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Thursday, 5 November 2020

महाकाल के दर्शन (उज्जैन्)

  महाकाल के दर्शन तो आप रोजाना  

 ही करते है ,तो विचार आया कि क्यों न श्री

महाकाल बाबा का पूरा महात्म लिखू पढ़ें जरूर

       जय श्री महाकाल


महाकाल महामात्य (उज्जैन्)

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महाकाल मंदिर परिसर में प्रमुख 42 देवताओं के मंदिर है,इस मन्दिर का लगभग साढ़े सात एकड़ में फैला विशाल परिसर संभवत भारत के किसी अन्य ज्योतिर्लिंग का नहीं है ।


देश के 12 ज्योर्तिलिंगो में एक  श्री महाकाल पृथ्वी लोक के अधिपति है। उज्जैन पूरी दुनिया से इस अर्थ में अलग है कि आकाश में उज्जैन को जो मध्य स्थान प्राप्त है, वहीं धरती पर भी प्राप्त है। आकाश व धरती दोनेां के केन्द्र बिन्दु पर उज्जैन स्थित है।


महाकाल का अर्थ समय और मृत्यु के देवता दोनों रूपों में लिया जाता है। इसी स्थान से पूरी पृथ्वी की काल गणना होती रही है। प्राचीन श्री महाकाल मंदिर का पुनर्निर्माण11वी शताब्दी में हुआ। श्री महाकाल पृथ्वी के नाभी केन्द्र पर स्थित 👉दक्षिणमुखी ज्योतिर्लिंग है, जो दुनिया का एक मात्र ऐसा ज्योतिर्लिंग है। तंत्र मन्त्र  की दृष्टि से भी इस दक्षिण मुखी ज्योतिर्लिंग का बडा महत्व है।


विश्व में अकेले श्री महाकाल है जो विविध रूपों में भक्तों को दर्शन देते है। कभी प्राकृतिक रूप में तो कभी  राजसी रूप में आभूषण धारण कर। कभी भांग, कभी चंदन और सूखे मेवे से तो कभी फल, फूल से सजते है। राजाधिराज।हनुमान, शिव, देवी सरस्वती, अवंतिका, भद्रकाली, नवग्रह, शनि, राधा-कृष्ण, गणेश के मंदिरों से विभूषित यह परिसर आध्यात्मिक अनुभूति का पावन  आंगन है।


श्री महाकाल मंदिर परिसर में यू तो छोटे-बडे अनेकों देवी देवताओं के मंदिर है परंतु परिसर में प्रमुख 42 मंदिर स्थापित है जो निम्नानुसार हैः-


श्री लक्ष्मी नृसिंह मंदिर है जो मंदिर परिसर के गलियारे में स्थित हैं। ऋद्धि- सिद्धी गणेश जी का मंदिर है जो लक्ष्मी नृसिंह मंदिर के आगे ही स्थित है। विट्ठल पण्ढ़रीनाथ मंदिर है जो मंदिर के गलियारे में स्थित है। श्री राम दरबार मंदिर गलियारे से कोटीतीर्थ की ओर नीचे उतरने पर स्थित है। श्री अवंतिका देवी का मंदिर जो उज्जैन का एक प्राचीन नाम अवंतिका है। इसका मंदिर श्री रामदरबार मंदिर के पीछे स्थापित हैं। श्री चन्द्रादिप्तेश्वर मंदिर श्री रामदरबार मंदिर से आगे बढने पर बायें हाथ पर स्थित है। श्री मंगलनाथ का मंदिर दन्द्रादिप्तेश्वर मंदिर से आगे भूमि पुत्र मंगल शिवलिंग के रूप में यहां विराजमान है। श्री अन्नपूर्णा देवी का मंदिर मंगलनाथ शिवलिंग से आगे स्थापित है। वाच्छायन गणपति महाकाल मंदिर के मुख्य प्रवेश द्वार (चांदी द्वार) के पास पूर्व दिशा में प्रतिमा स्थिापित है। प्रवेश द्वार के गणेश जी की मूर्ति चांदी द्वार के उपर गणेश प्रतिमा विराजित है।


