला ललाट पर तिलक लगाकर ही पूजा करें।

★ पूर्वाभिमुख बैठकर अपने बांयी ओर घंटा, धूप तथा दाहिनी ओर शंख, जलपात्र एवं पूजन सामग्री रखें।

★ घी का दीपक अपने बांयी ओर तथा देवता को दाहिने ओर रखें एवं चांवल पर दीपक रखकर प्रज्वलित करें। 

★ गणेशजी को तुलसी का पत्र छोड़कर सब पत्र प्रिय हैं।  भैरव की पूजा में तुलसी स्वीकार्य नहीं है। 

★ कुंद का पुष्प शिव को माघ महीने को छोड़कर निषेध है। 

★ बिना स्नान किये जो तुलसी पत्र जो तोड़ता है उसे देवता स्वीकार नहीं करते।

★ रविवार को दूर्वा नहीं तोड़नी चाहिए। 

★ केतकी पुष्प शिव को नहीं चढ़ाना चाहिए। 

★ केतकी पुष्प से कार्तिक माह में विष्णु की पूजा अवश्य करें। 

★ देवताओं के सामने प्रज्जवलित दीप को बुझाना नहीं चाहिए। 

★ शालिग्राम का आवाह्न तथा विसर्जन नहीं होता।  

★ जो मूर्ति स्थापित हो उसमें आवाहन और विसर्जन नहीं होता। 

★ तुलसीपत्र को मध्यान्ह के बाद ग्रहण न करें। 

★ पूजा करते समय यदि गुरुदेव,ज्येष्ठ व्यक्ति या पूज्य व्यक्ति आ जाए तो उनको उठ कर प्रणाम कर उनकी आज्ञा से शेष कर्म को समाप्त करें। 

★ मिट्टी की मूर्ति का आवाहन और विसर्जन होता है और अंत में शास्त्रीयविधि से गंगा प्रवाह भी किया जाता है। 

★ कमल को पांच रात,बिल्वपत्र को दस रात और तुलसी को ग्यारह रात बाद शुद्ध करके पूजन के कार्य में लिया जा सकता है। 

 ★ पंचामृत में यदि सब वस्तु प्राप्त न हो सके तो केवल दुग्ध से स्नान कराने मात्र से पंचामृतजन्य फल जाता है।  

★ शालिग्राम पर अक्षत नहीं चढ़ता। लाल रंग मिश्रित चावल चढ़ाया जा सकता है। 

★ हाथ में धारण किये पुष्प, तांबे के पात्र में चन्दन और चर्म पात्र में गंगाजल अपवित्र हो जाते हैं। 

★ पिघला हुआ घी और पतला चन्दन नहीं चढ़ाना चाहिए। 

★ प्रतिदिन की पूजा में सफलता के लिए दक्षिणा अवश्य चढ़ाएं। 

★ आसन, शयन, दान, भोजन, वस्त्र संग्रह, विवाद और विवाह के समयों पर छींक शुभ मानी गई है।  

★ जो मलिन वस्त्र पहनकर, मूषक आदि के काटे वस्त्र, केशादि बाल कर्तन युक्त और मुख दुर्गन्ध युक्त हो, जप आदि करता है उसे देवता नाश कर देते हैं। 

★ मिट्टी, गोबर को निशा में और प्रदोषकाल में गोमूत्र को ग्रहण न करें। 

★ मूर्ति स्नान में मूर्ति को अंगूठे से न रगड़ें।

★ पीपल को नित्य नमस्कार पूर्वाह्न के पश्चात् दोपहर में ही करना चाहिए। इसके बाद न करें।  

★ जहां अपूज्यों की पूजा होती है और विद्वानों का अनादर होता है, उस स्थान पर दुर्भिक्ष, मरण और भय उत्पन्न होता है। 

★ पौष मास की शुक्ल दशमी तिथि, चैत्र की शुक्ल पंचमी और श्रावण की पूर्णिमा तिथि को लक्ष्मी प्राप्ति के लिए लक्ष्मी का पूजन करें। 

★ कृष्णपक्ष में, रिक्तिका तिथि में, श्रवणादी नक्षत्र में लक्ष्मी की पूजा न करें। 

★ अपराह्नकाल में, रात्रि में, कृष्ण पक्ष में, द्वादशी तिथि में और अष्टमी को लक्ष्मी का पूजन प्रारम्भ न करें। 

★ मंडप के नव भाग होते हैं, वे सब बराबर-बराबर के होते हैं अर्थात् मंडप सब तरफ से चतुरासन होता है, अर्थात् टेढ़ा नहीं होता। जिस कुंड की श्रृंगार द्वारा रचना नहीं होती वह यजमान का नाश करता है। 

★ पूजा-पाठ करते समय हो जाए कुछ गलती तो अंत में जरूर बोलें ये एक मंत्र

आवाहनं न जानामि न जानामि विसर्जनम्।

पूजां चैव न जानामि क्षमस्व परमेश्वर॥

मंत्रहीनं क्रियाहीनं भक्तिहीनं जनार्दन।

यत्पूजितं मया देव! परिपूर्ण तदस्तु मे॥


आप सभी को निवेदन है अगर हो सके तो और लोगों को भी आप इन महत्वपूर्ण बातों से अवगत करा सकते हैं।

Saturday, 10 July 2021

भगवान् शिव के मुख्य अवतार

वीरभद्र: वीरभद्र को भगवान शिव का गण माना जाता है। यह अवतार उनकी जटा से उत्पन्न हुआ था। जब भगवान शिव के श्वसुर राजा दक्ष द्वारा आयोजित यज्ञ में माता सती ने अपनी देह का त्याग कर दिया था तब क्रोधवश भगवान शिव ने अपने सिर से एक जटा उखाड़ी और उसे पर्वत के उपर पटक दिया। उस जटा के पूर्वभाग से महाभंयकर वीरभद्र प्रगट हुए। शिव के इस अवतार ने दक्ष के यज्ञ का विध्वंस कर दिया और दक्ष का सिर काटकर शिव के सामने रख दिया था। बाद में भगवान शिव ने राजा दक्ष के सिर पर बकरे का सिर लगा कर उन्हें जिंदा कर दिया था।


पिप्पलाद: ये दधीचि ऋषि के पुत्र थे। कथा है कि पिप्पलाद ने देवताओं से पूछा- क्या कारण है कि मेरे पिता दधीचि जन्म से पूर्व ही मुझे छोड़कर चले गए? देवताओं ने बताया शनिग्रह की दृष्टि के कारण ही ऐसा कुयोग बना। पिप्पलाद यह सुनकर बड़े क्रोधित हुए। उन्होंने शनि को नक्षत्र मंडल से गिरने का श्राप दे दिया। श्राप के प्रभाव से शनि उसी समय आकाश से गिरने लगे। देवताओं की प्रार्थना पर पिप्पलाद ने शनि को इस बात पर क्षमा किया कि शनि जन्म से लेकर 16 साल तक की आयु तक किसी को कष्ट नहीं देंगे। तभी से पिप्पलाद का स्मरण करने मात्र से शनि की पीड़ा दूर हो जाती है।


नंदी: कथा अनुसार शिलाद नामक एक मुनि ब्रह्मचारी थे। वंश समाप्त होता देख उनके पितरों ने शिलाद से संतान उत्पन्न करने को कहा। शिलाद ने अयोनिज और मृत्युहीन संतान की कामना से भगवान शिव की तपस्या की। तब शिव के वरदान से कुछ समय बाद भूमि जोतते समय शिलाद को भूमि से उत्पन्न एक बालक मिला। शिलाद ने उसका नाम नंदी रखा। शिव ने नंदी को अपना गणाध्यक्ष बनाया। मरुतों की पुत्री सुयशा के साथ नंदी का विवाह हुआ।


भैरव: कथा अनुसार एक बार ब्रह्मा और विष्णु स्वयं को श्रेष्ठ मानने लगे। इसी दौरान वहां तेज-पुंज के मध्य एक पुरुषाकृति दिखलाई पड़ी। उन्हें देखकर ब्रह्माजी ने कहा- चंद्रशेखर तुम मेरे पुत्र हो। अत: मेरी शरण में आ जाओ। ब्रह्मा की ऐसी बात सुनकर भगवान शिव को क्रोध आ गया। उन्होंने उस पुरुषाकृति से कहा- काल की भांति शोभित होने के कारण आप साक्षात कालराज हैं। भीषण होने से भैरव हैं। भगवान शंकर से इन वरों को प्राप्त कर कालभैरव ने अपनी अंगुली के नाखून से ब्रह्मा के पांचवे सिर को काट दिया। ब्रह्मा का पांचवा सिर काटने के कारण भैरव ब्रह्महत्या के पाप से दोषी हो गए। काशी में भैरव को ब्रह्महत्या के पाप से मुक्ति मिली। शिव महापुराण में भैरव को भगवान शंकर का पूर्ण रूप बताया गया है।


अश्वत्थामा: अश्वत्थामा काल, क्रोध, यम व भगवान शंकर के अंशावतार थे। महाभारत में गुरु द्रोणाचार्य के पुत्र अश्वत्थामा ही एकमात्र ऐसे योद्धा थे जो युद्ध को कोरवों के पक्ष में करने की क्षमता रखते थे, लेकिन उन्हें युद्ध के अंत में सेनापति बनाया गया था। द्रोणाचार्य ने भगवान शिव को पुत्र रूप में पाने की लिए घोर तपस्या की थी। उनकी तपस्या से प्रसंन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें वरदान दिया था कि वे उनके पुत्र के रूप में अवतीर्ण होंगे। समय आने पर सवन्तिक रुद्र ने अपने अंश से द्रोण के बलशाली पुत्र अश्वत्थामा के रूप में अवतार लिया। ऐसी मान्यता है कि अश्वत्थामा अमर हैं तथा वह आज भी धरती पर ही निवास करते हैं।


शरभ: भगवान शिव का छठा अवतार है शरभावतार। शरभावतार में भगवान शंकर का स्वरूप आधा मृग तथा शेष शरभ पक्षी (पुराणों में वर्णित आठ पैरों वाला जंतु जो शेर से भी शक्तिशाली था) का था। लिंगपुराण में शिव के शरभावतार की कथा है, उसके अनुसार हिरण्यकशिपु का वध करने के लिए भगवान विष्णु ने नृसिंहावतार लिया था। हिरण्यकशिपु के वध के पश्चात भी जब भगवान नृसिंह का क्रोध शांत नहीं हुआ तो देवता शिवजी के पास पहुंचे। तब भगवान शिव ने शरभावतार लिया और वे इसी रूप में भगवान नृसिंह के पास पहुंचे तथा उनकी स्तुति की, लेकिन नृसिंह की क्रोधाग्नि शांत नहीं हुई। यह देखकर शरभ रूपी भगवान शिव अपनी पूंछ में नृसिंह को लपेटकर ले उड़े। तब कहीं जाकर भगवान नृसिंह की क्रोधाग्नि शांत हुई। तब उन्होंने शरभावतार से क्षमा याचना कर अति विनम्र भाव से उनकी स्तुति की।


गृहपति: भगवान शंकर का सातवां अवतार है गृहपति। कथा अनुसार नर्मदा के तट पर धर्मपुर नामक नगर में विश्वानर नाम के एक मुनि तथा उनकी पत्नी शुचिष्मती रहती थीं। शुचिष्मती ने बहुत काल तक नि:संतान रहने पर एक दिन अपने पति से शिव के समान पुत्र प्राप्ति की इच्छा की। मुनि विश्वनार ने काशी जाकर भगवान शिव के वीरेश लिंग की आराधना की। एक दिन मुनि को वीरेश लिंग के मध्य एक बालक दिखाई दिया। मुनि ने बालरूपधारी शिव की पूजा की। उनकी पूजा से प्रसन्न होकर भगवान शंकर ने शुचिष्मति के गर्भ से अवतार लेने का वरदान दिया। कालांतर में शुचिष्मति गर्भवती हुई और भगवान शंकर शुचिष्मती के गर्भ से पुत्ररूप में प्रकट हुए।


