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Thursday, 5 November 2020

यदि "महाभारत" को पढ़ने का समय ना हो तो भी इसके नौ सार - सूत्र हमारे जीवन में उपयोगी सिद्ध हो सकते है

1) संतानों कि  गलत  माँग  और  हठ  पर  समय  रेहते  अंकुश  नहीं  लगाया  गया , तो  अंत  में  आप  असहाय  हो  जायेंगे.....कौरव.....


2) आप  भले  ही  कितने  बलवान  हो  लेकिन  अधर्म  के  साथ  हो  तो , आपकी  विद्या ,  अस्त्र-शस्त्र  शक्ति  और  वरदान  सब  निष्फल  हो  जायेगा.....कर्ण.....


3) संतानों  को  इतना  महत्वाकांक्षी  मत  बना  दो  कि  विद्या  का  दुरुपयोग  कर  स्वयंनाश  कर  सर्वनाश  को  आमंत्रित  करे.....अश्वत्थामा.....


4) कभी  किसी  को  ऐसा  वचन  मत  दो  कि  आपको  अधर्मियों  के  आगे  समर्पण  करना  पड़े.....भीष्म पितामह.....


5) संपत्ति , शक्ति  व  सत्ता  का  दुरुपयोग  और  दुराचारियों  का  साथ  अंत  में  स्वयं  नाश  का  दर्शन  कराता  है.....दुर्योधन.....


6) अंध  व्यक्ति - अर्थात  मुद्रा , मदिरा , अज्ञान , मोह  और  काम ( मृदुला)  अंध  व्यक्ति  के  हाथ  में  सत्ता  भी  विनाश  की  ओर  ले  जाती  है.....धृतराष्ट्र.....


7) यदि  व्यक्ति  के  पास  विद्या , विवेक  से  बंधी  हो  तो  विजय  अवश्य  मिलती  है.....अर्जुन.....


8) हर  कार्य  में  छल , कपट ,  व  प्रपंच  रच  कर  आप  हमेशा  सफल  नहीं  हो  सकते.....शकुनि.....


9) यदि  आप  नीति , धर्म , व  कर्म  का  सफलता  पूर्वक  पालन  करेंगे , तो  विश्व  कि  कोई  भी  शक्ति  आपको  पराजित  नहीं  कर  सकती.....युधिष्ठिर.....


यदि  इन  नौ  सूत्रों  से  सबक  लेना  सम्भव  नहीं  होता  है  तो  जीवन  मे  महाभारत  संभव  हो  जाता  है।



हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे

हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे

सदैव सकारात्मक रहें |

 महाराज दशरथ को जब संतान प्राप्ति नहीं हो रही थी तब वो बड़े दुःखी रहते थे...पर ऐसे समय में उनको एक ही बात से हौंसला मिलता था जो कभी उन्हें आशाहीन नहीं होने देता था...


और वह था श्रवण के पिता का श्राप....


दशरथ जब-जब दुःखी होते थे तो उन्हें श्रवण के पिता का दिया श्राप याद आ जाता था... (कालिदास ने रघुवंशम में इसका वर्णन किया है)


श्रवण के पिता ने ये श्राप दिया था कि ''जैसे मैं पुत्र वियोग में तड़प-तड़प के मर रहा हूँ वैसे ही तू भी तड़प-तड़प कर मरेगा.....''


दशरथ को पता था कि ये श्राप अवश्य फलीभूत होगा और इसका मतलब है कि मुझे इस जन्म में तो जरूर पुत्र प्राप्त होगा.... (तभी तो उसके शोक में मैं तड़प के मरूँगा)


यानि यह श्राप दशरथ के लिए संतान प्राप्ति का सौभाग्य लेकर आया....


ऐसी ही एक घटना सुग्रीव के साथ भी हुई....


वाल्मीकि रामायण में वर्णन है कि सुग्रीव जब माता सीता की खोज में वानर वीरों को पृथ्वी की अलग - अलग दिशाओं में भेज रहे थे.... तो उसके साथ-साथ उन्हें ये भी बता रहे थे कि किस दिशा में तुम्हें कौन सा स्थान या देश  मिलेगा और किस दिशा में तुम्हें जाना चाहिए या नहीं जाना चाहिये.... 


प्रभु श्रीराम सुग्रीव का ये भगौलिक ज्ञान देखकर हतप्रभ थे...

उन्होंने सुग्रीव से पूछा कि सुग्रीव तुमको ये सब कैसे पता...?

तो सुग्रीव ने उनसे कहा कि... ''मैं बाली के भय से जब मारा-मारा फिर रहा था तब पूरी पृथ्वी पर कहीं शरण न मिली... और इस चक्कर में मैंने पूरी पृथ्वी छान मारी और इसी दौरान मुझे सारे भूगोल का ज्ञान हो गया....''


अब अगर सुग्रीव पर ये संकट न आया होता तो उन्हें भूगोल का ज्ञान नहीं होता और माता जानकी को खोजना कितना कठिन हो  जाता...


इसीलिए किसी ने बड़ा सुंदर कहा है :-


"अनुकूलता भोजन है, प्रतिकूलता विटामिन है और चुनौतियाँ वरदान है और जो उनके अनुसार व्यवहार करें.... वही पुरुषार्थी है...."


ईश्वर की तरफ से मिलने वाला हर एक पुष्प अगर वरदान है.......तो हर एक काँटा भी वरदान ही समझें....


मतलब.....अगर आज मिले सुख से आप खुश हो...तो कभी अगर कोई दुख,विपदा,अड़चन आजाये.....तो घबरायें नहीं.... क्या पता वो अगले किसी सुख की तैयारी हो....


सदैव सकारात्मक रहें...