इसी तरह महाकाल मंदिर परिसर में ही गर्भगृह में विराजित ज्योर्तिलिंग के रूप में भगवान श्री महाकालेश्वर विराजमान है जो चांदी द्वार से नीचे उतरने पर गर्भगृह स्थापित है। गर्भगृह में ही देवी पार्वती, श्री गणेश व श्री कार्तिकेय की रजत प्रतिमाएं है। गर्भगृह में ही दो अखंड नंदा दीप है। श्री ओंकारेश्वर महादेव मंदिर है जो श्री महाकालेश्वर के ठीक उपर स्थित है। श्री नागचन्द्रेश्वर महादेव का मंदिर है जो ओंकारेश्वर महादेव के उपर यानी ज्योतिर्लिंग महाकालेश्वर से तीसरी मंजिल पर स्थित है। इस मंदिर के पट वर्ष में एक बार नागपंचमी को ही खुलते है। नागचन्द्रेश्वर प्रतिमा के रूप में भी दर्शन होते है जो तीसरी मंजिल पर स्थापित है। सिद्धी विनायक मंदिर महाकालेश्वर प्रांगण में ओकारेश्वर मंदिर के सामने उत्तर दिशा की ओर स्थित है। साक्षी गोपाल मंदिर परिसर में सिद्धी विनायक के पास स्थित है। संकट मोचन सिद्धदास हनुमान मंदिर प्रांगण में उत्तर दिशा में स्थित है। स्वप्नेश्वर महादेव मंदिर सिद्धदास हनुमान मंदिर के सामने स्थापित है।


महाकाल परिसर में ही बृहस्पतेश्वर महादेव मंदिर है जो प्रांगण के उत्तर में स्वप्नेश्वर महादेव मंदिर के समीप स्थित हैं। शिव की प्राचीन प्रतिमाएं त्रिविष्टपेश्वर महादेव मंदिर श्री महाकाल मंदिर के पीछे स्थित है। मां भद्रकाल्ये मंदिर ओंकारेश्वर मंदिर से सटे उत्तरी कक्ष में है। नवग्रह मंदिर श्री महाकाल के निर्गम द्वार के पास स्थित है। मारूतिनंदन हनुमान मंदिर महाकाल परिसर के आग्नेय कोण में स्थित है। श्री राम मंदिर मारूतिनंदन हनुमान के पीछे स्थिापित है।


 नीलकंठेश्वर मंदिर महाकाल मंदिर के निर्गम द्वार के पीछे स्थित है। मराठों का मंदिर नीलकंठेश्वर महादेव के पास स्थित है। इसका निर्माण देवास के नरेश द्वारा कराया गया था। गोविन्देश्वर महादेव मंदिर वृद्धकालेश्वर महाकाल मंदिर के समीप स्थित है। सूर्यमुखी हनुमान मंदिर कोटितीर्थ के प्रदक्षिणा मार्ग पर श्री महाकाल के प्रमुख द्वार के पास स्थित है। लक्ष्मीप्रदाता मोढ़ गणेश मंदिर कोटितीर्थ के उत्तर दिशा में स्थित है। कोटेश्वर महादेव मंदिर यह महाकाल के गण तथा कोटितीर्थ के अधिष्ठाता है। यह एक महत्वपूर्ण मंदिर है। प्रदोष के दिन श्री महाकाल की संध्या-पूजा के पहले कोटेश्वर की पूजा की जाती है।


सप्तऋषि मंदिर महाकाल परिसर के पीछे की ओर सप्तऋषियों के सात मंदिर है। अनादिकल्पेश्वर महादेव मंदिर सप्तऋषि मंदिर के ठीक सामने है। श्री बाल विजय मस्त हनुमान मंदिर अनादिकल्पेश्वर महादेव के सामने स्थित है। यह एक चैतन्य देव स्थान माना जाता है। श्री ओंकारेश्वर महादेव का मंदिर परिसर में ही स्थित है। श्री वृद्धकालेश्वर महाकाल (जूना महाकाल) श्री बाल हनुमान मंदिर के पास स्थित है। पवित्र कोटितीर्थ महाकाल के आंगन का जल तीर्थ है। महाभारत इस तीर्थ का उल्लेख है। कोटितीर्थ के पवित्र जल से नित्य महाकाल का अभिषेक होता है।