दुर्वासा: धर्म ग्रंथों के अनुसार सती अनुसूइया के पति महर्षि अत्रि ने ब्रह्मा के निर्देशानुसार पत्नी सहित ऋक्षकुल पर्वत पर पुत्रकामना से घोर तप किया। उनके तप से प्रसन्न होकर ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों उनके आश्रम पर आए। उन्होंने कहा- हमारे अंश से तुम्हारे तीन पुत्र होंगे, जो त्रिलोकी में विख्यात तथा माता-पिता का यश बढ़ाने वाले होंगे। समय आने पर ब्रह्माजी के अंश से चंद्रमा उत्पन्न हुए। विष्णु के अंश से श्रेष्ठ संन्यास पद्धति को प्रचलित करने वाले दत्तात्रेय उत्पन्न हुए और रुद्र के अंश से मुनिवर दुर्वासा ने जन्म लिया।


हनुमान: शिवमहापुराण के अनुसार देवताओं और दानवों को अमृत बांटते हुए विष्णुजी के मोहिनी रूप को देखकर लीलावश शिवजी ने कामातुर होकर अपना वीर्यपात कर दिया। सप्तऋषियों ने उस वीर्य को कुछ पत्तों में संग्रहित कर लिया। समय आने पर सप्तऋषियों ने भगवान शिव के वीर्य को वानरराज केसरी की पत्नी अंजनी के कान के माध्यम से गर्भ में स्थापित कर दिया, जिससे अत्यंत तेजस्वी एवं प्रबल पराक्रमी श्री हनुमानजी उत्पन्न हुए।


वृषभ: धर्मग्रंथों अनुसार इस अवतार में भगवान शिव ने विष्णु पुत्रों का संहार किया था। जब भगवान विष्णु दैत्यों को मारने पाताल लोक गए तो उन्हें वहां बहुत सी चंद्रमुखी स्त्रियां दिखाई पड़ी। विष्णु ने उनके साथ रमण करके बहुत से पुत्र उत्पन्न किए। विष्णु के इन पुत्रों ने पाताल से पृथ्वी तक बड़ा उपद्रव किया। उनसे घबराकर ब्रह्माजी ऋषिमुनियों को लेकर शिवजी के पास गए और रक्षा के लिए प्रार्थना करने लगे। तब भगवान शंकर ने वृषभ रूप धारण कर विष्णु पुत्रों का संहार किया।


यतिनाथ: कथा अनुसार अर्बुदाचल पर्वत के समीप शिवभक्त आहुक-आहुका भील दम्पत्ति रहते थे। एक बार भगवान शंकर यतिनाथ के वेष में उनके घर आए। उन्होंने भील दम्पत्ति के घर रात व्यतीत करने की इच्छा प्रकट की। आहुका ने अपने पति को गृहस्थ की मर्यादा का स्मरण कराते हुए स्वयं धनुषबाण लेकर बाहर रात बिताने और यति को घर में विश्राम करने देने का प्रस्ताव रखा। इस तरह आहुक धनुषबाण लेकर बाहर चला गया। प्रात:काल आहुका और यति ने देखा कि वन्य प्राणियों ने आहुक को मार डाला है। इस पर यतिनाथ बहुत दु:खी हुए। तब आहुका ने उन्हें शांत करते हुए कहा कि आप शोक न करें। अतिथि सेवा में प्राण विसर्जन धर्म है और उसका पालन कर हम धन्य हुए हैं। जब आहुका अपने पति की चिताग्नि में जलने लगी तो शिवजी ने उसे दर्शन देकर अगले जन्म में पुन: अपने पति से मिलने का वरदान दिया।


कृष्णदर्शन: इक्ष्वाकुवंशीय श्राद्धदेव की नवमी पीढ़ी में राजा नभग का जन्म हुआ। विद्या-अध्ययन को गुरुकुल गए नभग जब बहुत दिनों तक न लौटे तो उनके भाइयों ने राज्य का विभाजन आपस में कर लिया। नभग को जब यह बात ज्ञात हुई तो वह अपने पिता के पास गए। पिता ने नभग से कहा कि वह यज्ञ परायण ब्राह्मणों के मोह को दूर करते हुए उनके यज्ञ को सम्पन्न करके, उनके धन को प्राप्त करे। तब नभग ने यज्ञभूमि में पहुंचकर वैश्य देव सूक्त के स्पष्ट उच्चारण द्वारा यज्ञ संपन्न कराया। अंगारिक ब्राह्मण यज्ञ अवशिष्ट धन नभग को देकर स्वर्ग को चले गए। उसी समय शिवजी कृष्णदर्शन रूप में प्रकट होकर बोले कि यज्ञ के अवशिष्ट धन पर तो उनका अधिकार है। विवाद होने पर कृष्णदर्शन रूपधारी शिवजी ने उसे अपने पिता से ही निर्णय कराने को कहा। नभग के पूछने पर श्राद्धदेव ने कहा-वह पुरुष शंकर भगवान हैं। यज्ञ में अवशिष्ट वस्तु उन्हीं की है। पिता की बातों को मानकर नभग ने शिवजी की स्तुति की। भगवान शिव ने इस अवतार में यज्ञ आदि धार्मिक कार्यों के महत्व को बताया है।


अवधूत: भगवान शंकर ने अवधूत अवतार लेकर इंद्र के अंहकार को चूर किया था। एक समय बृहस्पति और अन्य देवताओं को साथ लेकर इंद्र शंकर जी के दर्शनों के लिए कैलाश पर्वत पर गए। इंद्र की परीक्षा लेने के लिए शंकरजी ने अवधूत रूप धारण कर उनका मार्ग रोक लिया। इंद्र ने उस पुरुष से अवज्ञापूर्वक बार-बार उसका परिचय पूछा तो भी वह मौन रहा। इस पर क्रुद्ध होकर इंद्र ने ज्यों ही अवधूत पर प्रहार करने के लिए वज्र छोडना चाहा, वैसे ही उनका हाथ स्तंभित हो गया। यह देखकर बृहस्पति ने शिवजी को पहचान कर अवधूत की बहुविधि स्तुति की, जिससे प्रसन्न होकर शिवजी ने इंद्र को क्षमा कर दिया।


भिक्षुवर्य: धर्म ग्रंथों के अनुसार विदर्भ नरेश सत्यरथ को शत्रुओं ने मार डाला। उसकी गर्भवती पत्नी ने शत्रुओं से छिपकर अपने प्राण बचाए। समय आने पर उसने एक पुत्र को जन्म दिया। रानी जब जल पीने के लिए सरोवर गई तो उसे घड़ियाल ने अपना आहार बना लिया। तब वह बालक भूख-प्यास से तड़पने लगा। इसी दौरान शिवजी की प्रेरणा से एक भिखारिन वहां पहुंची। तब शिवजी ने भिक्षुक का रूप धारण कर उस भिखारिन को बालक का परिचय दिया और उसके पालन-पोषण का निर्देश दिया तथा यह भी कहा कि यह बालक विदर्भ नरेश सत्यरथ का पुत्र है। यह सब कह कर भिक्षुक रूपधारी शिव ने उस भिखारिन को अपना वास्तविक रूप दिखाया। शिव के आदेश अनुसार भिखारिन ने उस बालक का पालन-पोषण किया। बड़ा होकर उस बालक ने शिवजी की कृपा से अपने दुश्मनों को हराकर पुन: अपना राज्य प्राप्त किया।


सुरेश्वर: भगवान शंकर का सुरेश्वर (इंद्र) अवतार भक्त के प्रति उनकी प्रेमभावना को प्रदर्शित करता है। इस अवतार में भगवान शंकर ने एक छोटे से बालक उपमन्यु की भक्ति से प्रसन्न होकर उसे अपनी परम भक्ति और अमर पद का वरदान दिया। कथा कहती है कि व्याघ्रपाद का पुत्र उपमन्यु अपने मामा के घर पलता था। वह सदा दूध की इच्छा से व्याकुल रहता था। उसकी मां ने उसे अपनी अभिलाषा पूर्ण करने के लिए शिवजी की शरण में जाने को कहा। इस पर उपमन्यु वन में जाकर ऊँ नम: शिवाय का जप करने लगा। भगवान शिव सुरेश्वर (इंद्र) का रूप धारण कर उसके समक्ष उपस्थित हुए और वे शिवजी की अनेक प्रकार से निंदा करने लगे। इस पर उपमन्यु क्रोधित होकर इंद्र को मारने के लिए खड़ा हो गया। उपमन्यु को अपने में दृढ़ शक्ति और अटल विश्वास देखकर शिवजी ने उसे अपने वास्तविक रूप के दर्शन कराए तथा क्षीरसागर के समान एक अनश्वर सागर उसे प्रदान किया। उसकी प्रार्थना पर कृपालु शिवजी ने उसे परम भक्ति का पद भी दिया।


किरात: महाभारत के अनुसार वनवास के दौरान जब अर्जुन भगवान शंकर को प्रसन्न करने के लिए तपस्या कर रहे थे, तभी दुर्योधन द्वारा भेजा हुआ मूड़ नामक दैत्य अर्जुन को मारने के लिए शूकर (सुअर) का रूप धारण कर वहां पहुंचा। अर्जुन ने शूकर पर अपने बाण से प्रहार किया, उसी समय भगवान शंकर ने भी किरात वेष धारण कर उसी शूकर पर बाण चलाया। शिव की माया के कारण अर्जुन उन्हें पहचान न पाए और शूकर का वध उसके बाण से हुआ है, यह कहने लगे। इस पर दोनों में विवाद हो गया। अर्जुन ने किरात वेषधारी शिव से युद्ध किया। अर्जुन की वीरता देख भगवान शिव प्रसन्न हो गए और अपने वास्तविक स्वरूप में आकर अर्जुन को कौरवों पर विजय का आशीर्वाद दिया।


ब्रह्मचारी: दक्ष के यज्ञ में प्राण त्यागने के बाद जब सती ने हिमालय के घर जन्म लिया तो शिवजी को पति रूप में पाने के लिए घोर तप किया। पार्वती की परीक्षा लेने के लिए शिवजी ब्रह्मचारी का वेष धारण कर उनके पास पहुंचे। पार्वती ने ब्रह्मचारी को देख उनकी विधिवत पूजा की। जब ब्रह्मचारी ने पार्वती से उसके तप का उद्देश्य पूछा और जानने पर शिव की निंदा करने लगे तथा उन्हें श्मशानवासी व कापालिक भी कहा। यह सुन पार्वती को बहुत क्रोध हुआ। पार्वती की भक्ति व प्रेम को देखकर शिव ने उन्हें अपना वास्तविक स्वरूप दिखाया। यह देख पार्वती अति प्रसन्न हुईं।


सुनटनर्तक: पार्वती के पिता हिमाचल से उनकी पुत्री का हाथ मागंने के लिए शिवजी ने सुनटनर्तक वेष धारण किया था। हाथ में डमरू लेकर शिवजी नट के रूप में हिमाचल के घर पहुंचे और नृत्य करने लगे। नटराज शिवजी ने इतना सुंदर और मनोहर नृत्य किया कि सभी प्रसन्न हो गए। जब हिमाचल ने नटराज को भिक्षा मांगने को कहा तो नटराज शिव ने भिक्षा में पार्वती को मांग लिया। इस पर हिमाचलराज अति क्रोधित हुए। कुछ देर बाद नटराज वेषधारी शिवजी पार्वती को अपना रूप दिखाकर स्वयं चले गए। उनके जाने पर मैना और हिमाचल को दिव्य ज्ञान हुआ और उन्होंने पार्वती को शिवजी को देने का निश्चय किया।


यक्ष: ये अवतार शिवजी ने देवताओं के अनुचित और मिथ्या अभिमान को दूर करने के लिए धारण किया था। देवता और असुरों द्वारा किए गए समुद्रमंथन के दौरान जब भयंकर विष निकला तो भगवान शंकर ने उस विष को ग्रहण कर अपने कण्ठ में रोक लिया। इसके बाद अमृत कलश निकला। अमृतपान करने से सभी देवता अमर तो हो गए साथ ही उनहें अभिमान भी हो गया कि वे सबसे बलशाली हैं। देवताओं के इसी अभिमान को तोड़ने के लिए शिवजी ने यक्ष का रूप धारण किया व देवताओं के आगे एक तिनका रखकर उसे काटने, जलाने, डूबोने या उड़ाने को कहा। अपनी पूरी शक्ति लगाने पर भी देवता उस तिनके को हिला भी नहीं पाए। तभी आकाशवाणी हुई कि यह यक्ष सब गर्वों के विनाशक शंकर भगवान हैं। सभी देवताओं ने भगवान शंकर की स्तुति की तथा अपने अपराध के लिए क्षमा मांगी।

