श्रीकिशोरी जन्मोत्सव चर्चा
श्रीवृषभानु गोप की पत्नी श्रीकीर्ति महारानी नित्य यमुना स्नान करतीं हैं ठाकुर जी का आराधन करतीं हैं , बस मन में एक ही कामना है , हे प्रभु मुझे एक सुंदर सी कन्या पुत्री रूप में प्राप्त हो जिसे मैं अपने हाथों से नहलाऊं , खिलाऊँ , उसका श्रृंगार करूँ , दुलार करूँ । प्रार्थना करते अरसों बीत गये पर फल अभी नहीं मिला ( मिलने में समय भी लगना ही चाहिये आखिर श्रीकृष्ण को भी फल प्रदान करने वाली को जो आना है ) लेकिन मन की अभिलाषा बस यही रही मेरी किशोरी । एक समय कीर्ति महारानी अपनी माँ के घर आयीं " रावल " । नित्य यमुना स्नान ,भगवान का ध्यान । भादौं की शुक्ला अष्टमी को स्नान करने ब्रह्म मुहूर्त में जमुना जल में डुबकी लगाई और ज्यौं ही बाहर सिर निकाला सुन्दर नील कमल पर कोटि कोटि चन्द्रों की आभा को अपने नख मणि में धारण करने वाली अत्यंत आभा युक्त एक छोटी सी छोरी को पाया , हृदय मयूर नृत्य कर गया , नेत्र पथरा गये , रोमावली पुलकित हो गयी । जल्दी से लाली को उठा हृदय से लगा लिया । दौड़ती हुईं श्रीगोप जी के पास आईं । अजी जल्दी उठिये । देखिये । अरे सुनिये तो । नजर पड़ी श्रीगोप जी झूम उठे । अरी कहाँ से लाई इसे ? आखों में प्रेमाश्रु लिये श्रीकीर्ति महारानी बोली अजी जमुना मैया कौ प्रसाद है ये । उनकी कृपा से ये लाली हमें पुत्री रूप में प्राप्त भई है । इतना सुनना ही था श्रीगोप जी तो गदगद हो गये । सारे रावल में हल्ला हो गया " कीर्ति के छोरी हुई है " जिसने सुना सब दौड़े चले आरहे हैं , बधाई गायीं जा रहीं हैं बड़ा आनन्द है और हो भी क्यों ना आनन्दकन्द परमानन्द श्रीकृष्ण को भी आनन्द सागर में गोता लगवाने वालीं स्वयं जो पधारीं हैं । लेकिन ये क्या ? ना तो रोती है , ना ही आँख खोलती है । हे प्रभु ये क्या हुआ इसे । बहुत चेष्टा की पर ना आँख खुली ना मुख से आवाज निकली । सब तरफ बातें होने लगीं अरी कीर्ति की छोरी ना तो बोलै ना आँख खोलै ऐसौ लगै गूंगी और अंधी हतै । हे जमुना महारानी ये कैसा आशीर्वाद दिया तुमने ? पर अब जो हो मेरी छोरी जैसी भी है मेरी है । वर्ष बीतने पर आरहा है पर स्थिति वही । खबर आई अरे नन्द जी के छोरा हुआ है सारे ग्वाल बाल जा रहे हैं गोकुल । श्रीकीर्ति महारानी भी सब सखियों के संग नन्द महल पहुँचीं , बधाई दी । अरे वाह जी लाला बड़ा सुंदर है हाय नजर ना लगे नन्द रानी । देर भले ही हो गयी लेकिन लाला का मुख देख के तो लगता है ऐसा लाला यदि देर से ही मिलता है तो बुढ़ापे में ही लाला मिले । तब तक श्रीकीर्ति जी ने अपनी लाली को रख दिया लाला के बगल में और जैसे ही लाला का हाथ लाली से छुआ मानो चमत्कार सा हो गया । नेत्र खुल गये , मुख से मधुर ध्वनि निकली । अरे ये क्या साल भर से जिसके नेत्र बन्द थे मुख से आवाज नहीं निकली आज नन्द महल में आते ही सब ठीक हो गया । अब तो हर्षोल्लास और बढ़ गया । खूब दूध दही की धार चली । रावल के गोप और गोकुल के ग्वाला , जम के खाये रबड़ी और मावा ।।
नोट - श्रीकिशोरी जी का अवतार गोकुल के पास " रावल " नाम के ग्राम में हुआ है । बरसाने में तो उनके पिता जी का महल था । यह चित्र इसी कथा को कह रहा है यह रावल के मंदिर से खींचा गया है ।
श्रीअलबेली सरकार की जय हो ।
श्रीराधारानी की जय हो ।
श्रीवृषभानु दुलारी की जय हो ।