भगवान श्री महाकाल की प्रतिदिन पांच आरती होती है। भस्मार्ती  प्रतिदिन प्रातः होती है।भस्मार्ती का समय केवल श्रावण मास में परिवर्तन किया जाता है। इसी प्रकार महाशिवरात्रि पर्व पर भस्मार्ती दोपहर 12 बजे होती है। विश्वभर में एक मात्र श्री महाकाल है जिनकी प्रातः 4 से 6 बजे तक वैदिक मंत्रों, स्त्रोत-पाठ, वाद्य यंत्रों, शंख, डमरू, घंटी घडियालों के साथ भस्मार्ती होती है। दद्दयोदय आरती प्रातः काल 7 बजे से होती है। इस आरती में समय पर परिवर्तन होता रहता है। तीसरी आरती प्रातः 10 बजे से नैवेद्य आरती होती है। शाम 5 बजे गर्भगृह में बाबा महाकाल का जलाभिषेक बंद रहता है और इस समय पूजन श्रंगार किया जाता है। इसके बाद शाम को संध्या आरती 7 बजे से की जाती है। शयन आरती रात्रि 10.30 बजे से होती है इसके बाद गर्भगृह के पट बंद हो जाते है। जेा अगले दिन प्रातः 4 बजे खुलते है। आरतियों में समय-समय पर परिवर्तन होता रहता है।


मंदिर परिसर के बाहर ही सिद्ध विनायक  गणेश जी की विशाल प्रतिमा है ।इसी से थोड़ा आगे माँ हरसिद्धि का मंदिर है जो देवी के 52 शक्तिपीठो में से एक है ।प्रसिद्द शिप्रा का घाट रामघाट भी हरसिध्दि मंदिर के समीप ही है ।समीप ही चार धाम मंदिर है ।


एक तरह से देखा जाय तो यह देवताओ की नगरी है जहाँ भी नजर दौड़ाये मंदिर नजर आएंगे।यहां के कण कण में भगवान है  84 महादेव,9 नारायण,सप्तसागर , कालभैरव, सिद्धवट, सांदीपनि आश्रम,गोपाल मंदिर,भर्तहरि गुफा, इस्कॉन मंदिर, गढ़कालिका,चिन्तामण गणेश, हनुमानजी के सेकड़ो सिद्ध मंदिर यहां की शोभा बढ़ाते है ।


इसीलिये कहा जाता है महाकाल यहाँ सपरिवार विराजित है ।


     ।।  जय श्री महाकाल ।।

भगवान शिव के 35 रहस्य

भगवान शिव अर्थात पार्वती के पति शंकर जिन्हें महादेव, भोलेनाथ, आदिनाथ आदि कहा जाता है।


🔱1. आदिनाथ शिव :- सर्वप्रथम शिव ने ही धरती पर जीवन के प्रचार-प्रसार का प्रयास किया इसलिए उन्हें आदिदेव भी कहा जाता है, आदि का अर्थ प्रारंभ, आदिनाथ होने के कारण उनका एक नाम आदिश भी है।


🔱2. शिव के अस्त्र-शस्त्र :- शिव का धनुष पिनाक, चक्र भवरेंदु और सुदर्शन, अस्त्र पाशुपतास्त्र और शस्त्र त्रिशूल है, उक्त सभी का उन्होंने ही निर्माण किया था।


🔱3. भगवान शिव का नाग :- शिव के गले में जो नाग लिपटा रहता है उसका नाम वासुकि है, वासुकि के बड़े भाई का नाम शेषनाग है।


🔱4. शिव की अर्द्धांगिनी :- शिव की पहली पत्नी सती ने ही अगले जन्म में पार्वती के रूप में जन्म लिया और वही उमा, उर्मि, काली कही गई।


🔱5. शिव के पुत्र :- शिव के प्रमुख 6 पुत्र हैं- गणेश, कार्तिकेय, सुकेश, जलंधर, अयप्पा और भूमा, सभी के जन्म की कथा रोचक है।


🔱6. शिव के शिष्य :- शिव के 7 शिष्य हैं जिन्हें प्रारंभिक सप्तऋषि माना गया है, इन ऋषियों ने ही शिव के ज्ञान को सम्पूर्ण धरती पर प्रचारित किया जिसके चलते भिन्न-भिन्न धर्म और संस्कृतियों की उत्पत्ति हुई, शिव ने ही गुरु और शिष्य परम्परा की शुरुआत की थी, शिव के शिष्य हैं- बृहस्पति, विशालाक्ष, शुक्र, सहस्राक्ष, महेन्द्र, प्राचेतस मनु, भरद्वाज इसके अलावा 8वें गौरशिरस मुनि भी थे।