Friday, 9 July 2021

भगवान शिव का वार सोमवार माना जाता है

भगवान शिव का वार सोमवार माना जाता है। ऐसे में कहा जाता है कि यदि सोमवार को अगर भगवान शिव की सच्चे मन से पूजा की जाए तो सारे क्लेशों से मुक्ति मिलती है और मनोकामना पूर्ण होती है। शिव सदा अपने भक्तों पर कृपा बरसाते हैं। इसलिए मान्यता है कि भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए सोमवार को सुबह उठकर स्नान करके भगवान शिव की आराधना करें भगवान शंकर के साथ माता पार्वती और नंदी को गंगाजल चढ़ाएं। साथ ही इस दिन शिवजी पर खास तौर से चंदन, अक्षत, बिल्व पत्र, धतूरा या आंकड़े के फूल चढ़ाएं। ये सभी चीजें भगवान शिव की प्रिय हैं। इन्हें चढ़ाने पर भोलेनाथ जल्दी प्रसन्न होकर अपनी कृपा बरसाते है। 

सोमवार के दिन भगवान शिवजी को घी, शक्कर, गेंहू के आटे से बने प्रसाद का भोग लगाना चाहिए। इसके बाद धूप, दीप से आरती करें। प्रसाद को गुरुजनों, बुजुर्गों और परिवार, मित्र सहित ग्रहण करें।

मान्यता है कि सोमवार के दिन  महामृत्युंजय मंत्र का जाप 108 बार करने से भगवान शिव की विशेष कृपा प्राप्त होती है। सोमवार के दिन शिवलिंग पर गाय का कच्चा दूध चढ़ाने से भगवान शिव की कृपा आप पर हमेशा बनी रहेगी। इसके अलावा भगवान के अन्य मंत्रों का भी स्मरण करने से भगवान की कृपा बरसती रहती है।

भगवान शिव का मंत्र- नम: शिवाय, ऊँ नम: शिवाय॥ 


शिव पूजा में इन बातों का रखें खास ध्यान:

शिव पूजा में बहुत सी ऐसी चीजें अर्पित की जाती हैं जो अन्य किसी देवता को नहीं चढ़ाई जाती, जैसे- आक, बिल्वपत्र, भांग आदि। इसी तरह माना जाता है कि शिव पूजा में कई ऐसी चीजें होती हैं जो आपकी पूजा का फल देने की बजाय आपको नुकसान पहुंचा सकती हैं...


1. हल्दी: हल्दी खानपान का स्वाद तो बढ़ाती है साथ ही धामिज़्क कार्यों में भी हल्दी का महत्वपूर्ण स्थान माना गया है, लेकिन शिवजी की पूजा में हल्दी नहीं चढ़ाई जाती है। हल्दी उपयोग मुख्य रूप से सौंदर्य प्रसाधन में किया जाता है. शास्त्रों के अनुसार शिवलिंग पुरुषत्व का प्रतीक है, इसी वजह से महादेव को हल्दी नहीं चढ़ाई जाती।

2. फूल: शिव को कनेर और कमल के अलावा लाल रंग के फूल प्रिय नहीं हैं, शिव को केतकी और केवड़े के फूल चढ़ाने का निषेध किया गया है। 

3. कुमकुम या रोली: शास्त्रों के अनुसार शिव जी को कुमकुम और रोली नहीं लगाई जाती है। 

4. शिव पूजा में वर्जित है शंख: शंख भगवान विष्णु को बहुत ही प्रिय हैं, लेकिन शिव जी ने शंखचूर नामक असुर का वध किया था इसलिए शंख भगवान शिव की पूजा में वर्जित माना गया है।

5. नारियल पानी: नारियल पानी से भगवान शिव का अभिषेक नहीं करना चाहिए मान्यता के अनुसार नारियल को लक्ष्मी का स्वरूप माना जाता है, इसलिए सभी शुभ कार्य में नारियल को प्रसाद के तौर पर ग्रहण किया जाता है। लेकिन कहा जाता है कि शिव पर अर्पित होने के बाद नारियल पानी ग्रहण योग्य नहीं रह जाता है।

6. तुलसी दल: तुलसी का पत्ता भी भगवान शिव को नहीं चढ़ाना चाहिए। इस संदर्भ में असुर राज जलंधर की कथा है जिसकी पत्नी वृंदा तुलसी का पौधा बन गई थी। भगवान शिव ने जलंधर का वध किया था इसलिए वृंदा ने भगवान शिव की पूजा में तुलसी के पत्तों का प्रयोग न करने की बात कही थी


शिव पूजन में चढऩे वाली चीजें...

जल, दूध, दही, शहद, घी, चीनी, इत्र, चंदन, केसर, भांग। इन सभी चीजों को एक साथ मिलाकर या एक-एक चीज शिवलिंग पर चढ़ा सकते हैं। शिवपुराण में बताया गया है कि इन चीजों से शिवलिंग को स्नान कराने पर सभी इच्छाएं पूरी होती हैं।


10 चीजें और उनसे मिलने वाले फल की यह मान्यता है...

1. मंत्रों का उच्चारण करते हुए शिवलिंग पर जल चढ़ाने से हमारा स्वभाव शांत होता है, आचरण स्नेेहमय होता है।

2. शहद चढ़ाने से हमारी वाणी में मिठास आती है।

3. दूध अर्पित करने से उत्तम स्वास्थ्य मिलता है।

4. दही चढ़ाने से हमारा स्वभाव गंभीर होता है।

5. शिवलिंग पर घी अर्पित करने से हमारी शक्ति बढ़ती है।

6. इत्र से स्नान करवाने से विचार पवित्र होते हैं। 

7. शिवजी को चंदन चढ़ाने से हमारा व्यक्तित्व आकर्षक होता है, समाज में मान-सम्मान प्राप्त होता है।

8. केसर अर्पित करने से सौम्यता प्राप्त होती है।

9. भांग चढ़ाने से विकार और बुराइयां दूर होती हैं।

10. शक्कर चढ़ाने से सुख और समृद्धि बढ़ती है।


शिव पूजन की सामान्य विधि

जिस दिन शिव पूजन करना चाहते हैं, उस दिन सुबह स्नान आदि नित्य कर्मों से निवृत्त होकर पवित्र हो जाएं। इसके बाद घर के मंदिर में ही या किसी शिव मंदिर जाएं। मंदिर पहुंचकर भगवान शिव के साथ माता पार्वती और नंदी को गंगाजल या पवित्र जल अर्पित करें। जल अर्पित करने के बाद शिवलिंग पर चंदन, चावल, बिल्वपत्र, आंकड़े के फूल और धतूरा चढ़ाएं।


पूजन में इस मंत्र का जप करें-

'मन्दारमालांकलितालकायै कपालमालांकितशेखराय।

दिव्याम्बरायै च दिगम्बराय नम: शिवायै च नम: शिवाय।।'


पूजा संपन्न करने के लिए भगवान शिव को घी, शक्कर का भोग लगाएं और इसके बाद धूप, दीप से आरती करें।

Thursday, 8 July 2021

छबील क्यूं लगाई जाती है।



श्री गुरु अर्जुनदेव जी को जिस दिन गर्म तवी पर बिठाया गया,उसी शाम को गुरु जी को वापिस जेल मे डाल दिया गया, और बहुत सख्त पहरा लगा दिया गया कि कोई भी गुरुजी से मिल ना सके, उस समय चँदू लाहोर का नवाब था।

जिसके हुकुम से ये सब हूआ था, उसी रात को चँदू की पत्नी, चँदू का पुत्र कर्मचंद और पुत्रवधू गुरु अर्जुनदेव जी से मिलने जेल मे गए तो सिपाहियों ने उन्हें आगे नहीं जाने दिया, तो चँदू की पत्नी और पुत्रवधू ने अपने सारे जेवरात उतार कर सिपाहियों को दे दिये और उस जगह पहुंच गए जहाँ गुरु जी कैद थे।

जब चँदू के परिवार ने गुरुजी की हालत देखी तो सभी रोने लगे कि इतने बड़े महापुरुष के साथ ऐसा सलूक ?

तब चँदू की पत्नी ने कहा गुरुजी मैं आपके लिए ठंडा मिठा शरबत लेकर आई हूँ कृपया करके शरबत पी लिजिए, ये कहते हुए शरबत का गिलास गुरुजी के आगे रख दिया, तो गुरुजी ने मना कर दिया और कहा हम परण कर चुके हैं कि हम चँदू के घर का पानी भी नहीं पियेंगे।ये सुन कर चँदू की पत्नी की आँखें भर आईऔर बोली कि मैंने तो सुना है कि गुरुजी के घर से कोई खाली हाथ नहीं गया पर ?

तब गुरु जी ने वचन किया कि माता इस मुख से तो मैं तेरा शरबत नहीं पियूँगा, पर हां एक समय ऐसा जरुर आएगा जब ये जो शरबत आप लेकर आयीं हैं, आपके नाम का ये शरबत हजारों लोग पिलाएंगे और लाखों लोग पिएंगे।आपकी सेवा सफल होगी।


आज ये छबील लगाई और पिलाई जाती है ये गुरु अर्जुन देव जी का वचन है, ये है छबील का इतिहास जो देश के हर गांव और शहर में ठंडे मिठे पानी की छबीलें लगाई जाती है।


तब चँदू की पुत्रवधू ने गुरु जी से विनती की,कि महाराज कल आपको शहीद कर दिया जयेगा, मेरी आपसे एक ही विनती है कि कल जब आप ये शरीर रुपी चोला छोड़ो तो मैं भी अपना शरीर छोड़ दूँ,मैं लोगों के ताने नहीं सुन सकती कि वो देखो चँदू की पुत्रवधू जा रही जिसके ससुर ने श्री गुरू अर्जुन देव जी को शहीद किया था।अगले दिन जब गुरु जी को शहीद किया गया तो चँदू की पुत्रवधू भी शरीर त्याग गई।

ये होता है अपने गुरु से सच्चा प्यार और गुरु के प्रति श्रध्दा।

बातों से कभी ईश्वर नहीं मिलता, यहां तो 90-90साल के बुर्जुग भी मरने को तैयार नहीं,

पर धन है चँदू की पुत्रवधू🙏


इस बारे मे लोगों को बहुत कम ही जानकारी है, अगर अच्छा लगा हो तो आप से विनती है कि आज की पीढ़ी तक गुरु इतिहास की जानकारी पहुचाएं।।

दान की प्रक्रिया

        राजा हरिश्चंद्र एक बहुत बड़े दानवीर थे। उनकी ये एक खास बात थी कि जब वो दान देने के लिए हाथ आगे बढ़ाते तो अपनी नज़रें नीचे झुका लेते थे। ये बात सभी को अजीब लगती थी कि ये राजा कैसे दानवीर हैं। ये दान भी देते हैं और इन्हें शर्म भी आती है। ये बात जब तुलसीदासजी  तक पहुँची तो उन्होंने राजा को चार पंक्तियाँ लिख भेजीं जिसमें लिखा था -

           ऐसी  देनी  देन  जु,  कित   सीखे   हो  सेन।

           ज्यों ज्यों कर ऊँचौ करौ, त्यों त्यों नीचे नैन।।


           इसका मतलब था कि राजा  तुम ऐसा दान देना कहाँ से सीखे हो ? जैसे जैसे तुम्हारे हाथ ऊपर उठते हैं वैसे वैसे तुम्हारी नज़रें तुम्हारे नैन नीचे क्यूँ झुक जाते हैं ?