श्रीवृषभानु गोप की पत्नी श्रीकीर्ति महारानी नित्य यमुना स्नान करतीं हैं ठाकुर जी का आराधन करतीं हैं , बस मन में एक ही कामना है , हे प्रभु मुझे एक सुंदर सी कन्या पुत्री रूप में प्राप्त हो जिसे मैं अपने हाथों से नहलाऊं , खिलाऊँ , उसका श्रृंगार करूँ , दुलार करूँ । प्रार्थना करते अरसों बीत गये पर फल अभी नहीं मिला ( मिलने में समय भी लगना ही चाहिये आखिर श्रीकृष्ण को भी फल प्रदान करने वाली को जो आना है ) लेकिन मन की अभिलाषा बस यही रही मेरी किशोरी । एक समय कीर्ति महारानी अपनी माँ के घर आयीं " रावल " । नित्य यमुना स्नान ,भगवान का ध्यान । भादौं की शुक्ला अष्टमी को स्नान करने ब्रह्म मुहूर्त में जमुना जल में डुबकी लगाई और ज्यौं ही बाहर सिर निकाला सुन्दर नील कमल पर कोटि कोटि चन्द्रों की आभा को अपने नख मणि में धारण करने वाली अत्यंत आभा युक्त एक छोटी सी छोरी को पाया , हृदय मयूर नृत्य कर गया , नेत्र पथरा गये , रोमावली पुलकित हो गयी । जल्दी से लाली को उठा हृदय से लगा लिया । दौड़ती हुईं श्रीगोप जी के पास आईं । अजी जल्दी उठिये । देखिये । अरे सुनिये तो । नजर पड़ी श्रीगोप जी झूम उठे । अरी कहाँ से लाई इसे ? आखों में प्रेमाश्रु लिये श्रीकीर्ति महारानी बोली अजी जमुना मैया कौ प्रसाद है ये । उनकी कृपा से ये लाली हमें पुत्री रूप में प्राप्त भई है । इतना सुनना ही था श्रीगोप जी तो गदगद हो गये । सारे रावल में हल्ला हो गया " कीर्ति के छोरी हुई है " जिसने सुना सब दौड़े चले आरहे हैं , बधाई गायीं जा रहीं हैं बड़ा आनन्द है और हो भी क्यों ना आनन्दकन्द परमानन्द श्रीकृष्ण को भी आनन्द सागर में गोता लगवाने वालीं स्वयं जो पधारीं हैं । लेकिन ये क्या ? ना तो रोती है , ना ही आँख खोलती है । हे प्रभु ये क्या हुआ इसे । बहुत चेष्टा की पर ना आँख खुली ना मुख से आवाज निकली । सब तरफ बातें होने लगीं अरी कीर्ति की छोरी ना तो बोलै ना आँख खोलै ऐसौ लगै गूंगी और अंधी हतै । हे जमुना महारानी ये कैसा आशीर्वाद दिया तुमने ? पर अब जो हो मेरी छोरी जैसी भी है मेरी है । वर्ष बीतने पर आरहा है पर स्थिति वही । खबर आई अरे नन्द जी के छोरा हुआ है सारे ग्वाल बाल जा रहे हैं गोकुल । श्रीकीर्ति महारानी भी सब सखियों के संग नन्द महल पहुँचीं , बधाई दी । अरे वाह जी लाला बड़ा सुंदर है हाय नजर ना लगे नन्द रानी । देर भले ही हो गयी लेकिन लाला का मुख देख के तो लगता है ऐसा लाला यदि देर से ही मिलता है तो बुढ़ापे में ही लाला मिले । तब तक श्रीकीर्ति जी ने अपनी लाली को रख दिया लाला के बगल में और जैसे ही लाला का हाथ लाली से छुआ मानो चमत्कार सा हो गया । नेत्र खुल गये , मुख से मधुर ध्वनि निकली । अरे ये क्या साल भर से जिसके नेत्र बन्द थे मुख से आवाज नहीं निकली आज नन्द महल में आते ही सब ठीक हो गया । अब तो हर्षोल्लास और बढ़ गया । खूब दूध दही की धार चली । रावल के गोप और गोकुल के ग्वाला , जम के खाये रबड़ी और मावा ।।
नोट - श्रीकिशोरी जी का अवतार गोकुल के पास " रावल " नाम के ग्राम में हुआ है । बरसाने में तो उनके पिता जी का महल था । यह चित्र इसी कथा को कह रहा है यह रावल के मंदिर से खींचा गया है ।
श्रीअलबेली सरकार की जय हो ।
श्रीराधारानी की जय हो ।
श्रीवृषभानु दुलारी की जय हो ।