जीवन की सात मर्यादाओं का भंग न करो
क्रान्तदर्शी विद्वानों ने व्यक्ति को पाप से बचाने के लिए सात मर्यादाओं का निर्माण किया है उन मर्यादाओं का उल्लंघन किसी को कभी भूलकर भी नहीं करना चाहिए यथा―(1) स्तेय - चोरी न करना, मालिक की दृष्टि बचाकर उसकी वस्तु का अपने लिये उपयोग करना यह साधारण चोरी है। उसकी उपस्थिति में बलपूर्वक छीन लेना 'लूट' कहाता है, जो व्यापारी पूरे पैसे लेकर कम तोलता है, कम नापता है, बढ़िया पैसे माल के लेकर घटिया देता है, वस्तुओं में मिलावट करके बेचता है, पूरा वेतन लेकर कम काम करता है, जो अधिकारी या नौकर घूंस (रिश्वत) लेता है, जो आवश्यकता से अधिक संग्रह करता है वह चोर, डाकू, लुटेरा है। सब प्रकार की चोरी, डाका, लूट से बचना ही अस्तेय है। अर्थात् प्रत्येक प्रकार की शारीरिक , मानसिक चोरी का त्याग अस्तेय है।
(2). तल्पारोहण त्याग - किसी भी पराई स्त्री से भोग करना तल्पारोहण कहलाता है। परस्त्री सम्पर्क का दोष दर्शाते हुए नीतिकारों ने कहा है:―
बधो बन्धो धनभ्रंशस्तापः शोक कुलक्षयः ।
आयासः कलहो मृत्युर्लभ्यन्ते पर दारकै ।।
भावार्थ - पराई स्त्री से सहवास करने वालों को कतल होना, कैद में पड़ना, धन का नाश, सन्ताप प्राप्ति, शोकाकुलता, कुल का नाश, थकान का आना, कलह और मृत्यु से दो चार होना पड़ता है।अतः इससे बचना बहुत आवश्यक है।_
(3). भ्रूण हत्या का त्याग - अर्थात् गर्भपात से बचना अथवा अण्डे, माँस, आदि का न खाना, किसी कवि का वचन है
पेट भर सकती हैं तेरा जब सिर्फ दो रोटियाँ ।
किस लिये फिर ढूंढता है बे-जुबां की बोटियां ।
गर हिरस है तो हिरस का पेट भर सकता नहीं ।
दुनिया का सब कुछ मिले तो तृप्त कर सकता नहीं।
(4). मादक वस्तुओं का त्याग - सुरापान, भंग, चरस, अफीम,तम्बाकू, बीड़ी,सिगरेट आदि बुद्धिनाशक वस्तुओं का त्याग, नशीली वस्तुओं का प्रयोग बड़ा हानिकारक है। क्योंकि नशीले पदार्थों के सेवन से बुद्धि विकृत होकर चित्त में भ्रान्ति हो जाती है, चित्त के भ्रान्त होने पर मनुष्य पाप करता है, पाप करके दुर्गति को प्राप्त होता है।
(5). दुष्कृत कर्मों का त्याग - बुरे कर्मों की बार-बार जीवन में आवृत्ति नहीं करनी चाहिए, बुरे कर्मों से सदा बचना चाहिए,
भलाई कर चलो जग में तुम्हारा भी भला होगा ।तुम्हारे कर्म का लेखा किसी दिन बरमला होगा ।
(6). ब्रह्महत्या से बचना - अर्थात् भक्ति का त्याग न करना, भक्ति तीन प्रकार की होती है―जाति भक्ति, देश भक्ति,प्रभु भक्ति अथवा किसी ईश्वरभक्त, वेदपाठी सदाचारी विद्वान् की हत्या न करना या उसे किसी प्रकार से कष्ट न पहुँचाना।
(7). पाप करके उसे न छिपाना - पाप छिपाने से बढ़ता और प्रकट करने से घटता है। इसलिये बुद्धिमान को पाप करके छिपाना नहीं चाहिए।
जो उपरोक्त मर्यादाओं का पालन करता है वही श्रेष्ठ पुरुष है। उस पर पाप का कभी भी आक्रमण नहीं होता, वह सदा सुख की और अग्रसर होता है। वेद का सन्देश इस प्रकार है–