         राजा ने इसके बदले में जो जवाब दिया वो जवाब इतना गजब का था कि जिसने भी सुना वो राजा का कायल हो गया। इतना प्यारा जवाब आज तक किसी ने किसी को नहीं दिया। राजा ने जवाब में लिखा -


            देनहार कोई और है, भेजत जो दिन रैन।

            लोग भरम हम पर करैं, तासौं नीचे नैन।।


          मतलब, देने वाला तो कोई और है वो मालिक है वो परमात्मा है वो दिन रात भेज रहा है। परन्तु लोग ये समझते हैं कि मैं दे रहा हूँ राजा दे रहा है। ये सोच कर मुझे शर्म आ जाती है और मेरी आँखें नीचे झुक जाती है

            "जय जय श्री राधे"

Wednesday, 7 July 2021

"ॐ जय शिव ओंकारा"

यह वह प्रसिद्ध आरती है जो देश भर में शिव-भक्त नियमित गाते हैं..

लेकिन, बहुत कम लोग का ही ध्यान इस तथ्य पर जाता है कि... इस आरती के पदों में ब्रम्हा-विष्णु-महेश तीनो की स्तुति है..


एकानन (एकमुखी, विष्णु),  चतुरानन (चतुर्मुखी, ब्रम्हा) और पंचानन (पंचमुखी, शिव) राजे..

हंसासन (ब्रम्हा) गरुड़ासन (विष्णु ) वृषवाहन (शिव) साजे..

दो भुज (विष्णु), चार चतुर्भुज (ब्रम्हा), दसभुज (शिव) अति सोहे..

अक्षमाला (रुद्राक्ष माला, ब्रम्हाजी ), वनमाला (विष्णु ) रुण्डमाला (शिव) धारी..

चंदन (ब्रम्हा ), मृगमद (कस्तूरी विष्णु ), चंदा (शिव) भाले शुभकारी (मस्तक पर शोभा पाते हैं)..

श्वेताम्बर (सफेदवस्त्र, ब्रम्हा) पीताम्बर (पीले वस्त्र, विष्णु) बाघाम्बर (बाघ चर्म ,शिव) अंगे..

ब्रम्हादिक (ब्राह्मण, ब्रह्मा) सनकादिक (सनक आदि, विष्णु ) प्रेतादिक (शिव ) संगे (साथ रहते हैं)..

कर के मध्य कमंडल (ब्रम्हा), चक्र (विष्णु), त्रिशूल (शिव) धर्ता..

जगकर्ता (ब्रम्हा) जगहर्ता (शिव ) जग पालनकर्ता (विष्णु)..

ब्रह्मा विष्णु सदाशिव जानत अविवेका (अविवेकी लोग इन तीनो को अलग अलग जानते हैं।)

प्रणवाक्षर के मध्ये ये तीनों एका

(सृष्टि के निर्माण के मूल ऊँकार नाद में ये तीनो एक रूप रहते है... आगे सृष्टि-निर्माण, सृष्टि-पालन और संहार हेतु त्रिदेव का रूप लेते हैं.

संभवतः इसी त्रि-देव रुप के लिए वेदों में ओंकार नाद को ओ३म् के रुप में प्रकट किया गया है ।

Tuesday, 6 July 2021

गुरु मँत्र क्यो आवश्यक है?

क्या कारण है कि लोगों को मंत्र गुप्त रखने के लिए कहा जाता है?


मंत्र दीक्षा का अर्थ है कि जब तुम समर्पण करते हो तो गुरु तुममें प्रवेश कर जाता है, वह तुम्हारे शरीर, मन, आत्मा में प्रविष्ट हो जाता है। गुरु तुम्हारे अंतस में जाकर तुम्हारे अनुकूल ध्वनि की खोज करेगा वह तुम्हारा मंत्र होगा और जब तुम उसका उच्चारण करोगे तो तुम एक भिन्न आयाम में एक भिन्न व्यक्ति होओगे।


जब तक समर्पण नहीं होता, मंत्र नहीं दिया जा सकता है। मंत्र देने का अर्थ है कि गुरु ने तुममें प्रवेश किया है, गुरु ने तुम्हारी गहरी लयबद्धता को, तुम्हारे प्राणों के संगीत को अनुभव किया है। और फिर वह तुम्हें प्रतीक रूप में एक मंत्र देता है जो तुम्हारे अंतस के संगीत से मेल खाता हो। और जब तुम उस मंत्र का उच्चार करते हो तो तुम आंतरिक संगीत के जगत में प्रवेश कर जाते हो, तब आंतरिक लयबद्धता उपलब्ध होती है।


मंत्र तो सिर्फ चाबी है। और चाबी तब तक नहीं दी जा सकती जब तक ताले को न जान लिया जाए। मैं तुम्हें तभी चाबी दे सकता हूं जब तुम्हारे ताले को समझ लूं। चाबी तभी सार्थक है जब वह ताले को खोले। किसी भी चाबी से काम नहीं चलेगा। प्रत्येक आदमी विशेष ढंग का ताला है, उसके लिए विशेष ढंग की चाबी जरूरी है।


यही कारण है कि मंत्रों को गुप्त रखा जाता है। अगर तुम अपना मंत्र किसी और को बताते हो तो वह उसका प्रयोग कर सकता है। यही कारण है कि लोगों को अपने— अपने मंत्र गुप्त रखने चाहिए, उन्हें सार्वजनिक बनाना ठीक नहीं है। वह खतरनाक है तुम दीक्षित हुए हो तो तुम जानते हो, तुम उसका मूल्य जानते हो, तुम उसे बांटते नहीं फिर सकते। यह दूसरों के लिए हानिकर हो सकता है। यह तुम्हारे लिए भी हानिकर हो सकता है। इसके कई कारण हैं।


पहली बात कि तुम वचन तोड़ रहे हो। और जैसे ही वचन टूटता है, गुरु के साथ तुम्हारा संपर्क टूट जाता है। फिर तुम गुरु के संपर्क में नहीं रहोगे। वचन पालन करने से ही सतत संपर्क कायम रहता है। दूसरी बात, दूसरे को बताने से, दूसरे के साथ उसके संबंध में बातचीत करने से मंत्र मन की सतह पर चला आता है और उसकी गहरी जड़ें टूट जाती हैं। तब मंत्र गपशप का हिस्सा बन जाता है। और तीसरा कारण है कि गुप्त रखने से मंत्र गहराता है। जितना गुप्त रखोगे वह उतना ही गहरे जाएगा; उसे गहरे में जाना ही होगा।


मारपा के संबंध में खबर है कि जब उसके गुरु ने उसे गुह्य मंत्र दिया तो उससे वचन ले लिया कि वह उसे बिलकुल गुप्त रखेगा। उसे कहा गया कि तुम इसे किसी को भी नहीं बताओगे। फिर मारपा का गुरु उसके स्वप्न में प्रकट हुआ और उसने पूछा कि तुम्हारा मंत्र क्या है? 


और स्‍वप्‍न में भी मारपा ने वचन का पालन किया; उसने बताने से इनकार कर दिया और कहा जाता है कि इस भय से कि कहीं स्वप्न में गुरु फिर प्रकट हों या किसी को भेजें और वह इतनी नींद में हो कि गुप्त मंत्र को प्रकट कर दे और वचन टूट जाए, मारपा ने बिलकुल सोना ही छोड़ दिया। वह सोता ही नहीं था।


ऐसे सोए बिना मारपा को सात— आठ दिन हो गए थे। फिर जब उसके गुरु ने पूछा कि तुम सोते क्यों नहीं हो? मैं देखता हूं कि तुमने सोना छोड़ दिया है। बात क्या है?


 मारपा ने गुरु से कहा : आप मेरे साथ चालबाजी कर रहे हैं। आपने स्वप्न में आकर मुझसे मेरा मंत्र पूछा था। मैं आपको भी नहीं बताने वाला हूं। जब वचन दे दिया तो मैं उसका स्‍वप्‍न में भी पालन करूंगा लेकिन फिर मैं डर गया। नींद में, कौन जाने, किसी दिन मैं भूल जा सकता हूं!


अगर तुम अपने वचन के प्रति इतने सावधान हो कि स्‍वप्‍न में भी उसका स्मरण रहता है तो उसका अर्थ है कि वह गहराई में उतर रहा है। वह अंतस में उतर रहा है; वह अंतरस्थ प्रदेश में प्रवेश कर रहा है और वह जितनी गहराई को छुएगा, वह उतना ही तुम्हारे लिए चाबी बनता जाएगा। क्योंकि ताला तो अंतर्तम में है।


किसी चीज के साथ भी प्रयोग करो अगर तुम उसे गुप्त रख सके तो वह गहराई प्राप्त करेगा और अगर तुम उसे गुप्त न रख सके तो वह बाहर निकल आएगा तुम क्यों कोई बात दूसरे से कहना चाहते हो? तुम क्यों बातें करते रहते हो?


सच तो यह है कि जिस चीज को तुम कह देते हो, उससे मुक्त हो जाते हो। एक बार तुमने किसी से कह दिया, तुम्हारा उससे छुटकारा हो जाता है। वह चीज बाहर निकल गई। मनोविश्लेषण का पूरा धंधा इसी पर खड़ा है। रोगी बोलता रहता है और मनोविश्लेषक सुनता रहता है। इससे रोगी को राहत मिलती है। वह अपनी समस्याओं के बारे में, अपने दुख के बारे में जितना ही बोलता है, वह उनसे उतनी ही छुट्टी पा लेता है।


और इसके ठीक विपरीत घटित होता है जब तुम किसी चीज को छिपाकर रखते हो, गुप्त रखते हो। इसीलिए तुम्हें कहा जाता है कि मंत्र को किसी से कभी मत कहो। तब वह गहरे से गहरे तल पर उतरता जाता है और किसी दिन ताले को खोल देता है।

Monday, 5 July 2021

स्नान एक पवित्र सनातनी परम्परा!!

स्नान किये विना जो पुण्यकर्म किया जाता है वह निष्फल होता है। उसे राक्षस ग्रहण करते है।।

दुःस्वप्न देखने,हजामत बनवाने (क्षोरकर्म) वमन (उल्टी) होने स्त्री संग करने और श्मशान भूमि में जाने पर वस्त्र सहित स्नान करना चाहिए।

तेल लगाने के बाद ,श्मशान से लौटने पर, स्त्रीसंग करने पर ,क्षोरकर्म करने के बाद जब तक मनुष्य स्नान नही करता ,तब तक बह चांडाल बना रहता है।।: 


यदि नदी हो तो जिस ओर से उसकी धारा आती हो उसी ओर मुंह करके तथा दूसरे जलाशय में सूर्य की ओर मुंह करके स्नान करना चाहिए।


कुएं से निकाले हुए जल की अपेक्षा झरने का जल पवित्र होता है।उससे पवित्र सरोवर का,उससे भी पवित्र नदी नद का जल बताया गया है।तीर्थ का जल उससे भी पवित्र होता है ओर गङ्गा का जल तो सबसे पवित्र माना गया है।


भोजन के बाद,रोगी रहने पर,महानिशा(रात्रि के मध्य दो पहर)में बहुत वस्त्र पहने हुए और अज्ञात जलाशय में स्नान नही करना चाहिए।।


रात्रि के समय स्नान नही करना चाहिए, सन्ध्या के समय भी स्नान नही करना चाहिए।परन्तु सूर्यग्रहण अथवा चंद्रग्रहण के समय रात्रि में भी स्नान कर सकते है।


नोट👉 सूर्योदय के पूर्व एवम सूर्यास्त के बाद का प्रहर रात्रि की गणना में नही आते।


पुत्र जन्म ,सूर्य की संक्रांति,स्वजन की मृत्यु, ग्रहण तथा जन्म नक्षत्र में चंद्रमा रहने पर रात्रि में भी स्नान किया जा सकता है।।


बिना शरीर की थकावट दूर किये और बिना मुंह धोए स्नान नही करना चाहिए।


सूर्य की धूप से संतप्त व्यक्ति यदि तुरन्त (विना विश्राम किये)स्नान करता है तो उसकि दृष्टि मन्द पड़ जाती है और सिर में पीड़ा होती है।


कांसे के पात्र से निकाला हुआ जल कुत्ते के मूत्र के समान अशुद्ध होने के कारण स्नान एवम देवपूजा के योग्य नही होता। उसकी शुद्धि पुनः स्नान करने से होती है।।


नग्न होकर कभी स्नान नही करना चाहिए।


पुरुष को नित्य सिर के ऊपर से स्नान करना चाहिए।सिर को छोड़कर स्नान नही करना चाहिये।सिर के ऊपर से स्नान करके ही देवकार्य और पितृकार्य करने चाहिए।


