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Sunday, 19 May 2019

गायत्री मंत्र कब ज़रूरी है

गायत्री मंत्र कब ज़रूरी है

सुबह उठते वक़्त 8 बार
अष्ट कर्मों को जीतने के लिए !!

भोजन के समय 1 बार
अमृत समान भोजन प्राप्त होने के लिए !! 

बाहर जाते समय 3 बार
समृद्धि सफलता और सिद्धि के लिए !! 

मन्दिर में 12 बार
प्रभु के गुणों को याद करने के लिए !! 

छींक आए तब गायत्री मंत्र उच्चारण
1 बार अमंगल दूर करने के लिए !!

सोते समय 7 बार
सात प्रकार के भय दूर करने के लिए !! 

, ओउम् तीन अक्षरों से बना है।
अ उ म् । 
"अ" का अर्थ है उत्पन्न होना,
"उ" का तात्पर्य है उठना, उड़ना अर्थात् विकास, 
"म" का मतलब है मौन हो जाना अर्थात् "ब्रह्मलीन" हो जाना।
ॐ सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति और पूरी सृष्टि का द्योतक है।
ॐ का उच्चारण शारीरिक लाभ प्रदान करता है।
ॐ कैसे है स्वास्थ्यवर्द्धकऔर अपनाएं आरोग्य के लिए ॐ के

उच्चारण का मार्ग...

1. ॐ और थायराॅयडः-
ॐ का उच्चारण करने से गले में कंपन पैदा होती है जो थायरायड ग्रंथि पर सकारात्मक प्रभाव डालता है।
2. ॐ और घबराहटः-
अगर आपको घबराहट या अधीरता होती है तो ॐ के उच्चारण से उत्तम कुछ भी नहीं।
3. ॐ और तनावः-
यह शरीर के विषैले तत्त्वों को दूर करता है, अर्थात तनाव के कारण पैदा होने वाले द्रव्यों पर नियंत्रण करता है।
4. ॐ और खून का प्रवाहः-
यह हृदय और ख़ून के प्रवाह को संतुलित रखता है।
5. ॐ और पाचनः-
ॐ के उच्चारण से पाचन शक्ति तेज़ होती है।
6. ॐ लाए स्फूर्तिः-
इससे शरीर में फिर से युवावस्था वाली स्फूर्ति का संचार होता है।
7. ॐ और थकान:-
थकान से बचाने के लिए इससे उत्तम उपाय कुछ और नहीं।
8. ॐ और नींदः-
नींद न आने की समस्या इससे कुछ ही समय में दूर हो जाती है। रात को सोते समय नींद आने तक मन में इसको करने से निश्चिंत नींद आएगी।
9. ॐ और फेफड़े:-
कुछ विशेष प्राणायाम के साथ इसे करने से फेफड़ों में मज़बूती आती है।
10. ॐ और रीढ़ की हड्डी:-
ॐ के पहले शब्द का उच्चारण करने से कंपन पैदा होती है। इन कंपन से रीढ़ की हड्डी प्रभावित होती है और इसकी क्षमता बढ़ जाती है।
11. ॐ दूर करे तनावः-
ॐ का उच्चारण करने से पूरा शरीर तनाव-रहित हो जाता है।