🔱7. शिव के गण :- शिव के गणों में भैरव, वीरभद्र, मणिभद्र, चंदिस, नंदी, श्रृंगी, भृगिरिटी, शैल, गोकर्ण, घंटाकर्ण, जय और विजय प्रमुख हैं, इसके अलावा, पिशाच, दैत्य और नाग-नागिन, पशुओं को भी शिव का गण माना जाता है। 


🔱8. शिव पंचायत :- भगवान सूर्य, गणपति, देवी, रुद्र और विष्णु ये शिव पंचायत कहलाते हैं।


🔱9. शिव के द्वारपाल :- नंदी, स्कंद, रिटी, वृषभ, भृंगी, गणेश, उमा-महेश्वर और महाकाल।


🔱10. शिव पार्षद :- जिस तरह जय और विजय विष्णु के पार्षद हैं उसी तरह बाण, रावण, चंड, नंदी, भृंगी आदि शिव के पार्षद हैं।


🔱11. सभी धर्मों का केंद्र शिव :- शिव की वेशभूषा ऐसी है कि प्रत्येक धर्म के लोग उनमें अपने प्रतीक ढूंढ सकते हैं; मुशरिक, यजीदी, साबिईन, सुबी, इब्राहीमी धर्मों में शिव के होने की छाप स्पष्ट रूप से देखी जा सकती है, शिव के शिष्यों से एक ऐसी परम्परा की शुरुआत हुई, जो आगे चलकर शैव, सिद्ध, नाथ, दिगंबर और सूफी संप्रदाय में वि‍भक्त हो गई।


🔱12. बौद्ध साहित्य के मर्मज्ञ अंतरराष्ट्रीय :-  ख्याति प्राप्त विद्वान प्रोफेसर उपासक का मानना है कि शंकर ने ही बुद्ध के रूप में जन्म लिया था, उन्होंने पालि ग्रंथों में वर्णित 27 बुद्धों का उल्लेख करते हुए बताया कि इनमें बुद्ध के 3 नाम अतिप्राचीन हैं- तणंकर, शणंकर और मेघंकर।


🔱13. देवता और असुर दोनों के प्रिय शिव :- भगवान शिव को देवों के साथ असुर, दानव, राक्षस, पिशाच, गंधर्व, यक्ष आदि सभी पूजते हैं, वे रावण को भी वरदान देते हैं और राम को भी; उन्होंने भस्मासुर, शुक्राचार्य आदि कई असुरों को वरदान दिया था शिव, सभी आदिवासी, वनवासी जाति, वर्ण, धर्म और समाज के सर्वोच्च देवता हैं।


🔱14. शिव चिह्न :- वनवासी से लेकर सभी साधारण व्‍यक्ति जिस चिह्न की पूजा कर सकें, उस पत्‍थर के ढेले, बटिया को शिव का चिह्न माना जाता है, इसके अलावा रुद्राक्ष और त्रिशूल को भी शिव का चिह्न माना गया है, कुछ लोग डमरू और अर्द्ध चन्द्र को भी शिव का चिह्न मानते हैं, हालांकि ज्यादातर लोग शिवलिंग अर्थात शिव की ज्योति का पूजन करते हैं।


🔱15. शिव की गुफा :- शिव ने भस्मासुर से बचने के लिए एक पहाड़ी में अपने त्रिशूल से एक गुफा बनाई और वे फिर उसी गुफा में छिप गए, वह गुफा जम्मू से 150 किलोमीटर दूर त्रिकूटा की पहाड़ियों पर है, दूसरी ओर भगवान शिव ने जहां पार्वती को अमृत ज्ञान दिया था वह गुफा अमरनाथ गुफा के नाम से प्रसिद्ध है।


🔱16. शिव के पैरों के निशान :- श्रीपद- श्रीलंका में रतन द्वीप पहाड़ की चोटी पर स्थित श्रीपद नामक मंदिर में शिव के पैरों के निशान हैं, ये पदचिह्न 5 फुट 7 इंच लंबे और 2 फुट 6 इंच चौड़े हैं, इस स्थान को सिवानोलीपदम कहते हैं, कुछ लोग इसे आदम पीक कहते हैं।