विना स्नान किये कभी चन्दन नही लगाना चाहिए।  

जो दोनो पक्षो की एकादशी को आंवले से स्नान करता है -उसके बहुत से रोग एवम पाप नष्ट हो जाते है।और वह देवलोक में सम्मानित होता है।।


स्नान के वाद अपने अंगों में तेल की मालिस नही करनी चाहिए।समूह में गीले वस्त्रों को झटकारना नही चाहिए।


विना स्नान किये चन्दन आदि नही लगाना चाहिए।


स्नान के वाद वस्त्र को चौगुना करके निचोड़ना चाहिए, तिगुना करके नही। घर मे वस्त्र निचिड़ते समय उसके छोर को नीचे करके निचोड़े ,ओर जलाशय आदि में स्नान किया हो तो ऊपर की ओर छोर करके भूमि पर निचोड़े।


निचोडें हुए वस्त्र को कंधे पर न रखे।


स्नान के बाद शरीर को हाथ से नही पोंछना चाहिए ।


स्नान के वाद अपने गीले वालो को फटकारना (झाड़ना) नही चाहिए।


(बाल से गिरा हुआ जल अशुद्ध होता है।यदि बाल झाड़ना आवश्यक लग रहा हो तो इसका ध्यान रखना चाहिए कि बाल के छीटे किसी व्यक्ति या वस्तु पर न पड़े)


स्नान के समय पहने हुए भीगे वस्त्रों से शरीर को नही पोंछना चाहिए।


ऐसा करने से शरीर कुत्ते से चाटे हुए के समान अशुद्ध हो जाता है,जो पुनः स्नान से ही शुद्ध होता है।


उपरोक्त सभी शास्त्रोक्त नियम है।

स्नान विधि एक क्रम।

प्रश्न नही स्वाध्याय करें-!

धूर्तो के लिए कोई नियम नही होता!!

Friday, 29 January 2021

जिस क्षण आपका हृदय कातर होकर रोने लगेगा, उसी क्षण प्रभु सुन लेंगे

 जिस क्षण आपका हृदय कातर होकर रोने लगेगा, उसी क्षण प्रभु सुन लेंगे

आप भगवान् की यह बड़ी भारी कृपा समझें कि आसक्ति आपको आसक्तिके रूपमें दीख रही है|  इसका मिटना भगवत्कृपासापेक्ष है|  प्रयत्नसे यह कम होती है, पर इसके नाशका सर्वोत्तम उपाय है—भगवान् के सामने सच्चे हृदयसे प्रार्थना जिनके एक संकल्पसे विश्वका निर्माण हो जाता है और संकल्प छोड़ते ही सब नष्ट हो जाता है| 

🌹 वे यदि चाहें तो उनके लिये आपके इस दोषका नाश कितनी तुच्छ बात है—यह आप सहजमें अनुमान लगा सकते हैं|   अन्तर्हृदयकी करुण प्रार्थनाके द्वारा आप उनमें चाह उत्पन्न कर दें|  ठीक मानिये, यदि आप सच्चे हृदयसे इस दोषका नाश चाहने लग जाँय तो प्रभुको अवश्य ही दया आ जायगी और क्षणभरमें उनकी कृपासे सारे दोष मिटकर आपका मन उनमें लग जायगा|  आप चाहते नहीं हों, यह बात नहीं है; पर अभी चाह बहुत मंद है|  प्रार्थना करते-करते जिस क्षण सचमुच इन दोषोंके लिये हृदयमें जलन पैदा हो जायगी और आपका हृदय कातर होकर रोने लगेगा, उसी क्षण प्रभु सुन लेंगे|  अवश्य ही यह दूसरी श्रेणीकी बात है|  कुछ भी न माँगना सर्वोत्तम है|

कृष्ण शब्द की ध्वनि पारलौकिक है।

 कृष्ण शब्द की ध्वनि पारलौकिक है। कृष्ण का अर्थ है सर्वाधिक आनंद। हर व्यक्ति आनंद चाहता है। पर हममें से कोई नहीं जानता कि इस आनंद को पूरी तरह कैसे प्राप्त किया जाए। जीवन की भौतिकवादी अवधारणा के साथ हम सुख प्राप्त करने की कोशिश में हर कदम पर हताश हैं, क्योंकि हमारे पास जीवन का वास्तविक आनंद प्राप्त करने के लिए जरूरी ज्ञान ही नहीं है। हम सब एक मित्र की खोज में हैं, जो हमें सच्ची शांति प्रदान करे। श्रीकृष्ण ही वह सच्ची शांति प्रदान कर सकते हैं।

कृष्ण हमारे साथ हमेशा हो सकते हैं, क्योंकि वह सर्वशक्तिमान हैं। इसीलिए वह अपने नाम से ही हमारे साथ हो सकते हैं। उनका नाम और वह अलग नहीं हैं। कृष्ण के सर्वशक्तिमान होने का अर्थ है कि उनसे संबंधित प्रत्येक वस्तु में समान शक्ति है। उदाहरण के लिए, अगर हम प्यासे हैं और पानी चाहते हैं, तो सिर्फ 'पानी-पानी' दोहराने से हमारी प्यास नहीं बुझेगी, क्योंकि पानी शब्द में पानी पीने के समान शक्ति नहीं है। हमें पदार्थ रूप में पानी की आवश्यकता है, तभी हमारी प्यास तृप्त होगी। पर पारलौकिक, निरपेक्ष दुनिया में, ऐसा कोई अंतर नहीं है। कृष्ण का नाम, कृष्ण का गुण, कृष्ण का वचन-सब कुछ कृष्ण है और वही संतुष्टि प्रदान करता है।

Thursday, 5 November 2020

महाकाल के दर्शन (उज्जैन्)

  महाकाल के दर्शन तो आप रोजाना  

 ही करते है ,तो विचार आया कि क्यों न श्री

महाकाल बाबा का पूरा महात्म लिखू पढ़ें जरूर

       जय श्री महाकाल


महाकाल महामात्य (उज्जैन्)

       ******

महाकाल मंदिर परिसर में प्रमुख 42 देवताओं के मंदिर है,इस मन्दिर का लगभग साढ़े सात एकड़ में फैला विशाल परिसर संभवत भारत के किसी अन्य ज्योतिर्लिंग का नहीं है ।


देश के 12 ज्योर्तिलिंगो में एक  श्री महाकाल पृथ्वी लोक के अधिपति है। उज्जैन पूरी दुनिया से इस अर्थ में अलग है कि आकाश में उज्जैन को जो मध्य स्थान प्राप्त है, वहीं धरती पर भी प्राप्त है। आकाश व धरती दोनेां के केन्द्र बिन्दु पर उज्जैन स्थित है।


महाकाल का अर्थ समय और मृत्यु के देवता दोनों रूपों में लिया जाता है। इसी स्थान से पूरी पृथ्वी की काल गणना होती रही है। प्राचीन श्री महाकाल मंदिर का पुनर्निर्माण11वी शताब्दी में हुआ। श्री महाकाल पृथ्वी के नाभी केन्द्र पर स्थित 👉दक्षिणमुखी ज्योतिर्लिंग है, जो दुनिया का एक मात्र ऐसा ज्योतिर्लिंग है। तंत्र मन्त्र  की दृष्टि से भी इस दक्षिण मुखी ज्योतिर्लिंग का बडा महत्व है।


विश्व में अकेले श्री महाकाल है जो विविध रूपों में भक्तों को दर्शन देते है। कभी प्राकृतिक रूप में तो कभी  राजसी रूप में आभूषण धारण कर। कभी भांग, कभी चंदन और सूखे मेवे से तो कभी फल, फूल से सजते है। राजाधिराज।हनुमान, शिव, देवी सरस्वती, अवंतिका, भद्रकाली, नवग्रह, शनि, राधा-कृष्ण, गणेश के मंदिरों से विभूषित यह परिसर आध्यात्मिक अनुभूति का पावन  आंगन है।


श्री महाकाल मंदिर परिसर में यू तो छोटे-बडे अनेकों देवी देवताओं के मंदिर है परंतु परिसर में प्रमुख 42 मंदिर स्थापित है जो निम्नानुसार हैः-


श्री लक्ष्मी नृसिंह मंदिर है जो मंदिर परिसर के गलियारे में स्थित हैं। ऋद्धि- सिद्धी गणेश जी का मंदिर है जो लक्ष्मी नृसिंह मंदिर के आगे ही स्थित है। विट्ठल पण्ढ़रीनाथ मंदिर है जो मंदिर के गलियारे में स्थित है। श्री राम दरबार मंदिर गलियारे से कोटीतीर्थ की ओर नीचे उतरने पर स्थित है। श्री अवंतिका देवी का मंदिर जो उज्जैन का एक प्राचीन नाम अवंतिका है। इसका मंदिर श्री रामदरबार मंदिर के पीछे स्थापित हैं। श्री चन्द्रादिप्तेश्वर मंदिर श्री रामदरबार मंदिर से आगे बढने पर बायें हाथ पर स्थित है। श्री मंगलनाथ का मंदिर दन्द्रादिप्तेश्वर मंदिर से आगे भूमि पुत्र मंगल शिवलिंग के रूप में यहां विराजमान है। श्री अन्नपूर्णा देवी का मंदिर मंगलनाथ शिवलिंग से आगे स्थापित है। वाच्छायन गणपति महाकाल मंदिर के मुख्य प्रवेश द्वार (चांदी द्वार) के पास पूर्व दिशा में प्रतिमा स्थिापित है। प्रवेश द्वार के गणेश जी की मूर्ति चांदी द्वार के उपर गणेश प्रतिमा विराजित है।


इसी तरह महाकाल मंदिर परिसर में ही गर्भगृह में विराजित ज्योर्तिलिंग के रूप में भगवान श्री महाकालेश्वर विराजमान है जो चांदी द्वार से नीचे उतरने पर गर्भगृह स्थापित है। गर्भगृह में ही देवी पार्वती, श्री गणेश व श्री कार्तिकेय की रजत प्रतिमाएं है। गर्भगृह में ही दो अखंड नंदा दीप है। श्री ओंकारेश्वर महादेव मंदिर है जो श्री महाकालेश्वर के ठीक उपर स्थित है। श्री नागचन्द्रेश्वर महादेव का मंदिर है जो ओंकारेश्वर महादेव के उपर यानी ज्योतिर्लिंग महाकालेश्वर से तीसरी मंजिल पर स्थित है। इस मंदिर के पट वर्ष में एक बार नागपंचमी को ही खुलते है। नागचन्द्रेश्वर प्रतिमा के रूप में भी दर्शन होते है जो तीसरी मंजिल पर स्थापित है। सिद्धी विनायक मंदिर महाकालेश्वर प्रांगण में ओकारेश्वर मंदिर के सामने उत्तर दिशा की ओर स्थित है। साक्षी गोपाल मंदिर परिसर में सिद्धी विनायक के पास स्थित है। संकट मोचन सिद्धदास हनुमान मंदिर प्रांगण में उत्तर दिशा में स्थित है। स्वप्नेश्वर महादेव मंदिर सिद्धदास हनुमान मंदिर के सामने स्थापित है।


महाकाल परिसर में ही बृहस्पतेश्वर महादेव मंदिर है जो प्रांगण के उत्तर में स्वप्नेश्वर महादेव मंदिर के समीप स्थित हैं। शिव की प्राचीन प्रतिमाएं त्रिविष्टपेश्वर महादेव मंदिर श्री महाकाल मंदिर के पीछे स्थित है। मां भद्रकाल्ये मंदिर ओंकारेश्वर मंदिर से सटे उत्तरी कक्ष में है। नवग्रह मंदिर श्री महाकाल के निर्गम द्वार के पास स्थित है। मारूतिनंदन हनुमान मंदिर महाकाल परिसर के आग्नेय कोण में स्थित है। श्री राम मंदिर मारूतिनंदन हनुमान के पीछे स्थिापित है।


