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Monday, 2 March 2020

पत्नी "वामांगी" क्यों कहलाती है ?

पत्नी  "वामांगी"  क्यों कहलाती है ?

शास्त्रों में पत्नी को वामांगी कहा गया है , जिसका अर्थ होता है बायें अंग की अधिकारी । इसीलिये  पुरुष के शरीर का बायां हिस्सा स्त्री का माना जाता है । इसका कारण यह है कि भगवान शिव के बायें अंग से स्त्री की उत्पत्ति हुई है जिसका प्रतीक है उनका "अर्धनारीश्वर रूप" । यही कारण है कि हस्तरेखा विज्ञान के अनुसार पुरुष के दायें हाथ से पुरुष की और बायें  हाथ से स्त्री की स्थिति देखने की बात कही गयी है ।

स्त्री पुरुष की वामांगी होती है , अतः सोते समय और सभा में, सिंदूरदान,  आशीर्वाद ग्रहण करते समय और भोजन के समय स्त्री पति के बायीं तरफ रहने से  शुभ फल की प्राप्ति होती है । जो कर्म संसारिक होते हैं उसमें पत्नी पति के बायीं ओर बैठती है क्योंकि यह कर्म स्त्री प्रधान कर्म माने जाते हैं ।

वामांगी होने पर भी शास्त्रोक्त कथन है कि कुछ कार्यों में स्त्री को दायीं तरफ रहना चाहिये , जैसे कन्यादान, विवाह, यज्ञकर्म, जातकर्म, नामकरण और अन्न प्राशन के समय पत्नी को पति के दायीं तरफ बैठना चाहिये क्योंकि यह सभी कार्य  पारलौकिक माने जाते हैं और इन्हें पुरुष प्रधान माना गया है। इसलिए इन कर्मों में पत्नी के दायीं तरफ बैठने के नियम हैं ।

वामांगी के अतिरिक्त पत्नी को पति की अर्द्धांगिनी भी कहा जाता है, जिसका अर्थ है पत्नी, पति के शरीर का आधा अंग होती है ।  दोनों शब्दों का सार एक ही है जिसके अनुसार पत्नी के बिना पति अधूरा है । पत्नी ही पति के जीवन को पूर्ण करती है, उसे खुशहाली प्रदान करती है, उसके परिवार का ख्याल रखती है, और उसे सभी सुख प्रदान करती है ।

"सा भार्या या गृहे दक्षा सा भार्या या प्रियंवदा ।
सा भार्या या पतिप्राणा सा भार्या या पतिव्रता" ।।

अनजान गोपी

अनजान गोपी

वृन्दावन में आज महारास की रात्रि ‘शरद पूर्णिमा’ है… सारी गोपियाँ अलग अलग वेश में कान्हा जी को रिझाने के लिए निधिवन में इकट्ठी हुई हैं…

ललिता ने हज़ारों कमल-पुष्पों से स्वयं को ऊपर से नीचे तक सजा रखा है…ताकि वे कृष्णा के हाथ के कमल से ज्यादा सुन्दर दिख सकें…..

विशाखा ने स्वयं को एक मुरली की तरह सजा लिया है… ताकि कान्हा की बंसी को मात दे सकें…

एक गोपी ने खुद को सुदर्शन चक्र, एक ने गदा और एक ने खुद को शंख बना रखा है…

सभी गोपियाँ एक घेरा बनाकर कृष्णा के इंतज़ार में कड़ी हैं….सिवाय घेरे के बीच में खड़ी दो गोपियों के….

ललिता ने चुपके से विशाखा के कान में कहा… “हे सखी!!!… घेरे के बीच में खड़ी इन दो सुंदरियों को देखो…तो…एक तो हमारी राधारानी हैं… जिन्होंने खुद को कृष्ण के रूप में सजा रखा है…परन्तु ये दूसरी गोपी कौन है???…क्या तुम इसे जानती हो???”

“ना री सखी..!!! इसे तो ब्रज मे पहली बार ही देखूं…. पतों नये कौन है…लेकिन चाल-ढाल में तो हमारी राधे को टक्कर देवे है…परन्तु वाको घूघट ही इत्तो लंबो है… की सूरत देखवे में ना आवे…” विशाखा ने तिरछी नज़रों से अनजान गोपी को देखते हुए कहा…

तभी अचानक मुरली-मनोहर वहां प्रगट हो गए… और सारी गोपियाँ उनके साथ पहले नृत्य करने की स्पर्धा में लग गयीं….

परन्तु कान्हा जी ने ललिता, विशाखा समेत सभी गोपियों को अनदेखा कर दिया…

“ये ज़ालिम तो अपनी राधे के पास ही जाएगा… इसे हमारी क्या परवाह???” ललिता और विशाखा ने मुह चिड़ाते हुए कहा…

लेकिन वे सभी बहुत ही आश्चर्य में पड़ गयीं… जब उन्होंने देखा…. की कान्हा जी अपनी राधे को भी अनदेखा करते हुए….सबसे पहले उस अनजान गोपी के पास जाकर नृत्य करने लगे….

अब सारी सीमाएं पार हो चुकीं थीं…. राधे ने धैर्य खो दिया… और जल्दी से झपट कर उस अनजान गोपी का घूंघट खीच दिया…

सभी गोपियाँ एकदम चुप्प रह गयीं….जब उन्होंने पहले उस गोपी के लम्बे लम्बे बाल देखे… फिर एक त्रिशूल देखा….फिर एक डमरू देखा….और आखिर में गोपी के गले में लिपटा हुआ सांप देखा…

गोपी के रूप में महारास में आये महादेव को देखकर सभी गोपियाँ उनके चरणों में जा लिपटी…

“भगवान् शिव…सिर्फ इसी शर्त पर समुद्र –मंथन के समय विष पान को तैयार हुए थे…की मेरी हर महारास का आरम्भ इनके साथ मेरे नृत्य से ही होगा…..” कृष्ण जी ने रहस्य से पर्दा उठाया…
“बोलो गोपेश्वर महादेव की..जय!!!!!!!!” वे सभी एक स्वर में बोल उठे