रुद्र पद- तमिलनाडु के नागपट्टीनम जिले के थिरुवेंगडू क्षेत्र में श्रीस्वेदारण्येश्‍वर का मंदिर में शिव के पदचिह्न हैं जिसे रुद्र पदम कहा जाता है, इसके अलावा थिरुवन्नामलाई में भी एक स्थान पर शिव के पदचिह्न हैं।


तेजपुर- असम के तेजपुर में ब्रह्मपुत्र नदी के पास स्थित रुद्रपद मंदिर में शिव के दाएं पैर का निशान है।


जागेश्वर- उत्तराखंड के अल्मोड़ा से 36 किलोमीटर दूर जागेश्वर मंदिर की पहाड़ी से लगभग साढ़े 4 किलोमीटर दूर जंगल में भीम के मंदिर के पास शिव के पदचिह्न हैं, पांडवों को दर्शन देने से बचने के लिए उन्होंने अपना एक पैर यहां और दूसरा कैलाश में रखा था।


रांची- झारखंड के रांची रेलवे स्टेशन से 7 किलोमीटर की दूरी पर रांची हिल पर शिवजी के पैरों के निशान हैं, इस स्थान को पहाड़ी बाबा मंदिर कहा जाता है।


🔱17. शिव के अवतार :- वीरभद्र, पिप्पलाद, नंदी, भैरव, महेश, अश्वत्थामा, शरभावतार, गृहपति, दुर्वासा, हनुमान, वृषभ, यतिनाथ, कृष्णदर्शन, अवधूत, भिक्षुवर्य, सुरेश्वर, किरात, सुनटनर्तक, ब्रह्मचारी, यक्ष, वैश्यानाथ, द्विजेश्वर, हंसरूप, द्विज, नतेश्वर आदि हुए हैं, वेदों में रुद्रों का जिक्र है, रुद्र 11 बताए जाते हैं- कपाली, पिंगल, भीम, विरुपाक्ष, विलोहित, शास्ता, अजपाद, आपिर्बुध्य, शंभू, चण्ड तथा भव।


🔱18. शिव का विरोधा-भासिक परिवार :- शिवपुत्र कार्तिकेय का वाहन मयूर है, जबकि शिव के गले में वासुकि नाग है, स्वभाव से मयूर और नाग आपस में दुश्मन हैं, इधर गणपति का वाहन चूहा है, जबकि सांप मूषक भक्षी जीव है, पार्वती का वाहन शेर है, लेकिन शिवजी का वाहन तो नंदी बैल है, इस विरोधाभास या वैचारिक भिन्नता के बावजूद परिवार में एकता है।


🔱19. ति‍ब्बत स्थित कैलाश पर्वत :- पर उनका निवास है जहां पर शिव विराजमान हैं उस पर्वत के ठीक नीचे पाताल लोक है जो भगवान विष्णु का स्थान है, शिव के आसन के ऊपर वायुमंडल के पार क्रमश: स्वर्ग लोक और फिर ब्रह्माजी का स्थान है।


🔱20. शिव भक्त :- ब्रह्मा, विष्णु और सभी देवी-देवताओं सहित भगवान राम और कृष्ण भी शिव भक्त है, हरिवंश पुराण के अनुसार, कैलास पर्वत पर कृष्ण ने शिव को प्रसन्न करने के लिए तपस्या की थी, भगवान राम ने रामेश्वरम में शिवलिंग स्थापित कर उनकी पूजा-अर्चना की थी।


🔱21. शिव ध्यान :- शिव की भक्ति हेतु शिव का ध्यान-पूजन किया जाता है, शिवलिंग को बिल्वपत्र चढ़ाकर शिवलिंग के समीप मंत्र जाप या ध्यान करने से मोक्ष का मार्ग पुष्ट होता है।


🔱22. शिव मंत्र :- दो ही शिव के मंत्र हैं पहला- ॐ नम: शिवाय दूसरा महामृत्युंजय मंत्र- ॐ ह्रौं जू सः ॐ भूः भुवः स्वः ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्‌ उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्‌। स्वः भुवः भूः ॐ सः जू ह्रौं ॐ ॥ है।