 नीलकंठेश्वर मंदिर महाकाल मंदिर के निर्गम द्वार के पीछे स्थित है। मराठों का मंदिर नीलकंठेश्वर महादेव के पास स्थित है। इसका निर्माण देवास के नरेश द्वारा कराया गया था। गोविन्देश्वर महादेव मंदिर वृद्धकालेश्वर महाकाल मंदिर के समीप स्थित है। सूर्यमुखी हनुमान मंदिर कोटितीर्थ के प्रदक्षिणा मार्ग पर श्री महाकाल के प्रमुख द्वार के पास स्थित है। लक्ष्मीप्रदाता मोढ़ गणेश मंदिर कोटितीर्थ के उत्तर दिशा में स्थित है। कोटेश्वर महादेव मंदिर यह महाकाल के गण तथा कोटितीर्थ के अधिष्ठाता है। यह एक महत्वपूर्ण मंदिर है। प्रदोष के दिन श्री महाकाल की संध्या-पूजा के पहले कोटेश्वर की पूजा की जाती है।


सप्तऋषि मंदिर महाकाल परिसर के पीछे की ओर सप्तऋषियों के सात मंदिर है। अनादिकल्पेश्वर महादेव मंदिर सप्तऋषि मंदिर के ठीक सामने है। श्री बाल विजय मस्त हनुमान मंदिर अनादिकल्पेश्वर महादेव के सामने स्थित है। यह एक चैतन्य देव स्थान माना जाता है। श्री ओंकारेश्वर महादेव का मंदिर परिसर में ही स्थित है। श्री वृद्धकालेश्वर महाकाल (जूना महाकाल) श्री बाल हनुमान मंदिर के पास स्थित है। पवित्र कोटितीर्थ महाकाल के आंगन का जल तीर्थ है। महाभारत इस तीर्थ का उल्लेख है। कोटितीर्थ के पवित्र जल से नित्य महाकाल का अभिषेक होता है।


भगवान श्री महाकाल की प्रतिदिन पांच आरती होती है। भस्मार्ती  प्रतिदिन प्रातः होती है।भस्मार्ती का समय केवल श्रावण मास में परिवर्तन किया जाता है। इसी प्रकार महाशिवरात्रि पर्व पर भस्मार्ती दोपहर 12 बजे होती है। विश्वभर में एक मात्र श्री महाकाल है जिनकी प्रातः 4 से 6 बजे तक वैदिक मंत्रों, स्त्रोत-पाठ, वाद्य यंत्रों, शंख, डमरू, घंटी घडियालों के साथ भस्मार्ती होती है। दद्दयोदय आरती प्रातः काल 7 बजे से होती है। इस आरती में समय पर परिवर्तन होता रहता है। तीसरी आरती प्रातः 10 बजे से नैवेद्य आरती होती है। शाम 5 बजे गर्भगृह में बाबा महाकाल का जलाभिषेक बंद रहता है और इस समय पूजन श्रंगार किया जाता है। इसके बाद शाम को संध्या आरती 7 बजे से की जाती है। शयन आरती रात्रि 10.30 बजे से होती है इसके बाद गर्भगृह के पट बंद हो जाते है। जेा अगले दिन प्रातः 4 बजे खुलते है। आरतियों में समय-समय पर परिवर्तन होता रहता है।


मंदिर परिसर के बाहर ही सिद्ध विनायक  गणेश जी की विशाल प्रतिमा है ।इसी से थोड़ा आगे माँ हरसिद्धि का मंदिर है जो देवी के 52 शक्तिपीठो में से एक है ।प्रसिद्द शिप्रा का घाट रामघाट भी हरसिध्दि मंदिर के समीप ही है ।समीप ही चार धाम मंदिर है ।


एक तरह से देखा जाय तो यह देवताओ की नगरी है जहाँ भी नजर दौड़ाये मंदिर नजर आएंगे।यहां के कण कण में भगवान है  84 महादेव,9 नारायण,सप्तसागर , कालभैरव, सिद्धवट, सांदीपनि आश्रम,गोपाल मंदिर,भर्तहरि गुफा, इस्कॉन मंदिर, गढ़कालिका,चिन्तामण गणेश, हनुमानजी के सेकड़ो सिद्ध मंदिर यहां की शोभा बढ़ाते है ।


इसीलिये कहा जाता है महाकाल यहाँ सपरिवार विराजित है ।


     ।।  जय श्री महाकाल ।।

भगवान शिव के 35 रहस्य

भगवान शिव अर्थात पार्वती के पति शंकर जिन्हें महादेव, भोलेनाथ, आदिनाथ आदि कहा जाता है।


🔱1. आदिनाथ शिव :- सर्वप्रथम शिव ने ही धरती पर जीवन के प्रचार-प्रसार का प्रयास किया इसलिए उन्हें आदिदेव भी कहा जाता है, आदि का अर्थ प्रारंभ, आदिनाथ होने के कारण उनका एक नाम आदिश भी है।


🔱2. शिव के अस्त्र-शस्त्र :- शिव का धनुष पिनाक, चक्र भवरेंदु और सुदर्शन, अस्त्र पाशुपतास्त्र और शस्त्र त्रिशूल है, उक्त सभी का उन्होंने ही निर्माण किया था।


🔱3. भगवान शिव का नाग :- शिव के गले में जो नाग लिपटा रहता है उसका नाम वासुकि है, वासुकि के बड़े भाई का नाम शेषनाग है।


🔱4. शिव की अर्द्धांगिनी :- शिव की पहली पत्नी सती ने ही अगले जन्म में पार्वती के रूप में जन्म लिया और वही उमा, उर्मि, काली कही गई।


🔱5. शिव के पुत्र :- शिव के प्रमुख 6 पुत्र हैं- गणेश, कार्तिकेय, सुकेश, जलंधर, अयप्पा और भूमा, सभी के जन्म की कथा रोचक है।


🔱6. शिव के शिष्य :- शिव के 7 शिष्य हैं जिन्हें प्रारंभिक सप्तऋषि माना गया है, इन ऋषियों ने ही शिव के ज्ञान को सम्पूर्ण धरती पर प्रचारित किया जिसके चलते भिन्न-भिन्न धर्म और संस्कृतियों की उत्पत्ति हुई, शिव ने ही गुरु और शिष्य परम्परा की शुरुआत की थी, शिव के शिष्य हैं- बृहस्पति, विशालाक्ष, शुक्र, सहस्राक्ष, महेन्द्र, प्राचेतस मनु, भरद्वाज इसके अलावा 8वें गौरशिरस मुनि भी थे।


🔱7. शिव के गण :- शिव के गणों में भैरव, वीरभद्र, मणिभद्र, चंदिस, नंदी, श्रृंगी, भृगिरिटी, शैल, गोकर्ण, घंटाकर्ण, जय और विजय प्रमुख हैं, इसके अलावा, पिशाच, दैत्य और नाग-नागिन, पशुओं को भी शिव का गण माना जाता है। 


🔱8. शिव पंचायत :- भगवान सूर्य, गणपति, देवी, रुद्र और विष्णु ये शिव पंचायत कहलाते हैं।


🔱9. शिव के द्वारपाल :- नंदी, स्कंद, रिटी, वृषभ, भृंगी, गणेश, उमा-महेश्वर और महाकाल।


🔱10. शिव पार्षद :- जिस तरह जय और विजय विष्णु के पार्षद हैं उसी तरह बाण, रावण, चंड, नंदी, भृंगी आदि शिव के पार्षद हैं।


🔱11. सभी धर्मों का केंद्र शिव :- शिव की वेशभूषा ऐसी है कि प्रत्येक धर्म के लोग उनमें अपने प्रतीक ढूंढ सकते हैं; मुशरिक, यजीदी, साबिईन, सुबी, इब्राहीमी धर्मों में शिव के होने की छाप स्पष्ट रूप से देखी जा सकती है, शिव के शिष्यों से एक ऐसी परम्परा की शुरुआत हुई, जो आगे चलकर शैव, सिद्ध, नाथ, दिगंबर और सूफी संप्रदाय में वि‍भक्त हो गई।


🔱12. बौद्ध साहित्य के मर्मज्ञ अंतरराष्ट्रीय :-  ख्याति प्राप्त विद्वान प्रोफेसर उपासक का मानना है कि शंकर ने ही बुद्ध के रूप में जन्म लिया था, उन्होंने पालि ग्रंथों में वर्णित 27 बुद्धों का उल्लेख करते हुए बताया कि इनमें बुद्ध के 3 नाम अतिप्राचीन हैं- तणंकर, शणंकर और मेघंकर।


🔱13. देवता और असुर दोनों के प्रिय शिव :- भगवान शिव को देवों के साथ असुर, दानव, राक्षस, पिशाच, गंधर्व, यक्ष आदि सभी पूजते हैं, वे रावण को भी वरदान देते हैं और राम को भी; उन्होंने भस्मासुर, शुक्राचार्य आदि कई असुरों को वरदान दिया था शिव, सभी आदिवासी, वनवासी जाति, वर्ण, धर्म और समाज के सर्वोच्च देवता हैं।


🔱14. शिव चिह्न :- वनवासी से लेकर सभी साधारण व्‍यक्ति जिस चिह्न की पूजा कर सकें, उस पत्‍थर के ढेले, बटिया को शिव का चिह्न माना जाता है, इसके अलावा रुद्राक्ष और त्रिशूल को भी शिव का चिह्न माना गया है, कुछ लोग डमरू और अर्द्ध चन्द्र को भी शिव का चिह्न मानते हैं, हालांकि ज्यादातर लोग शिवलिंग अर्थात शिव की ज्योति का पूजन करते हैं।


🔱15. शिव की गुफा :- शिव ने भस्मासुर से बचने के लिए एक पहाड़ी में अपने त्रिशूल से एक गुफा बनाई और वे फिर उसी गुफा में छिप गए, वह गुफा जम्मू से 150 किलोमीटर दूर त्रिकूटा की पहाड़ियों पर है, दूसरी ओर भगवान शिव ने जहां पार्वती को अमृत ज्ञान दिया था वह गुफा अमरनाथ गुफा के नाम से प्रसिद्ध है।


🔱16. शिव के पैरों के निशान :- श्रीपद- श्रीलंका में रतन द्वीप पहाड़ की चोटी पर स्थित श्रीपद नामक मंदिर में शिव के पैरों के निशान हैं, ये पदचिह्न 5 फुट 7 इंच लंबे और 2 फुट 6 इंच चौड़े हैं, इस स्थान को सिवानोलीपदम कहते हैं, कुछ लोग इसे आदम पीक कहते हैं।


रुद्र पद- तमिलनाडु के नागपट्टीनम जिले के थिरुवेंगडू क्षेत्र में श्रीस्वेदारण्येश्‍वर का मंदिर में शिव के पदचिह्न हैं जिसे रुद्र पदम कहा जाता है, इसके अलावा थिरुवन्नामलाई में भी एक स्थान पर शिव के पदचिह्न हैं।


तेजपुर- असम के तेजपुर में ब्रह्मपुत्र नदी के पास स्थित रुद्रपद मंदिर में शिव के दाएं पैर का निशान है।


जागेश्वर- उत्तराखंड के अल्मोड़ा से 36 किलोमीटर दूर जागेश्वर मंदिर की पहाड़ी से लगभग साढ़े 4 किलोमीटर दूर जंगल में भीम के मंदिर के पास शिव के पदचिह्न हैं, पांडवों को दर्शन देने से बचने के लिए उन्होंने अपना एक पैर यहां और दूसरा कैलाश में रखा था।


रांची- झारखंड के रांची रेलवे स्टेशन से 7 किलोमीटर की दूरी पर रांची हिल पर शिवजी के पैरों के निशान हैं, इस स्थान को पहाड़ी बाबा मंदिर कहा जाता है।


🔱17. शिव के अवतार :- वीरभद्र, पिप्पलाद, नंदी, भैरव, महेश, अश्वत्थामा, शरभावतार, गृहपति, दुर्वासा, हनुमान, वृषभ, यतिनाथ, कृष्णदर्शन, अवधूत, भिक्षुवर्य, सुरेश्वर, किरात, सुनटनर्तक, ब्रह्मचारी, यक्ष, वैश्यानाथ, द्विजेश्वर, हंसरूप, द्विज, नतेश्वर आदि हुए हैं, वेदों में रुद्रों का जिक्र है, रुद्र 11 बताए जाते हैं- कपाली, पिंगल, भीम, विरुपाक्ष, विलोहित, शास्ता, अजपाद, आपिर्बुध्य, शंभू, चण्ड तथा भव।