जय श्रीराम

क्यों कहा जाता है भोले बाबा को कालो के काल महाकाल

क्यों कहा जाता है भोले बाबा को कालो के काल महाकाल
महाकाल को कालो का काल अर्थात काल का नियंत्रक कहा जाता है। संसार में सभी कुछ काल के आधीन हैं। जो व्यक्ति समय का सदुपयोग करते हुए उसके अनुसार चलता है, वही प्रगति करता है और जो समय को सम्मान नहीं देता, वह जीवन में पिछड़ जाता है। पौराणिक ग्रंथों में अवंतिका (उज्जयिनी) को काल के देवता भगवान महाकालेश्वर की नगरी के रूप में गौरव प्राप्त है। द्वादश ज्योतिर्लिगों में गिने जाने वाले भगवान महाकालेश्वर को शास्त्रों में मृत्युलोक (भूलोक) का अधिपति कहा गया है। सौरपुराण में महाकाल को दिव्यलिङ्ग कहा गया है-
महाकालस्य लिङ्गस्य दिव्यलिङ्ग: तदुच्यते।
मान्यता है कि पूर्वकाल में उज्जयिनी में घना वन था। महाकाल के यहां पधारने के बाद से वह क्षेत्र महाकाल-वन के नाम से जाना जाने लगा। स्कंदपुराण के अवंतीखंड में महाकाल-वन में महाकालेश्वर के निवास करने की कथा है। कथा के अनुसार, प्रलयकाल में सारा संसार गहरे अंधकार में डूब गया था। उस समय न सूर्य था और न ही चांद-तारे। महाकालेश्वर ने ब्रम्हा जी को उत्पन्न कर उन्हें सृष्टि के निर्माण का आदेश दिया। ब्रहमा जी के निवेदन करने पर श्रीमहाकालेश्वर ने महाकाल-वन में निवास करना स्वीकार किया। इससे स्पष्ट हो जाता है कि सृष्टि का प्रारंभ एवं कालचक्र का प्रवर्तन श्रीमहाकाल से ही हुआ है। धर्मग्रंथ कहते हैं
कालचक्र प्रवर्तको महाकाल: प्रतापन:।
अर्थात कालचक्र के प्रवर्तक महाकाल अत्यंत प्रतापी हैं।
द्वादश ज्योतिर्लिगों में मात्र महाकालेश्वर ही दक्षिण-मुखी हैं। यहां दक्षिण दिशा में मृत्यु के देवता यमराज मृत्यु के वाहक काल के साथ विराजते हैं। मान्यता है कि महाकाल अपनी दृष्टि से इन पर नियंत्रण रखते हैं।
नित्य प्रात: 4 से 6 के मध्य होने वाली श्रीमहाकालेश्वर की भस्म आरती अनूठी और विख्यात है। उज्जयिनी आने वाला प्रत्येक तीर्थयात्री इस आरती को देखने का इच्छुक होता है। यह आरती गाय के गोबर से बने उपलों (कण्डों) से निर्मित भस्म से होती है। आरती के समय महाकालेश्वर का दर्शन करके भक्तगण मंत्रमुग्ध हो जाते हैं।
उज्जयिनी में महाकालेश्वर-मंदिर कब बना, यह सही रूप से कह पाना कठिन है। निश्चित ही यह धर्मस्थल प्रागैतिहासिक देन है। समय-समय पर इसका जीर्णोद्धार होता रहा है। वेदव्यास, कालिदास, तुलसीदास और महाकवि रवींद्रनाथ टैगोर ने श्रीमहाकाल की वाड्.मयी अर्चना की है। मंदिर के वर्तमान स्वरूप का श्रेय अठारहवीं शताब्दी में मराठा शासक बाजीराव पेशवा प्रथम के समय राणोजी शिन्दे(सिंधिया) के शासनकाल में मालवा के सूबेदार रहे रामचंद्रबाबा शेणवी को जाता है।
श्री महाकालेश्वर मंदिर में साल-भर उत्सव होते रहते हैं। इनमें महाकालेश्वर नवरात्र लोकविख्यात है। फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष में महाशिवरात्रि के नौ दिन पूर्व से महाकालेश्वर का यह विशिष्ट नवरात्र प्रारंभ होता है, जिसका समापन श्रीमहाकाल के विवाहोत्सव के साथ होता है। नवरात्र के नौदिवसीय पर्वकाल में श्रीमहाकालेश्वर का नित नूतन श्रृंगार, पूजन, रुद्राभिषेक तथा हरि-हर कथा का आयोजन होता है। महाशिवरात्रि पर पुष्पों से महाकाल को सेहरा बांधा जाता है। महाकालेश्वर को देख भक्त कह उठते हैं-
महाकाल महादेव, महाकाल महाप्रभो। महाकाल महारुद्र, महाकाल नमोस्तु ते॥