🔱23. शिव व्रत और त्योहार :- सोमवार, प्रदोष और श्रावण मास में शिव व्रत रखे जाते हैं, शिवरात्रि और महाशिवरात्रि शिव का प्रमुख पर्व त्योहार है।


🔱24. शिव प्रचारक :- भगवान शंकर की परम्परा को उनके शिष्यों बृहस्पति, विशालाक्ष, (शिव) शुक्र, सहस्राक्ष, महेन्द्र, प्राचेतस मनु, भरद्वाज, अगस्त्य मुनि, गौरशिरस मुनि, नंदी, कार्तिकेय, भैरवनाथ आदि ने आगे बढ़ाया; इसके अलावा वीरभद्र, मणिभद्र, चंदिस, नंदी, श्रृंगी, भृगिरिटी, शैल, गोकर्ण, घंटाकर्ण, बाण, रावण, जय और विजय ने भी शैवपंथ का प्रचार किया, इस परम्परा में सबसे बड़ा नाम आदिगुरु भगवान दत्तात्रेय का आता है, दत्तात्रेय के बाद आदि शंकराचार्य, मत्स्येन्द्रनाथ और गुरु गुरुगोरखनाथ का नाम प्रमुखता से लिया जाता है।


🔱25. शिव महिमा :- शिव ने कालकूट नामक विष पिया था जो अमृत मंथन के दौरान निकला था, शिव ने भस्मासुर जैसे कई असुरों को वरदान दिया था, शिव ने कामदेव को भस्म कर दिया था, शिव ने गणेश और राजा दक्ष के सिर को जोड़ दिया था, ब्रह्मा द्वारा छल किए जाने पर शिव ने ब्रह्मा का पांचवां सिर काट दिया था।


🔱26. शैव परम्परा :- दसनामी, शाक्त, सिद्ध, दिगंबर, नाथ, लिंगायत, तमिल शैव, कालमुख शैव, कश्मीरी शैव, वीरशैव, नाग, लकुलीश, पाशुपत, कापालिक, कालदमन और महेश्वर सभी शैव परंपरा से हैं; चंद्रवंशी, सूर्यवंशी, अग्निवंशी और नागवंशी भी शिव की परंपरा से ही माने जाते हैं; भारत की असुर, रक्ष और आदिवासी जाति के आराध्य देव शिव ही हैं, शैव धर्म भारत के आदिवासियों का धर्म है।


🔱27. शिव के प्रमुख नाम :- शिव के वैसे तो अनेक नाम हैं जिनमें 108 नामों का उल्लेख पुराणों में मिलता है लेकिन यहां प्रचलित नाम जानें- महेश, नीलकंठ, महादेव, महाकाल, शंकर, पशुपतिनाथ, गंगाधर, नटराज, त्रिनेत्र, भोलेनाथ, आदिदेव, आदिनाथ, त्रियंबक, त्रिलोकेश, जटाशंकर, जगदीश, प्रलयंकर, विश्वनाथ, विश्वेश्वर, हर, शिवशंभु, भूतनाथ और रुद्र।


🔱28. अमरनाथ के अमृत वचन :- शिव ने अपनी अर्धांगिनी पार्वती को मोक्ष हेतु अमरनाथ की गुफा में जो ज्ञान दिया उस ज्ञान की आज अनेकानेक शाखाएं हो चली हैं, वह ज्ञानयोग और तंत्र के मूल सूत्रों में शामिल है, विज्ञान भैरव तंत्र एक ऐसा ग्रंथ है, जिसमें भगवान शिव द्वारा पार्वती को बताए गए 112 ध्यान सूत्रों का संकलन है।


🔱29. शिव ग्रंथ :- वेद और उपनिषद सहित विज्ञान भैरव तंत्र, शिव पुराण और शिव संहिता में शिव की संपूर्ण शिक्षा और दीक्षा समाई हुई है, तंत्र के अनेक ग्रंथों में उनकी शिक्षा का विस्तार हुआ है।


🔱30. शिवलिंग :- वायु पुराण के अनुसार प्रलयकाल में समस्त सृष्टि जिसमें लीन हो जाती है और पुन: सृष्टिकाल में जिससे प्रकट होती है, उसे लिंग कहते हैं, इस प्रकार विश्व की संपूर्ण ऊर्जा ही लिंग की प्रतीक है, वस्तुत: यह संपूर्ण सृष्टि बिंदु-नाद स्वरूप है, बिंदु शक्ति है और नाद शिव, बिंदु अर्थात ऊर्जा और नाद अर्थात ध्वनि, यही दो संपूर्ण ब्रह्मांड का आधार है, इसी कारण प्रतीक स्वरूप शिवलिंग की पूजा-अर्चना है।


🔱31. बारह ज्योतिर्लिंग :- सोमनाथ, मल्लिकार्जुन, महाकालेश्वर, ॐकारेश्वर, वैद्यनाथ, भीमशंकर, रामेश्वर, नागेश्वर, विश्वनाथजी, त्र्यम्बकेश्वर, केदारनाथ, घृष्णेश्वर; ज्योतिर्लिंग उत्पत्ति के संबंध में अनेकों मान्यताएं प्रचलित है; ज्योतिर्लिंग यानी व्यापक ब्रह्मात्मलिंग जिसका अर्थ है व्यापक प्रकाश; जो शिवलिंग के बारह खंड हैं, शिवपुराण के अनुसार ब्रह्म, माया, जीव, मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार, आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी को ज्योतिर्लिंग या ज्योति पिंड कहा गया है।


दूसरी मान्यता अनुसार शिव पुराण के अनुसार प्राचीनकाल में आकाश से ज्‍योति पिंड पृथ्‍वी पर गिरे और उनसे थोड़ी देर के लिए प्रकाश फैल गया, इस तरह के अनेकों उल्का पिंड आकाश से धरती पर गिरे थे, भारत में गिरे अनेकों पिंडों में से प्रमुख बारह पिंड को ही ज्‍योतिर्लिंग में शामिल किया गया।


🔱32. शिव का दर्शन :- शिव के जीवन और दर्शन को जो लोग यथार्थ दृष्टि से देखते हैं वे सही बुद्धि वाले और यथार्थ को पकड़ने वाले शिवभक्त हैं, क्योंकि शिव का दर्शन कहता है कि यथार्थ में जियो, वर्तमान में जियो, अपनी चित्तवृत्तियों से लड़ो मत, उन्हें अजनबी बनकर देखो और कल्पना का भी यथार्थ के लिए उपयोग करो, आइंस्टीन से पूर्व शिव ने ही कहा था कि कल्पना ज्ञान से ज्यादा महत्वपूर्ण है।


🔱33. शिव और शंकर :- शिव का नाम शंकर के साथ जोड़ा जाता है, लोग कहते हैं- शिव, शंकर, भोलेनाथ; इस तरह अनजाने ही कई लोग शिव और शंकर को एक ही सत्ता के दो नाम बताते हैं, असल में दोनों की प्रतिमाएं अलग-अलग आकृति की हैं, शंकर को हमेशा तपस्वी रूप में दिखाया जाता है, कई जगह तो शंकर को शिवलिंग का ध्यान करते हुए दिखाया गया है, अत: शिव और शंकर दो अलग अलग सत्ताएं है, हालांकि शंकर को भी शिवरूप माना गया है माना जाता है कि महेष (नंदी) और महाकाल भगवान शंकर के द्वारपाल हैं, रुद्र देवता शंकर की पंचायत के सदस्य हैं।


🔱34. देवों के देव महादेव :- देवताओं की दैत्यों से प्रतिस्पर्धा चलती रहती थी, ऐसे में जब भी देवताओं पर घोर संकट आता था तो वे सभी देवाधिदेव महादेव के पास जाते थे दैत्यों, राक्षसों सहित देवताओं ने भी शिव को कई बार चुनौती दी, लेकिन वे सभी परास्त होकर शिव के समक्ष झुक गए इसीलिए शिव हैं देवों के देव महादेव; वे दैत्यों, दानवों और भूतों के भी प्रिय भगवान हैं, वे राम को भी वरदान देते हैं और रावण को भी।


🔱35. शिव हर काल में :- भगवान शिव ने हर काल में लोगों को दर्शन दिए हैं, राम के समय भी शिव थे, महाभारत काल में भी शिव थे और विक्रमादित्य के काल में भी शिव के दर्शन होने का उल्लेख मिलता है, भविष्य पुराण अनुसार राजा हर्षवर्धन को भी भगवान शिव ने दर्शन दिये थे।