🔱18. शिव का विरोधा-भासिक परिवार :- शिवपुत्र कार्तिकेय का वाहन मयूर है, जबकि शिव के गले में वासुकि नाग है, स्वभाव से मयूर और नाग आपस में दुश्मन हैं, इधर गणपति का वाहन चूहा है, जबकि सांप मूषक भक्षी जीव है, पार्वती का वाहन शेर है, लेकिन शिवजी का वाहन तो नंदी बैल है, इस विरोधाभास या वैचारिक भिन्नता के बावजूद परिवार में एकता है।


🔱19. ति‍ब्बत स्थित कैलाश पर्वत :- पर उनका निवास है जहां पर शिव विराजमान हैं उस पर्वत के ठीक नीचे पाताल लोक है जो भगवान विष्णु का स्थान है, शिव के आसन के ऊपर वायुमंडल के पार क्रमश: स्वर्ग लोक और फिर ब्रह्माजी का स्थान है।


🔱20. शिव भक्त :- ब्रह्मा, विष्णु और सभी देवी-देवताओं सहित भगवान राम और कृष्ण भी शिव भक्त है, हरिवंश पुराण के अनुसार, कैलास पर्वत पर कृष्ण ने शिव को प्रसन्न करने के लिए तपस्या की थी, भगवान राम ने रामेश्वरम में शिवलिंग स्थापित कर उनकी पूजा-अर्चना की थी।


🔱21. शिव ध्यान :- शिव की भक्ति हेतु शिव का ध्यान-पूजन किया जाता है, शिवलिंग को बिल्वपत्र चढ़ाकर शिवलिंग के समीप मंत्र जाप या ध्यान करने से मोक्ष का मार्ग पुष्ट होता है।


🔱22. शिव मंत्र :- दो ही शिव के मंत्र हैं पहला- ॐ नम: शिवाय दूसरा महामृत्युंजय मंत्र- ॐ ह्रौं जू सः ॐ भूः भुवः स्वः ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्‌ उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्‌। स्वः भुवः भूः ॐ सः जू ह्रौं ॐ ॥ है।


🔱23. शिव व्रत और त्योहार :- सोमवार, प्रदोष और श्रावण मास में शिव व्रत रखे जाते हैं, शिवरात्रि और महाशिवरात्रि शिव का प्रमुख पर्व त्योहार है।


🔱24. शिव प्रचारक :- भगवान शंकर की परम्परा को उनके शिष्यों बृहस्पति, विशालाक्ष, (शिव) शुक्र, सहस्राक्ष, महेन्द्र, प्राचेतस मनु, भरद्वाज, अगस्त्य मुनि, गौरशिरस मुनि, नंदी, कार्तिकेय, भैरवनाथ आदि ने आगे बढ़ाया; इसके अलावा वीरभद्र, मणिभद्र, चंदिस, नंदी, श्रृंगी, भृगिरिटी, शैल, गोकर्ण, घंटाकर्ण, बाण, रावण, जय और विजय ने भी शैवपंथ का प्रचार किया, इस परम्परा में सबसे बड़ा नाम आदिगुरु भगवान दत्तात्रेय का आता है, दत्तात्रेय के बाद आदि शंकराचार्य, मत्स्येन्द्रनाथ और गुरु गुरुगोरखनाथ का नाम प्रमुखता से लिया जाता है।


🔱25. शिव महिमा :- शिव ने कालकूट नामक विष पिया था जो अमृत मंथन के दौरान निकला था, शिव ने भस्मासुर जैसे कई असुरों को वरदान दिया था, शिव ने कामदेव को भस्म कर दिया था, शिव ने गणेश और राजा दक्ष के सिर को जोड़ दिया था, ब्रह्मा द्वारा छल किए जाने पर शिव ने ब्रह्मा का पांचवां सिर काट दिया था।


🔱26. शैव परम्परा :- दसनामी, शाक्त, सिद्ध, दिगंबर, नाथ, लिंगायत, तमिल शैव, कालमुख शैव, कश्मीरी शैव, वीरशैव, नाग, लकुलीश, पाशुपत, कापालिक, कालदमन और महेश्वर सभी शैव परंपरा से हैं; चंद्रवंशी, सूर्यवंशी, अग्निवंशी और नागवंशी भी शिव की परंपरा से ही माने जाते हैं; भारत की असुर, रक्ष और आदिवासी जाति के आराध्य देव शिव ही हैं, शैव धर्म भारत के आदिवासियों का धर्म है।


🔱27. शिव के प्रमुख नाम :- शिव के वैसे तो अनेक नाम हैं जिनमें 108 नामों का उल्लेख पुराणों में मिलता है लेकिन यहां प्रचलित नाम जानें- महेश, नीलकंठ, महादेव, महाकाल, शंकर, पशुपतिनाथ, गंगाधर, नटराज, त्रिनेत्र, भोलेनाथ, आदिदेव, आदिनाथ, त्रियंबक, त्रिलोकेश, जटाशंकर, जगदीश, प्रलयंकर, विश्वनाथ, विश्वेश्वर, हर, शिवशंभु, भूतनाथ और रुद्र।


🔱28. अमरनाथ के अमृत वचन :- शिव ने अपनी अर्धांगिनी पार्वती को मोक्ष हेतु अमरनाथ की गुफा में जो ज्ञान दिया उस ज्ञान की आज अनेकानेक शाखाएं हो चली हैं, वह ज्ञानयोग और तंत्र के मूल सूत्रों में शामिल है, विज्ञान भैरव तंत्र एक ऐसा ग्रंथ है, जिसमें भगवान शिव द्वारा पार्वती को बताए गए 112 ध्यान सूत्रों का संकलन है।


🔱29. शिव ग्रंथ :- वेद और उपनिषद सहित विज्ञान भैरव तंत्र, शिव पुराण और शिव संहिता में शिव की संपूर्ण शिक्षा और दीक्षा समाई हुई है, तंत्र के अनेक ग्रंथों में उनकी शिक्षा का विस्तार हुआ है।


🔱30. शिवलिंग :- वायु पुराण के अनुसार प्रलयकाल में समस्त सृष्टि जिसमें लीन हो जाती है और पुन: सृष्टिकाल में जिससे प्रकट होती है, उसे लिंग कहते हैं, इस प्रकार विश्व की संपूर्ण ऊर्जा ही लिंग की प्रतीक है, वस्तुत: यह संपूर्ण सृष्टि बिंदु-नाद स्वरूप है, बिंदु शक्ति है और नाद शिव, बिंदु अर्थात ऊर्जा और नाद अर्थात ध्वनि, यही दो संपूर्ण ब्रह्मांड का आधार है, इसी कारण प्रतीक स्वरूप शिवलिंग की पूजा-अर्चना है।


🔱31. बारह ज्योतिर्लिंग :- सोमनाथ, मल्लिकार्जुन, महाकालेश्वर, ॐकारेश्वर, वैद्यनाथ, भीमशंकर, रामेश्वर, नागेश्वर, विश्वनाथजी, त्र्यम्बकेश्वर, केदारनाथ, घृष्णेश्वर; ज्योतिर्लिंग उत्पत्ति के संबंध में अनेकों मान्यताएं प्रचलित है; ज्योतिर्लिंग यानी व्यापक ब्रह्मात्मलिंग जिसका अर्थ है व्यापक प्रकाश; जो शिवलिंग के बारह खंड हैं, शिवपुराण के अनुसार ब्रह्म, माया, जीव, मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार, आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी को ज्योतिर्लिंग या ज्योति पिंड कहा गया है।


दूसरी मान्यता अनुसार शिव पुराण के अनुसार प्राचीनकाल में आकाश से ज्‍योति पिंड पृथ्‍वी पर गिरे और उनसे थोड़ी देर के लिए प्रकाश फैल गया, इस तरह के अनेकों उल्का पिंड आकाश से धरती पर गिरे थे, भारत में गिरे अनेकों पिंडों में से प्रमुख बारह पिंड को ही ज्‍योतिर्लिंग में शामिल किया गया।


🔱32. शिव का दर्शन :- शिव के जीवन और दर्शन को जो लोग यथार्थ दृष्टि से देखते हैं वे सही बुद्धि वाले और यथार्थ को पकड़ने वाले शिवभक्त हैं, क्योंकि शिव का दर्शन कहता है कि यथार्थ में जियो, वर्तमान में जियो, अपनी चित्तवृत्तियों से लड़ो मत, उन्हें अजनबी बनकर देखो और कल्पना का भी यथार्थ के लिए उपयोग करो, आइंस्टीन से पूर्व शिव ने ही कहा था कि कल्पना ज्ञान से ज्यादा महत्वपूर्ण है।


🔱33. शिव और शंकर :- शिव का नाम शंकर के साथ जोड़ा जाता है, लोग कहते हैं- शिव, शंकर, भोलेनाथ; इस तरह अनजाने ही कई लोग शिव और शंकर को एक ही सत्ता के दो नाम बताते हैं, असल में दोनों की प्रतिमाएं अलग-अलग आकृति की हैं, शंकर को हमेशा तपस्वी रूप में दिखाया जाता है, कई जगह तो शंकर को शिवलिंग का ध्यान करते हुए दिखाया गया है, अत: शिव और शंकर दो अलग अलग सत्ताएं है, हालांकि शंकर को भी शिवरूप माना गया है माना जाता है कि महेष (नंदी) और महाकाल भगवान शंकर के द्वारपाल हैं, रुद्र देवता शंकर की पंचायत के सदस्य हैं।


🔱34. देवों के देव महादेव :- देवताओं की दैत्यों से प्रतिस्पर्धा चलती रहती थी, ऐसे में जब भी देवताओं पर घोर संकट आता था तो वे सभी देवाधिदेव महादेव के पास जाते थे दैत्यों, राक्षसों सहित देवताओं ने भी शिव को कई बार चुनौती दी, लेकिन वे सभी परास्त होकर शिव के समक्ष झुक गए इसीलिए शिव हैं देवों के देव महादेव; वे दैत्यों, दानवों और भूतों के भी प्रिय भगवान हैं, वे राम को भी वरदान देते हैं और रावण को भी।


🔱35. शिव हर काल में :- भगवान शिव ने हर काल में लोगों को दर्शन दिए हैं, राम के समय भी शिव थे, महाभारत काल में भी शिव थे और विक्रमादित्य के काल में भी शिव के दर्शन होने का उल्लेख मिलता है, भविष्य पुराण अनुसार राजा हर्षवर्धन को भी भगवान शिव ने दर्शन दिये थे।

अमरनाथ गुफा का पूरा इतिहास

जानिए श्री अमरनाथ गुफा / यात्रा का पूरा इतिहास ताकि आप अपने बच्चों को सही जानकारी दे सकें ...


मुसलमानों के पहले पैगंबर मोहम्मद का जब जन्म भी नहीं हुआ था तब से अमरनाथ गुफा में हो रही है पूजा अर्चना ! इसलिए इस झूठ को नकारिए कि अमरनाथ गुफा की खोज एक मुस्लिम गडरिये बूटा मालिक ने की थी !


