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Sunday, 1 December 2019

रामचरितमानस- जानिए किस इंसान से किस तरह की बात नहीं करनी चाहिए

रामचरितमानस- जानिए किस इंसान से किस तरह की बात नहीं करनी चाहिए

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: श्रीरामचरितमानस के दो श्लोकों में भगवान श्री राम हमें बताते है की हमे किस तरह के इंसान से किस तरह की बातें नहीं करनी चाहिए। आइए जानते है कौन है वो लोग और कौनसी है वो बातें-

प्रथम श्लोक

सठ सन बिनय कुटिल सन प्रीती।
सहज कृपन सन सुंदर नीती।

मूर्ख यानी जड़ बुद्धि वाले व्यक्ति से न करें प्रार्थना

श्रीराम कहते हैं कि किसी मूर्ख से विनय की बात नहीं करनी चाहिए। कोई भी मूर्ख व्यक्ति दूसरों की प्रार्थना को समझता नहीं है, क्योंकि वह जड़ बुद्धि होता है। मूर्ख लोगों को डराकर ही उनसे काम करवाया जा सकता है।

कुटिल यानी बेईमान के साथ न करें प्रेम से बात

श्रीराम कहते हैं कि जो व्यक्ति कुटिल स्वभाव वाला होता है, उससे प्रेम पूर्वक बात नहीं करना चाहिए। कुटिल व्यक्ति प्रेम के लायक नहीं होते हैं। ऐसे लोग सदैव दूसरों को कष्ट देने का ही प्रयास करते हैं। ये लोग भरोसेमंद नहीं होते हैं। अपने स्वार्थ के लिए दूसरों को संकट में डाल सकते हैं। अत: कुटिल व्यक्ति से प्रेम पूर्वक बात नहीं करनी चाहिए।

कंजूस से न करें दान की बात

जो लोग स्वभाव से ही कंजूस हैं, धन के लालची हैं, उनसे उदारता की, किसी की मदद करने की, दान करने की बात नहीं करना चाहिए। कंजूस व्यक्ति किसी भी परिस्थिति में धन का दान नहीं कर सकता है। कंजूस से ऐसी बात करने पर हमारा ही समय व्यर्थ होगा।

दूसरा श्लोक

ममता रत सन ग्यान कहानी। अति लोभी सन बिरति बखानी।।
क्रोधिहि सम कामिहि हरिकथा। ऊसर बीज बएँ फल जथा।।

ममता में फंसे हुए व्यक्ति से न करें ज्ञान की बात

श्रीराम कहते हैं- ममता रत सन ग्यान कहानी। यानी जो लोग ममता में फंसे हुए हैं, उनसे ज्ञान की बात नहीं करना चाहिए। ममता के कारण व्यक्ति सही-गलत में भेद नहीं समझ पाता है।

अति लोभी से वैराग्य की बात

अति लोभी सन बिरति बखानी। यानी जो लोग बहुत अधिक लोभी हैं, उनका पूरा मोह धन में ही लगा रहता है। ऐसे लोग कभी भी वैरागी नहीं हो सकते हैं। सदैव धन के लोभ में फंसे रहते हैं। इनकी सोच धन से आगे बढ़ ही नहीं पाती है। अत: ऐसे लोगों से वैराग्य यानी धन का मोह छोड़ने की बात नहीं करना चाहिए।

क्रोधी से शांति का बात

जो व्यक्ति गुस्से में है, उससे शांति की बात करना व्यर्थ है। क्रोध के आवेश में व्यक्ति सब कुछ भूल जाता है। ऐसे समय में वह तुरंत शांत नहीं हो सकता है। जब तक क्रोध रहता है, व्यक्ति शांति से बात नहीं कर पाता है। क्रोध के आवेश में व्यक्ति अच्छी-बुरी बातों में भेद नहीं कर पाता है।

कामी से भगवान की बात

जो व्यक्ति कामी है यानी जिसकी भावनाएं वासना से भरी हुई हैं, उससे भगवान की बात करना व्यर्थ है। कामी व्यक्ति को हर जगह सिर्फ काम वासना ही दिखाई देती है। अति कामी व्यक्ति रिश्तों की और उम्र की मर्यादा को भी भूला देते हैं। अत: ऐसे लोगों से भगवान की बात नहीं करनी चाहिए।

!! जय श्री राम !!
यही सनातन धर्म है , यह प्रभु राम की नीति।
जा को राम सों प्रीति है,करे ना कोइ अनीति।।
!! जय श्री राम वन्दन अभिन्द्न भैया जी
जय श्रीराम!

गीता के मूलमंत्र

🌸 गीता के मूलमंत्र 🌸


🌸अध्याय १
मोह ही सारे तनाव व विषादों का कारण होता है ।

🌸अध्याय २
शरीर नहीं आत्मा को मैं समझो और आत्मा अजन्मा-अमर है ।

🌸अध्याय ३
कर्तापन और कर्मफल के विचार को ही छोड़ना है, कर्म को कभी नहीं ।

🌸अध्याय ४
सारे कर्मों को ईश्वर को अर्पण करके करना ही कर्म संन्यास है ।

🌸अध्याय ५
मैं कर्ता हूँ- यह भाव ही अहंकार है, जिसे त्यागना और सम रहना ही ज्ञान मार्ग है ।

🌸अध्याय ६
आत्मसंयम के बिना मन को नहीं जीता जा सकता, बिना मन जीते योग नहीं हो सकता ।

🌸अध्याय ७
त्रिकालज्ञ ईश्वर को जानना ही भक्ति का कारण होना चाहिये, यही ज्ञानयोग है ।

🌸अध्याय ८
ईश्वर ही ज्ञान और ज्ञेय हैं- ज्ञेय को ध्येय बनाना योगमार्ग का द्वार है ।

🌸अध्याय ९
जीव का लक्ष्य स्वर्ग नहीं ईश्वर से मिलन होना चाहिये ।

🌸अध्याय १०
परम कृपालु सर्वोत्तम नहीं बल्कि अद्वितीय हैं ।

🌸अध्याय ११
यह विश्व भी ईश्वर का स्वरूप है, चिन्ताएँ मिटाने का प्रभुचिन्तन ही उपाय है ।

🌸अध्याय १२
अनन्यता और बिना पूर्ण समर्पण भक्ति नहीं हो सकती और बिना भक्ति भगवान् नहीं मिल सकते ।

🌸अध्याय १३
हर तन में जीवात्मा परमात्मा का अंश है- जिसे परमात्मा का प्रकृतिरूप भरमाता है, यही तत्व ज्ञान है ।

🌸अध्याय १४
प्रकृति प्रदत्त तीनों गुण बंधन देते हैं, इनसे पार पाकर ही मोक्ष संभव है ।

🌸अध्याय १५
काया तथा जीवात्मा दोनों से उत्तम पुरुषोत्तम ही जीव का लक्ष्य हैं ।

🌸अध्याय १६
काम-क्रोध-लोभ से छुटकारा पाये बिना जन्म-मृत्यु के चक्कर से छुटकारा नहीं मिल सकता ।

🌸अध्याय १७
त्रिगुणी जगत् को देखकर दु:खी नहीं होना चाहिये, बस स्वभाव को सकारात्मक बनाने का प्रयास करना चाहिये ।

🌸अध्याय १८
शरणागति और समर्पण ही जीव का धर्म है और यही है गीता का सार ।

जय श्रीकृष्ण.