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Monday, 2 March 2020

ईश्वर की भक्ति

ओ३म् 

ईश्वर की भक्ति


प्रश्न:― कृपया बताईये कि भक्ति किसे कहते हैं और उसका स्वरुप क्या है?

उत्तर:― जिन साधनों से ईश्वर का साक्षात्कार होता है, उसे भक्ति कहते हैं। उस भक्ति के तीन भाग हैं―स्तुति, प्रार्थना, उपासना।

स्तुति:― स्तुति का अर्थ है ईश्वर के गुण गान करना, उसके गुणों का चिन्तन करना और उन्हें अपने जीवन में धारण करना, तथा जीवन में उन गुणों को धारण कर उनसे लाभ उठाना। मनुष्य का यह स्वाभाविक गुण है कि वह प्रत्येक वस्तु के गुणों को जानना चाहता है, छोटा बच्चा भी जब किसी वस्तु को देखता है, तो पूछता है कि यह क्या है, ऐसी क्यों है, इसका नाम क्या है इत्यादि।

प्रार्थना:― प्रार्थना का अर्थ है, किसी वस्तु के गुण जानने के पश्चात् उस वस्तु को पाने की प्रबल इच्छा का उत्पन्न हो जाना। यह स्वाभाविक ही है। प्रार्थना का सीधा अर्थ है, किसी से कुछ मांगना, ईश्वर से कुछ मांगने का नाम प्रार्थना है। यह तीन प्रकार की है। यथा―

(1) प्रथम उत्तम प्रार्थना ― जिससे संसार के प्राणी मात्र का भला हो ऐसी प्रार्थना करना उत्तम प्रार्थना है। यथा―
निस्सन्तान संतानयुक्त हों, सन्तान वाले पुत्र पौत्रों से युक्त हों, निर्धन धन सम्पन्न हों, तथा सब लोग सौ वर्ष की दीर्घायु को देखें। समय-समय पर वर्षा हो। पृथिवी माता हरे भरे अन्नों से सुशोभित हो, सारा देश क्षोभ से रहित हो। देश के ज्ञानी, विज्ञानी, ब्राह्मण निर्भय होकर विचरें। संसार के सब प्राणी सुखी हों, कोई भी दुःखी दृष्टि गोचर न हो। सब रोग रहित होकर भद्र को देखें।

(2) द्वितीय मध्यम प्रार्थना ― जिसमें आत्म कल्याण और आत्महित की भावना हो यथा ―
हे प्रभो ! मेरा जीवन शुद्ध और पवित्र हो, बल, बुद्धि, यश, तेज, सत्यता, उदारता आदि शुभ गुणों का मेरे जीवन में वास हो। मैं विषयों, व्यसनों, दुर्गुणों एवं मृत्यु से पृथक् होकर मोक्षानन्द का लाभ करूँ।मृत्यु र्मुक्षीय माऽमृतात्"

(3) तृतीय निकृष्ट प्रार्थना ― जिसमें अपना स्वार्थ और अन्यों के बुरे की भावना भरी हो। यथा मुझे धन, पशु, सन्तान, सुख की प्राप्ति हो जाय और मेरे शत्रु इन वस्तुओं से रहित होकर दुःख, दारिद्रय, और रोगों को प्राप्त कर मौत के दर्शन करें। ऐसी प्रार्थना ईश्वर कभी स्वीकार नहीं करते।

उपासना:― भक्ति का तीसरा अंग उपासना है इसका अर्थ है ईश्वर के समीप बैठना, ईश्वर के गुणों को अपने में धारण करके उस जैसा हो जाना। इस अवस्था को प्राप्त कर भक्त कह उठता है, अहं ब्रह्माऽस्मि" मैं ब्रह्मस्थ हो गया हूँ। जीव किसी अवस्था में भी ब्रह्म नहीं हो सकता। हाँ, समाधि अवस्था में कुछ समय के लिए वह अपने को ब्रह्म समान समझने लगता है जैसे लोहा, आग में पड़कर आग के समान हो जाता है। परन्तु आग नहीं बन जाता, आग से पृथक् होने पर पुनः लोहा ही रहता है।इसी प्रकार भक्ति द्वारा ईश्वर के कुछ गुण उपासक में आ जाते हैं।

Tuesday, 17 December 2019

शरद पूर्णिमा

🌏     वर्ष के बारह महीनों में ये पूर्णिमा ऐसी है, जो तन, मन और धन तीनों के लिए सर्वश्रेष्ठ होती है। इस पूर्णिमा को चंद्रमा की किरणों से अमृत की वर्षा होती है, तो धन की देवी महालक्ष्मी रात को ये देखने के लिए निकलती हैं कि कौन जाग रहा है और वह अपने कर्मनिष्ठ भक्तों को धन-धान्य से भरपूर करती हैं।

🌏    शरद पूर्णिमा का एक नाम कोजागरी पूर्णिमा भी है यानी लक्ष्मी जी पूछती हैं- कौन जाग रहा है? अश्विनी महीने की पूर्णिमा को चंद्रमा अश्विनी नक्षत्र में होता है इसलिए इस महीने का नाम अश्विनी पड़ा है।

🌓      एक महीने में चंद्रमा जिन 27 नक्षत्रों में भ्रमण करता है, उनमें ये सबसे पहला है और आश्विन नक्षत्र की पूर्णिमा आरोग्य देती है।

🌎    केवल शरद पूर्णिमा को ही चंद्रमा अपनी सोलह कलाओं से संपूर्ण होता है और पृथ्वी के सबसे ज्यादा निकट भी। चंद्रमा की किरणों से इस पूर्णिमा को अमृत बरसता है।

🌏    आयुर्वेदाचार्य वर्ष भर इस पूर्णिमा की प्रतीक्षा करते हैं। जीवनदायिनी रोगनाशक जड़ी-बूटियों को वह शरद पूर्णिमा की चांदनी में रखते हैं। अमृत से नहाई इन जड़ी-बूटियों से जब दवा बनायी जाती है तो वह रोगी के ऊपर तुंरत असर करती है।

🌓   चंद्रमा को वेदं-पुराणों में मन के समान माना गया है- चंद्रमा मनसो जात:। वायु पुराण में चंद्रमा को जल का कारक बताया गया है। प्राचीन ग्रंथों में चंद्रमा को औषधीश यानी औषधियों का स्वामी कहा गया है।

🌏   ब्रह्मपुराण के अनुसार- सोम या चंद्रमा से जो सुधामय तेज पृथ्वी पर गिरता है उसी से औषधियों की उत्पत्ति हुई और जब औषधी 16 कला संपूर्ण हो तो अनुमान लगाइए उस दिन औषधियों को कितना बल मिलेगा।

🌏   शरद पूर्णिमा की शीतल चांदनी में रखी खीर खाने से शरीर के सभी रोग दूर होते हैं। ज्येष्ठ, आषाढ़, सावन और भाद्रपद मास में शरीर में पित्त का जो संचय हो जाता है, शरद पूर्णिमा की शीतल धवल चांदनी में रखी खीर खाने से पित्त बाहर निकलता है।

🌓    लेकिन इस खीर को एक विशेष विधि से बनाया जाता है। पूरी रात चांद की चांदनी में रखने के बाद सुबह खाली पेट यह खीर खाने से सभी रोग दूर होते हैं, शरीर निरोगी होता है।

🌏   शरद पूर्णिमा को रास पूर्णिमा भी कहते हैं। स्वयं सोलह कला संपूर्ण भगवान श्रीकृष्ण से भी जुड़ी है यह पूर्णिमा। इस रात को अपनी राधा रानी और अन्य सखियों के साथ श्रीकृष्ण महारास रचाते हैं।

🌏   कहते हैं जब वृन्दावन में भगवान कृष्ण महारास रचा रहे थे तो चंद्रमा आसमान से सब देख रहा था और वह इतना भाव-विभोर हुआ कि उसने अपनी शीतलता के साथ पृथ्वी पर अमृत की वर्षा आरंभ कर दी।

🌓  गुजरात में शरद पूर्णिमा को लोग रास रचाते हैं और गरबा खेलते हैं। मणिपुर में भी श्रीकृष्ण भक्त रास रचाते हैं। पश्चिम बंगाल और ओडिशा में शरद पूर्णिमा की रात को महालक्ष्मी की विधि-विधान के साथ पूजा की जाती है। मान्यता है कि इस पूर्णिमा को जो महालक्ष्मी का पूजन करते हैं और रात भर जागते हैं, उनकी सभी कामनाओं की पूर्ति होती है।

🌏   ओडिशा में शरद पूर्णिमा को कुमार पूर्णिमा के नाम से मनाया जाता है। आदिदेव महादेव और देवी पार्वती के पुत्र कार्तिकेय का जन्म इसी पूर्णिमा को हुआ था। गौर वर्ण, आकर्षक, सुंदर कार्तिकेय की पूजा कुंवारी लड़कियां उनके जैसा पति पाने के लिए करती हैं।

🌏   शरद पूर्णिमा ऐसे महीने में आती है, जब वर्षा ऋतु अंतिम समय पर होती है। शरद ऋतु अपने बाल्यकाल में होती है और हेमंत ऋतु आरंभ हो चुकी होती है और इसी पूर्णिमा से कार्तिक स्नान प्रारंभ हो जाता है।