शायद इस वर्ष 23 जून 2020 को बाबा बर्फानी के दर्शन के लिये अमरनाथ यात्रा शुरू भी हो जाये अमरनाथ यात्रा शुरू होते ही फिर से सेक्युलरिज्म के झंडबदारों ने गलत इतिहास की व्याख्या शुरू कर देनी है कि इस गुफा को 1850 में एक मुसलिम गडरिये बूटा मलिक ने खोजा था ! पिछले कई सालों से तो पत्रकारिता का गोयनका अवार्ड घोषित करने वाले इंडियन एक्सप्रेस ने एक लेख लिखकर इस झूठ को जोर-शोर से प्रचारित किया था। जबकि इतिहास में दर्ज है कि जब इसलाम इस धरती पर मौजूद भी नहीं था , यानी इसलाम के पहले पैगंबर मोहम्मद पर कुरान उतरना तो छोडि़ए , उनका जन्म भी नहीं हुआ था , तब से श्री अमरनाथ की गुफा में सनातन संस्कृति के अनुयायी बाबा बर्फानी की पूजा-अर्चना कर रहे थे ।


कश्मीर के इतिहास पर कल्हण की राजतरंगिणी और नीलमत पुराण से सबसे अधिक प्रकाश पड़ता है। श्रीनगर से 141 किलोमीटर दूर 3888 मीटर की उंचाई पर स्थित श्री अमरनाथ गुफा को तो भारतीय पुरातत्व विभाग ही 5 हजार वर्ष प्राचीन मानता है। यानी महाभारत काल से इस गुफा की मौजूदगी खुद भारतीय एजेंसियों मानती हैं। लेकिन यह भारत का सेक्यूलरिज्म है , जो तथ्यों और इतिहास से नहीं, मार्क्सवादी-नेहरूवादियों के ‘परसेप्शन’ से चलता है! वही ‘परसेप्शन’ बार बार भी बनाने का प्रयास पिछले कई वर्षों से चल रहा है।


राजतरंगिणी में श्री अमरनाथ का उल्लेख


श्री अमरनाथ जी की पवित्र गुफा प्राकृतिक है न कि मानव नर्मित। इसलिए पांच हजार वर्ष की पुरातत्व विभाग की यह गणना भी कम ही पड़ती है, क्योंकि हिमालय के पहाड़ लाखों वर्ष पुराने माने जाते हैं। यानी यह प्राकृतिक गुफा लाखों वर्ष से है। कल्हण की राजतरंगिणी में इसका उल्लेख है कि कश्मीर के राजा सामदीमत शैव थे और वह पहलगाम के वनों में स्थित बर्फ के शिवलिंग की पूजा-अर्चना करने जाते थे। ज्ञात हो कि बर्फ का शिवलिंग अमरनाथ को छोड़कर और कहीं नहीं है। यानी वामपंथी, जिस 1850 में श्री अमरनाथ गुफा को खोजे जाने का कुतर्क गढ़ते हैं, इससे कई शताब्दी पूर्व कश्मीर के राजा खुद बाबा बर्फानी की पूजा करते थे।


नीलमत पुराण और बृंगेश संहिता में श्री अमरनाथ गुफा के उल्लेख मिलता है ।


नीलमत पुराण , बृंगेश संहिता में भी अमरनाथ तीर्थ का बारंबार उल्लेख मिलता है। बृंगेश संहिता में लिखा है कि अमरनाथ की गुफा की ओर जाते समय अनंतनया (अनंतनाग), माच भवन (मट्टन), गणेशबल (गणेशपुर), मामलेश्वर (मामल), चंदनवाड़ी, सुशरामनगर (शेषनाग), पंचतरंगिरी (पंचतरणी) और अमरावती में यात्री धार्मिक अनुष्ठान करते थे।


वहीं छठी में लिखे गये नीलमत पुराण में श्री अमरनाथ यात्रा का स्पष्ट उल्लेख है। नीलमत पुराण में कश्मीर के इतिहास, भूगोल, लोककथाओं , धार्मिक अनुष्ठानों की विस्तृत रूप में जानकारी उपलब्ध है। नीलमत पुराण में अमरेश्वरा के बारे में दिए गये वर्णन से पता चलता है कि छठी शताब्दी में लोग श्री अमरनाथ यात्रा किया करते थे।


नीलमत पुराण में तब अमरनाथ यात्रा का जिक्र है जब इस्लामी पैगंबर मोहम्मद का जन्म भी नहीं हुआ था तो फिर किस तरह से बूटा मलिक नामक एक मुसलमान गड़रिया श्री अमरनाथ गुफा की खोज कर कर सकता है ? ब्रिटिशर्स, मार्क्सवादी और नेहरूवादी इतिहासकार का पूरा जोर इस बात को साबित करने में है कि कश्मीर में मुसलमान हिंदुओं से पुराने वाशिंदे हैं। इसलिए अमरनाथ की यात्रा को कुछ सौ साल पहले शुरु हुआ बताकर वहां मुसलिम अलगाववाद की एक तरह से स्थापना का प्रयास किया गया है!


इतिहास में अमरनाथ गुफा का उल्लेख है


अमित कुमार सिंह द्वारा लिखित ‘ अमरनाथ यात्रा ’ नामक पुस्तक के अनुसार , पुराण में अमरगंगा का भी उल्लेख है, जो सिंधु नदी की एक सहायक नदी थी। अमरनाथ गुफा जाने के लिए इस नदी के पास से गुजरना पड़ता था। ऐसी मान्यता था कि बाबा बर्फानी के दर्शन से पहले इस नदी की मिट्टी शरीर पर लगाने से सारे पाप धुल जाते हैं। शिव भक्त इस मिट्टी को अपने शरीर पर लगाते थे।


पुराण में वर्णित है कि अमरनाथ गुफा की उंचाई 250 फीट और चौड़ाई 50 फीट थी। इसी गुफा में बर्फ से बना एक विशाल शिवलिंग था, जिसे बाहर से ही देखा जा सकता था। बर्नियर ट्रेवल्स में भी बर्नियर ने इस शिवलिंग का वर्णन किया है। विंसेट-ए-स्मिथ ने बर्नियर की पुस्तक के दूसरे संस्करण का संपादन करते हुए लिखा है कि अमरनाथ की गुफा आश्चर्यजनक है, जहां छत से पानी बूंद-बूंद टपकता रहता है और जमकर बर्फ के खंड का रूप ले लेता है। हिंदू इसी को शिव प्रतिमा के रूप में पूजते हैं। राजतरंगिरी तृतीय खंड की पृष्ठ संख्या-409 पर डॉ. स्टेन ने लिखा है कि अमरनाथ गुफा में 7 से 8 फीट की चौड़ा और लगभग 10-15 फीट लंबा शिवलिंग है। कल्हण की राजतरंगिणी द्वितीय , में कश्मीर के शासक सामदीमत 34 ई.पू से 17 वीं ईस्वी और उनके बाबा बर्फानी के भक्त होने का उल्लेख है।


यही नहीं , जिस बूटा मलिक को 1850 में अमरनाथ गुफा का खोजकर्ता साबित किया जाता है, उससे करीब 400 साल पूर्व कश्मीर में बादशाह जैनुलबुद्दीन का शासन 1420-70 था। उसने भी अमरनाथ की यात्रा की थी। इतिहासकार जोनराज ने इसका उल्लेख किया है। 16 वीं शताब्दी में मुगल बादशाह अकबर के समय के इतिहासकार अबुल फजल ने अपनी पुस्तक आईने अकबरी में अमरनाथ का जिक्र एक पवित्र हिंदू तीर्थस्थल के रूप में किया है। आईने अकबरी में लिखा है- गुफा में बर्फ का एक खण्ड बनता है। यह थोड़ा-थोड़ा करके 15 दिन तक रोजाना बढ़ता है और यह 3-4 गज से अधिक उंचा हो जाता है। चंद्रमा के घटने के साथ-साथ वह भी घटना शुरू हो जाता है और जब चांद लुप्त हो जाता है तो शिवलिंग भी विलुप्त हो जाता है।


वास्तव में कश्मीर घाटी पर विदेशी इस्लामी आक्रांता के हमले के बाद हिंदुओं को कश्मीर छोड़कर भागना पड़ा। इसके कारण 14 वीं शताब्दी के मध्य से करीब 300 साल तक यह यात्रा बाधित रही। यह यात्रा फिर से 1872 में आरंभ हुई। इसी अवसर का लाभ उठाकर कुछ इतिहासकारों ने बूटा मलिक को 1850 में अमरनाथ गुफा का खोजक साबित कर दिया और इसे लगभग मान्यता के रूप में स्थापित कर दिया। जनश्रुति भी लिख दी गई जिसमें बूटा मलिक को लेकर एक कहानी बुन दी गई कि उसे एक साधु मिला। साधु ने बूटा मालिक को कोयले से भरा एक थैला दिया। घर पहुंच कर बूटा मालिक ने जब थैला खोला तो उसमें उसने चमकता हुआ हीरा पाया । वह जब हीरा लौटाने या फिर खुश होकर धन्यवाद देने जब उस साधु के पास पहुंचा तो वहां साधु नहीं था, बल्कि सामने श्री अमरनाथ जी की गुफा थी ।


आज भी श्री अमरनाथ में जो चढ़ावा चढ़ाया जाता है उसका एक भाग बूटा मलिक के परिवार को दिया जाता है।


चढ़ावा देने से हमारा विरोध नहीं है, लेकिन झूठ के बल पर इसे दशक-दर-दशक स्थापित करने का यह जो प्रयास किया गया है, उसमें बहुत हद तक इन लोगों को सफलता मिल चुकी है। आज भी किसी हिंदू से पूछिए, वह #नीलमत_पुराण का नाम नहीं जानता होगा , लेकिन एक मुसलिम गडरिये ने अमरनाथ गुफा की खोज की , तुरंत इस फर्जी इतिहास पर बात करने लगेगा। यही फेक विमर्श का प्रभाव होता है, जिसमें ब्रिटिशर्स-मार्क्सवादी-नेहरूवादी इतिहासकार सफल भी रहे हैं।


न जाने कब और कैसे ये " श्री अमरनाथ जी श्राइन बोर्ड " नामक संस्था आयी और इसने पूरी श्री अमरनाथ यात्रा पर अपना कब्जा जमा लिया और श्री अमरनाथ यात्रियीं को दोहन करना आरम्भ कर दिया , श्राइन बोर्ड द्वारा ऐसी कोई व्यवथा अमरनाथ यात्रियों के लिये नहीं कि जाती , जो किसी भी रूप में अमरनाथ यात्रियों के हित में हो , मनमाने रूप में अमरनाथ यात्रियों से पैसा वसूला जाता है फिर भी सभी हिन्दू संगठन , भंडारा समिति ओर अमरनाथ यात्री चुप हैं

यदि "महाभारत" को पढ़ने का समय ना हो तो भी इसके नौ सार - सूत्र हमारे जीवन में उपयोगी सिद्ध हो सकते है

1) संतानों कि  गलत  माँग  और  हठ  पर  समय  रेहते  अंकुश  नहीं  लगाया  गया , तो  अंत  में  आप  असहाय  हो  जायेंगे.....कौरव.....


2) आप  भले  ही  कितने  बलवान  हो  लेकिन  अधर्म  के  साथ  हो  तो , आपकी  विद्या ,  अस्त्र-शस्त्र  शक्ति  और  वरदान  सब  निष्फल  हो  जायेगा.....कर्ण.....


3) संतानों  को  इतना  महत्वाकांक्षी  मत  बना  दो  कि  विद्या  का  दुरुपयोग  कर  स्वयंनाश  कर  सर्वनाश  को  आमंत्रित  करे.....अश्वत्थामा.....


4) कभी  किसी  को  ऐसा  वचन  मत  दो  कि  आपको  अधर्मियों  के  आगे  समर्पण  करना  पड़े.....भीष्म पितामह.....


5) संपत्ति , शक्ति  व  सत्ता  का  दुरुपयोग  और  दुराचारियों  का  साथ  अंत  में  स्वयं  नाश  का  दर्शन  कराता  है.....दुर्योधन.....


6) अंध  व्यक्ति - अर्थात  मुद्रा , मदिरा , अज्ञान , मोह  और  काम ( मृदुला)  अंध  व्यक्ति  के  हाथ  में  सत्ता  भी  विनाश  की  ओर  ले  जाती  है.....धृतराष्ट्र.....


7) यदि  व्यक्ति  के  पास  विद्या , विवेक  से  बंधी  हो  तो  विजय  अवश्य  मिलती  है.....अर्जुन.....


8) हर  कार्य  में  छल , कपट ,  व  प्रपंच  रच  कर  आप  हमेशा  सफल  नहीं  हो  सकते.....शकुनि.....


9) यदि  आप  नीति , धर्म , व  कर्म  का  सफलता  पूर्वक  पालन  करेंगे , तो  विश्व  कि  कोई  भी  शक्ति  आपको  पराजित  नहीं  कर  सकती.....युधिष्ठिर.....


यदि  इन  नौ  सूत्रों  से  सबक  लेना  सम्भव  नहीं  होता  है  तो  जीवन  मे  महाभारत  संभव  हो  जाता  है।



हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे

हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे